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    देवनारायण का पाताल विजय अभियान: राक्षसों का संहार कर नाग कन्या और दैत्य पुत्री से रचाया विवाह

    10 hours ago

    गढ़ गाजणा के युद्ध से पाताल लोक तक गूंजा देव अवतार का प्रताप, भोपा संस्कृति के प्रतीकों का हुआ प्राकट्य

    राजस्थान। लोक संस्कृति के महानायक और विष्णु स्वरूप देवनारायण की गाथाएं शौर्य और अध्यात्म का अनूठा संगम हैं। उनके जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय गढ़ गाजणा का युद्ध और उसके पश्चात पाताल लोक में उनकी विजय से जुड़ा है। यह कथा न केवल उनके पराक्रम को दर्शाती है, बल्कि यह भी स्पष्ट करती है कि किस प्रकार देवनारायण की फड़ बांचने वाले भोपा समाज के पारंपरिक प्रतीकों का जन्म हुआ।

    रक्तबीज सदृश राक्षसों का अंत और जोगणियों का आह्वान

    पौराणिक वृत्तांत के अनुसार, जब देवनारायण ने गढ़ गाजणा के बाहर राक्षसों का संहार प्रारंभ किया, तो एक विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गई। किसी भी राक्षस को मारने पर उसके रक्त की बूंदें जमीन पर गिरते ही नए राक्षसों को जन्म दे रही थीं। इस मायावी संकट को देखते हुए देवनारायण ने अपने दाहिने पांव से 64 जोगणियों और 52 भैरुओं को प्रकट किया। उन्होंने आदेश दिया कि राक्षसों के रक्त की एक भी बूंद धरती का स्पर्श न करे। जोगणियों और भैरुओं ने समस्त रक्त का पान किया, जिससे राक्षसों का समूल नाश संभव हो सका।

    पाताल लोक प्रस्थान और शेषनाग से साक्षात्कार

    भयंकर युद्ध के अंत में गज दन्त और नीम दन्त नामक दो शेष राक्षस साडू माता की घोड़ी लेकर पाताल लोक की खाई में जा छिपे। उनका पीछा करते हुए देवनारायण भी पाताल लोक जा पहुंचे, जहां पृथ्वी को धारण करने वाले शेषनाग विश्राम कर रहे थे। देवनारायण के अश्व की टापों की गूँज से शेषनाग जागृत हुए। जब देवनारायण ने उनसे राक्षसों के विषय में पूछा, तो शेषनाग ने अपनी कुंवारी नाग कन्या के साथ विवाह का प्रस्ताव रखा, जिसे देवनारायण ने स्वीकार कर लिया।

    'सेली' का रहस्य: जोगी भोपा को मिला वरदान

    नाग कन्या के साथ प्रथम फेरा पूर्ण करने के बाद, देवनारायण ने चंवरी से उठकर एक तीव्र फटकार मारी। इस अलौकिक क्रिया से 'सेली' (काली डोरी) का निर्माण हुआ, जिसे उन्होंने जोगी भोपा को प्रदान किया। यही कारण है कि आज भी देवनारायण की फड़ बांचने वाले भोपे परंपरा के अनुसार अपने गले में इस काली डोरी को धारण करते हैं।

    दैत्य कन्या चीमटी बाई और फड़ दर्शन की लकड़ी

    शेषनाग से मार्ग का ज्ञान प्राप्त कर देवनारायण पुनः गढ़ गाजणा पहुंचे और दैत्यराज की सेना पर आक्रमण किया। भयभीत होकर गज दन्त और नीम दन्त ने साडू माता की काली घोड़ी और किवाड़ लौटा दिए। इसके साथ ही उन्होंने अपनी राजकुमारी चीमटी बाई (दैत्य कन्या) से विवाह का आग्रह किया। देवनारायण ने वहां दूसरा विवाह किया और दूसरे फेरे के बाद पुनः फटकार मारकर एक लकड़ी तैयार की। यह वही लकड़ी है जिसका उपयोग भोपा आज भी फड़ का परिचय देते समय दृश्यों को दर्शाने के लिए करते हैं।

    एक जीवंत परंपरा का आधार

    देवनारायण के ये प्रसंग केवल कथाएं नहीं हैं, बल्कि ये उस संस्कृति का आधार हैं जो सदियों से ग्रामीण अंचलों में रची-बसी है। पाताल लोक की इस विजय गाथा ने समाज को यह संदेश दिया कि अधर्म चाहे कितना भी गहरा क्यों न छिपा हो, नारायण का प्रताप उसे खोज निकालता है। आज भी 'जय देव धणी' के जयघोष के साथ भक्त इन चमत्कारों को याद करते हैं।

     

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