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    BRICS शिखर सम्मेलन पर पी. चिदंबरम का सवाल, BJP ने साधा निशाना; ‘ठोस लाभ’ को लेकर छिड़ी राजनीतिक बहस

    1 hour ago

     

    Yugcharan News / 10-09-2026

    नई दिल्ली: भारत में 2026 के BRICS शिखर सम्मेलन की शुरुआत से ठीक पहले इस अंतरराष्ट्रीय समूह को लेकर देश की राजनीति में तीखी बहस छिड़ गई है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद पी. चिदंबरम ने BRICS समेत विभिन्न बहुपक्षीय मंचों में भारत की भागीदारी के वास्तविक और ठोस लाभों पर सवाल उठाए हैं। उनके बयान के बाद भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पर विदेश नीति और कूटनीति को केवल लेन-देन के नजरिए से देखने का आरोप लगाते हुए पलटवार किया है।

    भारत इस वर्ष BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी नई दिल्ली के भारत मंडपम में कर रहा है। सम्मेलन शुक्रवार शाम से शुरू होकर रविवार तक चलेगा। इस वर्ष सम्मेलन की थीम ‘Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability’ यानी लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता रखी गई है। ऐसे समय में जब दुनिया पश्चिम एशिया संकट, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, व्यापार तनाव और बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों से जूझ रही है, BRICS बैठक को भारत की कूटनीतिक सक्रियता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    हालांकि, सम्मेलन से पहले कांग्रेस सांसद पी. चिदंबरम की टिप्पणी ने इसके राजनीतिक और व्यावहारिक महत्व को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। चिदंबरम ने कहा कि भारत BRICS के अलावा शंघाई सहयोग संगठन (SCO), G20 और QUAD जैसे कई महत्वपूर्ण बहुपक्षीय समूहों का हिस्सा है, लेकिन पिछले कुछ सम्मेलनों से भारत को क्या ठोस लाभ मिला, यह स्पष्ट नहीं है।

    चिदंबरम ने समाचार एजेंसी ANI से बातचीत में कहा कि उन्हें नहीं पता कि इस बार कितने राष्ट्रपति और कितने प्रधानमंत्री भारत आ रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि पिछले दो-तीन BRICS शिखर सम्मेलनों से उन्हें कोई महत्वपूर्ण और ठोस परिणाम दिखाई नहीं दिया। उनके मुताबिक, पहले के BRICS सम्मेलनों में ऐसे फैसले हुए थे जिन्हें स्पष्ट लाभ या परिणाम के तौर पर देखा जा सकता था, लेकिन हाल के वर्षों में तस्वीर उतनी स्पष्ट नहीं रही है।

    कांग्रेस नेता की इस टिप्पणी को BJP ने तुरंत राजनीतिक मुद्दा बना लिया। भाजपा नेता नलिन कोहली ने कांग्रेस की आलोचना करते हुए सवाल उठाया कि क्या किसी देश की कूटनीति को केवल इस आधार पर मापा जाना चाहिए कि उससे तत्काल कितना प्रत्यक्ष लाभ मिला। उन्होंने कहा कि BRICS जैसा मंच भारत को कई देशों के शीर्ष नेतृत्व के साथ सीधे संवाद का अवसर देता है और ऐसे संपर्कों को केवल आर्थिक लेन-देन की कसौटी पर नहीं देखा जा सकता।

    नलिन कोहली ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि विपक्ष की सोच कुछ ऐसी है जैसे कूटनीति में हर बातचीत के बाद यह पूछा जाए कि भारत को बदले में क्या मिला। उन्होंने कहा कि BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों के साथ द्विपक्षीय मुलाकातें होंगी। उनके अनुसार, इस तरह की बैठकें लंबे समय में रणनीतिक, आर्थिक और राजनीतिक संबंधों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

    BJP ने यह भी सवाल उठाया कि अगर कूटनीति के हर प्रयास को केवल तत्काल और दिखाई देने वाले लाभ से मापा जाए, तो भारत की दशकों पुरानी विदेश नीति के कई हिस्सों पर भी सवाल खड़े किए जा सकते हैं। नलिन कोहली ने कांग्रेस से कहा कि उसे अपनी विदेश नीति के पुराने दृष्टिकोण पर भी जवाब देना चाहिए।

    भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने कांग्रेस पर और तीखा हमला किया। उन्होंने विपक्ष की प्रतिक्रिया की तुलना एक ऐसे व्यक्ति से की जो किसी उपलब्धि से नाराज होकर उसे स्वीकार नहीं करना चाहता। भंडारी ने दावा किया कि भारत में BRICS सम्मेलन का आयोजन देश के बढ़ते वैश्विक प्रभाव का संकेत है और कांग्रेस इस वजह से असहज है।

    भंडारी ने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस को इस बात का डर है कि मौजूदा सरकार को मिलने वाली ऐसी अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों का राजनीतिक लाभ उसके पास नहीं होगा। उन्होंने इसे ‘FOMO’ यानी ‘Fear Of Missing Out’ से जोड़ते हुए कहा कि विपक्ष BRICS सम्मेलन की उपलब्धियों को लेकर सवाल उठा रहा है क्योंकि वह खुद इस तरह के आयोजन की मेजबानी नहीं कर पाएगा।

    BRICS की मौजूदा भूमिका को समझना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह समूह पिछले दो दशकों में तेजी से विस्तारित हुआ है। भारत BRICS का संस्थापक सदस्य है और इससे पहले 2012, 2016 और 2021 में समूह की अध्यक्षता कर चुका है। 1 जनवरी 2026 को भारत ने चौथी बार BRICS की अध्यक्षता संभाली। यह समय समूह के लिए प्रतीकात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि BRICS अपनी स्थापना के 20 वर्ष पूरे कर रहा है।

    इस बार भारत की मेजबानी ऐसे दौर में हो रही है जब वैश्विक राजनीति में शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है। पश्चिमी देशों और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच आर्थिक और रणनीतिक मतभेद, आपूर्ति श्रृंखलाओं में बदलाव, व्यापार प्रतिबंध, ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय संघर्षों का असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ रहा है। ऐसे में BRICS के भीतर विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच सहयोग को लेकर चर्चा का महत्व बढ़ गया है।

    शिखर सम्मेलन में पश्चिम एशिया के संकट से पैदा हुए आर्थिक प्रभावों पर भी व्यापक चर्चा होने की उम्मीद है। ऊर्जा बाजार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और वैश्विक महंगाई जैसे मुद्दे BRICS देशों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। भारत के लिए यह सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब वह एक साथ कई रणनीतिक समूहों के साथ अपने संबंधों को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है।

    भारत की विदेश नीति में BRICS की भूमिका केवल शिखर सम्मेलनों तक सीमित नहीं है। समूह के माध्यम से आर्थिक सहयोग, विकास वित्त, व्यापार, तकनीक, ऊर्जा, स्वास्थ्य और वैश्विक शासन व्यवस्था जैसे विषयों पर सदस्य देशों के बीच संवाद होता है। इसके अतिरिक्त, BRICS को वैश्विक संस्थाओं में विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करने के एक माध्यम के रूप में भी देखा जाता है।

    हालांकि, चिदंबरम का सवाल इस व्यापक बहस को सामने लाता है कि अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भारत की सक्रिय भागीदारी का मूल्यांकन किस तरह किया जाना चाहिए। क्या किसी सम्मेलन की सफलता को केवल तत्काल व्यापारिक समझौतों, निवेश घोषणाओं या संयुक्त बयानों से मापा जाना चाहिए, या फिर राजनीतिक संवाद, रणनीतिक संपर्क और भविष्य की साझेदारियों को भी उसका हिस्सा माना जाना चाहिए? यह सवाल भारत की बहुपक्षीय कूटनीति को लेकर लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है।

    BRICS सम्मेलन में कई देशों के शीर्ष नेताओं के शामिल होने की संभावना के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भी यह आयोजन महत्वपूर्ण कूटनीतिक अवसर माना जा रहा है। खासकर भारत और चीन के संबंधों के संदर्भ में इस सम्मेलन पर विशेष नजर है। सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच संभावित बैठक को लेकर भी काफी चर्चा है। यदि ऐसी द्विपक्षीय वार्ता होती है, तो सीमा विवाद के बाद दोनों देशों के संबंधों में आई जटिलताओं के बीच यह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश दे सकती है।

    इसी तरह, रूस समेत अन्य प्रमुख BRICS देशों के नेताओं के साथ भारत की बातचीत वैश्विक मुद्दों पर नई समझ विकसित करने का अवसर दे सकती है। भारत लंबे समय से अपनी विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता पर जोर देता रहा है और BRICS, QUAD, SCO तथा G20 जैसे अलग-अलग मंचों में उसकी भागीदारी इसी व्यापक कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा है।

    BRICS सम्मेलन को लेकर कांग्रेस और BJP के बीच शुरू हुई बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन पर मतभेद नहीं है। इसके केंद्र में यह सवाल है कि भारत की विदेश नीति की सफलता को किस पैमाने पर मापा जाए। कांग्रेस तत्काल और ठोस परिणामों पर जोर दे रही है, जबकि भाजपा का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में प्रभाव, संवाद और रणनीतिक अवसरों का मूल्यांकन लंबे समय में किया जाना चाहिए।

    आने वाले दिनों में सम्मेलन में होने वाली द्विपक्षीय बैठकों, संयुक्त घोषणाओं और आर्थिक तथा रणनीतिक पहलों से यह स्पष्ट हो सकता है कि भारत की BRICS अध्यक्षता से कौन से व्यावहारिक परिणाम सामने आते हैं। फिलहाल, शिखर सम्मेलन शुरू होने से पहले ही इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो चुकी है।

    BRICS की बैठक जहां भारत को वैश्विक मंच पर अपनी प्राथमिकताओं को रखने का अवसर दे रही है, वहीं घरेलू राजनीति में विपक्ष और सरकार के बीच विदेश नीति की दिशा और उपलब्धियों को लेकर बहस भी तेज हो गई है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि सम्मेलन के दौरान लिए जाने वाले फैसले और नेताओं के बीच होने वाली बातचीत चिदंबरम द्वारा उठाए गए ‘ठोस लाभ’ के सवाल का कितना स्पष्ट जवाब दे पाती है।

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