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    भारत समेत 5 देशों पर 100% अमेरिकी टैरिफ का खतरा, रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर सख्त कार्रवाई की तैयारी

    1 hour ago

     
     

    Yugcharan News / 18-09-2026

    नई दिल्ली: रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों पर अमेरिकी दबाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने एक ऐसे विधेयक को आगे बढ़ाया है, जिसके तहत राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से ऊर्जा खरीदने वाले प्रमुख देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है। इस संभावित कदम से भारत समेत पांच देशों के व्यापारिक हित प्रभावित हो सकते हैं।

    अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने बुधवार को Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 को आगे बढ़ाने के पक्ष में 214-211 के अंतर से मतदान किया। अब इस विधेयक पर अंतिम मतदान गुरुवार को होना है। रिपोर्ट के अनुसार, विधेयक को अंतिम मंजूरी मिलने की संभावना को लेकर अमेरिकी संसद में प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ रही है।

    इस प्रस्तावित कानून में भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान जैसे रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों को संभावित रूप से निशाना बनाया जा सकता है। हालांकि, यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है कि विधेयक पारित होने मात्र से भारत पर तत्काल 100 प्रतिशत टैरिफ लागू नहीं हो जाता। प्रस्ताव राष्ट्रपति को ऐसी कार्रवाई करने का अधिकार देगा और किसी देश पर वास्तविक टैरिफ लगाने का निर्णय बाद में अमेरिकी प्रशासन द्वारा लिया जाएगा।

    रूस से ऊर्जा खरीद पर अमेरिकी दबाव

    रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए अमेरिका लंबे समय से विभिन्न प्रतिबंधों और आर्थिक उपायों का इस्तेमाल करता रहा है। प्रस्तावित नया कानून इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है। इसका उद्देश्य रूस की ऊर्जा बिक्री से होने वाली आय को प्रभावित करना और उन देशों पर दबाव बढ़ाना है जो रूसी तेल या गैस की खरीद जारी रखते हैं।

    विधेयक के तहत अमेरिकी प्रशासन को रूस के पांच सबसे बड़े ऊर्जा खरीदारों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है। इसके अलावा उन पांच देशों के खिलाफ भी टैरिफ का प्रावधान प्रस्तावित है, जिन पर रूस को मौजूदा प्रतिबंधों से बचने में सहायता करने का आरोप लगाया जाता है।

    टैरिफ की वास्तविक दर निर्धारित करने की जिम्मेदारी अमेरिकी Trade Representative को दी जा सकती है। इसका मतलब यह है कि सभी संबंधित देशों पर समान दर लागू होना अनिवार्य नहीं होगा और आगे की प्रशासनिक कार्रवाई इस संबंध में महत्वपूर्ण होगी।

    भारत पर संभावित असर

    भारत इस पूरे घटनाक्रम में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में बदलाव आया और भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूसी तेल की खरीद में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    भारत का ऊर्जा आयात उसके आर्थिक हितों से सीधे जुड़ा हुआ है। देश अपनी घरेलू खपत की बड़ी जरूरतों को पूरा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार से कच्चा तेल खरीदता है। ऐसे में किसी प्रमुख आपूर्तिकर्ता के साथ व्यापारिक व्यवस्था में अचानक बदलाव का असर आयात लागत, रिफाइनिंग और व्यापक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है।

    भारत के लिए एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू अमेरिका के साथ उसके बढ़ते आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार और टैरिफ से जुड़े मुद्दों पर पहले से बातचीत चल रही है। ऐसे समय में रूस से भारत की ऊर्जा खरीद को लेकर अमेरिका द्वारा अतिरिक्त शुल्क की संभावना द्विपक्षीय व्यापार संबंधों में एक नया मुद्दा जोड़ सकती है।

    सीनेट में पहले ही पारित हो चुका है विधेयक

    रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी सीनेट ने इस विधेयक को अगस्त में भारी बहुमत से पारित किया था। इसके बाद अब प्रतिनिधि सभा में इसकी प्रक्रिया आगे बढ़ी है।

    विधेयक को दोनों दलों के सांसदों से समर्थन और विरोध दोनों का सामना करना पड़ा है। कुछ डेमोक्रेट सांसदों ने राष्ट्रपति को व्यापारिक साझेदारों पर व्यापक टैरिफ लगाने की अतिरिक्त शक्ति देने पर आपत्ति जताई है। वहीं, कुछ रिपब्लिकन सांसदों ने भी आशंका जताई है कि व्यापक प्रतिबंध और टैरिफ अमेरिकी ऊर्जा कीमतों तथा घरेलू अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं।

    इससे पता चलता है कि विधेयक को लेकर अमेरिकी राजनीति में भी अलग-अलग मत मौजूद हैं। हालांकि, बुधवार को हुए प्रक्रियात्मक मतदान के बाद इसे अंतिम मतदान के लिए आगे बढ़ा दिया गया।

    भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता के बीच नया मुद्दा

    रूस से तेल खरीद को लेकर प्रस्तावित अमेरिकी कार्रवाई ऐसे समय सामने आई है जब भारत और अमेरिका अपने द्विपक्षीय व्यापार संबंधों को लेकर बातचीत कर रहे हैं।

    दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते और टैरिफ से जुड़े कई मुद्दों पर चर्चा होती रही है। यदि अमेरिकी प्रशासन रूस से ऊर्जा खरीद के आधार पर भारत पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने के अधिकार का इस्तेमाल करता है, तो इससे दोनों देशों के बीच चल रही आर्थिक बातचीत पर एक और जटिल विषय जुड़ सकता है।

    भारत के लिए स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका उसके प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में शामिल है, जबकि रूस ऊर्जा और रक्षा सहित कई क्षेत्रों में लंबे समय से भारत का महत्वपूर्ण साझेदार रहा है।

    इस परिस्थिति में भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों, अंतरराष्ट्रीय व्यापार संबंधों और व्यापक आर्थिक हितों के बीच संतुलन बनाए रखना होगा।

    अंतिम फैसला अभी बाकी

    वर्तमान स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रतिनिधि सभा में विधेयक की प्रक्रिया आगे बढ़ी है, लेकिन भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लागू होने का कोई स्वतः निर्णय नहीं हुआ है।

    अंतिम मतदान और उसके बाद की विधायी प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। यदि कानून प्रभावी होता है, तो उसके बाद अमेरिकी प्रशासन के फैसले यह तय करेंगे कि किन देशों के खिलाफ किस स्तर के टैरिफ लगाए जाते हैं और किन परिस्थितियों में उनका इस्तेमाल किया जाता है।

    इसलिए फिलहाल भारत के लिए तत्काल प्रभाव के बजाय संभावित जोखिम और आगे की अमेरिकी नीति पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।

    वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी असर की आशंका

    इस प्रस्तावित कानून का असर केवल भारत-अमेरिका संबंधों तक सीमित नहीं रह सकता। रूस दुनिया के प्रमुख ऊर्जा उत्पादकों में शामिल है और भारत तथा चीन जैसे बड़े देशों के साथ उसका ऊर्जा व्यापार वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था का हिस्सा है।

    यदि रूस से तेल खरीदने वाले बड़े देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाए जाते हैं या रूसी ऊर्जा व्यापार पर और दबाव बढ़ता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति के रास्तों में बदलाव आ सकता है। इससे तेल की कीमतों, परिवहन लागत और विभिन्न देशों की खरीद रणनीतियों पर प्रभाव पड़ सकता है।

    भारत के लिए रूसी तेल की खरीद में किसी भी बड़े बदलाव का अर्थ अन्य स्रोतों से अधिक आयात करना हो सकता है। ऐसी स्थिति में कीमत, आपूर्ति की उपलब्धता और परिवहन लागत जैसे कारक महत्वपूर्ण हो जाएंगे।

    आगे की प्रक्रिया पर नजर

    अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में विधेयक को आगे बढ़ाए जाने के बाद अब सभी की नजर अंतिम मतदान पर है। इसके बाद राष्ट्रपति के स्तर पर होने वाली कार्रवाई भी महत्वपूर्ण होगी।

    भारत की ओर से भी इस घटनाक्रम पर कूटनीतिक और आर्थिक स्तर पर नजर रखी जा रही है। नई दिल्ली के लिए रूस के साथ ऊर्जा व्यापार और अमेरिका के साथ आर्थिक संबंध दोनों ही महत्वपूर्ण हैं।

    यदि प्रस्तावित कानून आगे बढ़ता है, तो उसके वास्तविक प्रभाव का आकलन केवल विधेयक के प्रावधानों से नहीं, बल्कि अमेरिकी प्रशासन द्वारा लिए जाने वाले अगले फैसलों से होगा। भारत पर कोई अतिरिक्त टैरिफ वास्तव में लागू होता है या नहीं, उसकी दर क्या होती है और किन वस्तुओं को प्रभावित किया जाता है—इन सभी सवालों के जवाब आगे की प्रक्रिया में सामने आएंगे।

    फिलहाल अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में रूस प्रतिबंध विधेयक की प्रगति ने भारत के लिए व्यापार और ऊर्जा नीति के मोर्चे पर एक नई चुनौती जरूर खड़ी कर दी है। आने वाले दिनों में वॉशिंगटन के फैसले और नई दिल्ली की कूटनीतिक प्रतिक्रिया यह तय करेगी कि इस घटनाक्रम का भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों और भारत की रूस से ऊर्जा खरीद पर कितना प्रभाव पड़ता है।

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