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    स्टालिन का विजय पर पलटवार, बोले- आपातकाल में जेल में पुलिस ने तोड़े थे मेरे जबड़े; विधानसभा बयान पर मचा सियासी घमासान

    1 hour ago

    Yugcharan News / 10-09-2026

    चेन्नई। तमिलनाडु की राजनीति में आपातकाल के दौर की घटनाओं को लेकर एक बार फिर तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) अध्यक्ष एम.के. स्टालिन ने गुरुवार को मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के विधानसभा में दिए गए बयान और कथित इशारे पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। स्टालिन ने सोशल मीडिया पर जारी एक वीडियो के माध्यम से अपने पुराने अनुभव को सामने रखते हुए कहा कि आपातकाल के दौरान जेल में उनके साथ पुलिस ने बर्बर व्यवहार किया था और उनके जबड़े की हड्डियां तक तोड़ दी गई थीं।

    स्टालिन ने कहा कि विधानसभा में उनके बारे में कथित तौर पर किया गया शारीरिक इशारा केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं था, बल्कि वह उनके जीवन में घट चुकी एक गंभीर घटना की याद दिलाता है। उन्होंने अपने वीडियो में उस दौर की परिस्थितियों का जिक्र किया और बताया कि आपातकाल के दौरान उन्हें और उनके साथ मौजूद अन्य लोगों को जेल में एक ऐसे वार्ड में रखा गया था, जिसका इस्तेमाल कथित तौर पर कुष्ठ रोगियों के लिए किया जाता था।

    यह बयान ऐसे समय आया है जब तमिलनाडु की राजनीति में आगामी राजनीतिक मुकाबलों को लेकर पहले से ही तीखी प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है। मुख्यमंत्री विजय और स्टालिन के बीच राजनीतिक मतभेद लगातार सार्वजनिक मंचों पर सामने आते रहे हैं। विधानसभा में दिए गए विजय के कथित बयान के बाद स्टालिन ने अपने सोशल मीडिया वीडियो के जरिये सीधे जवाब देकर इस विवाद को और व्यापक राजनीतिक बहस में बदल दिया है।

    स्टालिन ने अपने बयान में आपातकाल के दौरान जेल में बिताए गए दिनों को याद किया। उन्होंने कहा कि उस समय उनके साथ कथित तौर पर मारपीट की गई थी और उनके जबड़ों पर गंभीर चोटें आई थीं। उनका कहना है कि जेल में पुलिस की कार्रवाई के दौरान उनके जबड़े टूट गए थे। स्टालिन ने इस घटना को अपने राजनीतिक जीवन के बेहद कठिन दौर के रूप में प्रस्तुत किया और कहा कि उस समय उन्होंने तथा अन्य लोगों ने जेल के भीतर प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना किया।

    आपातकाल भारतीय राजनीतिक इतिहास का एक बेहद संवेदनशील अध्याय रहा है। 1975 से 1977 के बीच देश में आपातकाल लागू रहा था, जिसके दौरान विपक्षी नेताओं, कार्यकर्ताओं और सरकार की आलोचना करने वाले कई लोगों को गिरफ्तार किया गया था। उस दौर में नागरिक स्वतंत्रताओं और राजनीतिक अधिकारों को लेकर देशभर में व्यापक बहस हुई थी। तमिलनाडु भी इससे अछूता नहीं रहा और राज्य के कई राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने उस समय गिरफ्तारी तथा जेल से जुड़े अनुभवों का सामना किया।

    स्टालिन का मौजूदा बयान इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को फिर से राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ले आया है। डीएमके अध्यक्ष ने अपने वीडियो में यह बताने की कोशिश की कि आपातकाल के दौरान उनके साथ क्या हुआ था और क्यों विधानसभा में किया गया कथित इशारा उनके लिए विशेष रूप से गंभीर है। उन्होंने अपने पुराने अनुभव को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से जोड़ते हुए मुख्यमंत्री विजय पर निशाना साधा।

    स्टालिन के मुताबिक, उन्हें और उनके साथ गिरफ्तार किए गए अन्य लोगों को जिस स्थान पर रखा गया था, वह सामान्य जेल वार्ड से अलग था। उन्होंने दावा किया कि उन्हें एक ऐसे वार्ड में रखा गया था जिसे कुष्ठ रोगियों के लिए इस्तेमाल किया जाता था। उनके अनुसार, उस समय की परिस्थितियां बेहद कठिन थीं और जेल के भीतर उनके साथ कथित तौर पर हिंसक व्यवहार किया गया।

    स्टालिन की ओर से यह बयान जारी किए जाने के बाद तमिलनाडु की राजनीतिक बहस में आपातकाल का मुद्दा फिर से महत्वपूर्ण हो गया है। इस विवाद में एक तरफ स्टालिन अपने व्यक्तिगत अनुभव और आपातकाल के दौरान कथित पुलिस ज्यादती का हवाला दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री विजय के विधानसभा भाषण को लेकर राजनीतिक व्याख्याएं सामने आ रही हैं।

    तमिलनाडु की राजनीति में डीएमके लंबे समय से राज्य की प्रमुख राजनीतिक शक्तियों में शामिल रही है। स्टालिन स्वयं पार्टी के अध्यक्ष के रूप में संगठन का नेतृत्व कर रहे हैं और उनका राजनीतिक जीवन कई दशकों में फैला हुआ है। इसलिए आपातकाल से जुड़े उनके व्यक्तिगत अनुभव का राजनीतिक महत्व भी काफी अधिक माना जाता है। किसी भी सार्वजनिक बयान में उस दौर की घटनाओं का उल्लेख डीएमके के समर्थकों और पार्टी के राजनीतिक इतिहास से जुड़े लोगों के बीच विशेष प्रतिक्रिया पैदा कर सकता है।

    विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि विधानसभा जैसे संवैधानिक मंच पर नेताओं द्वारा किए गए बयान और इशारे अक्सर व्यापक राजनीतिक संदेश के रूप में देखे जाते हैं। यदि किसी नेता के बारे में व्यक्तिगत या शारीरिक संदर्भ दिया जाता है, तो उसका जवाब भी उसी स्तर पर सामने आ सकता है। स्टालिन ने इसी संदर्भ में सोशल मीडिया का सहारा लेकर अपना पक्ष जनता के सामने रखा।

    उन्होंने अपने वीडियो में केवल मौजूदा विवाद पर प्रतिक्रिया नहीं दी, बल्कि लोगों को यह भी याद दिलाने की कोशिश की कि उनके राजनीतिक जीवन में जेल और दमन का अनुभव नया नहीं है। उनका कहना है कि आपातकाल के दौरान हुई कथित पुलिस हिंसा उनके जीवन की वास्तविक घटना है और इसे किसी राजनीतिक मजाक या इशारे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

    राजनीतिक विश्लेषण के लिहाज से देखें तो यह विवाद तमिलनाडु में व्यक्तिगत राजनीतिक इतिहास और वर्तमान राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच संबंध को भी सामने लाता है। राज्य की राजनीति में नेताओं के पुराने संघर्ष, आंदोलनों और राजनीतिक घटनाओं का प्रभाव आज भी दिखाई देता है। ऐसे में आपातकाल जैसे ऐतिहासिक मुद्दे का इस्तेमाल मौजूदा राजनीतिक बहस में होना असामान्य नहीं है।

    स्टालिन के बयान से यह भी संकेत मिलता है कि डीएमके नेतृत्व मुख्यमंत्री विजय के बयानों को लेकर आक्रामक राजनीतिक रुख अपना सकता है। विधानसभा में हुई किसी भी घटना को लेकर दोनों पक्षों के बीच आने वाले दिनों में और बयान सामने आ सकते हैं। सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के कारण ऐसे विवाद अब केवल सदन तक सीमित नहीं रहते, बल्कि कुछ ही घंटों में व्यापक सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन जाते हैं।

    इस पूरे घटनाक्रम में यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि स्टालिन ने अपने दावे सोशल मीडिया पर जारी वीडियो के माध्यम से रखे हैं। उनके द्वारा बताए गए जेल अनुभव और पुलिस कार्रवाई के विवरण उनके व्यक्तिगत दावे के रूप में सामने आए हैं। ऐसे ऐतिहासिक दावों को समझने के लिए उस दौर के उपलब्ध रिकॉर्ड और अन्य स्वतंत्र स्रोतों का संदर्भ भी महत्वपूर्ण होगा।

    तमिलनाडु की राजनीति में मुख्यमंत्री विजय का उभरना भी मौजूदा समीकरणों को नया रूप दे रहा है। एक ओर पारंपरिक द्रविड़ राजनीति की मजबूत विरासत रखने वाली डीएमके है, तो दूसरी ओर विजय की राजनीतिक उपस्थिति राज्य की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में नए समीकरण पैदा कर रही है। ऐसे माहौल में नेताओं के बीच तीखे बयान और पुराने राजनीतिक मुद्दों का फिर से सामने आना आने वाले समय में चुनावी राजनीति को प्रभावित कर सकता है।

    स्टालिन ने जिस तरह अपने पुराने जेल अनुभव को मौजूदा विधानसभा विवाद से जोड़ा है, उससे यह स्पष्ट है कि वह इस मुद्दे को केवल व्यक्तिगत टिप्पणी के रूप में नहीं देख रहे हैं। उन्होंने इसे अपने राजनीतिक संघर्ष और आपातकाल के दौरान झेली गई कथित ज्यादती से जोड़कर जनता के सामने रखा है। इससे विवाद का दायरा भी बढ़ गया है और अब चर्चा केवल विधानसभा में हुए कथित इशारे तक सीमित नहीं रह गई है।

    आने वाले दिनों में मुख्यमंत्री विजय या उनकी पार्टी की ओर से इस पर प्रतिक्रिया सामने आती है या नहीं, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। यदि विजय इस मुद्दे पर स्पष्टीकरण देते हैं या स्टालिन के आरोपों का जवाब देते हैं, तो राजनीतिक टकराव और तेज हो सकता है। वहीं यदि दोनों पक्ष इस विवाद को आगे नहीं बढ़ाते हैं, तो मामला धीरे-धीरे अन्य राजनीतिक मुद्दों के बीच दब सकता है।

    फिलहाल, स्टालिन का बयान तमिलनाडु की राजनीति में एक पुराने ऐतिहासिक अध्याय को वर्तमान राजनीतिक संघर्ष से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण घटनाक्रम बन गया है। आपातकाल के दौरान उनके कथित जेल उत्पीड़न और जबड़े की चोटों का जिक्र कर उन्होंने मुख्यमंत्री विजय के विधानसभा बयान पर तीखा पलटवार किया है। इस घटनाक्रम ने न केवल दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक दूरी को उजागर किया है, बल्कि यह भी दिखाया है कि तमिलनाडु की राजनीति में दशकों पुराने संघर्ष आज भी मौजूदा राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

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