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    सुप्रीम कोर्ट ने अबू सलेम की समयपूर्व रिहाई की याचिका खारिज की, 2030 तक जेल में रहने का रास्ता साफ

    1 hour ago

    Yugcharan News / 10-09-2026

    नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने 1993 के मुंबई सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे गैंगस्टर अबू सलेम की समयपूर्व रिहाई की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। सलेम ने अदालत के सामने दलील दी थी कि पुर्तगाल से उसके प्रत्यर्पण के समय भारत की ओर से दिए गए आश्वासन के तहत तय 25 वर्ष की अधिकतम कैद की अवधि की गणना में जेल में अर्जित रिमिशन और विचाराधीन कैदी के रूप में बिताई गई अवधि को भी शामिल किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद फिलहाल सलेम को राहत नहीं मिली है और उसकी रिहाई का रास्ता 2030 तक टल गया है।

    यह फैसला न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने सुनाया। अदालत ने इससे पहले मामले में दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद संकेत दिया था कि याचिका खारिज की जा सकती है। हालांकि, उस समय अदालत ने अंतिम आदेश सुरक्षित रखते हुए पक्षकारों को लिखित दलीलें और संबंधित न्यायिक फैसले दाखिल करने का अवसर दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने सलेम की उस मांग को स्वीकार नहीं किया, जिसके जरिए वह अपनी सजा की गणना में विभिन्न प्रकार की रियायतों को जोड़कर तत्काल रिहाई का दावा कर रहा था।

    अबू सलेम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा ने अदालत के समक्ष मुख्य रूप से जेल में बिताई गई अवधि और अर्जित रिमिशन से जुड़े कानूनी पहलुओं पर जोर दिया था। उनका तर्क था कि जिस अवधि में सलेम विचाराधीन कैदी के रूप में हिरासत में रहा, उसे उसकी सजा की अवधि में समायोजित किया जाना चाहिए। इसके अलावा, अच्छे आचरण के कारण उसे जो अर्जित रिमिशन मिला, उसे भी वास्तविक कारावास की अवधि की गणना में शामिल किया जाना चाहिए।

    सलेम की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया था कि वह दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 432 के तहत मिलने वाली सामान्य या वैधानिक रिमिशन की मांग नहीं कर रहा है। उसका दावा विशेष रूप से उस रिमिशन को लेकर था, जो कैदी को अच्छे व्यवहार, निर्धारित कार्यों के पालन और जेल नियमों के तहत उपलब्ध कराया जाता है।

    सलेम के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले स्वामी श्रद्धानंद उर्फ मुरली मनोहर बनाम कर्नाटक राज्य का हवाला देते हुए कहा था कि अच्छे आचरण के आधार पर मासिक, त्रैमासिक या वार्षिक रूप से मिलने वाली रिमिशन को वास्तविक कारावास की अवधि का हिस्सा माना जा सकता है। उनके अनुसार, सलेम ने जेल में अच्छे आचरण के आधार पर करीब तीन वर्ष और दो महीने की रिमिशन अर्जित की थी। उनका यह भी दावा था कि अन्य मामलों में दोषियों की रिहाई के समय ऐसी रिमिशन को ध्यान में रखा गया है।

    सलेम ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस निष्कर्ष को भी चुनौती दी थी, जिसमें अदालत ने कहा था कि पुर्तगाल से प्रत्यर्पण के दौरान भारत द्वारा दिए गए आश्वासन के आधार पर तय 25 वर्ष की अवधि को सामान्य जेल रिमिशन के जरिए और कम नहीं किया जा सकता। सलेम की ओर से दलील थी कि 25 वर्ष की अवधि को वास्तविक कारावास की गणना के दौरान इस तरह देखा जाना चाहिए कि विचाराधीन कैदी के रूप में बिताया समय और अर्जित रिमिशन दोनों उसमें समायोजित हों।

    इस पूरे विवाद की जड़ वर्ष 2002 में हुए अबू सलेम के प्रत्यर्पण से जुड़ी है। भारत ने 17 दिसंबर 2002 को पुर्तगाल को आश्वासन दिया था कि सलेम को भारत में मौत की सजा नहीं दी जाएगी और प्रत्यर्पण की शर्तों के तहत उसे 25 वर्ष से अधिक समय तक जेल में नहीं रखा जाएगा। बाद में यही आश्वासन सलेम की कानूनी लड़ाई का प्रमुख आधार बन गया।

    जुलाई 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस प्रत्यर्पण व्यवस्था पर विचार किया था। अदालत ने कहा था कि पुर्तगाल को दिए गए भारत के आश्वासन और संबंधित प्रत्यर्पण व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए सलेम को 25 वर्ष की अवधि पूरी होने के बाद रिहा करना होगा। इसके बाद सलेम ने दावा किया कि उसकी हिरासत की अलग-अलग अवधियों को जोड़ने और जेल में अर्जित रिमिशन को समायोजित करने पर 25 वर्ष की अवधि लगभग पूरी हो चुकी है।

    सलेम के अनुसार, वह नवंबर 2005 से सितंबर 2017 तक करीब 11 वर्ष, 9 महीने और 26 दिन विचाराधीन कैदी के रूप में हिरासत में रहा था। इसके बाद दोषी ठहराए जाने के बाद उसने लगभग 9 वर्ष, 10 महीने और 4 दिन जेल में बिताए। उसने अच्छे आचरण के आधार पर करीब तीन वर्ष और 16 दिन की रिमिशन का भी दावा किया था। इसके अलावा पुर्तगाल में विचाराधीन कैदी के रूप में बिताई गई अवधि के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई करीब एक महीने की अतिरिक्त राहत को भी उसने अपनी गणना में शामिल किया।

    इन सभी अवधियों को जोड़कर सलेम का दावा था कि उसने लगभग 25 वर्ष की प्रभावी कारावास अवधि पूरी कर ली है। इसी आधार पर उसने अपनी तत्काल रिहाई की मांग की थी। उसने यह भी कहा था कि लगातार हिरासत में रखा जाना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से संबंधित सवाल पैदा करता है। उसने अदालत से अधिकारियों को उसकी रिहाई की सटीक तारीख निर्धारित करने का निर्देश देने की मांग की थी।

    हालांकि, बॉम्बे हाई कोर्ट ने अप्रैल 2025 में उसकी याचिका को खारिज कर दिया था। हाई कोर्ट ने कहा था कि भारत द्वारा पुर्तगाल को दिए गए आश्वासन के तहत 25 वर्ष की अवधि अभी पूरी नहीं हुई है और इसकी समाप्ति नवंबर 2030 में होगी। अदालत ने सलेम की उस मांग को समय से पहले और कानूनी रूप से गलत बताया था, जिसमें उसने अर्जित रिमिशन को 25 वर्ष की अधिकतम सीमा से घटाने की कोशिश की थी।

    हाई कोर्ट के सामने यह महत्वपूर्ण सवाल था कि क्या जेल में अच्छे आचरण के आधार पर मिलने वाली सामान्य रिमिशन का इस्तेमाल उस 25 वर्ष की अवधि को और कम करने के लिए किया जा सकता है, जिसे प्रत्यर्पण की अंतरराष्ट्रीय शर्तों के तहत लागू किया गया था। अदालत ने इसका जवाब नकारात्मक दिया था।

    हाई कोर्ट ने कहा था कि 25 वर्ष की सीमा स्वयं एक विशेष व्यवस्था है, क्योंकि सामान्य परिस्थितियों में उम्रकैद का अर्थ केवल निश्चित संख्या में वर्षों की सजा नहीं होता। सलेम के मामले में भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के कारण एक विशेष अधिकतम अवधि सामने आई थी। ऐसे में यदि जेल नियमों के तहत मिलने वाली सामान्य रिमिशन को भी इसमें घटा दिया जाए, तो इससे उस व्यवस्था का मूल उद्देश्य प्रभावित हो सकता है।

    अदालत ने यह भी कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के 2022 के फैसले में ऐसा कोई स्पष्ट संकेत नहीं था कि महाराष्ट्र जेल नियमों के तहत मिलने वाली अर्जित रिमिशन को 25 वर्ष की प्रत्यर्पण-आधारित अवधि को कम करने के लिए इस्तेमाल किया जाना था। हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र प्रिजन्स (रिमिशन सिस्टम) रूल्स, 1962 के तहत मिलने वाली रियायतों और सीआरपीसी की धारा 432 के तहत मिलने वाली रिमिशन के बीच भी अंतर को ध्यान में रखा था।

    हाई कोर्ट ने सलेम की गिरफ्तारी की तारीख 11 नवंबर 2005 को आधार मानते हुए कहा था कि 25 वर्ष की अवधि की साधारण गणना करने पर यह नवंबर 2030 में पूरी होगी। इस निष्कर्ष के बाद सलेम ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

    सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सलेम की ओर से इस बात पर जोर दिया गया कि उसकी जेल में वास्तविक मौजूदगी और विचाराधीन कैदी के रूप में बिताया समय नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बचाव पक्ष ने यह समझाने की कोशिश की कि वास्तविक कारावास और रिमिशन के कानूनी प्रभावों को अलग-अलग तरीके से देखने के बजाय सजा की कुल अवधि निर्धारित करते समय उन्हें समग्र रूप से देखा जाना चाहिए।

    लेकिन सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि इस चरण पर अदालत ने सलेम के पक्ष में ऐसा कोई आदेश देने से इनकार कर दिया है, जिससे 25 वर्ष की अवधि पहले पूरी मानी जाए। इसका सीधा अर्थ यह है कि सलेम की समयपूर्व रिहाई की मौजूदा मांग सफल नहीं हुई।

    अबू सलेम का नाम भारत के सबसे चर्चित आपराधिक मामलों में लंबे समय से जुड़ा रहा है। 1993 के मुंबई सिलसिलेवार बम धमाकों ने देश को झकझोर कर रख दिया था और इस मामले की जांच तथा सुनवाई कई वर्षों तक चली। सलेम को इस मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद उम्रकैद की सजा मिली। पुर्तगाल से उसका प्रत्यर्पण भी लंबे समय तक कानूनी और कूटनीतिक चर्चा का विषय रहा।

    मौजूदा विवाद केवल सलेम की व्यक्तिगत रिहाई से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि यह इस व्यापक कानूनी प्रश्न से भी जुड़ा है कि किसी आरोपी या दोषी के प्रत्यर्पण के दौरान भारत द्वारा दूसरे देश को दिए गए आश्वासन का घरेलू आपराधिक न्याय व्यवस्था में किस तरह प्रभाव पड़ता है। साथ ही, यह मामला जेल रिमिशन, विचाराधीन हिरासत और उम्रकैद की सजा के बीच संबंध को लेकर भी महत्वपूर्ण कानूनी बहस सामने लाता है।

    सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सलेम की ओर से उठाया गया 25 वर्ष की गणना और अर्जित रिमिशन का मुद्दा फिलहाल उसके पक्ष में नहीं गया है। अदालत के निर्णय ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस दृष्टिकोण को प्रभावी रूप से बरकरार रखा है कि सामान्य जेल रिमिशन को भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रत्यर्पण प्रतिबद्धता के तहत तय 25 वर्ष की अवधि को कम करने के साधन के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

    फिलहाल सलेम की समयपूर्व रिहाई की याचिका खारिज हो चुकी है और नवंबर 2030 की अवधि इस मामले में महत्वपूर्ण बनी हुई है। हालांकि, मामले से जुड़े अन्य कानूनी पहलू और भविष्य में उठने वाली कोई नई चुनौती अलग न्यायिक प्रक्रिया का विषय हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इस बात को भी रेखांकित करता है कि अंतरराष्ट्रीय प्रत्यर्पण आश्वासन और घरेलू जेल नियमों के बीच टकराव की स्थिति में अदालतें संबंधित प्रतिबद्धताओं और उनके मूल उद्देश्य को गंभीरता से देखती हैं।

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