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    भारतीय भाषाओं को सशक्त करना ही भारत की आत्मा को सशक्त करना है : प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी CBSE के त्रिभाषा सूत्र (R3) के समर्थन में उठी राष्ट्रीय आवाज़

    1 hour ago

    जयपुर । कक्षा 9 से केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) द्वारा त्रिभाषा सूत्र (R3) के कार्यान्वयन के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में दायर जनहित याचिका (PIL) के बाद देशभर में भारतीय भाषाओं, सांस्कृतिक अस्मिता और शिक्षा नीति को लेकर व्यापक चर्चा प्रारंभ हो गई है। शिक्षा जगत, भाषाविदो तथा भारतीय भाषाओ के समर्थको का मानना है कि यह केवल पाठ्यक्रम से जुड़ा विषय नहीं, बल्कि भारत की भाषाई पहचान, सांस्कृतिक निरंतरता और शैक्षिक न्याय से संबंधित अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दा है।

    भारतीय भाषाओं को लेकर बढ़ी राष्ट्रीय चिंता

    विशेषज्ञों का कहना है कि देश के सीमित अभिजात्य वर्ग अथवा विदेशी भाषा समर्थक समूहों की अपेक्षाओं के आधार पर करोड़ों विद्यार्थियों को भारतीय भाषाओं के अध्ययन से वंचित नहीं किया जा सकता। अधिकांश विद्यार्थी आठवीं कक्षा तक किसी भारतीय भाषा का अध्ययन करते हैं और नई व्यवस्था उन्हें कक्षा 9 एवं 10 तक उसी भाषा का अध्ययन जारी रखने का अवसर प्रदान करती है।

    भारत की भाषाएँ केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना और ज्ञान परंपरा की आधारशिला हैं। इस विषय पर केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने कहा कि भारत की भाषाएँ केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना और ज्ञान परंपरा की आधारशिला हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीय भाषाओ को शिक्षा और अनुसंधान के केंद्र में स्थापित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल है तथा सीबीएसई केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का त्रिभाषा सूत्र उसी दूरदर्शी सोच का व्यावहारिक स्वरूप है। प्रो. वरखेड़ी ने कहा जो विद्यार्थी प्रारंभिक कक्षाओ से भारतीय भाषाओं का अध्ययन करते आए हैं, उन्हें माध्यमिक स्तर पर भी भाषाई निरंतरता का अवसर मिलना चाहिए। मातृभाषा और भारतीय भाषाओ में शिक्षा विद्यार्थियों के बौद्धिक विकास, आत्मविश्वास और सृजनात्मक क्षमता को सुदृढ़ करती है। भारत की भाषाई विविधता हमारी सबसे बड़ी शक्ति है और इसे संरक्षित तथा समृद्ध करना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।

    विदेशी भाषाओं का विरोध नहीं, भारतीय भाषाओं का सम्मान

    प्रो. वरखेड़ी ने स्पष्ट किया कि भारतीय भाषाओ के संवर्धन का अर्थ किसी विदेशी भाषा का विरोध नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत सदैव विश्व ज्ञान के प्रति उदार और खुला रहा है, किंतु अपनी भाषाई जड़ों को कमजोर कर कोई भी राष्ट्र दीर्घकाल तक आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी नहीं रह सकता। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की मूल भावना से जुड़ा R3 मॉडल

    शिक्षाविदों के अनुसार सीबीएसई द्वारा लागू किया जा रहा R3 मॉडल राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) की मूल भावना के अनुरूप है। नई शिक्षा नीति मातृभाषा आधारित शिक्षा, बहुभाषिकता तथा भारतीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन पर विशेष बल देती है।

    विभिन्न अंतरराष्ट्रीय शोधों में भी यह सिद्ध हुआ है कि विद्यार्थी अपनी परिचित भाषा में अधिक प्रभावी ढंग से सीखते हैं तथा उनका बौद्धिक, भावनात्मक और रचनात्मक विकास अधिक सुदृढ़ होता है।

    भारतीय भाषाओं के अध्ययन के प्रमुख लाभ

    1. बौद्धिक विकास

    बहुभाषिक शिक्षा विद्यार्थियों की स्मरण शक्ति, तार्किक चिंतन और रचनात्मकता को विकसित करती है।

    2. शैक्षिक समानता

    भारतीय भाषाएँ शिक्षा को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने का प्रभावी माध्यम हैं तथा इससे शिक्षा में कृत्रिम अभिजात्यवाद कम होता है। 3. सांस्कृतिक संरक्षण

    भाषा के माध्यम से साहित्य, लोकज्ञान, परंपराएँ और राष्ट्रीय स्मृतियाँ सुरक्षित रहती हैं। 4.राष्ट्रीय एकता भारतीय भाषाएँ विभिन्न क्षेत्रों के बीच सांस्कृतिक संवाद और भावनात्मक एकता को सुदृढ़ करती हैं।

    5.विद्यार्थियों के हित में निरंतरता

    आठवीं कक्षा तक किसी भारतीय भाषा का अध्ययन कर चुके विद्यार्थियों को आगे भी उसी भाषा के अध्ययन का अवसर मिलना चाहिए।

    इसे लेकर जन-जागरण अभियान चलाने की आवश्यकता

    शिक्षा एवं संस्कृति से जुड़े विद्वानों ने देशभर में भारतीय भाषाओ के समर्थन में सकारात्मक जन-जागरण अभियान चलाने की आवश्यकता पर बल दिया है। सामाजिक मीडिया, प्रिंट मीडिया, डिजिटल मंचों, शिक्षण संस्थानों और सांस्कृतिक संगठनों से अपेक्षा की जा रही है कि वे बहुभाषिक शिक्षा और भारतीय भाषाओ के महत्व को समाज तक पहुँचाने में सक्रिय भूमिका निभाएँ।

     

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