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    GST संग्रह पर सरकार का बचाव, 11% वृद्धि के आंकड़े को लेकर छिड़ी बहस; मुआवजा उपकर हटने से गणना पर सवाल

    1 hour ago

     

    Yugcharan News / 10-09-2026

    नई दिल्ली: वस्तु एवं सेवा कर (GST) संग्रह में मजबूत वृद्धि के सरकारी दावे को लेकर केंद्र सरकार और पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के बीच आंकड़ों की व्याख्या को लेकर बहस तेज हो गई है। सरकार के अनुसार अगस्त 2026 में सकल GST संग्रह सालाना आधार पर 14.8 प्रतिशत बढ़कर करीब 1.99 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया, जबकि अप्रैल से अगस्त के बीच कुल संग्रह में 11 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई और यह 10.43 लाख करोड़ रुपये रहा। दूसरी ओर, गर्ग ने तर्क दिया है कि यदि पिछले वर्ष की अवधि में वसूले गए मुआवजा उपकर को भी तुलना में शामिल किया जाए, तो GST से संबंधित राजस्व वृद्धि काफी कम दिखाई देती है।

    इस विवाद का मुख्य केंद्र यह है कि मौजूदा GST संग्रह की तुलना पिछले वर्ष के किस राजस्व आधार से की जानी चाहिए। केंद्र सरकार और केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (CBIC) का कहना है कि किसी भी वृद्धि दर की सही गणना के लिए दोनों अवधियों में समान करों और उपकरों को आधार बनाना जरूरी है। चूंकि मुआवजा उपकर अब लागू नहीं है, इसलिए सरकार ने मौजूदा वृद्धि की गणना में इसे दोनों अवधियों से बाहर रखा है।

    वहीं, पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग का कहना है कि मुआवजा उपकर को हटाए जाने का आर्थिक प्रभाव अलग से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार, यदि पिछले वर्ष के संग्रह में शामिल इस उपकर को तुलना के आधार में रखा जाए, तो अगस्त में GST वृद्धि 14.8 प्रतिशत के बजाय करीब 7.51 प्रतिशत और अप्रैल-अगस्त की पांच महीने की अवधि में वृद्धि लगभग 4.08 प्रतिशत रह जाती है। उन्होंने शुद्ध राजस्व वृद्धि को करीब 1.3 प्रतिशत बताया है।

    यह बहस ऐसे समय में सामने आई है जब GST संग्रह को भारतीय अर्थव्यवस्था की गतिविधियों, उपभोग और कर अनुपालन के प्रमुख संकेतकों में से एक माना जाता है। अगस्त के आंकड़ों में कुल सकल GST संग्रह 1.99 लाख करोड़ रुपये रहा। इसमें केंद्रीय GST (CGST) से 38,413 करोड़ रुपये, राज्य GST (SGST) से 46,316 करोड़ रुपये और एकीकृत GST (IGST) से लगभग 1.15 लाख करोड़ रुपये शामिल रहे।

    सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अगस्त में घरेलू स्रोतों से GST राजस्व में करीब 9.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि आयात से जुड़े GST संग्रह में लगभग 29 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। इससे कुल GST संग्रह में तेज बढ़ोतरी दिखाई दी। हालांकि, इस वृद्धि की वास्तविक मजबूती को लेकर अब अलग-अलग आधारों पर आंकड़ों की व्याख्या की जा रही है।

    CBIC ने गर्ग की आपत्ति का कड़ा जवाब देते हुए कहा कि अलग-अलग कर आधारों को मिलाकर तुलना करना भ्रामक हो सकता है। बोर्ड के अनुसार, मौजूदा वृद्धि दर की गणना CGST, SGST और IGST के आधार पर दोनों संबंधित अवधियों के लिए समान तरीके से की गई है। सरकार का तर्क है कि यदि कोई ऐसा कर या उपकर वर्तमान अवधि में मौजूद ही नहीं है, तो उसे वर्तमान और पिछले वर्ष के बीच समान आधार वाली तुलना में शामिल करना सांख्यिकीय रूप से उचित नहीं होगा।

    सरकार की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया कि मुआवजा उपकर के आंकड़ों को पूरी तरह छिपाया नहीं गया है, बल्कि उसे अलग से प्रदर्शित किया गया है। इसलिए केंद्र का कहना है कि 11 प्रतिशत की वृद्धि दर को गलत या कृत्रिम आंकड़ा बताना उचित नहीं है।

    पूर्व भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी संजय कुमार ने भी इस मामले में CBIC के रुख का समर्थन किया। उनके अनुसार, अगस्त 2026 का लगभग 1.998 लाख करोड़ रुपये का GST संग्रह CGST, SGST और IGST से बना है और इसमें मुआवजा उपकर शामिल नहीं है। अगस्त 2025 में इसी आधार पर संग्रह करीब 1.741 लाख करोड़ रुपये था। इस तरह दोनों वर्षों में समान कर घटकों की तुलना करने पर 14.8 प्रतिशत की वृद्धि निकलती है।

    अप्रैल से अगस्त की अवधि में भी यही तर्क लागू होता है। हालांकि पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में मुआवजा उपकर वसूला जा रहा था, लेकिन सरकार द्वारा इस्तेमाल किया गया करीब 9.40 लाख करोड़ रुपये का तुलनीय आधार इस उपकर को अलग रखता है। इस आधार पर अप्रैल-अगस्त 2026 में 11 प्रतिशत वृद्धि दर्ज होती है।

    संजय कुमार ने हालांकि यह भी माना कि गर्ग का सवाल पूरी तरह निरर्थक नहीं है। उनका कहना है कि यदि उद्देश्य केवल समान कर संरचना के आधार पर GST की वृद्धि मापना है, तो CBIC का तरीका उचित है। लेकिन यदि सवाल यह हो कि सरकार से जुड़े कुल GST-संबंधित राजस्व में वास्तविक आर्थिक बदलाव कितना आया, तो मुआवजा उपकर के खत्म होने का प्रभाव महत्वपूर्ण हो जाता है।

    यही अंतर मौजूदा विवाद को अधिक महत्वपूर्ण बनाता है। एक ओर सरकार कर संग्रह की वृद्धि को समान आधार पर मापने की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर आलोचक यह जानना चाहते हैं कि GST व्यवस्था से सरकार को कुल मिलाकर कितना अतिरिक्त राजस्व मिल रहा है और कर संरचना में हुए बदलावों का उस वृद्धि पर कितना प्रभाव पड़ा है।

    मुआवजा उपकर का मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले वर्ष तक यह कुछ विशेष वस्तुओं पर लागू था। GST व्यवस्था लागू होने के बाद राज्यों को राजस्व नुकसान की भरपाई के उद्देश्य से इस उपकर की व्यवस्था की गई थी। बाद में GST परिषद के निर्णयों और कर संरचना में बदलाव के साथ इसकी भूमिका समाप्त हुई। सितंबर 2025 में GST दरों में व्यापक बदलाव किए गए, जिसके बाद अधिकांश वस्तुओं पर संशोधित GST दरें 22 सितंबर 2025 से प्रभावी हुईं। इसके बाद निर्दिष्ट तंबाकू और पान मसाला उत्पादों पर मुआवजा उपकर को भी 1 फरवरी 2026 से हटा दिया गया।

    इस बदलाव के कारण 2026 के GST आंकड़ों की तुलना पिछले वर्ष के आंकड़ों से करना कुछ हद तक जटिल हो गया है। पिछले साल के आंकड़ों में ऐसा राजस्व शामिल था जो अब वर्तमान कर ढांचे का हिस्सा नहीं है। इसलिए सामान्य सालाना वृद्धि दर और व्यापक राजस्व तस्वीर दोनों अलग-अलग कहानी पेश कर सकती हैं।

    गर्ग की गणना इसी अंतर पर आधारित है। यदि पिछले साल प्राप्त मुआवजा उपकर को भी कर संग्रह का हिस्सा माना जाए और इस साल उससे तुलना की जाए, तो वृद्धि दर काफी कम हो जाती है। अगस्त के लिए उनकी गणना में वृद्धि 7.51 प्रतिशत और अप्रैल-अगस्त के लिए 4.08 प्रतिशत आती है। उनका कहना है कि इससे GST राजस्व की वास्तविक स्थिति का अलग आकलन सामने आता है।

    हालांकि, सरकार का मानना है कि इस तरह की गणना दो अलग कर व्यवस्थाओं को एक ही आधार पर रखने के बराबर होगी। CBIC ने इसीलिए समान कर घटकों के आधार पर तुलना करने को अधिक उपयुक्त माना है। बोर्ड का कहना है कि किसी वृद्धि दर का अर्थ तभी स्पष्ट होता है जब दोनों पक्षों में समान करों या लेवी को शामिल किया जाए।

    यह विवाद केवल आंकड़ों की तकनीकी बहस तक सीमित नहीं है। GST संग्रह को सरकार की वित्तीय स्थिति और अर्थव्यवस्था में औपचारिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है। यदि संग्रह लगातार तेजी से बढ़ रहा है, तो इसे बेहतर कर अनुपालन, आर्थिक गतिविधियों में विस्तार और डिजिटल टैक्स सिस्टम की प्रभावशीलता से जोड़ा जा सकता है। लेकिन यदि कर ढांचे में बदलाव के कारण पुराने और नए आंकड़ों की तुलना सीधे नहीं की जा सकती, तो वृद्धि दर की व्याख्या सावधानी से करना जरूरी हो जाता है।

    अगस्त में आयात से जुड़े GST संग्रह में 29 प्रतिशत की वृद्धि भी ध्यान देने योग्य है। इसके विपरीत घरेलू GST राजस्व में वृद्धि 9.3 प्रतिशत रही। इससे संकेत मिलता है कि कुल संग्रह की वृद्धि में आयात आधारित राजस्व ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। ऐसे में GST वृद्धि का मूल्यांकन करते समय घरेलू आर्थिक गतिविधियों और आयात से मिलने वाले राजस्व को अलग-अलग देखना भी उपयोगी हो सकता है।

    विशेषज्ञों के बीच इस बात पर सहमति बनती दिखाई देती है कि दोनों पक्ष अपने-अपने संदर्भ में सही सवाल उठा रहे हैं। सरकार का 11 प्रतिशत का आंकड़ा तुलनीय GST घटकों पर आधारित है और इसलिए सांख्यिकीय रूप से एक समान आधार वाली तुलना प्रस्तुत करता है। दूसरी ओर, मुआवजा उपकर के समाप्त होने से सरकार के कुल कर-संबंधी राजस्व पर जो प्रभाव पड़ा है, उसे आर्थिक विश्लेषण से पूरी तरह बाहर नहीं किया जा सकता।

    इसलिए मौजूदा विवाद को केवल इस सवाल तक सीमित करना कि 11 प्रतिशत का आंकड़ा सही है या 4.08 प्रतिशत, शायद पूरी तस्वीर नहीं दिखाएगा। वास्तविक तस्वीर समझने के लिए यह देखना होगा कि किस उद्देश्य से वृद्धि मापी जा रही है। यदि लक्ष्य वर्तमान GST प्रणाली के उन्हीं घटकों की तुलना करना है जो आज भी लागू हैं, तो सरकार का तरीका अधिक उपयुक्त है। लेकिन यदि लक्ष्य सरकार के कुल GST-संबंधित राजस्व की वास्तविक आर्थिक वृद्धि का आकलन करना है, तो समाप्त हो चुके मुआवजा उपकर का प्रभाव भी विश्लेषण में शामिल करना आवश्यक हो सकता है।

    GST व्यवस्था के आगे बढ़ने के साथ ऐसी तुलनाएं और भी महत्वपूर्ण होंगी। कर दरों में बदलाव, नए अनुपालन नियम, रिफंड, आयात संरचना और विभिन्न उपकरों के समाप्त होने जैसे कारक हर साल तुलना के आधार को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में केवल एक headline growth figure के आधार पर GST व्यवस्था की मजबूती या कमजोरी का निष्कर्ष निकालना पर्याप्त नहीं होगा।

    फिलहाल केंद्र सरकार 11 प्रतिशत की अप्रैल-अगस्त GST वृद्धि को समान कर आधार पर सही आंकड़ा बता रही है, जबकि सुभाष चंद्र गर्ग की गणना मुआवजा उपकर को शामिल करने पर कहीं कम वृद्धि की तस्वीर पेश करती है। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि GST संग्रह की वृद्धि केवल सांख्यिकीय आधार पर मजबूत दिखाई देती है या घरेलू अर्थव्यवस्था और सरकार के कुल राजस्व में भी उसी अनुपात में सुधार देखने को मिलता है। यही अंतर इस बहस को महज आंकड़ों की लड़ाई के बजाय भारतीय कर व्यवस्था और राजस्व प्रदर्शन के व्यापक मूल्यांकन का विषय बनाता है।

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