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    जंतर-मंतर प्रदर्शन से जुड़े व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, दिल्ली पुलिस पर अपहरण और उत्पीड़न के गंभीर आरोप

    1 hour ago

    युगचरण न्यूज़ / 29 जुलाई 2026

    नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित छात्र आंदोलन से जुड़ा एक नया कानूनी विवाद सामने आया है। प्रदर्शन के दौरान आंदोलनकारियों के लिए भोजन की व्यवस्था करने वाले जुनैद मलिक ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दिल्ली पुलिस और उत्तर प्रदेश पुलिस के कुछ अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। याचिका में दावा किया गया है कि उन्हें कथित तौर पर जबरन उठाया गया, कई घंटों तक पूछताछ की गई और बाद में उत्तराखंड के देहरादून के पास छोड़ दिया गया। साथ ही यह भी आरोप लगाया गया है कि उनके परिवार के सदस्यों पर भी दबाव बनाया गया।

    हालांकि, इन आरोपों पर संबंधित पुलिस एजेंसियों की ओर से इस मामले में विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। मामला अब सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है।

    सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुई याचिका

    मंगलवार को दायर याचिका में जुनैद मलिक ने कहा कि वे जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों के लिए भोजन उपलब्ध कराने का कार्य कर रहे थे। उनके अनुसार, इसी गतिविधि के कारण उन्हें निशाना बनाया गया।

    याचिका में आरोप लगाया गया है कि कुछ लोगों ने उन्हें कथित रूप से अपनी हिरासत में लिया, भोजन की व्यवस्था और उसके लिए प्राप्त धन के स्रोत के बारे में पूछताछ की तथा बाद में उन्हें देहरादून के समीप छोड़ दिया। इन दावों की स्वतंत्र रूप से आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और इनकी जांच न्यायिक प्रक्रिया के तहत की जाएगी।

    परिवार को भी परेशान करने का आरोप

    सुप्रीम कोर्ट में पेश याचिका के अनुसार, जुनैद मलिक ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश पुलिस के कुछ अधिकारियों ने उनके परिवार के सदस्यों से भी पूछताछ की और उन पर दबाव बनाया कि वे जुनैद को आंदोलन से दूर रहने और पुलिस के सामने उपस्थित होने के लिए कहें।

    याचिका में यह भी कहा गया कि परिवार के अन्य सदस्यों, जिनमें उनकी विवाहित बहन का परिवार भी शामिल है, से कथित रूप से पूछताछ की गई। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस प्रकार की कार्रवाई मौलिक अधिकारों के विरुद्ध है और इसकी न्यायिक समीक्षा आवश्यक है।

    वरिष्ठ अधिवक्ता ने रखा पक्ष

    सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने पक्ष रखा। उन्होंने अदालत के समक्ष कहा कि यदि किसी व्यक्ति ने केवल आंदोलन में भोजन उपलब्ध कराया है तो उसके आधार पर उसके परिवार पर दबाव बनाना या पूछताछ करना उचित नहीं माना जा सकता।

    याचिका में यह भी कहा गया कि राज्य की शक्तियों का उपयोग किसी नागरिक को डराने या उसके लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रयोग से रोकने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। अदालत से इस पूरे मामले में हस्तक्षेप की मांग की गई है।

    भोजन व्यवस्था को लेकर उठे सवाल

    याचिका के अनुसार, पुलिस अधिकारियों ने कथित तौर पर भोजन वितरण के लिए उपयोग किए गए धन के स्रोत के बारे में विस्तार से जानकारी मांगी। जुनैद मलिक का कहना है कि उन्होंने आंदोलन में शामिल लोगों की सहायता के उद्देश्य से भोजन की व्यवस्था की थी।

    हालांकि, पुलिस की ओर से इस संबंध में अभी तक सार्वजनिक रूप से कोई विस्तृत स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया है कि यदि पूछताछ हुई तो उसका आधार क्या था।

    हाल के दिनों में बढ़ा कानूनी विवाद

    जंतर-मंतर और 'चलो संसद' मार्च से जुड़े घटनाक्रम पिछले कुछ दिनों से लगातार चर्चा में हैं। प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई, बल प्रयोग, सोशल मीडिया पोस्ट, विभिन्न एफआईआर और न्यायालय में दाखिल याचिकाओं को लेकर कई घटनाएं सामने आई हैं।

    इसी क्रम में यह नई याचिका भी उस व्यापक कानूनी और प्रशासनिक विवाद का हिस्सा बन गई है, जिसकी सुनवाई अलग-अलग अदालतों में जारी है।

    अदालत में क्या मांग की गई?

    याचिका में सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध किया गया है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाए और यदि किसी प्रकार की अवैध कार्रवाई हुई हो तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ उचित कदम उठाए जाएं।

    याचिकाकर्ता ने यह भी आग्रह किया है कि भविष्य में उनके तथा उनके परिवार के सदस्यों के साथ किसी प्रकार की कथित प्रताड़ना या दबाव की स्थिति उत्पन्न न हो, इसके लिए आवश्यक निर्देश जारी किए जाएं।

    पुलिस की प्रतिक्रिया का इंतजार

    समाचार लिखे जाने तक दिल्ली पुलिस या उत्तर प्रदेश पुलिस की ओर से याचिका में लगाए गए सभी आरोपों पर विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं हुई थी। ऐसे मामलों में पुलिस का पक्ष सामने आने के बाद ही पूरे घटनाक्रम की स्पष्ट तस्वीर सामने आ सकेगी।

    कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अदालत इस मामले में नोटिस जारी करती है तो संबंधित एजेंसियों को अपने पक्ष में जवाब दाखिल करना होगा, जिसके बाद न्यायालय उपलब्ध तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर आगे की सुनवाई करेगा।

    लोकतांत्रिक अधिकार और कानून का संतुलन

    हाल के छात्र आंदोलनों ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शन और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए। एक ओर प्रशासन सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी निभाता है, वहीं दूसरी ओर नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने का संवैधानिक अधिकार भी प्राप्त है।

    इसी कारण ऐसे मामलों में न्यायपालिका की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है, जहां आरोपों और सरकारी कार्रवाई दोनों की कानूनी कसौटी पर जांच की जाती है।

    आगे क्या?

    अब इस मामले में सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई पर रहेगी। अदालत यह तय करेगी कि याचिका में लगाए गए आरोपों पर किस प्रकार की कार्रवाई आवश्यक है और क्या संबंधित एजेंसियों से जवाब मांगा जाएगा।

    फिलहाल, जुनैद मलिक द्वारा लगाए गए आरोप न्यायिक परीक्षण के अधीन हैं। मामले के अंतिम निष्कर्ष अदालत की सुनवाई, सरकारी जवाब और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही सामने आएंगे। युगचरण न्यूज़ इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है और आधिकारिक जानकारी उपलब्ध होने पर पाठकों को आगे की अपडेट से अवगत कराएगा।

     
     
     
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