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    21वीं इंडिया - जापान इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ‘बायकॉन 2026 का हुआ समापन : एआई के सही इस्तेमाल पर विशेषज्ञों ने दिया जोर

    एआई को यूज़ करे लेकिन खुद पर हावी न होने दें : डॉ. संजय बियानी जयपुर । बियानी ग्रुप ऑफ कॉलेजेस में आयोजित चार दिवसीय 21वीं इंडो-जापान इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ‘बायकॉन-2026’ का बुधवार को समापन हुआ। समापन दिवस पर दो महत्वपूर्ण अकादमिक सत्र आयोजित किए गए। प्रथम सत्र में सोशल साइंसेज एवं एजुकेशन विभाग द्वारा “इंटेलिजेंट सोसाइटीज़: AI ट्रांसफॉर्मिंग सोशल सिस्टम्स, ह्यूमन डेवलपमेंट एंड एजुकेशन” विषय पर विशेषज्ञ चर्चा हुई। वहीं, द्वितीय सत्र में लॉ विभाग द्वारा “द फ्यूचर ऑफ लॉ एंड गवर्नेंस इन द ऐज ऑफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस” विषय पर विचार-विमर्श किया गया। सत्रों में एआई के समाज, शिक्षा, मीडिया एवं कानून पर प्रभाव, डेटा प्राइवेसी, साइबर सिक्योरिटी तथा इसके अवसरों और चुनौतियों पर विशेषज्ञों ने विचार साझा किए। कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन एवं गणेश वंदना के साथ हुई, इसके बाद अतिथियों एवं विशेषज्ञ वक्ताओं का स्वागत किया गया। समापन समारोह में मुख्य अतिथि डिप्टी चीफ मिनिस्टर के डिप्टी चीफ हनुमान सिंह शेखावत, राजस्थान सचिवालय के हायर एजुकेशन डिपार्टमेंट से समीर शर्मा, विशिष्ट अतिथि इशिकावा प्रीफेक्चरल यूनिवर्सिटी से प्रो. बाबा, ओसाका कॉलेज ऑफ टूरिज्म एंड बिजनेस से प्रो. क्यो एवं नवीन, डॉ. ली और डॉ. याहो सहित आयोजक चेयरमैन डॉ. राजीव बियानी, डायरेक्टर डॉ. संजय बियानी तथा डीन एवं प्रिंसिपल डॉ. ध्यान सिंह गोठवाल उपस्थित रहे। डिप्टी चीफ मिनिस्टर के डिप्टी चीफ हनुमान सिंह शेखावत ने कहा कि बियानी कॉलेज द्वारा समय-समय पर इस तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे हैं, जो एक सराहनीय पहल है। ऐसे आयोजनों के माध्यम से विभिन्न देशों के शिक्षा और संस्कृति से जुड़ी जानकारी को साझा करने और एक-दूसरे को समझने का अवसर मिलता है। उन्होंने इस सफल आयोजन के लिए बियानी कॉलेज को शुभकामनाएं दीं । राजस्थान सचिवालय के हायर एजुकेशन डिपार्टमेंट से समीर शर्मा ने कहा कि भारत ने करीब 1700 वर्षों तक अपने ज्ञान और समृद्ध परंपरा के आधार पर विश्व का मार्गदर्शन किया है। आज की युवा पीढ़ी के पास विचार, विज़न और नवाचार की क्षमता है। यदि उन्हें उचित संसाधन और सरकारी सहयोग मिले, तो वे आगे बढ़कर भारत की ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक ले जाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। इसी क्रम में गुलाबी प्रोग्राम के तहत भारत आए जापानी विद्यार्थियों ने अपने भारत प्रवास के अनुभव सभी के साथ साझा किए। विद्यार्थियों ने भारत की संस्कृति, परंपराओं और यहां मिले भावनात्मक जुड़ाव के बारे में अपने विचार व्यक्त किए। साथ ही, उन्होंने राजस्थानी लोक नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति देकर सभी का उत्साह बढ़ाया। समारोह में कॉन्फ्रेंस के ऑर्गेनाइजिंग चेयर एवं डायरेक्टर (रिसर्च एंड डेवलपमेंट) प्रो. डॉ. मनीष बियानी ने एजुकेशन और लॉ के विद्यार्थियों को जापान में उपलब्ध करियर अवसरों की जानकारी दी। उन्होंने ओसीटीबी–बियानी टी2सी (ट्रेनिंग टू करियर) जॉइंट एजुकेशन एंड जॉब प्रोग्राम के तहत पढ़ाई, ट्रेनिंग और रोजगार के अवसरों के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने गुलाबी प्रोग्राम और साकुरा साइंस प्रोग्राम के माध्यम से विद्यार्थियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सीखने और आगे बढ़ने के अवसरों से अवगत कराया। साथ ही, उन्होंने विद्यार्थियों को अपने ज्ञान और कौशल का उपयोग देश के विकास में योगदान देने के लिए प्रेरित किया। वहीं कॉलेज के एकेडमिक डायरेक्टर डॉ. संजय बियानी ने स्वागत उद्बोधन में कहा कि मोटिवेशन के लिए केवल लेक्चर देने के बजाय विद्यार्थियों को छोटे-छोटे साप्ताहिक लक्ष्य और प्रैक्टिकल गतिविधियां दी जानी चाहिए। हर सोमवार लक्ष्य तय करें और शुक्रवार को उसकी समीक्षा करें, इससे आत्मविश्वास और एफिशियंसी बढ़ेगी। उन्होंने कहा, “आप एआई को चलाएं, एआई आपको न चलाए।” विद्यार्थियों को एआई टूल्स का सही उपयोग सीखने और चैटजीपीटी का उपयोग करियर व सीखने से जुड़े सवालों के लिए करने की सलाह दी। उन्होंने कहा, “जिंदगी काम करने से बदलती है, सिर्फ समझने से नहीं।” उन्होंने फैकल्टी से इंटरेस्टिंग प्रोजेक्ट तैयार करने और विद्यार्थियों को जापान की शिक्षा व कार्य संस्कृति से सीखने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि बियानी का हर विद्यार्थी लीडर बने और अपने जीवन में आगे बढ़ने के लिए स्वयं पहल करे। तकनीकी सत्र में केंद्रीय विश्वविद्यालय हरियाणा के प्रो. दिनेश चाहल ने कहा कि एआई नए दौर की शुरुआत है। युवाओं को इसके सही उपयोग के साथ नियंत्रण और संयम भी रखना चाहिए। एआई से नए आय के अवसर तलाशते हुए वैल्यूज, एथिक्स और रिस्पॉन्सिबिलिटी का भी ध्यान रखना जरूरी है। वनस्थली विद्यापीठ के प्रो. अजय सुराणा ने कहा कि कोरोना महामारी के बाद शिक्षा क्षेत्र में कई बदलाव आए हैं। एआई के आने से नई चुनौतियाँ सामने आई हैं, ऐसे में शिक्षकों को नवाचार के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है। उन्होंने एआई के प्रभाव, चुनौतियों और उनके समाधान के लिए आवश्यक सुझाव भी साझा किए। नई दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया से प्रो.डॉ. इंदरजीत सिंह सोढ़ी ने कहा कि कृषि, ट्रैफिक मैनेजमेंट और ग्रामीण प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में प्रभावी एआई टूल्स की कमी है। उन्होंने इन क्षेत्रों के लिए सुलभ और उपयोगी एआई समाधान विकसित करने पर जोर दिया। जयपुर के शिक्षा संकुल से नोडल अधिकारी डॉ. चंदर कंवर पलावत ने शिक्षा, प्रशासन एवं सामाजिक विषयों पर अपने विचार साझा किए। इसके बाद मौखिक प्रस्तुति सत्र आयोजित हुआ, जिसमें शोधकर्ताओं ने अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए और प्रश्नोत्तर सत्र में विचार-विमर्श किया। लॉ एवं गवर्नेंस सत्र की शुरुआत में प्रेसिडेंसी यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु की प्रो.डॉ. सरोज शर्मा बोहरा ने कहा कि एआई कानून और न्याय के क्षेत्र में मददगार है, लेकिन अंतिम फैसला इंसान ही करेगा। उन्होंने डिजिटल सबूतों और साइबर लॉ में एआई के सही और जिम्मेदारी से उपयोग पर जोर दिया। वीजीयू से डॉ. शिल्पा राव रस्तोगी ने एआई के बढ़ते इस्तेमाल से जुड़े साइबर चैलेंज और प्राइवेसी पर चर्चा की। उन्होंने डिजिटल अरेस्ट जैसी घटनाओं का जिक्र करते हुए व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा और एआई के जिम्मेदार इस्तेमाल पर जोर दिया। लॉ डेस्क के फाउंडर एडवोकेट प्रतीक कासलीवाल ने कहा कि एआई के बढ़ते उपयोग के साथ डेटा प्राइवेसी, डीपफेक, मॉनिटरिंग, डिस्क्रिमिनेशन और मिसइन्फॉर्मेशन जैसी चुनौतियां बढ़ रही हैं। उन्होंने कहा कि एआई के डिसीजन में ट्रांसपेरेंसी और अकाउंटेबिलिटी सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था जरूरी है। अंत में सहायक निदेशक डॉ. राधिका बियानी डागा ने कार्यक्रम की रिपोर्ट प्रस्तुत की और सभी अतिथियों, वक्ताओं एवं प्रतिभागियों का धन्यवाद ज्ञापित किया। सम्मेलन का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ। समापन के साथ BICON-2026 ने यह संदेश दिया कि AI का भविष्य केवल तकनीक तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा, समाज, कानून और मानव जीवन के साथ उसके संतुलित और जिम्मेदार उपयोग में भी निहित है।  

    पंचम देव दर्शन यात्रा कैंची धाम के लिए हुई रवाना

    चौमूं। विराज फाउंडेशन के तत्वावधान में आयोजित पंचम देव दर्शन यात्रा बुधवार को प्रदेशाध्यक्ष भुवनेश तिवाड़ी के नेतृत्व में गढ़ गणेश मंदिर, चौमूं से धार्मिक जयघोष के साथ रवाना हुई। यात्रा के शुभारंभ अवसर पर मुख्य अतिथि फैंसी फुटवियर व्यापार मंडल अध्यक्ष पवन कुमार सैनी एवं विशिष्ट अतिथि नगर मंडल उपाध्यक्ष राजेश चोपड़ा ने यात्रा को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इस अवसर पर श्रद्धालुओं में उत्साह का माहौल रहा। शिक्षा प्रकोष्ठ जिलाध्यक्ष नरेंद्र सिंह सोलंकी,चौमूं नगर अध्यक्ष डॉ. सीताराम कुमावत ने बताया कि यह तीन दिवसीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक यात्रा है। यात्रा के दौरान श्रद्धालु कैंची धाम, मुक्तेश्वर धाम एवं नैनीताल के प्रमुख धार्मिक एवं दर्शनीय स्थलों के दर्शन करेंगे। उन्होंने कहा कि यात्रा का उद्देश्य श्रद्धालुओं को धार्मिक एवं आध्यात्मिक स्थलों के दर्शन कराने के साथ-साथ प्रकृति एवं संस्कृति से जुड़ने का अवसर प्रदान करना है। यात्रा के रवाना होने से पूर्व श्रद्धालुओं ने भगवान के जयकारे लगाए तथा यात्रा की सुखद, मंगलमय एवं सफल यात्रा के लिए प्रार्थना की। इस दौरान श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह और उमंग देखने को मिली। विराज् फाउंडेशन के संरक्षक एवं सिक्किम प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी गैंगटोक सिक्किम के कुलसचिव प्रोफेसर रमेश कुमार रावत ने सभी भक्तों को सफल यात्रा के लिए शुभकामना दी है! इस अवसर पर बनवारी लाल शर्मा, ओमप्रकाश रीडर, डॉ एमके अग्रवाल, नारायण लाल शर्मा, रामलाल शेरावत, योगेश सैनी, रामावतार लालाणी, महेंद्र कुमावत, रामावतार बासोतिया, शशिकांत बासोतिया, श्यामलाल बराला, रामकृष्ण टेलर, हरीश कुमावत एवं नानूराम कुमावत, जय सैन सहित अनेक गणमान्य लोग एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे।  

    23 हजार से अधिक हृदय सर्जरी की गौरवपूर्ण उपलब्धि, डॉ. अजीत बाना का विराज फाउंडेशन ने किया सम्मान

    विराज फाउंडेशन द्वारा विख्यात कार्डियक सर्जन एवं चेयरमैन, कार्डियक साइंसेज डॉ. अजीत बाना द्वारा 23 हजार से अधिक सफल हृदय सर्जरी पूर्ण करने पर उनका अभिनंदन एवं सम्मान किया गया। इस अवसर पर प्रदेशाध्यक्ष भुवनेश तिवाड़ी ने डॉ. अजीत बाना को दुपट्टा एवं शॉल ओढ़ाकर तथा अभिनंदन पत्र भेंट कर सम्मानित किया। इस अवसर पर प्रदेशाध्यक्ष भुवनेश तिवाड़ी ने कहा कि डॉ. अजीत बाना ने चिकित्सा के क्षेत्र में अपनी विशेषज्ञता, समर्पण और सेवाभाव के माध्यम से हजारों मरीजों को नया जीवन प्रदान किया है। 23 हजार से अधिक हृदय सर्जरी पूर्ण करना चिकित्सा जगत में उनकी उल्लेखनीय उपलब्धि है। उनकी सेवाएं समाज के लिए प्रेरणादायी हैं। विराज फाउंडेशन के संरक्षक एवं सिक्किम प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, गैंगटोक, सिक्किम, के कुलसचिव प्रोफेसर रमेश कुमार रावत ने विराज फाउंडेशन के प्रदेशाध्यक्ष भुवनेश तिवाड़ी को डॉ. अजीत बाना का स्वागत करने पर गैंगटोक, सिक्किम से मोबाइल पर भदाई एवं साधुवाद दिया! इसके साथ ही प्रोफेसर रमेश कुमार रावत ने कहा कि चिकित्सा के क्षेत्र में ऐसे चिकित्सकों का सम्मान समाज के लिए गौरव का विषय है। डॉ. बाना की उपलब्धियां युवा चिकित्सकों को सेवा, समर्पण और मानवीय मूल्यों के साथ कार्य करने की प्रेरणा देती हैं। विराज फाउंडेशन के प्रदेशाध्यक्ष भुवनेश तिवाड़ी चोमू नगर के गौरव है एवं पिछले अनेक सालों से शिक्षा, चिकित्सा, संस्कृति, समाज सेवा मे विशिष्ट योगदान देने वाले करीब तीन हजार से अधिक लोगों को अब तक विशेष अवसरों पर विभिन्न मंचों से समानीत कर चुके है! विराज फाउंडेशन की ओर से डॉ. अजीत बाना के उज्ज्वल भविष्य एवं निरंतर सेवा कार्यों के लिए शुभकामनाएं प्रेषित की गईं। इस अवसर पर प्रदेश महासचिव बनवारी लाल शर्मा, प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य डॉ. एम.के. अग्रवाल एवं शिक्षा प्रकोष्ठ जिलाध्यक्ष नरेंद्र सिंह सोलंकी, विनोद शर्मा ने भी डॉ. अजीत बाना को उनकी उल्लेखनीय उपलब्धि पर बधाई एवं शुभकामनाएं दीं।  

    प्राताप यूनिवर्सिटी जयपुर में 600-बेड वाले मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल के साथ महाराणा प्रताप मेडिसिटी स्थापित करेगी

    जयपुर: गौरव की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम बढ़ाते हुए, प्राताप यूनिवर्सिटी, जयपुर चांदवाजी, जयपुर स्थित अपने कैंपस के 40 एकड़ क्षेत्र में एक सुव्यवस्थित महाराणा प्रताप मेडिसिटी का उद्घाटन करने के लिए पूरी तरह तैयार है। यह महत्वाकांक्षी परियोजना यूनिवर्सिटी के शैक्षणिक और स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी ढांचे के विस्तार में एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित होगी। इस एकीकृत स्वास्थ्य सेवा और चिकित्सा शिक्षा सुविधा में 600-बेड वाला मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल, 100-बेड वाला आयुर्वेद अस्पताल और विभिन्न स्वास्थ्य सेवा संबंधी कार्यक्रमों के लिए शिक्षण सुविधाएं शामिल होंगी। महाराणा प्रताप मेडिसिटी की योजना चिकित्सा शिक्षा, क्लिनिकल प्रशिक्षण और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए एक एकीकृत इकोसिस्टम के रूप में बनाई जा रही है। यह सुविधा MBBS, BAMS के माध्यम से आयुर्वेद, BSc Nursing, GNM और फिजियोथेरेपी, मेडिकल लैबोरेटरी टेक्नोलॉजी तथा टेक्नीशियन कार्यक्रमों सहित कई पैरामेडिकल विषयों में शैक्षणिक कार्यक्रम प्रदान करेगी। इसके साथ ही बैचलर ऑफ वेटरिनरी साइंस एंड एनिमल हसबैंड्री (बी.वी.एससी. एंड ए.एच.) कार्यक्रम भी उपलब्ध कराया जाएगा। यह पशु चिकित्सा के क्षेत्र में करियर बनाने वाले छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम होगा। मेडिसिटी को कक्षा में होने वाली पढ़ाई को व्यावहारिक अनुभव के साथ जोड़ने के लिए डिजाइन किया गया है। यह छात्रों को उनकी शिक्षा के हिस्से के रूप में क्लिनिकल और स्वास्थ्य सेवा से जुड़े वातावरण तक पहुंच प्रदान करेगी। यह पहल राजस्थान में अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवा संस्थानों के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करने पर भी ध्यान केंद्रित करेगी, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां कुशल नर्सिंग और पैरामेडिकल पेशेवरों की मांग है। 600-बेड वाले मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल का विकास दो चरणों में किया जाएगा। पहला चरण 2026 के अंत तक संचालन शुरू करने की उम्मीद है। वहीं, दूसरे चरण की योजना जुलाई-अगस्त 2027 के लिए बनाई गई है। चिकित्सा, नर्सिंग, पैरामेडिकल, आयुर्वेद और पशु चिकित्सा विषयों के शैक्षणिक कार्यक्रम 2027-28 शैक्षणिक सत्र से शुरू होने की उम्मीद है। पहल पर उत्साह व्यक्त करते हुए, प्राताप यूनिवर्सिटी के चांसलर शैलेन्द्र भदौरिया ने कहा, “महाराणा प्रताप मेडिसिटी की परिकल्पना एक ऐसे स्थान के रूप में की गई है जहां शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और कौशल विकास एक साथ आते हैं। हमारा उद्देश्य एक ऐसा संस्थान तैयार करना है जहां छात्रों को मजबूत शैक्षणिक आधार के साथ सार्थक व्यावहारिक अनुभव मिले, जबकि स्वास्थ्य सुविधाएं व्यापक समुदाय की सेवा करें। इस पहल के माध्यम से हम न केवल जयपुर और राजस्थान बल्कि पूरे देश के स्वास्थ्य सेवा संस्थानों के लिए प्रशिक्षित स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों की उपलब्धता में योगदान करने की उम्मीद करते हैं।” स्वास्थ्य सुविधाओं और विविध शैक्षणिक कार्यक्रमों के संयोजन के साथ, महाराणा प्रताप मेडिसिटी की परिकल्पना जयपुर और राजस्थान की व्यापक आबादी की सेवा करने वाले एक प्रमुख चिकित्सा और शैक्षणिक संस्थान के रूप में की गई है। यह पहल स्वास्थ्य सेवा शिक्षा में अवसर पैदा करने पर प्राताप यूनिवर्सिटी के फोकस को और मजबूत करेगी और साथ ही एक कुशल स्वास्थ्य सेवा कार्यबल के विकास में योगदान देगी।  

    “बेस्ट आउट ऑफ वेस्ट” गतिविधि का सफल आयोजन

    कानोड़िया पी.जी. महिला महाविद्यालय, जयपुर के नेचर क्लब की ओर से रचनात्मकता और पर्यावरण संरक्षण से परिपूर्ण “बेस्ट आउट ऑफ वेस्ट” गतिविधि का सफल आयोजन किया गया। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य छात्राओं में कलात्मक कौशल के साथ-साथ अपशिष्ट न्यूनीकरण, पुनः उपयोग, पुनर्चक्रण और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता को बढ़ावा देना था। गतिविधि में महाविद्यालय की 48 छात्राओं ने उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया और घरों से लाई गई अनुपयोगी सामग्री से शानदार सजावटी व उपयोगी वस्तुएँ बनाईं। महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. सीमा अग्रवाल ने छात्राओं के प्रयासों की सराहना करते हुए दैनिक जीवन में 3 आर (रिड्यूस, रियूज एवं रिसाईकल) के सिद्धांतों को अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे छोटे प्रयास पर्यावरण को स्वच्छ और सुरक्षित बनाने में मील का पत्थर साबित होते हैं। प्रतियोगिता के निर्णायक डॉ. नीतू माथुर, सह-आचार्य, व्यावसायिक प्रशासन विभाग एवं डॉ. आरती मिश्रा, सह-आचार्य, रसायन विभाग रहीं। प्रतिभागियों को प्रोत्साहित एवं उनकी प्रतिभा को सम्मानित करने के लिए प्रथम पुरस्कार बी.एससी. सेमेस्टर-प्रथम की छात्रा चेतरा यादव, द्वितीय पुरस्कार बी.एससी. सेमेस्टर-पंचम की छात्रा हर्षिता, तथा तृतीय पुरस्कार बी.एससी. सेमेस्टर-तृतीय की छात्रा शाइली मिश्रा को प्रदान किया गया। सांत्वना पुरस्कार बी.एससी. सेमेस्टर-प्रथम की छात्राओं समीक्षा एवं रिद्धिमा को प्रदान किए गए। सभी विजेताओं को उनकी रचनात्मकता एवं अपशिष्ट पदार्थों के अभिनव उपयोग के लिए पुरस्कारों के साथ प्रमाण-पत्र भी प्रदान किए गए. 

    एंकरिंग वर्कशाॅप में छात्राओं ने सीखे प्रभावी प्रस्तुति और मंच संचालन के गुर

    कानोड़िया पी.जी. महिला महाविद्यालय, जयपुर के अभिव्यक्ति क्लब (हिंदी/अंग्रेजी) द्वारा 23 सितंबर, 2026 को आयोजित एंकरिंग वर्कशाॅप में छात्राओं को प्रभावी मंच संचालन, शुद्ध उच्चारण, आवाज में उतार-चढ़ाव और आत्मविश्वासपूर्ण प्रस्तुति के गुर सिखाए गए। कार्यशाला की विषय विशेषज्ञ वरिष्ठ एंकर एवं एसोसिएट न्यूज एडिटर, फर्स्ट इंडिया न्यूज, श्वेता मिश्रा अवस्थी रहीं। उन्होंने छात्राओं को नुक्ता वाले शब्दों सहित विभिन्न शब्दों के शुद्ध उच्चारण, उनके नियमित अभ्यास, उचित शब्द चयन तथा संवेदनशीलता के साथ प्रभावी प्रस्तुति के विभिन्न पहलुओं की जानकारी दी। उन्होंने वाक्-कौशल विकसित करने के लिए नियमित समाचार-वाचन, श्वास अभ्यास, आईने के सामने अभ्यास तथा शब्दावली समृद्ध करने के लिए प्रेरित किया। मंच-भय दूर करने और आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए संवादात्मक गतिविधियाँ भी कराई गईं। कार्यक्रम में महाविद्यालय प्राचार्य डॉ. सीमा अग्रवाल ने छात्राओं को संबोधित करते हुए कहा कि “अभिव्यक्ति आज के समय की मांग है। इसके लिए समसामयिक विषयों की जानकारी रखने के साथ साथ निरंतर स्वाध्याय आवश्यक है। ”इस दौरान डॉ. स्वाति धनवानी ने सभी का स्वागत करते हुए कार्यशाला के उद्देश्य से अवगत कराया और डॉ. धर्मा यादव ने छात्राओं को क्लब की आगामी गतिविधियों की जानकारी देते हुए सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया। इस आयोजन की सफलता में क्लब सदस्य डॉ. स्वाति एस. सुल्तानिया, डॉ. सुरभि शर्मा, डॉ. निमिषा गौड़, डॉ. शिप्रा गोयल एवं डॉ. स्वाति चौधरी की सक्रिय भूमिका रही।  

    आशीष दुसाद के चोमू के सभापति बनने पर अशोक विहार मे खुशी की लहर

    आशीष दुसाद ने चोमू के सभापति बनने पर मन्दिर मे ईश्वर से आशीर्वाद लिया एवं अपने पिता गोविंद दुसाद एवं परिजनों तथा चोमू की देव तुल्य जनता से भी आशीर्वाद लिया! ​आशीष दुसाद को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा चोमू नगर परिषद के प्रथम पूर्ण कालिक नगर परिषद सभापति बनाए जाने पर अशोक विहार वार्ड नंबर 22 के निवासियों ने हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएं दी है! सभी ने आशा जताई है कि जिस प्रकार से आशीष दुसाद ने पूर्व मे चोमू नगरपालिका का अध्यक्ष रहते हुए ​आपका पूर्व कार्यकाल विकास और जनसेवा की दृष्टि से अत्यंत सराहनीय व ऐतिहासिक रहा। आपने सदैव शोषित, पीड़ित, वंचित और गरीब वर्ग के अधिकारों व कल्याण के लिए आगे आकर कार्य किया है। समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक विकास और सहायता पहुँचाना ही आपकी प्राथमिक कार्यशैली रही है। उसी क्रम मे ​आपके उसी सेवाभाव, अटूट निष्ठा और कुशल नेतृत्व पर पार्टी और जनता ने एक बार फिर विश्वास जताया है और आप को सभापति बनाया है! साथ ही वार्ड 22 एवं चोमू की जनता को आप पर पूर्ण विश्वास है कि आपके नेतृत्व में नगर परिषद क्षेत्र में विकास की गति और भी तीव्र होगी तथा हर वर्ग को मान-सम्मान मिलेगा। आशीष दुसाद के चोमू के सभापति बनने पर ​राजस्थाय प्रदेश के मुख्य प्रवक्ता एवं पूर्व विधायक रामलाल शर्मा, सभी बीजेपी के पार्षद, चोमू के सभी व्यापार मंडल, धर्म एवं समाज के संस्थान के पदाधिकारी एवं सदस्य इसके साथ ही डॉ ओम प्रकाश धमोड, राजेन्द्र अग्रवाल, राधेश्याम अग्रवाल, श्रवण कामदार, सांवरमल बजाज, शंकरलाल अग्रवाल KD, राम कृष्ण दुसाद, नवल किशोर रावत, अशोक बंसल, दामोदर प्रसाद रावत, महेश कासलीवाल, भुवनेश तिवाड़ी, बनवारी लाल शर्मा, मनीष शर्मा, मनीष जांगिड़, नारायण महेश्वरी, प्रोफेसर रमेश रावत, कैलाश झलानी, नेनेश प्रधान, दिनेश खेमावाला, मनीष दीक्षित, सुरेश रावत, विशन रावत, देवकी नंदन अगरवाल, किशन रावत, नितिन अगरवाल, हरि रावत, राजेंद्र ताम्बी, नरोत्तम कामदार, राजेंद्र धमोड, कैलाश चंद्र खुटेटा, डॉ विनोद अगरवाल, अशोक अगरवाल, अशोक अगरवाल अनंतपपुरा वाले, मनोज शर्मा, ओम प्रकाश कासलीवाल, हेमंत खंडेलवाल, मेहुल् अगरवाल, गोविंद विजय वर्गीय, केशव रावत, राजेंद्र अगरवाल, चंद्र प्रकाश ताम्बि, सुनील अगरवाल, मूल चंद्र दुसाद, राम मनोहर दुसाद, पपू जी दुसाद, राम अवतार दुसाद एवं विनोद दुसाद, निलेश सर्राफ, प्रवीण शर्मा, विनेश अग्रवाल, राम अवतार महाजन, अनिल जैन, सुधीर अग्रवाल, प्रोफेसर हरिनारायण अग्रवाल, पप्पू माधाणी, गोविंद झालानी, विनोद झालानी, संजय खटोड़, चिरंजी लाल महेश्वरी, रमेश बजाज, राजू हलवाई, मनीष अग्रवाल, मुकेश के डी, दामोदर अग्रवाल, हरि नारायण शर्मा, कुंज बिहारी तांबी, अमर चंद्र रावत, विमल शर्मा, शिव प्रसाद पालीवाल, श्याम बजाज, दामोदर खांडल, नटवर अगीवाल, विनोद खटोड़, सुरेश तांबी, योगेश खटोड़, राधेश्याम नाणका, रामबाबू नायक, सुरेश महरिया, डॉ मदन लाल कुमावत, डॉ सीताराम शर्मा, श्याम सुंदर अग्रवाल, गोपाल अग्रवाल, लाखन बागोरिया, संजय बजाज, अरुण पटवारी, राजकुमार पटवारी, ने भदाई दी है!  

    ज्ञान से नेतृत्व तक… ‘स्पार्क’ ने जगाई नई सोच की लौ

    जेईसीआरसी विश्वविद्यालय के जयपुर स्कूल ऑफ बिज़नेस की ‘स्पार्क सीरीज़ 4.0’ में उद्योग जगत के दिग्गजों से रूबरू हुए विद्यार्थी, अनुभवात्मक गतिविधियों से निखरे नेतृत्व और प्रबंधन कौशल जयपुर। जब शिक्षा केवल किताबों तक सीमित न रहकर अनुभव, संवाद और वास्तविक दुनिया से जुड़ती है, तब सीखने की प्रक्रिया एक नई दिशा लेती है। इसी सोच को साकार करते हुए जेईसीआरसी विश्वविद्यालय के जयपुर स्कूल ऑफ बिज़नेस के बिज़नेस एडमिनिस्ट्रेशन विभाग द्वारा ‘स्पार्क सीरीज़ 4.0’ का सफल आयोजन किया गया। यह पहल विद्यार्थियों को उद्योग जगत के अनुभवी विशेषज्ञों, कॉर्पोरेट लीडर्स और विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों से जोड़ने के साथ-साथ उनके व्यक्तित्व, नेतृत्व क्षमता और प्रबंधन कौशल को विकसित करने की दिशा में एक प्रभावी प्रयास रही। उद्योग जगत से सीधा संवाद, करियर की नई समझ ‘स्पार्क सीरीज़ 4.0’ के दौरान विद्यार्थियों को विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिष्ठित उद्योग विशेषज्ञों एवं कॉर्पोरेट लीडर्स के साथ संवाद करने का अवसर मिला। विशेषज्ञों ने अपने व्यावसायिक अनुभव, करियर यात्रा और उद्योग जगत की चुनौतियों से जुड़े वास्तविक अनुभव विद्यार्थियों के साथ साझा किए। इन संवादात्मक सत्रों के माध्यम से विद्यार्थियों को करियर निर्माण, नेतृत्व, व्यक्तिगत विकास, निर्णय लेने की क्षमता, प्रबंधन, कार्यस्थल की चुनौतियों और बदलते कॉर्पोरेट परिदृश्य को समझने का अवसर मिला। विशेषज्ञों के साथ खुला संवाद विद्यार्थियों के लिए कक्षा की चारदीवारी से बाहर निकलकर वास्तविक दुनिया को समझने का माध्यम बना। सीख जो किताबों से आगे बढ़कर अनुभव बनी कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण आकर्षण विभाग के विभिन्न छात्र क्लबों द्वारा आयोजित संवादात्मक एवं अनुभवात्मक गतिविधियां रहीं। इन गतिविधियों में विद्यार्थियों ने सक्रिय भागीदारी करते हुए टीमवर्क, नेतृत्व, रचनात्मक सोच, संचार, समस्या-समाधान और प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण कौशलों को व्यवहारिक रूप से समझा। इन गतिविधियों ने विद्यार्थियों को केवल अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का अवसर ही नहीं दिया, बल्कि उन्हें वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में सोचने, निर्णय लेने और चुनौतियों का समाधान तलाशने का अनुभव भी प्रदान किया। इससे विद्यार्थियों के आत्मविश्वास, रचनात्मकता और निर्णय क्षमता को नई मजबूती मिली। ‘स्पार्क’ से सशक्त हुआ विद्यार्थियों का आत्मविश्वास ‘स्पार्क सीरीज़ 4.0’ का मूल उद्देश्य विद्यार्थियों में केवल शैक्षणिक ज्ञान का विस्तार करना नहीं, बल्कि उन्हें भविष्य के जिम्मेदार, आत्मविश्वासी और कुशल पेशेवरों एवं प्रभावी नेतृत्वकर्ताओं के रूप में तैयार करना रहा। उद्योग विशेषज्ञों के अनुभव, कॉर्पोरेट जगत की वास्तविक समझ और अनुभवात्मक गतिविधियों के संयोजन ने विद्यार्थियों को अपने भविष्य और करियर को एक व्यापक दृष्टिकोण से देखने का अवसर दिया। कार्यक्रम ने विद्यार्थियों में सीखने की जिज्ञासा को बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें अपनी क्षमताओं को पहचानने और निरंतर बेहतर बनाने के लिए प्रेरित किया। समग्र विकास की दिशा में एक और सार्थक पहल कार्यक्रम डॉ. रेनू पारीक, डीन, जयपुर स्कूल ऑफ बिज़नेस के मार्गदर्शन में तथा डॉ. रुचि गोयल, विभागाध्यक्ष, बिज़नेस एडमिनिस्ट्रेशन विभाग एवं विभाग के समर्पित फैकल्टी सदस्यों के समन्वय में सफलतापूर्वक आयोजित किया गया। कार्यक्रम की सफलता में जेईसीआरसी विश्वविद्यालय के प्रबंधन, फैकल्टी सदस्यों, उद्योग विशेषज्ञों, कॉर्पोरेट लीडर्स और छात्र स्वयंसेवकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। ‘स्पार्क सीरीज़ 4.0’ ने विद्यार्थियों को ज्ञान से अनुभव, अनुभव से आत्मविश्वास और आत्मविश्वास से नेतृत्व की ओर बढ़ने का अवसर प्रदान किया। यह पहल जेईसीआरसी विश्वविद्यालय की उस प्रतिबद्धता को भी रेखांकित करती है, जिसमें विद्यार्थियों को अकादमिक शिक्षा के साथ-साथ उद्योग-उन्मुख कौशल, व्यावहारिक अनुभव और नेतृत्व क्षमता से सशक्त बनाने पर निरंतर जोर दिया जाता है।  

    "युवाओं के लिए रोजगार क्षमता संवर्धन’’ विषय पर 10 दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ

    कानोड़िया पी.जी. महिला महाविद्यालय, जयपुर में सेंटर फॉर करियर गाइडेंस, ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट द्वारा नांदी फाउंडेशन- महिंद्रा प्राइड क्लासरूम के संयुक्त तत्वावधान में ‘‘युवाओं के लिए रोजगार क्षमता संवर्धन’’ विषय पर 10 दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला का आयोजन 22 सितंबर से 01 अक्टूबर 2026 तक विशेष रूप से अंतिम वर्ष की छात्राओं को रोजगार के लिए आवश्यक कौशल एवं दक्षताओं से सुसज्जित करने के उद्देश्य से किया गया है। इस अवसर पर महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. सीमा अग्रवाल ने प्रशिक्षक का स्वागत कर कार्यशाला के औपचारिक रूप से शुभारंभ की घोषणा की। उन्होंने छात्राओं को कार्यशाला का अधिकतम लाभ उठाने और अपने रोजगार कौशल को सुदृढ़ करने के लिए प्रोत्साहित किया। प्राचार्य ने कहा कि वर्तमान प्रतिस्पर्धात्मक रोजगार परिवेश में विषयगत ज्ञान के साथ संचार कौशल, आत्मविश्वास, टीमवर्क एवं समस्या-समाधान जैसी क्षमताएँ भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में नांदी फाउंडेशन के प्रशिक्षक, संजय शर्मा ने छात्राओं को कार्यशाला की रूपरेखा, उद्देश्यों एवं प्रशिक्षण के विभिन्न आयामों से परिचित कराया। उन्होंने रोजगार के बदलते परिदृश्य में तकनीकी ज्ञान के साथ-साथ प्रभावी संचार, व्यक्तित्व विकास, जीवन कौशल, आत्मविश्वास तथा साक्षात्कार कौशल के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने छात्राओं को प्रशिक्षण के प्रत्येक सत्र में सक्रिय सहभागिता करने तथा प्राप्त ज्ञान एवं कौशल को व्यावहारिक जीवन में उपयोग करने के लिए प्रेरित किया। कार्यशाला के प्रथम दिन लगभग 80 छात्राएं उपस्थित रहीं। आगामी सत्रों में छात्राओं को प्रभावी संचार कौशल, जीवन कौशल, व्यक्तित्व विकास, साक्षात्कार कौशल तथा रोजगार से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण दक्षताओं का प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा। कार्यशाला का उद्देश्य छात्राओं को रोजगार के लिए अधिक आत्मविश्वासी, सक्षम एवं तैयार बनाना तथा उन्हें बदलते कार्यक्षेत्र की आवश्यकताओं के अनुरूप व्यावहारिक कौशल प्रदान करना है।

    NHAI ने हाई-स्पीड एक्सेस-कंट्रोल्ड हाईवे के लिए जारी किए एक समान डिजाइन मानक, जानिए क्या बदलेगा

    Yugcharan News / 22-09-2026 भारत में हाई-स्पीड सड़क नेटवर्क के विस्तार के बीच भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने एक्सेस-कंट्रोल्ड हाई-स्पीड नेशनल हाईवे के लिए एक समान डिजाइन फ्रेमवर्क पेश किया है। नए दिशानिर्देशों का उद्देश्य देश में ऐसे हाईवे की योजना, डिजाइन, यातायात आकलन, लेन व्यवस्था, इंटरचेंज और सुरक्षा प्रावधानों को एक समान बनाना है। NHAI के अनुसार, नए मानक आगामी चार और छह लेन वाले एक्सेस-कंट्रोल्ड ग्रीनफील्ड और ब्राउनफील्ड राष्ट्रीय राजमार्गों पर लागू होंगे। हालांकि, एक्सप्रेसवे इन दिशानिर्देशों के दायरे से बाहर रहेंगे। यह कदम ऐसे समय में आया है जब भारत में हाई-स्पीड और नियंत्रित प्रवेश वाले सड़क गलियारों का नेटवर्क तेजी से विस्तार करने की योजना पर काम हो रहा है। सरकार के Viksit Bharat 2047 रोडमैप के तहत करीब 50,000 किलोमीटर एक्सेस-कंट्रोल्ड हाई-स्पीड कॉरिडोर विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। अब तक अलग मानकों के कारण थी असमानता NHAI के मुताबिक, अब तक एक्सप्रेसवे के अलावा एक्सेस-कंट्रोल्ड हाई-स्पीड राष्ट्रीय राजमार्गों की योजना और डिजाइन के लिए अलग से व्यापक मानक मौजूद नहीं थे। इसके चलते अलग-अलग कॉरिडोर के लिए Detailed Project Report (DPR) तैयार करते समय तकनीकी मानकों में अंतर देखने को मिलता था। नए फ्रेमवर्क का उद्देश्य इस स्थिति में एकरूपता लाना है। इसके तहत परियोजनाओं की योजना बनाते समय यातायात की मात्रा, लेन की संख्या, सड़क की ज्यामिति, संरचनाओं, इंटरचेंज और प्रवेश नियंत्रण जैसे पहलुओं के लिए साझा मानक अपनाए जाएंगे। इससे अलग-अलग राज्यों और परियोजनाओं में तैयार होने वाले हाई-स्पीड कॉरिडोर की डिजाइन प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित करने की कोशिश की गई है। यातायात के आधार पर तय होगी लेन की संख्या नए दिशानिर्देशों में हाईवे की संरचना को अपेक्षित यातायात के आधार पर तय करने का प्रावधान किया गया है। इसका मतलब है कि जिस कॉरिडोर पर वाहनों की संख्या जितनी अधिक होगी, वहां सड़क और संबंधित संरचनाओं की क्षमता उसी हिसाब से निर्धारित की जाएगी। दिशानिर्देशों के अनुसार, जिन कॉरिडोर पर प्रतिदिन 15,000 तक वाहनों का यातायात अनुमानित है, वहां चार लेन का हाईवे और चार लेन की संरचनाएं बनाई जाएंगी। ऐसे कॉरिडोर के लिए प्रस्तावित चौड़ाई 60 मीटर होगी। यदि यातायात 15,000 से 25,000 वाहनों के बीच है, तो चार लेन का हाईवे और छह लेन की संरचनाओं का प्रावधान होगा। इस श्रेणी के कॉरिडोर की प्रस्तावित चौड़ाई 70 मीटर रखी गई है। वहीं, 25,000 से 40,000 वाहनों वाले कॉरिडोर के लिए छह लेन का हाईवे और छह लेन की संरचनाएं प्रस्तावित की गई हैं। इस श्रेणी में भी कॉरिडोर की चौड़ाई 70 मीटर निर्धारित की गई है। इस व्यवस्था के जरिए सड़क की क्षमता को वास्तविक और अनुमानित यातायात मांग से जोड़ने की कोशिश की गई है। हाईवे के प्रवेश और निकास पर ज्यादा ध्यान नए डिजाइन फ्रेमवर्क में हाई-स्पीड यातायात की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए प्रवेश और निकास बिंदुओं के बारे में भी नए प्रावधान शामिल किए गए हैं। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार, हाईवे पर एंट्री और एग्जिट की पहले से सूचना देने के लिए पर्याप्त संकेत और अग्रिम सूचना व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी। इसका उद्देश्य वाहन चालकों को निकास या प्रवेश बिंदु के बारे में पहले से जानकारी देना है, ताकि वे अचानक लेन बदलने या तेज ब्रेक लगाने जैसी परिस्थितियों से बच सकें। हाई-स्पीड सड़कों पर अचानक किसी इंटरचेंज या निकास के सामने आने से दुर्घटना का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए नए मानकों में ड्राइवर को पहले से पर्याप्त जानकारी देने पर विशेष जोर दिया गया है। महत्वपूर्ण सड़कों पर इंटरचेंज और रैंप NHAI के नए मानकों में हाई-स्पीड कॉरिडोर पर सीधे प्रवेश को सीमित करने की व्यवस्था भी की गई है। महत्वपूर्ण सड़क क्रॉसिंग पर इंटरचेंज और रैंप विकसित किए जाएंगे। इनका प्रावधान एक्सप्रेसवे, राष्ट्रीय राजमार्ग, राज्य राजमार्ग और ऐसे महत्वपूर्ण आर्टेरियल रोड के साथ क्रॉसिंग पर किया जाएगा, जहां पर्याप्त मात्रा में यातायात उत्पन्न होता है। इस व्यवस्था का उद्देश्य हाई-स्पीड कॉरिडोर पर अनियंत्रित या सीधे प्रवेश को कम करना है। इससे मुख्य राजमार्ग पर चल रहे तेज यातायात और स्थानीय या दूसरे मार्गों से आने वाले वाहनों के बीच संभावित टकराव की स्थितियों को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। एयरपोर्ट, पोर्ट और लॉजिस्टिक्स हब से बेहतर कनेक्टिविटी नए दिशानिर्देशों में प्रमुख यातायात पैदा करने वाले स्थानों को हाई-स्पीड हाईवे से जोड़ने पर भी ध्यान दिया गया है। पोर्ट, एयरपोर्ट, मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स पार्क, औद्योगिक क्षेत्र और बड़े पर्यटन स्थलों जैसे प्रमुख गंतव्यों तक पहुंच के लिए आवश्यक स्थानों पर इंटरचेंज उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया है। इससे हाई-स्पीड हाईवे केवल लंबी दूरी के यातायात के लिए ही नहीं, बल्कि महत्वपूर्ण आर्थिक और लॉजिस्टिक केंद्रों से कनेक्टिविटी के लिए भी उपयोगी बनाए जा सकेंगे। विशेष रूप से औद्योगिक क्षेत्रों और लॉजिस्टिक्स पार्कों के साथ बेहतर कनेक्टिविटी माल परिवहन के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। इसी तरह एयरपोर्ट और बंदरगाहों से सीधी और नियंत्रित पहुंच यात्रियों तथा माल की आवाजाही को अधिक व्यवस्थित करने में मदद कर सकती है। हाईवे के किनारे एक मीटर ऊंची बाउंड्री वॉल एक्सेस कंट्रोल को मजबूत करने के लिए NHAI ने हाईवे के बाहरी किनारे पर एक मीटर ऊंची बाउंड्री वॉल बनाने का प्रावधान भी किया है। इस दीवार का उद्देश्य हाईवे पर अनधिकृत प्रवेश, अतिक्रमण और आवारा पशुओं के प्रवेश को रोकना है। हाई-स्पीड कॉरिडोर पर अचानक पैदल यात्रियों, स्थानीय वाहनों या पशुओं के पहुंचने से गंभीर दुर्घटना का खतरा पैदा हो सकता है। इसलिए भौतिक अवरोध को नए डिजाइन फ्रेमवर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है। इससे सड़क के प्रवेश बिंदुओं को अधिक नियंत्रित रखने और हाई-स्पीड यातायात के लिए सुरक्षित वातावरण तैयार करने की कोशिश की गई है। ग्रीनफील्ड और ब्राउनफील्ड दोनों परियोजनाओं पर लागू नए मानक केवल नई सड़कों तक सीमित नहीं रहेंगे। NHAI के अनुसार, इनका इस्तेमाल ग्रीनफील्ड परियोजनाओं के साथ-साथ मौजूदा हाईवे को एक्सेस-कंट्रोल्ड कॉरिडोर में अपग्रेड करने वाली ब्राउनफील्ड परियोजनाओं में भी किया जाएगा। ग्रीनफील्ड परियोजनाएं ऐसे नए सड़क कॉरिडोर हैं जिन्हें नए सिरे से विकसित किया जाता है, जबकि ब्राउनफील्ड परियोजनाओं में मौजूदा सड़क ढांचे को अपग्रेड या पुनर्विकसित किया जाता है। दोनों प्रकार की परियोजनाओं के लिए समान आधारभूत मानक निर्धारित करने से डिजाइन और योजना प्रक्रिया में अंतर कम करने की कोशिश की गई है। DPR तैयार करने में आएगी एकरूपता NHAI के नए फ्रेमवर्क का एक प्रमुख उद्देश्य Detailed Project Report यानी DPR तैयार करने की प्रक्रिया में एकरूपता लाना है। किसी बड़े हाईवे प्रोजेक्ट की DPR में यातायात अनुमान, लेन की जरूरत, सड़क की ज्यामिति, पुल और अन्य संरचनाएं, इंटरचेंज, प्रवेश नियंत्रण और सुरक्षा उपायों जैसे पहलुओं का आकलन किया जाता है। अब इन पहलुओं के लिए साझा मानक होने से अलग-अलग परियोजनाओं की योजना तैयार करने में अधिक स्पष्टता आने की उम्मीद है। NHAI का मानना है कि एक समान डिजाइन व्यवस्था से हाई-स्पीड कॉरिडोर की योजना और निर्माण में तकनीकी अंतर कम होंगे तथा सड़क नेटवर्क के संचालन में भी अधिक एकरूपता लाई जा सकेगी। भारत के हाई-स्पीड रोड नेटवर्क के विस्तार की दिशा में कदम भारत में आर्थिक गतिविधियों, औद्योगिक क्षेत्रों, बंदरगाहों, एयरपोर्ट और बड़े शहरों के बीच तेज कनेक्टिविटी की जरूरत लगातार बढ़ रही है। ऐसे में एक्सेस-कंट्रोल्ड हाई-स्पीड हाईवे का नेटवर्क विस्तार बुनियादी ढांचे की योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है। NHAI का नया डिजाइन फ्रेमवर्क इसी विस्तार को एक समान तकनीकी और सुरक्षा मानकों के साथ आगे बढ़ाने का प्रयास है। यातायात के आधार पर लेन की संख्या तय करने, महत्वपूर्ण स्थानों पर इंटरचेंज उपलब्ध कराने, प्रवेश और निकास की अग्रिम सूचना देने तथा हाईवे के किनारे भौतिक अवरोध बनाने जैसे प्रावधानों के जरिए परियोजनाओं की योजना को अधिक व्यवस्थित बनाने पर जोर दिया गया है। नए दिशानिर्देशों का प्रभाव आने वाले समय में उन चार और छह लेन वाले एक्सेस-कंट्रोल्ड राष्ट्रीय राजमार्गों की डिजाइन और निर्माण प्रक्रिया में दिखाई देगा, जिन्हें देश के विभिन्न हिस्सों में विकसित या अपग्रेड किया जाना है। सरकार के Viksit Bharat 2047 के तहत प्रस्तावित बड़े हाई-स्पीड कॉरिडोर नेटवर्क के संदर्भ में इन मानकों को एक महत्वपूर्ण आधार के रूप में देखा जा रहा है।

    महाराष्ट्र UCC समिति से पूर्व बॉम्बे हाईकोर्ट जज आरसी चव्हाण का इस्तीफा, जानिए क्या थी वजह

    Yugcharan News / 22-09-2026 महाराष्ट्र में समान नागरिक संहिता यानी Uniform Civil Code (UCC) तैयार करने के लिए गठित समिति को लेकर महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। बॉम्बे हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस आरसी चव्हाण ने समिति की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। उनका इस्तीफा 19 सितंबर को समिति की दूसरी बैठक के कुछ घंटे बाद सामने आया। राज्य सरकार ने सोमवार को उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया। जस्टिस चव्हाण के इस्तीफे की वजह समिति में आम जनता से राय लेने के लिए तैयार किए जा रहे प्रश्नावली (Questionnaire) के तरीके और समिति की कार्यप्रणाली से जुड़ी उनकी असहमति बताई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने समिति को भेजे अपने ईमेल में कहा कि उन्हें लगा था कि UCC की कवायद का उद्देश्य महाराष्ट्र के लोगों के विचार जानना और विभिन्न सामाजिक एवं कानूनी मुद्दों पर व्यापक सहमति विकसित करना है। हालांकि, बाद में उन्हें लगा कि प्रस्तावित प्रक्रिया मुख्य रूप से लोगों से हां या ना में जवाब लेने और उन जवाबों के आंकड़ों का विश्लेषण करने तक सीमित हो सकती है। जुलाई में गठित हुई थी सात सदस्यीय समिति महाराष्ट्र सरकार ने जुलाई 2026 में राज्य के लिए समान नागरिक संहिता का मसौदा तैयार करने के उद्देश्य से सात सदस्यीय समिति का गठन किया था। समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस रंजना देसाई कर रही हैं। समिति में जस्टिस आरसी चव्हाण के अलावा बॉम्बे हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस एसजी मेहरे भी सदस्य हैं। इसके अन्य सदस्यों में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्य सचिव डीके जैन, महाराष्ट्र के पूर्व महाधिवक्ता वीरेंद्र सराफ, संविधान विशेषज्ञ और पद्मश्री सम्मानित रमेश पतंगे तथा शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता सुवर्णा रावल शामिल हैं। समिति का उद्देश्य महाराष्ट्र में समान नागरिक संहिता से जुड़े विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करना और राज्य के लिए प्रस्तावित UCC के मसौदे की दिशा में काम करना है। इसी प्रक्रिया के तहत जनता से राय और सुझाव लेने के लिए एक वेबसाइट तथा प्रश्नावली तैयार की जा रही थी। 19 सितंबर की बैठक के बाद आया इस्तीफा समिति की दूसरी बैठक 19 सितंबर को ऑनलाइन आयोजित की गई थी। रिपोर्ट के अनुसार, बैठक का एजेंडा तीन प्रमुख बिंदुओं पर केंद्रित था। इनमें पिछली बैठक की कार्यवाही की पुष्टि, UCC पर लोगों से राय लेने के लिए तैयार की जा रही वेबसाइट पर चर्चा और सार्वजनिक प्रतिक्रिया के लिए प्रश्नावली से संबंधित मुद्दे शामिल थे। इसी बैठक के बाद जस्टिस चव्हाण ने समिति से इस्तीफा देने का फैसला किया। अपने ईमेल में उन्होंने प्रश्नावली को लेकर हुई चर्चा का उल्लेख किया। रिपोर्ट के मुताबिक, बैठक में कुछ सदस्यों ने सुझाव दिया था कि लोगों से ऐसे सवाल पूछे जाएं जिनके जवाब केवल “हां” या “नहीं” में दिए जा सकें। वहीं, प्रश्नावली की पेशेवर समीक्षा कराए जाने की बात भी सामने आई। जस्टिस चव्हाण ने अपने संदेश में कहा कि समिति की अध्यक्ष पहले ही अपनी ओर से अंतिम रूप दी गई प्रश्नावली सदस्यों के साथ साझा कर चुकी थीं और वेबसाइट तैयार होने के बाद उसे अपलोड किया जाना था। उन्होंने बताया कि इस बिंदु पर उन्होंने बैठक से लॉग आउट कर दिया, क्योंकि उनके अनुसार एजेंडे का संबंधित हिस्सा समाप्त हो चुका था। जनता की राय और प्रश्नावली को लेकर क्या था मतभेद जस्टिस चव्हाण ने अपने ईमेल में कहा कि प्रश्नावली को लेकर अपनी बात रखने का उनका प्रयास इस समझ पर आधारित था कि समिति का मुख्य उद्देश्य महाराष्ट्र की जनता के विचार जानना और विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए व्यापक सहमति बनाने की कोशिश करना है। रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने अपने संदेश में देर से होने वाली शादियों, वैवाहिक अस्थिरता, बांझपन, वैवाहिक विवादों और विवादों के समाधान में लगने वाले अधिक समय जैसे मुद्दों का उल्लेख किया। उनका कहना था कि उन्हें लगा था कि लोगों से इन विषयों पर व्यापक विचार और राय हासिल करने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी। लेकिन समिति की प्रस्तावित प्रश्नावली को देखने के बाद उन्हें लगा कि प्रक्रिया का स्वरूप अलग है। उनके अनुसार, लोगों को निर्धारित सवालों पर हां या ना में जवाब देने का अवसर मिलेगा और इसके बाद प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण किया जाएगा। जस्टिस चव्हाण ने इसी अंतर को अपने इस्तीफे के प्रमुख कारणों में शामिल किया। बैठक में गैर-सदस्य की मौजूदगी का भी किया उल्लेख जस्टिस चव्हाण ने अपने ईमेल में बैठक में एक ऐसे व्यक्ति की मौजूदगी का भी उल्लेख किया जो समिति का सदस्य नहीं था। उनके अनुसार, इस व्यक्ति ने राज्य सरकार के अधिकारियों द्वारा तैयार की गई वेबसाइट में कुछ और बदलावों की आवश्यकता बताई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, समिति की अध्यक्ष ने अधिकारियों को वेबसाइट में आवश्यक बदलाव एक सप्ताह के भीतर करने का निर्देश दिया। जस्टिस चव्हाण ने अपने ईमेल में कहा कि उन्हें यह स्पष्ट नहीं था कि समिति की बैठक में उस गैर-सदस्य की भूमिका क्या थी। उन्होंने यह भी लिखा कि उस व्यक्ति के सुझावों के बाद उनके मन में यह सवाल उठा कि क्या राज्य के अधिकारी वेबसाइट तैयार करने के काम में स्वयं को सक्षम नहीं मानते हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि वह समिति से अपनी सीट खाली कर रहे हैं, ताकि सरकार उस स्थान को जल्द भर सके। जस्टिस आरसी चव्हाण कौन हैं? जस्टिस आरसी चव्हाण का न्यायिक करियर कई दशकों तक फैला रहा है। उनका जन्म 12 अप्रैल 1952 को हुआ था। उन्होंने 1 मार्च 1976 को सिविल जज (जूनियर डिवीजन) और न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी के रूप में न्यायिक सेवा शुरू की। जुलाई 1985 में उन्हें सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के पद पर पदोन्नत किया गया। इसके बाद मार्च 1987 में वह अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश बने। अपने न्यायिक करियर के दौरान उन्होंने जलगांव और ठाणे में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश तथा नासिक में संयुक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में काम किया। 1990 से 1994 के बीच उन्होंने नागपुर स्थित Judicial Officers Training Institute में संयुक्त निदेशक के रूप में भी जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद वह नांदेड़, औरंगाबाद, दमन एवं दीव तथा पुणे में जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पद पर रहे। बॉम्बे हाईकोर्ट में उन्होंने अतिरिक्त रजिस्ट्रार और रजिस्ट्रार सहित कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाईं। वह बॉम्बे हाईकोर्ट के पहले रजिस्ट्रार जनरल भी रहे। 2005 में बने थे बॉम्बे हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस चव्हाण को 22 जून 2005 को बॉम्बे हाईकोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। उन्होंने 2013 तक हाईकोर्ट में न्यायाधीश के रूप में कार्य किया। उनके न्यायिक और प्रशासनिक करियर के अलावा तकनीक के क्षेत्र में उनके योगदान का भी उल्लेख किया जाता है। उन्हें भारत में ई-कोर्ट प्रणाली को आगे बढ़ाने वाले न्यायिक अधिकारियों में गिना जाता है। 19 नवंबर 2012 को उन्हें मुंबई की विशेष अदालत (TORTS) का न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। बाद में उन्होंने महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया। सेवानिवृत्ति के बाद लेखन की ओर बढ़े हाईकोर्ट से सेवानिवृत्ति के बाद जस्टिस चव्हाण ने साहित्य और लेखन के क्षेत्र में भी काम किया। उन्होंने न्यायपालिका और कानून से जुड़े अपने अनुभवों तथा विचारों को पुस्तकों के माध्यम से सामने रखा। उन्होंने Cries in Wilderness और More Cries in Wilderness नामक किताबें लिखीं। इसके अलावा उन्होंने Yes My Lords, It’s You In The Mirror नामक उपन्यास भी लिखा, जिसमें न्यायपालिका की पृष्ठभूमि में चार दोस्तों की यात्रा को केंद्र में रखा गया है। वह Who Killed Rule of Law नामक अपनी अगली साहित्यिक कृति पर भी काम कर रहे हैं। इस्तीफे के बाद क्या होगा? जस्टिस चव्हाण के इस्तीफे के बाद अब महाराष्ट्र सरकार को समिति में खाली हुई सदस्य की जगह पर नई नियुक्ति करनी होगी। समिति की ओर से UCC से जुड़े सार्वजनिक सुझाव लेने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जानी है। जस्टिस चव्हाण ने अपने ईमेल में यह भी संकेत दिया कि समिति में काम करना उनके लिए एक महत्वपूर्ण सीखने का अनुभव रहा। उन्होंने कहा कि यह विषय उनके लिए व्यक्तिगत रूप से महत्वपूर्ण रहा है और समिति से अलग होने के बाद भी एक स्वतंत्र नागरिक के रूप में वह अपने विचार सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र रहेंगे। फिलहाल उनके इस्तीफे को लेकर सामने आई जानकारी मुख्य रूप से उनके द्वारा समिति को भेजे गए ईमेल और मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है। समिति की आगे की कार्यवाही और सार्वजनिक प्रतिक्रिया जुटाने की प्रक्रिया पर अब नजर रहेगी, क्योंकि महाराष्ट्र में प्रस्तावित समान नागरिक संहिता को लेकर सरकार की ओर से आगे की प्रक्रिया इसी समिति के काम से जुड़ी होगी।

    मलेशिया में नौकरी के लिए वीजा-फ्री एंट्री का इस्तेमाल न करें, भारतीय दूतावास ने जारी की चेतावनी

    Yugcharan News / 22-09-2026 मलेशिया में नौकरी की तलाश कर रहे भारतीय नागरिकों के लिए भारतीय उच्चायोग ने महत्वपूर्ण चेतावनी जारी की है। कुआलालंपुर स्थित भारतीय उच्चायोग ने भारतीय पासपोर्ट धारकों से कहा है कि वे मलेशिया की 30 दिनों की वीजा-मुक्त प्रवेश सुविधा का इस्तेमाल नौकरी तलाशने या रोजगार हासिल करने के उद्देश्य से न करें। उच्चायोग के मुताबिक, इस सुविधा का उद्देश्य पर्यटन और सामाजिक यात्राओं तक सीमित है और इसके तहत मलेशिया में रोजगार करना अधिकृत नहीं है। उच्चायोग ने मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जारी एक सलाह में कहा कि हाल के समय में ऐसे भारतीय नागरिकों की संख्या में “उल्लेखनीय वृद्धि” देखी गई है, जो वीजा-मुक्त प्रवेश के जरिए मलेशिया पहुंचकर नौकरी तलाशने की कोशिश कर रहे हैं। मिशन ने यह भी चेतावनी दी कि कुछ यात्रियों को ऐसे एजेंटों द्वारा गुमराह किया जा रहा है, जो विदेश में नौकरी दिलाने के नाम पर झूठे वादे कर रहे हैं। 30 दिन की वीजा-मुक्त सुविधा नौकरी के लिए नहीं मलेशिया फिलहाल भारतीय पासपोर्ट धारकों को अधिकतम 30 दिनों तक वीजा-मुक्त प्रवेश की सुविधा देता है। उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के अनुसार, भारतीय नागरिकों के लिए यह छूट 31 दिसंबर 2026 तक प्रभावी है। हालांकि, भारतीय उच्चायोग ने स्पष्ट किया है कि इस सुविधा को रोजगार हासिल करने के रास्ते के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। 30 दिनों की वीजा-मुक्त व्यवस्था मुख्य रूप से पर्यटन और सामाजिक यात्राओं के लिए है। यदि कोई भारतीय नागरिक मलेशिया में कानूनी रूप से काम करना चाहता है, तो उसे संबंधित रोजगार अनुमति और आवश्यक वीजा दस्तावेज हासिल करने होंगे। मलेशियाई आव्रजन व्यवस्था में काम के लिए आवश्यक दस्तावेजों में वैध वर्क परमिट या Visa With Reference (VDR) शामिल हो सकता है। संबंधित अनुमति न होने की स्थिति में केवल वीजा-मुक्त प्रवेश के आधार पर मलेशिया में नौकरी करना कानूनी रूप से मान्य नहीं होगा। एजेंटों के झूठे नौकरी के वादों से सावधान रहने की सलाह भारतीय उच्चायोग ने अपनी सलाह में विशेष रूप से उन एजेंटों से सावधान रहने को कहा है, जो मलेशिया में आसानी से नौकरी दिलाने का दावा करते हैं। मिशन के अनुसार, कुछ भारतीय नागरिकों को रोजगार का झांसा देकर वीजा-मुक्त मार्ग से मलेशिया भेजा जा रहा है। ऐसे मामलों में यात्रियों को बाद में कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। उच्चायोग ने संभावित जोखिमों में वीजा अवधि से अधिक समय तक रुकना, अवैध स्थिति में पहुंच जाना, शोषण, हिरासत और कानूनी कार्रवाई जैसी परिस्थितियों का उल्लेख किया है। विदेश में नौकरी के नाम पर एजेंटों को भुगतान करने से पहले रोजगार की वास्तविकता और नियोक्ता की जानकारी की जांच करना महत्वपूर्ण है। केवल एजेंट के मौखिक आश्वासन के आधार पर दूसरे देश की यात्रा करना जोखिमपूर्ण हो सकता है, खासकर तब जब यात्रा का इस्तेमाल ऐसे उद्देश्य के लिए किया जा रहा हो जिसके लिए संबंधित प्रवेश सुविधा मान्य नहीं है। मलेशिया में नौकरी के लिए किन दस्तावेजों की जरूरत भारतीय नागरिक यदि मलेशिया में रोजगार के उद्देश्य से यात्रा करना चाहते हैं, तो उन्हें उचित रोजगार प्रक्रिया पूरी करने के बाद ही यात्रा करने की सलाह दी गई है। भारतीय उच्चायोग के अनुसार, कानूनी रूप से काम करने के इच्छुक लोगों के पास संबंधित मलेशियाई वीजा और रोजगार से जुड़े जरूरी दस्तावेज होने चाहिए। इनमें वैध वर्क परमिट या आवश्यक स्वीकृति, रोजगार अनुबंध और नियोक्ता से संबंधित विवरण महत्वपूर्ण हो सकते हैं। यात्रा से पहले नौकरी देने वाली कंपनी, पद, वेतन, काम की शर्तों और आव्रजन अनुमति की पुष्टि करना भी जरूरी है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मलेशिया पहुंचने के बाद व्यक्ति की स्थिति कानूनी और दस्तावेजों के अनुरूप हो। यदि कोई व्यक्ति पर्यटन के नाम पर प्रवेश करता है लेकिन वहां पहुंचकर नौकरी तलाशता है, तो उसे आव्रजन अधिकारियों के सवालों और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ सकता है। असली पर्यटकों के लिए भी जरूरी दस्तावेज भारतीय उच्चायोग ने यह स्पष्ट किया है कि वीजा-मुक्त प्रवेश का इस्तेमाल करने वाले वास्तविक पर्यटकों को भी मलेशिया पहुंचने से पहले अपने जरूरी दस्तावेज तैयार रखने चाहिए। आव्रजन अधिकारियों द्वारा मांगे जाने पर यात्रियों को अपनी यात्रा का उद्देश्य और रहने की व्यवस्था साबित करने में सक्षम होना चाहिए। पर्यटकों को आम तौर पर कन्फर्म रिटर्न टिकट, होटल बुकिंग और कम से कम छह महीने की वैधता वाला पासपोर्ट साथ रखने की सलाह दी गई है। इसके अलावा, भारतीय पासपोर्ट धारकों को मलेशिया पहुंचने से पहले Malaysia Digital Arrival Card यानी MDAC भी ऑनलाइन जमा करना होता है। मलेशिया की आधिकारिक प्रवेश व्यवस्था में भारतीय यात्रियों के लिए इन आवश्यकताओं का उल्लेख किया गया है। इसलिए केवल वीजा-मुक्त सुविधा उपलब्ध होने का मतलब यह नहीं है कि यात्री बिना अन्य दस्तावेजों के प्रवेश का दावा कर सकता है। पहले भी सामने आ चुकी हैं प्रवेश से जुड़ी समस्याएं भारतीय मिशन की ताजा चेतावनी ऐसे समय में आई है जब मलेशिया की यात्रा करने वाले कुछ भारतीय नागरिकों को प्रवेश से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ा है। रिपोर्ट किए गए मामलों में कथित नौकरी तलाशने की कोशिश, पर्याप्त होटल या रहने की जानकारी उपलब्ध न होना, पर्याप्त धनराशि का प्रमाण नहीं होना और रिटर्न टिकट नहीं होना जैसे कारणों से यात्रियों से पूछताछ या अन्य कार्रवाई की स्थिति सामने आई है। ऐसे मामलों में आव्रजन अधिकारी यात्रा के उद्देश्य, रहने की व्यवस्था और वापसी की योजना से संबंधित दस्तावेजों की जांच कर सकते हैं। इसलिए पर्यटकों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे यात्रा से पहले सभी आवश्यक दस्तावेज तैयार रखें और प्रवेश नियमों का पालन करें। नौकरी के लिए जाने वालों के लिए अलग प्रक्रिया मलेशिया में काम करने की योजना बना रहे भारतीय नागरिकों को पर्यटक के रूप में प्रवेश करके नौकरी तलाशने के बजाय निर्धारित रोजगार प्रक्रिया का पालन करने की सलाह दी गई है। भारतीय उच्चायोग की मौजूदा सलाह के अनुसार, रोजगार के लिए यात्रा करने वालों को उचित मलेशियाई वीजा, रोजगार अनुबंध और नियोक्ता की पूरी जानकारी हासिल करने के बाद ही यात्रा करनी चाहिए। इस प्रक्रिया से यात्री को यह सुनिश्चित करने में मदद मिलती है कि उसकी यात्रा और रोजगार दोनों संबंधित नियमों के अनुरूप हैं। दूसरी ओर, अनधिकृत तरीके से नौकरी तलाशने पर व्यक्ति की कानूनी स्थिति प्रभावित हो सकती है और उसे आव्रजन कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। भारतीय यात्रियों के लिए क्या है मुख्य संदेश भारतीय उच्चायोग की चेतावनी का मुख्य संदेश यह है कि मलेशिया की 30 दिनों की वीजा-मुक्त प्रवेश सुविधा को रोजगार के विकल्प के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। पर्यटकों के लिए उपलब्ध प्रवेश सुविधा और विदेशी नागरिकों के लिए रोजगार की अनुमति दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। मलेशिया में नौकरी करने के इच्छुक भारतीय नागरिकों को यात्रा से पहले वैध रोजगार प्रस्ताव, नियोक्ता की जानकारी और आवश्यक वीजा व वर्क परमिट संबंधी मंजूरी सुनिश्चित करनी चाहिए। वहीं, केवल पर्यटन के लिए जाने वाले यात्रियों को रिटर्न टिकट, होटल बुकिंग, वैध पासपोर्ट और Malaysia Digital Arrival Card जैसे आवश्यक दस्तावेज पूरे रखने चाहिए। उच्चायोग की सलाह ऐसे भारतीय नागरिकों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है जो विदेश में नौकरी दिलाने के नाम पर एजेंटों के संपर्क में हैं। किसी भी प्रस्ताव पर भरोसा करने से पहले नियोक्ता और रोजगार संबंधी दस्तावेजों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना जरूरी है। वीजा-मुक्त प्रवेश का उद्देश्य समझना और उसी के अनुरूप यात्रा करना यात्रियों को संभावित कानूनी, आर्थिक और सुरक्षा संबंधी परेशानियों से बचाने में मदद कर सकता है।