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    राजस्थान ज्ञान सभा में बनी भारतीय संस्कृति और मूल्यों पर आधारित नई शिक्षा व्यवस्था की रूपरेखा

    1 month ago

    जॉब सीकर' नहीं, अब 'जॉब क्रिएटर' तैयार करेगी राजस्थान की नई शिक्षा नीति- राजस्थान ज्ञान सभा

    -राजस्थान को आत्मनिर्भर आर्थिक इकोसिस्टम बनाने हेतु जेईसीआरसी में प्रदेशव्यापी वैचारिक यात्रा का संकल्प

    -सड़कें और इमारतें नहीं, ज्ञान, नैतिकता और संवेदनशीलता है असली विकास- वासुदेव देवनानी; राजस्थान ज्ञान सभा

    -जयपुर,

    परंपरा की जड़ों से आधुनिकता के आकाश तक, राजस्थान की शिक्षा व्यवस्था को एक नए युग में ले जाने का जो संकल्प 21 मार्च को जेइसीआरसी विश्वविद्यालय की दहलीज़ से शुरू हुआ, वह 22 मार्च को एक ठोस 'विज़न डॉक्यूमेंट' के साथ संपन्न हुआ। जेइसीआरसी विश्वविद्यालय, आयुक्तालय कॉलेज शिक्षा, शिक्षा विभाग (राजस्थान सरकार), और शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के साझा संकल्प का परिणाम यह दो दिवसीय 'राजस्थान ज्ञान सभा' केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि प्रदेश की बौद्धिक चेतना का वह पुनर्जागरण बना, जहाँ पुरातन विरासत और नवीन विज्ञान के बीच की दूरियां सिमटी।

    इस महामंथन का उद्देश्य राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में 'संस्कार और मूल्य' आधारित शिक्षा की रूपरेखा तैयार करना था। जहाँ, राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी, शिक्षा एवं पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर, पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रो. रमेश पोखरियाल 'निशंक' और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख सुनील मेहता सहित कई गणमान्य शिक्षाविदों ने अपने विचार साझा किए।

    इन दो दिनों, कुल पांच महत्वपूर्ण तकनीकी सत्र आयोजित किए गए, जिनमें कौशल विकास, रोजगार सृजन, विज्ञान एवं तकनीकी नवाचार और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों पर गहन चर्चा हुई। 

    ‘राजस्थान में कौशल आधारित शिक्षा और आर्थिक परिप्रेक्ष्य’ पर केंद्रित सत्र में शिक्षाविदों ने पारंपरिक ज्ञान से आगे बढ़कर व्यावहारिक शिक्षा की आवश्यकता पर संवाद किया। संस्थानों में संचालित वोकेशनल ट्रेनिंग, इन्क्यूबेशन सेंटर्स और स्थानीय कारीगरों को सशक्त करने वाले माइक्रो-एंटरप्रेन्योरशिप के सफल अनुभवों को साझा करते हुए, इस बात पर सर्वसम्मति बनी कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली को 'रोज़गार चाहने वालों' के बजाय 'रोज़गार सृजनकर्ताओं' के निर्माण पर केंद्रित होना चाहिए।

    वहीं, 'राजस्थान की शिक्षा में पर्यावरण एवं सतत विकास' सत्र में आधुनिक 'ग्रीन कैंपस' के निर्माण के साथ-साथ, हमारी सदियों पुरानी पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली को नई शिक्षा प्रणाली में पिरोने पर विशेष बल दिया गया। शिक्षाविदों ने स्पष्ट किया कि जल संरक्षण और शून्य-अपशिष्ट जैसी प्राचीन भारतीय पद्धतियों को आज के शिक्षण परिसरों की दैनिक कार्यप्रणाली का अभिन्न अंग बनाना आवश्यक है।

    समापन सत्र में मुख्य अथिति, राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष, वासुदेव देवनानी ने शिक्षकों को राष्ट्र-निर्माण की धुरी बताते हुए स्पष्ट किया कि शिक्षण कोई सामान्य पेशा नहीं, बल्कि स्वप्रेरणा से उत्पन्न एक पवित्र दायित्व है। उन्होंने 'विकास' की पारंपरिक परिभाषा को नया आयाम देते हुए बताया कि सशक्त समाज का निर्माण केवल भौतिक ढांचे से नहीं, बल्कि ज्ञान, नैतिकता और संवेदनशीलता से होता है। उन्होंने शिक्षा प्रणाली में भारतीय ज्ञान परंपरा को गर्व के साथ शामिल करने पर बल दिया, ताकि युवा पीढ़ी औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होकर आत्मनिर्भर और सांस्कृतिक रूप से जागरूक बन सके। साथ ही शिक्षकों से आह्वान किया कि वे नवाचार, पर्यावरण संरक्षण और अपने उत्कृष्ट आचरण से विद्यार्थियों का सर्वमुखी व समावेशी विकास सुनिश्चित करें।

    यह महामंथन अब केवल चर्चा तक सीमित नहीं है; इसका मुख्य लक्ष्य राजस्थान को एक आत्मनिर्भर आर्थिक इकोसिस्टम बनाना और प्रकृति के प्रति सजग ऐसी युवा शक्ति तैयार करना है, जो राज्य की प्रगति का मुख्य आधार बने। इसी संकल्प के साथ यह तय किया गया है कि शिक्षा में 'संस्कार, मूल्य और आत्मनिर्भरता' का यह विमर्श अब चित्तौड़ और जोधपुर प्रांतों से होते हुए, संभाग और जिला स्तर तक एक जीवंत वैचारिक यात्रा का रूप लेगा।

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