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    Etihad Delhi-Abu Dhabi Flight Cancelled: तकनीकी खराबी से उड़ान रद्द होने पर यात्रियों को कितना मुआवजा मिल सकता है?

    Yugcharan News / 21-09-2026 दिल्ली से अबू धाबी जाने वाली Etihad Airways की उड़ान EY217 को विमान में तकनीकी समस्या के कारण रद्द किए जाने के बाद करीब 200 यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ा। शनिवार देर शाम दिल्ली से उड़ान भरने वाली इस फ्लाइट को पहले यात्रियों को विमान से उतारने के बाद कुछ समय तक स्थिति स्पष्ट नहीं की गई। बाद में यात्रियों को बताया गया कि उड़ान रद्द कर दी गई है। उड़ान रद्द होने की इस घटना ने यात्रियों के अधिकारों और एयरलाइन की मुआवजा संबंधी जिम्मेदारियों को लेकर सवाल खड़े किए हैं। खास तौर पर यह सवाल महत्वपूर्ण है कि यदि यात्री विमान में बोर्ड कर चुके हों और उसके बाद तकनीकी खराबी के कारण फ्लाइट रद्द हो जाए, तो क्या उन्हें DGCA के नियमों के तहत मुआवजा, रिफंड, वैकल्पिक उड़ान, भोजन या होटल जैसी सुविधाएं मिल सकती हैं? DGCA के नियमों के अनुसार, केवल विमान में बोर्ड कर लेने से यात्रियों के अधिकार समाप्त नहीं हो जाते। यदि निर्धारित उड़ान संचालित नहीं होती है और उसमें कम से कम एक यात्री की बुकिंग थी, तो ऐसी स्थिति को उड़ान रद्द होने के रूप में माना जा सकता है। दिल्ली-अबू धाबी उड़ान में क्या हुआ? रिपोर्टों के अनुसार, Etihad की EY217 उड़ान को दिल्ली से अबू धाबी के लिए रात 9:15 बजे रवाना होना था। करीब 200 यात्री इस उड़ान से यात्रा करने वाले थे। यात्रियों के विमान में सवार होने के बाद उन्हें विमान से उतरने के लिए कहा गया। क्रू की ओर से बताया गया कि विमान में तकनीकी समस्या सामने आई है। इसके बाद यात्रियों को कई घंटों तक इंतजार करना पड़ा। बाद में एयरलाइन ने घोषणा की कि उड़ान को रद्द कर दिया गया है। इस कारण यात्रियों को अपनी आगे की यात्रा को लेकर परेशानी का सामना करना पड़ा। Etihad की ओर से तकनीकी समस्या का उल्लेख किया गया, लेकिन उपलब्ध जानकारी के अनुसार खराबी की सटीक प्रकृति स्पष्ट नहीं की गई थी। क्या विमान में बोर्ड करने के बाद भी ‘कैंसिलेशन’ माना जाएगा? यह इस मामले का महत्वपूर्ण पहलू है। DGCA के प्रावधानों के अनुसार, किसी उड़ान का कैंसिलेशन तब माना जाता है जब पहले से निर्धारित उड़ान संचालित नहीं होती और उस उड़ान में कम से कम एक यात्री का आरक्षण मौजूद था। इसका अर्थ यह है कि यात्री विमान में चढ़ चुके हों, लेकिन बाद में उड़ान संचालित ही न हो, तो केवल बोर्डिंग पूरी हो जाने के आधार पर एयरलाइन यह नहीं कह सकती कि उड़ान रद्द नहीं हुई। इसलिए दिल्ली-अबू धाबी उड़ान के मामले में भी यात्रियों के लिए रद्दीकरण से जुड़े अधिकार लागू हो सकते हैं। हालांकि अंतिम रूप से मुआवजे की पात्रता उड़ान रद्द होने के वास्तविक कारण और लागू नियमों के आधार पर तय होगी। यात्रियों को क्या मिल सकता है? DGCA के नियमों के तहत उड़ान रद्द होने की स्थिति में यात्रियों को कुछ परिस्थितियों में वैकल्पिक उड़ान या टिकट का पूरा रिफंड उपलब्ध कराया जाना चाहिए। यदि यात्री एयरपोर्ट पहुंच चुका है और उड़ान रद्द होती है, तो परिस्थितियों के अनुसार एयरलाइन को भोजन और जलपान जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध करानी पड़ सकती हैं। यदि वैकल्पिक यात्रा के लिए रुकना आवश्यक हो, तो होटल और एयरपोर्ट से होटल तक आने-जाने की व्यवस्था भी नियमों के तहत लागू हो सकती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उड़ान रद्द होने के कारण यात्रियों को अचानक आने वाली अतिरिक्त परेशानी और खर्च का पूरा बोझ स्वयं न उठाना पड़े। अंतरराष्ट्रीय उड़ान के लिए मुआवजे का प्रावधान अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के मामले में DGCA के प्रावधान उड़ान की अवधि के आधार पर मुआवजे की सीमा निर्धारित करते हैं। दो घंटे या उससे अधिक की ब्लॉक टाइम वाली अंतरराष्ट्रीय उड़ान के लिए उपलब्ध नियमों के अनुसार मुआवजे की राशि ₹10,000 या बुक किए गए एकतरफा मूल किराए और एयरलाइन फ्यूल चार्ज के बराबर राशि, इनमें से जो कम हो, हो सकती है। हालांकि मुआवजा हर रद्द उड़ान में स्वतः लागू नहीं होता। इसके लिए यह देखना जरूरी होता है कि उड़ान रद्द होने का कारण एयरलाइन के नियंत्रण में था या ऐसी परिस्थिति में था जिसे एयरलाइन नियंत्रित नहीं कर सकती थी। तकनीकी खराबी होने पर क्या एयरलाइन को हमेशा मुआवजा देना होगा? यह सबसे महत्वपूर्ण कानूनी सवालों में से एक है। DGCA के नियमों में ऐसी परिस्थितियों के लिए अपवाद मौजूद हैं जिनमें उड़ान रद्द होने का कारण एयरलाइन के नियंत्रण से बाहर हो। प्राकृतिक आपदा, एयर ट्रैफिक कंट्रोल से जुड़ी समस्या, हड़ताल, सरकारी आदेश या सुरक्षा संबंधी परिस्थितियां इसके उदाहरण हो सकते हैं। तकनीकी खराबी का मामला हालांकि हर परिस्थिति में एक जैसा नहीं माना जा सकता। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि खराबी किस कारण से हुई और क्या वह एयरलाइन के नियंत्रण से बाहर की परिस्थिति थी। इस मामले में Etihad ने फिलहाल उड़ान रद्द होने के पीछे तकनीकी समस्या बताई है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, समस्या की विस्तृत वजह सामने नहीं आई है। इसलिए यह तय करना संभव नहीं है कि संबंधित तकनीकी खराबी ऐसी परिस्थिति थी जिसे एयरलाइन के नियंत्रण से बाहर माना जाएगा या नहीं। विमान में तकनीकी खराबी के अलग-अलग कारण हो सकते हैं किसी विमान में तकनीकी समस्या कई कारणों से हो सकती है। सामान्य रखरखाव या विमान की परिचालन स्थिति से संबंधित समस्या और किसी बाहरी घटना के कारण उत्पन्न खराबी को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। यदि किसी तकनीकी समस्या की वजह निर्माता की खामी, तोड़फोड़ या किसी अन्य असाधारण घटना से जुड़ी हो और एयरलाइन का उस पर नियंत्रण नहीं हो, तो परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। दूसरी ओर, यदि समस्या ऐसी प्रकृति की हो जिसे एयरलाइन के परिचालन या रखरखाव दायित्वों के तहत नियंत्रित किया जा सकता था, तो यात्रियों के मुआवजे से जुड़े नियम अलग तरीके से लागू हो सकते हैं। इसलिए केवल ‘technical issue’ कहे जाने से यह अपने आप तय नहीं हो जाता कि यात्री मुआवजे के पात्र हैं या नहीं। Etihad की अपनी शर्तों में भी भारतीय नियम महत्वपूर्ण एयरलाइन की Conditions of Carriage में भी यात्रियों की यात्रा से जुड़े नियम और शर्तें होती हैं। लेकिन इन शर्तों का मतलब यह नहीं है कि एयरलाइन किसी देश के अनिवार्य कानूनों या नियामकीय प्रावधानों को नजरअंदाज कर सकती है। Etihad की भारत से संबंधित जानकारी में भी DGCA के निर्धारित मुआवजे से जुड़े प्रावधानों का उल्लेख किया जाता है। इसलिए भारत से रवाना होने वाली उड़ान के मामले में लागू भारतीय विमानन नियमों को ध्यान में रखना जरूरी है। इसका मतलब है कि यात्रियों को अपनी स्थिति समझने के लिए टिकट की शर्तों के साथ-साथ DGCA के नियमों को भी देखना चाहिए। रिफंड और मुआवजा अलग-अलग हैं यात्रियों के लिए यह समझना भी जरूरी है कि टिकट का रिफंड और मुआवजा दो अलग-अलग चीजें हो सकती हैं। यदि यात्री रद्द उड़ान के कारण टिकट का रिफंड लेने का विकल्प चुनता है, तो टिकट की पात्र राशि उस भुगतान माध्यम में वापस भेजी जा सकती है जिससे टिकट खरीदा गया था। इसके अलावा, यदि यात्री मुआवजे के लिए पात्र है, तो वह मुआवजा रिफंड से अलग हो सकता है। इसलिए एयरलाइन द्वारा टिकट का पैसा वापस कर दिया जाना जरूरी नहीं कि मुआवजे के दावे को स्वतः समाप्त कर दे। दोनों के लिए लागू नियम और परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। क्या एयरलाइन यात्री को सिर्फ वाउचर दे सकती है? मुआवजे के भुगतान के तरीके को लेकर भी यात्रियों के अधिकार महत्वपूर्ण हैं। उपलब्ध DGCA प्रावधानों के अनुसार, मुआवजा नकद, बैंक ट्रांसफर या यात्री की सहमति से ट्रैवल वाउचर के रूप में दिया जा सकता है। इसका अर्थ है कि यदि यात्री वाउचर स्वीकार नहीं करना चाहता, तो एयरलाइन उसे केवल वाउचर लेने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। यात्रियों को ऐसे मामलों में एयरलाइन से लिखित रूप में यह पूछना चाहिए कि रद्दीकरण किस कारण से हुआ, वैकल्पिक उड़ान की क्या व्यवस्था है और मुआवजे के लिए उनकी पात्रता क्या है। यात्रियों को क्या करना चाहिए? ऐसी स्थिति में यात्रियों के लिए सबसे जरूरी है कि वे अपनी यात्रा से संबंधित दस्तावेज सुरक्षित रखें। टिकट, बोर्डिंग पास, बुकिंग कन्फर्मेशन, एयरलाइन के संदेश और रद्दीकरण से संबंधित ईमेल या एसएमएस भविष्य में दावे के दौरान उपयोगी हो सकते हैं। यात्री एयरलाइन से लिखित रूप में रिफंड, वैकल्पिक उड़ान और मुआवजे की जानकारी मांग सकते हैं। यदि एयरलाइन की ओर से उचित समाधान नहीं मिलता, तो यात्री संबंधित विमानन शिकायत तंत्र के माध्यम से अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। तकनीकी खराबी की वास्तविक वजह पर निर्भर करेगा मामला दिल्ली-अबू धाबी उड़ान के मामले में फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण जानकारी तकनीकी समस्या की वास्तविक प्रकृति है। Etihad ने उड़ान रद्द होने का कारण तकनीकी समस्या बताया है, लेकिन उपलब्ध रिपोर्टों में इसकी विस्तृत वजह स्पष्ट नहीं हुई है। यही जानकारी यह तय करने में महत्वपूर्ण हो सकती है कि यात्रियों को केवल वैकल्पिक उड़ान या रिफंड मिलेगा या वे निर्धारित मुआवजे के भी पात्र होंगे। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि विमान में पहले से सवार यात्रियों के लिए उड़ान का बाद में रद्द होना उन्हें रद्दीकरण से जुड़े अधिकारों से स्वतः वंचित नहीं करता। DGCA के नियमों में यात्रियों के लिए रिफंड, वैकल्पिक यात्रा, भोजन और आवश्यकता पड़ने पर आवास जैसी व्यवस्थाओं का प्रावधान है, जबकि मुआवजा उड़ान रद्द होने की परिस्थितियों और लागू अपवादों पर निर्भर करता है। इस मामले में अंतिम स्थिति Etihad द्वारा तकनीकी खराबी की प्रकृति स्पष्ट किए जाने और संबंधित नियामकीय प्रावधानों के आधार पर ही तय होगी।

    राज ठाकरे पर रील को लेकर पुणे में विवाद: महेश मोटे से कथित तौर पर माफी मंगवाई, चेहरे पर स्याही लगाई और कराई उठक-बैठक

    Yugcharan News / 21-09-2026 पुणे में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) प्रमुख राज ठाकरे को लेकर बनाई गई एक सोशल मीडिया रील के बाद विवाद सामने आया है। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर महेश मोटे को कथित तौर पर MNS कार्यकर्ताओं ने पकड़कर पार्टी कार्यालय ले जाया, जहां उनके चेहरे पर काली स्याही लगाने, राज ठाकरे की तस्वीर के सामने झुकने और सिर पर चप्पल रखकर उठक-बैठक लगाने के लिए मजबूर किए जाने के वीडियो सामने आए हैं। इसके बाद मोटे से एक वीडियो में राज ठाकरे और MNS पदाधिकारियों से माफी भी मंगवाई गई। इस पूरे घटनाक्रम के वीडियो सोमवार को सोशल मीडिया पर सामने आए और तेजी से प्रसारित होने लगे। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, मोटे की जिस रील को लेकर आपत्ति जताई गई थी, उसमें राज ठाकरे को लेकर कथित तौर पर आपत्तिजनक और व्यक्तिगत टिप्पणियां की गई थीं। MNS नेताओं ने इन टिप्पणियों पर नाराजगी जताई थी। वीडियो में क्या दिखाई दे रहा है? सामने आए वीडियो में महेश मोटे के चेहरे पर काली स्याही लगी दिखाई देती है। एक अन्य वीडियो में वह राज ठाकरे की तस्वीर के सामने झुकते नजर आते हैं। उन्हें सिर पर चप्पल रखकर उठक-बैठक करते हुए भी दिखाया गया है। इसके बाद मोटे ने कैमरे के सामने हाथ जोड़कर माफी मांगी। वीडियो में वह भावुक और परेशान दिखाई देते हैं। उन्होंने राज ठाकरे के साथ-साथ MNS के स्थानीय पदाधिकारियों से भी माफी मांगी और कहा कि उन्होंने अनजाने में गलत बात कह दी थी। मोटे ने अपने माफीनामे में कहा कि उन्होंने राज ठाकरे के बारे में गलत तरीके से बात की और शुबham जगदाले तथा अन्य MNS पदाधिकारियों के बारे में भी अनुचित टिप्पणी की। उन्होंने अपनी गलती पर खेद जताते हुए पार्टी और संबंधित लोगों से माफी मांगी। करीब एक महीने पुरानी रील को लेकर विवाद रिपोर्टों के अनुसार, विवाद की शुरुआत मोटे द्वारा सोशल मीडिया पर डाली गई एक रील से हुई थी। Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, यह वीडियो करीब एक महीने पहले पोस्ट किया गया था और इसमें मोटे ने अपनी मूंछें हटाने को लेकर सोशल मीडिया पर की जा रही टिप्पणियों का संदर्भ देते हुए राज ठाकरे के बारे में भी टिप्पणी की थी। इसके बाद MNS कार्यकर्ताओं की ओर से प्रतिक्रिया सामने आई। हालांकि, MNS की ओर से मोटे की उस मूल रील के पूरे शब्द या कथित आपत्तिजनक टिप्पणी का विस्तृत विवरण सार्वजनिक रूप से नहीं दिया गया है। MNS पुणे शहर अध्यक्ष साईनाथ बाबर ने India Today को बताया कि मोटे ने राज ठाकरे के बारे में “objectionable reels and personal comments” किए थे और कहा कि रील बनाने में आपत्ति नहीं है, लेकिन पार्टी प्रमुख के बारे में व्यक्तिगत टिप्पणियों से बचना चाहिए। पुणे लौटने के बाद कथित तौर पर पकड़ा गया MNS के हडपसर विधानसभा क्षेत्र के उपविभागीय अध्यक्ष शुभम जगदाले के अनुसार, मोटे कुछ समय के लिए केरल में थे। जगदाले ने दावा किया कि MNS कार्यकर्ताओं को उनके पुणे लौटने की जानकारी मिली और उन्हें कात्रज इलाके में देखा गया। रिपोर्टों के मुताबिक, कार्यकर्ता कात्रज के एक पार्क तक पहुंचे और वहां से मोटे को अपने साथ MNS के जनसंपर्क कार्यालय ले गए। इसके बाद कथित तौर पर वहां उनके साथ यह पूरा घटनाक्रम हुआ। जगदाले ने इस कार्रवाई को पार्टी की शैली से जोड़ते हुए ‘MNS स्टाइल’ बताया। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी प्रमुख के खिलाफ इस तरह की टिप्पणी करने वालों के साथ इसी तरह प्रतिक्रिया दी जाएगी। यह बयान विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में उद्धृत किया गया है। ‘महाप्रसाद’ शब्द का इस्तेमाल मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जगदाले ने कार्यालय में मोटे के साथ की गई कार्रवाई को ‘महाप्रसाद’ बताया। उनके अनुसार, यह पार्टी प्रमुख के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणी के जवाब में MNS की अपनी शैली थी। हालांकि, किसी व्यक्ति को पकड़कर ले जाने, सार्वजनिक रूप से अपमानित करने या जबरन माफी रिकॉर्ड कराने की वैधानिक स्थिति अलग कानूनी प्रश्न है। उपलब्ध रिपोर्टों में यह स्पष्ट नहीं है कि घटना के समय पुलिस की मौजूदगी थी या नहीं। 21 सितंबर को उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, इस घटना को लेकर पुलिस में कोई शिकायत दर्ज होने की पुष्टि नहीं हुई थी। India Today ने भी रिपोर्ट किया कि घटना के संबंध में उस समय तक कोई पुलिस शिकायत दर्ज नहीं हुई थी। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो घटना से जुड़े वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैलने के बाद यह मामला व्यापक चर्चा में आ गया। वीडियो में मोटे को माफी मांगते हुए और कथित तौर पर पार्टी कार्यकर्ताओं के सामने खड़े हुए देखा जा सकता है। एक वीडियो में वह राज ठाकरे की तस्वीर के सामने झुकते हैं, जबकि दूसरे में सिर पर चप्पल रखकर उठक-बैठक करते दिखाई देते हैं। चेहरे पर काली स्याही लगाए जाने का दृश्य भी वीडियो में मौजूद है। इन वीडियो को MNS से जुड़े लोगों की ओर से साझा किए जाने की बात रिपोर्टों में कही गई है। वीडियो सामने आने के बाद घटना को लेकर सोशल मीडिया पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ पोस्ट में इसे MNS की कार्रवाई बताया गया, जबकि अन्य प्रतिक्रियाओं में किसी व्यक्ति से इस तरह माफी मंगवाने और सार्वजनिक रूप से अपमानित किए जाने पर सवाल उठाए गए। अभिव्यक्ति और राजनीतिक प्रतिक्रिया का सवाल सोशल मीडिया के दौर में राजनीतिक नेताओं और दलों को लेकर टिप्पणी करने वाले कंटेंट क्रिएटर्स और इन्फ्लुएंसर्स की संख्या लगातार बढ़ी है। इसके साथ ही राजनीतिक दलों के समर्थकों और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं के बीच विवाद भी सामने आते रहे हैं। पुणे की यह घटना इसी व्यापक संदर्भ में चर्चा में है। हालांकि किसी राजनीतिक नेता या दल के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी पर शिकायत या कानूनी प्रक्रिया का रास्ता उपलब्ध होता है, इस मामले में सामने आए वीडियो कथित तौर पर एक अलग तरह की प्रतिक्रिया को दिखाते हैं। MNS नेताओं ने मोटे की मूल रील को आपत्तिजनक बताया है, जबकि उपलब्ध रिपोर्टों में पुलिस द्वारा उस रील की सामग्री पर कोई स्वतंत्र निष्कर्ष सामने नहीं आया है। इसलिए मूल वीडियो में कही गई बातों और उसके संदर्भ को लेकर अंतिम निष्कर्ष संबंधित जांच या आधिकारिक कार्रवाई के आधार पर ही निकाला जा सकता है। माफी के वीडियो में क्या कहा गया? मोटे द्वारा रिकॉर्ड किए गए माफीनामे में उन्होंने राज ठाकरे को संबोधित करते हुए अपनी टिप्पणी पर खेद जताया। उन्होंने MNS पदाधिकारियों के नाम लेते हुए भी माफी मांगी और कहा कि उन्होंने गलत तरीके से बात की थी। वीडियो में वह हाथ जोड़कर दिखाई देते हैं और आगे किसी तरह की परेशानी नहीं होने देने की अपील करते नजर आते हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, यह माफी उस घटनाक्रम के बाद रिकॉर्ड कराई गई जिसमें उनके चेहरे पर स्याही लगाए जाने और उन्हें उठक-बैठक करने के लिए मजबूर किए जाने का आरोप है। MNS की ओर से क्या कहा गया? MNS नेता शुभम जगदाले ने घटनाक्रम को पार्टी की शैली में दिया गया जवाब बताया। उन्होंने दावा किया कि मोटे ने राज ठाकरे के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया था। पुणे शहर MNS अध्यक्ष साईनाथ बाबर ने भी कहा कि मोटे ने राज ठाकरे को लेकर आपत्तिजनक रील और व्यक्तिगत टिप्पणियां की थीं। उन्होंने यह भी कहा कि कोई व्यक्ति रील बना सकता है, लेकिन पार्टी प्रमुख के बारे में व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। हालांकि, MNS नेताओं के इन दावों के अलावा उपलब्ध रिपोर्टों में मूल रील की सामग्री का स्वतंत्र सत्यापन या पुलिस जांच के आधार पर निष्कर्ष सामने नहीं आया है। पुलिस कार्रवाई पर स्थिति स्पष्ट नहीं 21 सितंबर 2026 तक सामने आई रिपोर्टों में इस घटना के संबंध में पुलिस केस दर्ज होने की पुष्टि नहीं हुई थी। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि पुलिस ने वीडियो और घटनाक्रम का स्वतः संज्ञान लिया है या आगे कोई कानूनी कार्रवाई की जाएगी। घटना में किसी व्यक्ति को कथित तौर पर पकड़कर पार्टी कार्यालय ले जाने, सार्वजनिक रूप से अपमानित करने और माफी रिकॉर्ड कराने के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि भी अभी आधिकारिक पुलिस जांच के जरिए सामने नहीं आई है। इसलिए फिलहाल उपलब्ध जानकारी को आरोप, वीडियो और संबंधित MNS नेताओं के बयानों के आधार पर ही देखा जा रहा है। पुणे की यह घटना सोशल मीडिया कंटेंट, राजनीतिक नेताओं पर टिप्पणी और राजनीतिक संगठनों की प्रतिक्रिया के बीच बढ़ते टकराव को लेकर चर्चा में है। अब आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि पुलिस या अन्य संबंधित अधिकारी मामले में कोई औपचारिक शिकायत, जांच या कार्रवाई दर्ज करते हैं या नहीं।

    अभिषेक मनु सिंघवी: टाटा संस के खिलाफ ट्रस्ट्स की कानूनी लड़ाई में कौन हैं वरिष्ठ अधिवक्ता

    Yugcharan News / 21-09-2026 टाटा समूह के भीतर चेयरमैन पद और भविष्य की रणनीति को लेकर चल रहा विवाद अब कानूनी मोर्चे पर भी महत्वपूर्ण रूप ले चुका है। टाटा ट्रस्ट्स ने वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी को अपनी ओर से पैरवी के लिए नियुक्त किया है। ट्रस्ट्स की ओर से यह कदम टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति और कंपनी की प्रस्तावित लिस्टिंग से जुड़े मुद्दों पर उठाया गया है। इस मामले में सिंघवी की भूमिका इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि वह इससे पहले टाटा संस और साइरस मिस्त्री के बीच हुए लंबे कानूनी विवाद में टाटा पक्ष की ओर से पेश हो चुके हैं। उस समय उन्होंने टाटा संस के बोर्ड और उसके फैसलों का प्रतिनिधित्व किया था। अब वही वरिष्ठ वकील टाटा ट्रस्ट्स की ओर से टाटा संस के मौजूदा नेतृत्व से जुड़े सवालों पर कानूनी पक्ष रख रहे हैं। टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस में लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। ट्रस्ट्स ने 17 सितंबर को टाटा संस के बोर्ड द्वारा चंद्रशेखरन को पांच वर्ष के एक और कार्यकाल के लिए चेयरमैन नियुक्त किए जाने की वैधता पर सवाल उठाया है। इसके साथ ही प्रस्तावित सार्वजनिक लिस्टिंग को लेकर भी मतभेद सामने आए हैं। टाटा विवाद में सिंघवी की नई भूमिका टाटा ट्रस्ट्स की ओर से सिंघवी की नियुक्ति ऐसे समय हुई है जब समूह के भीतर कंपनी के प्रशासन, चेयरमैन के कार्यकाल और टाटा संस की भविष्य की संरचना को लेकर चर्चा तेज है। सिंघवी ने इस विवाद में अपनी भूमिका को लेकर ‘दुख और खेद’ की भावना व्यक्त की है। इसकी वजह उनके दिवंगत रतन टाटा के साथ पुराने संबंध भी बताए गए हैं। हालांकि, कानूनी रूप से उनका वर्तमान दायित्व टाटा ट्रस्ट्स का पक्ष रखना है और विवाद से जुड़े मुद्दों पर ट्रस्ट्स की ओर से तर्क प्रस्तुत करना है। यह स्थिति उनके पुराने टाटा मामले से अलग है। साइरस मिस्त्री को टाटा संस के चेयरमैन पद से हटाए जाने के बाद शुरू हुए विवाद में सिंघवी टाटा पक्ष की कानूनी टीम का हिस्सा थे। मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने टाटा संस के बोर्ड द्वारा मिस्त्री को हटाने के फैसले को बरकरार रखा था और मामले में टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका तथा कंपनी के Articles of Association से जुड़े अधिकारों पर भी विचार किया था। कौन हैं अभिषेक मनु सिंघवी? अभिषेक मनु सिंघवी सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता होने के साथ-साथ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद हैं। वह तेलंगाना का प्रतिनिधित्व करते हैं। संसद और कांग्रेस संगठन में भी उन्होंने कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाई हैं। सिंघवी 1997 में महज 37 वर्ष की उम्र में भारत के सबसे युवा अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बने थे। उन्होंने 1997 से 1998 तक इस पद पर काम किया। उनके पिता लक्ष्मी मल सिंघवी भी देश के जाने-माने विधिवेत्ता, राजनयिक और सांसद थे। वह ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त रह चुके थे और राज्यसभा के सदस्य भी रहे थे। अभिषेक मनु सिंघवी ने दिल्ली के सेंट कोलंबा स्कूल और सेंट स्टीफंस कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने अर्थशास्त्र में बीए ऑनर्स किया। इसके बाद उन्होंने कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज से उच्च शिक्षा हासिल की, जहां उन्होंने एमए और पीएचडी की डिग्री प्राप्त की। उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय में पब्लिक इंटरनेशनल लॉ के समर प्रोग्राम में भी हिस्सा लिया। साइरस मिस्त्री विवाद में टाटा पक्ष के वकील सिंघवी के करियर से जुड़े प्रमुख मामलों में टाटा संस और साइरस मिस्त्री का विवाद विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। मिस्त्री को टाटा संस के चेयरमैन पद से हटाए जाने के बाद कंपनी और मिस्त्री पक्ष के बीच लंबी कानूनी लड़ाई चली। मामला राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण से लेकर उच्च न्यायालय और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। सिंघवी टाटा पक्ष की ओर से कानूनी टीम में शामिल थे। 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने टाटा संस के बोर्ड के निर्णय को बरकरार रखा। अब टाटा ट्रस्ट्स की ओर से सिंघवी की नियुक्ति के कारण उनके पुराने कानूनी अनुभव का संदर्भ फिर सामने आया है। हालांकि वर्तमान विवाद के मुद्दे अलग हैं और इसमें टाटा ट्रस्ट्स की ओर से उठाए जा रहे सवालों पर कानूनी बहस होनी है। नेशनल हेराल्ड मामले में भी पैरवी सिंघवी कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं की ओर से भी अदालतों में पेश होते रहे हैं। नेशनल हेराल्ड से जुड़े मामलों में उन्होंने कांग्रेस नेता सोनिया गांधी सहित अन्य नेताओं का प्रतिनिधित्व किया है। यह मामला Associated Journals Limited और Young Indian से जुड़े कानूनी और वित्तीय मुद्दों से संबंधित है। विभिन्न जांच एजेंसियों की कार्रवाई और उससे जुड़े कानूनी विवादों में सिंघवी कांग्रेस नेताओं के प्रमुख कानूनी प्रतिनिधियों में शामिल रहे हैं। डी.के. बसु मामला और हिरासत में अधिकार सिंघवी का नाम सुप्रीम कोर्ट के चर्चित डी.के. बसु मामले से भी जुड़ा रहा है। यह मामला हिरासत में हिंसा, अवैध हिरासत और मानवाधिकारों की सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों से संबंधित है। बाद की कार्यवाही में सुप्रीम कोर्ट ने सिंघवी को एमिकस क्यूरी यानी अदालत के सहयोगी के रूप में नियुक्त किया था। उन्होंने हिरासत में लोगों के अधिकारों की सुरक्षा और अदालत के पहले से तय दिशा-निर्देशों को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए अतिरिक्त उपायों की जरूरत पर अपनी दलीलें रखीं। डी.के. बसु मामले में सुप्रीम कोर्ट का मूल फैसला हिरासत में यातना और अवैध गिरफ्तारी से जुड़े सुरक्षा उपायों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। राष्ट्रीय ध्वज से जुड़ा ऐतिहासिक मामला सिंघवी उन वकीलों में भी रहे हैं जिन्होंने नागरिक अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण संवैधानिक मामलों में पैरवी की है। Union of India बनाम नवीन जिंदल मामले में उन्होंने नवीन जिंदल की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दलीलें रखी थीं। इस मामले में अदालत ने राष्ट्रीय ध्वज फहराने के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के एक पहलू के रूप में माना था, हालांकि यह अधिकार उचित प्रतिबंधों के अधीन है। जलीकट्टू मामले में भूमिका 2017 में जलीकट्टू से जुड़े कानूनी विवाद में भी सिंघवी ने Animal Welfare Board of India की ओर से पैरवी की थी। मामला पशु क्रूरता, जलीकट्टू की वैधता और इस प्रथा को अनुमति या विनियमित करने के लिए बनाए गए कानूनों से जुड़े सवालों पर केंद्रित था। यह मामला पशु कल्याण और परंपरागत प्रथाओं के बीच कानूनी संतुलन से जुड़े व्यापक संवैधानिक और विधिक प्रश्नों के कारण महत्वपूर्ण रहा। टेलीकॉम क्षेत्र के बड़े मामलों में भी प्रतिनिधित्व सिंघवी ने अपने लंबे कानूनी करियर में देश की कई बड़ी दूरसंचार कंपनियों का प्रतिनिधित्व किया है। इनमें भारती एयरटेल, वोडाफोन और आइडिया जैसी कंपनियां शामिल रही हैं। इन मामलों में स्पेक्ट्रम शुल्क, राजस्व हिस्सेदारी, 3G इंट्रा-सर्किल रोमिंग व्यवस्था, लाइसेंस नवीनीकरण और 2G स्पेक्ट्रम विवाद से जुड़े कानूनी प्रश्न शामिल रहे हैं। टेलीकॉम क्षेत्र में हुए नियामकीय और कानूनी बदलावों के दौरान इन मामलों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दिल्ली आबकारी नीति मामले में भी पैरवी सिंघवी दिल्ली आबकारी नीति मामले में आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की ओर से भी सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए हैं। उन्होंने पूर्व दिल्ली मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की ओर से गिरफ्तारी और जमानत से जुड़े मामलों में दलीलें रखीं। इन मामलों में केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाई, गिरफ्तारी की वैधता और जमानत के कानूनी मानकों से जुड़े प्रश्न सुप्रीम कोर्ट के सामने आए। राहुल गांधी के मानहानि मामले में प्रतिनिधित्व कांग्रेस नेता राहुल गांधी से जुड़े ‘मोदी सरनेम’ मानहानि मामले में भी सिंघवी उनके कानूनी प्रतिनिधियों में शामिल रहे। 2023 में राहुल गांधी को आपराधिक मानहानि मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद उनकी लोकसभा सदस्यता चली गई थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उनकी दोषसिद्धि पर रोक लगा दी, जिसके बाद उनकी संसदीय सदस्यता बहाल होने का रास्ता साफ हुआ। PMLA से जुड़े मामलों में दलीलें सिंघवी ने Prevention of Money Laundering Act यानी PMLA से संबंधित कई महत्वपूर्ण मामलों में भी कानूनी दलीलें रखी हैं। विशेष रूप से कानून की कड़ी जमानत शर्तों और प्रवर्तन एजेंसियों की शक्तियों से जुड़े सवालों पर उन्होंने अदालतों में बहस की है। विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ जैसे महत्वपूर्ण मामलों में PMLA की धाराओं और जमानत से जुड़ी ‘ट्विन कंडीशंस’ पर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष व्यापक कानूनी बहस हुई थी। अब टाटा समूह में नया कानूनी अध्याय टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच मौजूदा विवाद में सिंघवी की नियुक्ति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह टाटा समूह के पिछले बड़े कॉरपोरेट विवाद में दूसरी तरफ से कानूनी प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। वर्तमान मामले में मुख्य प्रश्न टाटा संस के चेयरमैन के रूप में एन. चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति, बोर्ड के 17 सितंबर के प्रस्ताव और कंपनी की प्रस्तावित लिस्टिंग से जुड़े हैं। टाटा ट्रस्ट्स की ओर से इन मुद्दों की वैधता और प्रक्रिया को लेकर आपत्तियां उठाई गई हैं। आगे की कानूनी कार्यवाही में दोनों पक्षों के तर्क, कंपनी के Articles of Association, ट्रस्ट्स के अधिकार और टाटा संस के कॉरपोरेट प्रशासन से जुड़े प्रावधान महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। ऐसे में अभिषेक मनु सिंघवी का अनुभव इस विवाद के कानूनी पक्ष में प्रमुखता से सामने आया है।

    डोकलाम तनाव का असर मुंबई तक: चीन के ICBC ने 185 मिलियन डॉलर के कर्ज और निवेश पर लगाई रोक

    Yugcharan News / 21-09-2026 नई दिल्ली। भारत और चीन के बीच वर्ष 2017 में डोकलाम सीमा विवाद के दौरान पैदा हुआ सैन्य तनाव केवल सीमा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा था। एक नई जांच रिपोर्ट में सामने आए आंतरिक दस्तावेजों के अनुसार, इस टकराव का असर मुंबई स्थित चीन के सबसे बड़े सरकारी बैंकों में से एक, इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल बैंक ऑफ चाइना (ICBC) की भारत शाखा के वित्तीय फैसलों पर भी पड़ा था। दस्तावेजों के मुताबिक, डोकलाम गतिरोध के दौरान मुंबई में स्थित ICBC की भारत की एकमात्र शाखा ने ऋण और निवेश से जुड़े जोखिमों को कम करने के लिए कई कदम उठाए। बैंक ने पहले से स्वीकृत लेकिन अभी तक वितरित नहीं किए गए 11 ऋणों और बॉन्ड निवेशों की राशि जारी करने पर रोक लगा दी। इन सभी वित्तीय प्रतिबद्धताओं का कुल मूल्य करीब 185 मिलियन डॉलर बताया गया है। ICBC के जनवरी 2018 के एक 178 पन्नों वाले गोपनीय कार्य-सारांश में कहा गया कि सीमा विवाद के कारण मुंबई शाखा को उस वर्ष “आंतरिक और बाहरी चुनौतियों” का सामना करना पड़ा। दस्तावेज के अनुसार, इन परिस्थितियों के बावजूद शाखा ने अपने सामान्य संचालन को बनाए रखने की कोशिश की। यह रिपोर्ट चीन कैपिटल नामक एक अंतरराष्ट्रीय खोजी पत्रकारिता परियोजना के तहत सामने आए लाखों दस्तावेजों की जांच पर आधारित है। डोकलाम विवाद और बैंकिंग फैसले का संबंध डोकलाम भारत, भूटान और चीन के त्रि-जंक्शन के निकट स्थित क्षेत्र है। वर्ष 2017 में यहां भारत और चीन की सेनाओं के बीच 73 दिनों तक गतिरोध चला था। विवाद उस समय शुरू हुआ जब चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की गतिविधियों और सड़क निर्माण को लेकर भारत और भूटान की आपत्तियां सामने आईं। भारतीय सैनिकों के हस्तक्षेप के बाद दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने आ गई थीं। कई सप्ताह तक चले सैन्य गतिरोध के बाद अगस्त 2017 में दोनों देशों ने अपने सैनिकों को पीछे हटाने पर सहमति बनाई। इस दौरान भारत और चीन के संबंधों में तनाव बढ़ा था और दोनों देशों के बीच राजनीतिक तथा कूटनीतिक स्तर पर भी बातचीत जारी रही। ICBC के आंतरिक दस्तावेज बताते हैं कि इस सीमा तनाव का प्रभाव भारत में बैंक की कारोबारी गतिविधियों पर भी पड़ा। दस्तावेज में कहा गया कि मुंबई शाखा ने सीमा संकट के दौरान ऋण और निवेश से जुड़े जोखिमों को सक्रिय रूप से कम किया और 11 स्वीकृत लेकिन लंबित ऋणों तथा बॉन्ड निवेशों की राशि रोक दी। इन लेनदेन का कुल मूल्य 185 मिलियन डॉलर बताया गया। ICBC के आंतरिक आकलन के अनुसार, इस कदम से बैंक की परिचालन आय पर करीब 6.36 मिलियन डॉलर का असर पड़ा। शाखा अपने लक्ष्य का केवल 57.7 प्रतिशत हासिल कर सकी गोपनीय कार्य-सारांश में मुंबई शाखा के प्रदर्शन का भी उल्लेख है। रिपोर्ट के मुताबिक, सीमा तनाव और उससे उत्पन्न कारोबारी परिस्थितियों सहित कई आंतरिक और बाहरी कारणों के चलते शाखा अपने बीजिंग स्थित मुख्यालय द्वारा निर्धारित वार्षिक लक्ष्य का केवल 57.7 प्रतिशत ही हासिल कर सकी। दस्तावेज में सीमा विवाद को शाखा के वित्तीय प्रदर्शन पर असर डालने वाले प्रमुख कारणों में शामिल किया गया। हालांकि, रिपोर्ट में इसे एकमात्र कारण नहीं बताया गया और शाखा के सामने मौजूद अन्य आंतरिक तथा बाहरी चुनौतियों का भी उल्लेख किया गया। ICBC का यह आकलन महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि इससे यह पता चलता है कि सीमा पर भारत और चीन के बीच पैदा हुए सैन्य तनाव ने दोनों देशों के बीच व्यापार और वित्तीय गतिविधियों पर भी असर डाला था। बैंक ने अपने जोखिम को सीमित करने के लिए कुछ स्वीकृत वित्तीय सौदों को रोकने का फैसला किया। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों की भूमिका दस्तावेज में मुंबई शाखा के भीतर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के सदस्यों की भूमिका का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, डोकलाम संकट के दौरान शाखा ने विभिन्न विभागों में पार्टी सदस्यों को अपने पदों पर बने रहने और चीन के दूतावास तथा वाणिज्य दूतावास के साथ लगातार संपर्क बनाए रखने के लिए संगठित किया। ICBC की रिपोर्ट में इसे सीमा तनाव के प्रतिकूल प्रभाव को कम करने के लिए पार्टी संगठन को मजबूत करने की गतिविधियों के संदर्भ में रखा गया था। दस्तावेज के अनुसार, पार्टी सदस्यों ने बैंक के विभिन्न विभागों में काम जारी रखते हुए चीनी राजनयिक प्रतिष्ठानों के साथ संपर्क बनाए रखा। शाखा ने संकट के दौरान अपने मुख्यालय को भी स्थिति की जानकारी दी और संभावित परिस्थितियों से निपटने के लिए आकस्मिक योजनाएं तैयार कीं। रिपोर्ट के मुताबिक, मुंबई शाखा ने मुख्यालय के संबंधित विभागों को सूचनाएं भेजीं, ऋण और निवेश जोखिमों को कम किया और सीमा गतिरोध के संभावित प्रतिकूल प्रभावों को सीमित करने के लिए कदम उठाए। कर्मचारियों के बीच भरोसा बनाए रखने की कोशिश सीमा विवाद के कारण केवल वित्तीय और परिचालन जोखिम ही नहीं बढ़े थे, बल्कि स्थानीय कर्मचारियों के बीच भी चिंता पैदा हुई थी। ICBC के दस्तावेज में बताया गया कि तनावपूर्ण दौर में शाखा ने कर्मचारियों के बीच संवाद और भरोसा बढ़ाने के लिए कई गतिविधियां आयोजित कीं। रिपोर्ट के अनुसार, शाखा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी की ओर से चाय पर बातचीत के सत्र आयोजित किए गए। स्थानीय कर्मचारियों के साथ व्यक्तिगत स्तर पर चर्चा की गई और सामाजिक गतिविधियों का भी आयोजन किया गया। इन गतिविधियों का उद्देश्य कर्मचारियों की चिंताओं को समझना और तनावपूर्ण माहौल के बीच शाखा के सामान्य कामकाज को बनाए रखना बताया गया। 178 पन्नों की गोपनीय रिपोर्ट से सामने आई जानकारी डोकलाम से संबंधित ये विवरण जनवरी 2018 में तैयार की गई ICBC की 178 पन्नों वाली एक आंतरिक कार्य-सारांश रिपोर्ट में दर्ज थे। दस्तावेज को “गोपनीय” और बाहरी वितरण के लिए अनुपयुक्त बताया गया था। यह रिपोर्ट ICBC की 42 विदेशी शाखाओं के प्रदर्शन से संबंधित थी। मुंबई शाखा के संदर्भ में इसमें वर्ष 2017 के भारत-चीन सीमा गतिरोध को उन परिस्थितियों में शामिल किया गया, जिनसे शाखा के कारोबार और वित्तीय लक्ष्य प्रभावित हुए थे। दस्तावेजों के अनुसार, शाखा ने संकट के दौरान सामान्य संचालन बनाए रखने के लिए वित्तीय जोखिम कम करने के साथ-साथ कर्मचारियों और प्रबंधन के बीच संचार को मजबूत किया। 48 लाख से अधिक दस्तावेजों की जांच यह जानकारी “चाइना कैपिटल” नामक अंतरराष्ट्रीय खोजी पत्रकारिता परियोजना के तहत सामने आई है। जांच में ICBC की लंदन शाखा से जुड़े करीब 48 लाख दस्तावेजों के एक बड़े डेटा सेट की समीक्षा की गई। इन दस्तावेजों में आंतरिक रिपोर्ट, गोपनीय फाइलें और हजारों कॉरपोरेट ग्राहकों से संबंधित रिकॉर्ड शामिल बताए गए हैं। डेटा वर्ष 2005 से 2024 के बीच का है और इसमें बैंक की अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों से संबंधित विभिन्न दस्तावेज मौजूद हैं। रिपोर्ट के अनुसार, यह डेटा एक हैकिंग समूह द्वारा हासिल किए जाने के बाद इंटरनेशनल कंसोर्टियम ऑफ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स (ICIJ) तक पहुंचा। इसके बाद ICIJ ने विभिन्न देशों के मीडिया संगठनों और पत्रकारों के साथ रिकॉर्ड साझा किए। जांच में 24 देशों के 75 पत्रकारों और 24 मीडिया भागीदारों के शामिल होने की जानकारी दी गई है। भारतीय संदर्भ में इन दस्तावेजों की समीक्षा के दौरान ICBC की मुंबई शाखा से संबंधित जानकारी सामने आई। ICBC से इन निष्कर्षों पर प्रतिक्रिया मांगी गई थी, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार बैंक ने द इंडियन एक्सप्रेस और ICIJ द्वारा भेजे गए प्रश्नों का जवाब नहीं दिया। चीन की बैंकिंग व्यवस्था में ICBC की बड़ी भूमिका ICBC चीन के प्रमुख सरकारी बैंकों में से एक है और संपत्ति के आकार के आधार पर दुनिया के सबसे बड़े बैंकों में गिना जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, बैंक के पास 8 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की परिसंपत्तियां हैं। ICBC चीन के चार प्रमुख सरकारी वाणिज्यिक बैंकों के समूह का हिस्सा है। इस समूह में बैंक ऑफ चाइना, एग्रीकल्चरल बैंक ऑफ चाइना और चाइना कंस्ट्रक्शन बैंक भी शामिल हैं। चीन की सरकारी बैंकिंग व्यवस्था में इन संस्थानों की भूमिका केवल पारंपरिक बैंकिंग तक सीमित नहीं मानी जाती। चाइना कैपिटल जांच में सामने आए दस्तावेजों में बैंक के भीतर पार्टी संगठन और चीन की आर्थिक नीतियों से संबंधित जिम्मेदारियों का भी उल्लेख मिलता है। 2022 की एक रिपोर्ट में ICBC के अंतरराष्ट्रीय परिचालन से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा पार्टी से संबंधित गतिविधियों को बैंक की प्रमुख जिम्मेदारियों में शामिल किए जाने का उल्लेख बताया गया है। डोकलाम के बाद भारत-चीन संबंधों पर असर 2017 का डोकलाम गतिरोध भारत और चीन के बीच संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम था। सीमा पर सैन्य तनाव के साथ-साथ दोनों देशों के बीच रणनीतिक विश्वास और व्यापारिक संबंधों को लेकर भी चर्चाएं बढ़ी थीं। ICBC की मुंबई शाखा से संबंधित यह दस्तावेज इस बात का एक उदाहरण प्रस्तुत करता है कि सीमा पर राजनीतिक और सैन्य तनाव का प्रभाव एक अंतरराष्ट्रीय बैंक की स्थानीय कारोबारी रणनीति तक पहुंच सकता है। बैंक ने अपने आंतरिक आकलन के आधार पर कुछ वित्तीय जोखिमों को सीमित करने और संभावित नुकसान को कम करने के उपाय किए। हालांकि, उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उस समय ICBC की भारत में पूरी कारोबारी गतिविधियां बंद हो गई थीं। रिपोर्ट में इसके विपरीत यह कहा गया है कि मुंबई शाखा ने अपने सामान्य संचालन को जारी रखा और कारोबारी गतिविधियों को बनाए रखने के लिए आकस्मिक योजनाएं तैयार कीं। दस्तावेजों से सामने आया वित्तीय प्रभाव ICBC की आंतरिक रिपोर्ट में दर्ज आंकड़े इस घटनाक्रम के वित्तीय प्रभाव को भी रेखांकित करते हैं। 185 मिलियन डॉलर के 11 स्वीकृत लेकिन लंबित ऋण और बॉन्ड निवेशों पर रोक के कारण करीब 6.36 मिलियन डॉलर की परिचालन आय प्रभावित होने का अनुमान बैंक ने खुद लगाया था। मुंबई शाखा का केवल 57.7 प्रतिशत वार्षिक लक्ष्य हासिल करना भी रिपोर्ट में दर्ज है। बैंक ने इसके लिए सीमा तनाव सहित कई आंतरिक और बाहरी कारणों का उल्लेख किया। इन दस्तावेजों से यह भी पता चलता है कि सीमा विवाद के दौरान बैंक के लिए वित्तीय जोखिम प्रबंधन और परिचालन निरंतरता दोनों महत्वपूर्ण प्राथमिकताएं थीं। शाखा ने एक ओर नए वित्तीय जोखिमों को सीमित किया, वहीं दूसरी ओर अपने कर्मचारियों और मुख्यालय के साथ संचार बनाए रखने के प्रयास किए। चाइना कैपिटल जांच से सामने आए ये रिकॉर्ड 2017 के डोकलाम गतिरोध के एक ऐसे पहलू पर प्रकाश डालते हैं जो आम तौर पर सीमा पर सैन्य गतिविधियों की चर्चा में सामने नहीं आता। भारत और चीन के बीच सैन्य तनाव का प्रभाव हजारों किलोमीटर दूर मुंबई स्थित एक चीनी बैंक की वित्तीय रणनीति तक पहुंचा और इसके परिणामस्वरूप करोड़ों डॉलर के स्वीकृत वित्तीय लेनदेन अस्थायी रूप से रोक दिए गए।

    IIT-Bombay ने छात्र की मौत से जुड़े पुराने बयान पर मांगी माफी, जांच के बीच निदेशक के इस्तीफे की खबरों को बताया गलत

    Yugcharan News / 21-09-2026 मुंबई। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान-बॉम्बे (IIT-Bombay) ने 22 वर्षीय छात्र साहिल की मौत से जुड़े अपने पहले के बयान पर सोमवार को माफी मांगते हुए कहा कि घटना से पहले की परिस्थितियों के बारे में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं था, क्योंकि पूरा मामला अभी संबंधित जांच एजेंसियों की जांच के अधीन है। संस्थान की यह सफाई ऐसे समय आई है जब छात्र की मौत को लेकर परिसर में विरोध-प्रदर्शन और असंतोष जारी है तथा मुंबई पुलिस ने मामले की जांच क्राइम ब्रांच को सौंप दी है। IIT-Bombay ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जारी एक पोस्ट में अपने पहले के संचार में इस्तेमाल किए गए विवरणों को लेकर खेद व्यक्त किया। संस्थान ने कहा कि साहिल की मौत से पहले हुई घटनाओं और परिस्थितियों का अंतिम निर्धारण अभी जांच के बाद ही किया जा सकता है। संस्थान ने यह भी कहा कि उचित जांच पूरी होने से पहले घटना से जुड़े तथ्यों को जिस तरह पहले के बयान में प्रस्तुत किया गया, वह उपयुक्त नहीं था। साहिल, IIT-Bombay में दूसरे वर्ष का छात्र था। वह शुक्रवार, 18 सितंबर 2026 को पवई स्थित संस्थान के हॉस्टल के कमरे में मृत पाया गया था। घटना के बाद यह जानकारी सामने आई कि परीक्षा के दौरान उसके पास मोबाइल फोन होने को लेकर एक शिक्षक ने रिपोर्ट की थी। इस मामले में परीक्षा की निगरानी कर रहे प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला का नाम मुंबई पुलिस की FIR में दर्ज किया गया है। संस्थान से जुड़े कुछ अन्य अधिकारियों के नाम भी FIR में शामिल किए गए हैं। पुराने बयान पर IIT-Bombay ने जताया खेद साहिल की मौत के तुरंत बाद 19 सितंबर को IIT-Bombay ने एक प्रारंभिक बयान जारी किया था। इस बयान में संस्थान ने कहा था कि छात्र को परीक्षा कक्ष में मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हुए पाया गया था और उसने कथित तौर पर परीक्षा के प्रश्नपत्र की तस्वीर या सामग्री ChatGPT पर अपलोड कर उत्तर प्राप्त करने की कोशिश की थी। संस्थान ने अपने उस बयान में यह भी कहा था कि छात्र के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं की गई थी। उसके अनुसार, मामले पर छात्र से संबंधित शिक्षक, फैकल्टी एडवाइजर और विभागाध्यक्ष ने बातचीत की थी। संस्थान ने दावा किया था कि छात्र को समझाया गया था और यह आश्वासन दिया गया था कि परीक्षा से जुड़ी घटना का उसके अकादमिक करियर पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। हालांकि, छात्र के परिवार ने संस्थान के इस शुरुआती विवरण पर अलग जानकारी दी। परिवार की ओर से आरोप लगाया गया कि साहिल को जातिसूचक टिप्पणियों और कथित उत्पीड़न का सामना करना पड़ा था। छात्र के पिता रविंद्र ने पुलिस को दिए बयान में कहा कि उनके बेटे ने उन्हें बताया था कि प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला पिछले करीब तीन महीनों से उसे परेशान कर रहे थे। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी जांच का विषय है। पुलिस ने मामले में FIR दर्ज की है और अब जांच क्राइम ब्रांच के पास स्थानांतरित किए जाने के बाद घटनाक्रम से जुड़े सभी पहलुओं की जांच की जा रही है। जांच पूरी होने से पहले निष्कर्ष पर आपत्ति अपने नए बयान में IIT-Bombay ने कहा कि छात्र की मौत से पहले हुई घटनाओं के विवरण को जांच के जरिए स्थापित किए जाने से पहले उन्हें निश्चित रूप से प्रस्तुत करना उचित नहीं था। संस्थान ने कहा कि मामले की वास्तविक परिस्थितियां संबंधित अधिकारियों की जांच के अधीन हैं। यह बदलाव संस्थान के पहले बयान से महत्वपूर्ण अंतर दिखाता है। जहां प्रारंभिक बयान में परीक्षा के दौरान मोबाइल फोन के इस्तेमाल और ChatGPT के जरिए प्रश्नपत्र से उत्तर लेने की कोशिश का उल्लेख किया गया था, वहीं नए बयान में संस्थान ने इस बात पर जोर दिया है कि मौत से पहले की परिस्थितियों का अंतिम निर्धारण जांच पूरी होने के बाद ही किया जाना चाहिए। इस मामले में पुलिस जांच के साथ-साथ छात्र के परिवार द्वारा लगाए गए आरोप भी महत्वपूर्ण हैं। परिवार का कहना है कि छात्र ने कथित उत्पीड़न की जानकारी अपने पिता को दी थी। पुलिस की FIR में लगाए गए आरोपों की जांच के दौरान यह देखा जाएगा कि घटना से पहले छात्र और संबंधित शिक्षक के बीच क्या हुआ था और क्या किसी तरह का दबाव या उत्पीड़न हुआ था। मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच करेगी जांच मामले की जांच मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच को सौंपे जाने के बाद जांच का दायरा और महत्वपूर्ण हो गया है। पुलिस को अब छात्र की मौत से पहले के घटनाक्रम, परीक्षा से संबंधित विवाद, संस्थान के अधिकारियों की भूमिका और परिवार द्वारा लगाए गए आरोपों सहित विभिन्न पहलुओं की जांच करनी है। छात्र की मौत के बाद IIT-Bombay परिसर में विरोध-प्रदर्शन भी हुए हैं। छात्रों के बीच इस घटना को लेकर नाराजगी देखी गई है और मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठाई गई है। इस बीच, पुलिस की जांच आगे बढ़ने के साथ FIR में दर्ज आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच की जाएगी। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि FIR में किसी व्यक्ति का नाम होना अपने आप में आरोप सिद्ध होने के बराबर नहीं है। मामले में जिम्मेदारी और घटनाओं का वास्तविक क्रम जांच के निष्कर्षों तथा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निर्धारित होगा। IIT-Bombay निदेशक के इस्तीफे की खबरों पर स्पष्टीकरण छात्र की मौत और उसके बाद परिसर में जारी विरोध के बीच IIT-Bombay के निदेशक के इस्तीफे से संबंधित खबरें भी सामने आई थीं। संस्थान ने इन खबरों का स्पष्ट रूप से खंडन किया है। IIT-Bombay ने सोशल मीडिया पर कहा कि उसके निदेशक ने इस्तीफा नहीं दिया है और इससे संबंधित खबरों को गलत बताया। संस्थान ने इस संबंध में किसी भी भ्रम की स्थिति को दूर करने के लिए स्पष्ट किया कि निदेशक अपने पद पर बने हुए हैं। इस स्पष्टीकरण के साथ संस्थान ने एक ओर अपने पहले बयान को लेकर माफी मांगी, वहीं दूसरी ओर निदेशक के इस्तीफे से जुड़ी रिपोर्टों को भी खारिज किया। दोनों घटनाक्रम ऐसे समय सामने आए हैं जब छात्र की मौत को लेकर संस्थान प्रशासन की भूमिका पर सार्वजनिक चर्चा जारी है। परिवार के आरोपों की भी होगी जांच साहिल के परिवार की ओर से लगाए गए आरोपों ने मामले को केवल परीक्षा में मोबाइल फोन के कथित इस्तेमाल तक सीमित नहीं रहने दिया है। पिता रविंद्र के अनुसार, उनके बेटे ने कथित तौर पर बताया था कि वह कई महीनों से संबंधित प्रोफेसर के व्यवहार से परेशान था। परिवार ने जातिसूचक टिप्पणियों का भी आरोप लगाया है। पुलिस की जांच में इन आरोपों की पुष्टि के लिए छात्र के परिवार के बयान, सहपाठियों से बातचीत, संस्थान के रिकॉर्ड और घटना से जुड़े अन्य उपलब्ध साक्ष्यों की जांच की जा सकती है। परीक्षा के दिन क्या हुआ था और उसके बाद छात्र के साथ किस स्तर पर बातचीत हुई, यह भी जांच का हिस्सा होगा। IIT-Bombay की ओर से अब यह स्पष्ट किया गया है कि संस्थान स्वयं घटना की परिस्थितियों के बारे में अंतिम निष्कर्ष नहीं दे रहा है और जांच एजेंसियों के निष्कर्ष का इंतजार किया जाएगा। जांच के निष्कर्ष का इंतजार साहिल की मौत ने उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रों की सुरक्षा, अनुशासनात्मक प्रक्रियाओं और शिकायतों से निपटने के तरीकों को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, इस मामले में किसी व्यापक निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले पुलिस जांच पूरी होना जरूरी है। फिलहाल क्राइम ब्रांच के सामने मुख्य चुनौती घटना से पहले के पूरे घटनाक्रम को क्रमवार स्थापित करने की है। परीक्षा से संबंधित विवाद, छात्र और शिक्षक के बीच हुई बातचीत, परिवार द्वारा लगाए गए उत्पीड़न के आरोप तथा संस्थान के शुरुआती बयान में बताए गए तथ्यों की जांच के बाद ही मामले की तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी। IIT-Bombay ने अपने ताजा बयान में इसी जांच प्रक्रिया को प्राथमिकता देने की बात कही है। संस्थान की माफी के बाद अब मामले में आगे की कार्रवाई पुलिस और संबंधित जांच अधिकारियों की रिपोर्ट पर निर्भर करेगी। इस बीच परिसर में छात्रों की प्रतिक्रिया और परिवार की ओर से निष्पक्ष जांच की मांग के बीच सभी पक्षों की नजर क्राइम ब्रांच की जांच पर बनी हुई है।

    दिल्ली SIR में दिवंगत अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय का नाम भी नोटिस सूची में, जयशंकर, आडवाणी और सिसोदिया समेत कई प्रमुख नाम शामिल

    Yugcharan News / 21-09-2026 नई दिल्ली। दिल्ली में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से जुड़ी विसंगतियों की जांच के लिए जारी नोटिसों की सूची में कई प्रमुख नाम सामने आए हैं। इनमें विदेश मंत्री एस. जयशंकर, भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू, पूर्व दिल्ली उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और विदेश सचिव विक्रम मिस्री जैसे नाम शामिल हैं। इस सूची में सबसे उल्लेखनीय मामलों में दिवंगत अर्थशास्त्री और पद्म पुरस्कार से सम्मानित बिबेक देबरॉय का नाम भी है, जिनका नवंबर 2024 में निधन हो चुका था। चुनाव आयोग की प्रक्रिया के तहत तैयार दिल्ली की ड्राफ्ट मतदाता सूची में देबरॉय का नाम मौजूद पाया गया और उनके रिकॉर्ड को पिछली SIR सूची से “नो मैपिंग” की श्रेणी में चिह्नित किया गया। हालांकि, अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि उनका नाम अंतिम मतदाता सूची में नहीं रखा जाएगा। एक वरिष्ठ चुनाव अधिकारी के अनुसार, देबरॉय की मृत्यु की जानकारी अधिकारियों को थी, लेकिन आयोग के निर्देशों के तहत कुछ विशेष श्रेणियों में आने वाले नामों को ड्राफ्ट सूची में शामिल किया गया था ताकि दावे और आपत्तियों की अवधि के दौरान आवश्यक दस्तावेज जुटाए जा सकें। 33 लाख से अधिक मतदाताओं को नोटिस दिल्ली SIR के तहत लगभग 33.1 लाख मतदाताओं के रिकॉर्ड को “नो मैपिंग” या “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” जैसी श्रेणियों में रखा गया है। इन मामलों में मतदाताओं के वर्तमान विवरण और पिछली मतदाता सूची के बीच मिलान नहीं होने या रिकॉर्ड में किसी तरह की तार्किक विसंगति पाए जाने पर सत्यापन की प्रक्रिया शुरू की गई है। दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने 19 सितंबर को ऐसे मामलों का बूथवार विवरण सार्वजनिक किया था। चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक और अद्यतन बनाना है। नोटिस मिलने का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित व्यक्ति का नाम अंतिम रूप से मतदाता सूची से हटा दिया गया है। संबंधित मतदाता को आवश्यक दस्तावेज और जानकारी देकर अपने रिकॉर्ड का सत्यापन कराने का अवसर दिया जा रहा है। देबरॉय का मामला इसलिए अलग है क्योंकि वह नवंबर 2024 में ही दुनिया से विदा हो चुके थे। इसके बावजूद उनका नाम दिल्ली की 31 अगस्त को प्रकाशित ड्राफ्ट मतदाता सूची में मौजूद रहा। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उनका नाम दिल्ली कैंट विधानसभा क्षेत्र के मतदाता के रूप में दर्ज था। रिपोर्टों में उन्हें ड्राफ्ट सूची में 70 वर्षीय मतदाता के तौर पर दर्ज किए जाने का उल्लेख है, जबकि उनके निधन के समय उनकी उम्र 69 वर्ष थी। SIR में प्रमुख राजनीतिक और सार्वजनिक हस्तियों के नाम बिबेक देबरॉय के अलावा विदेश मंत्री एस. जयशंकर और उनकी पत्नी क्योको सोमेकावा जयशंकर के नाम भी “नो मैपिंग” श्रेणी में सामने आए हैं। इसी तरह भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, उनकी बेटी प्रतिभा आडवाणी और बहू गीतिका आडवाणी के नाम भी इसी श्रेणी में दर्ज किए गए हैं। विदेश सचिव विक्रम मिस्री का नाम भी उन मतदाताओं की सूची में है जिनके रिकॉर्ड का पिछली SIR सूची से मिलान नहीं हो सका। पूर्व भाजपा आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय को भी नोटिस जारी किया गया है, जबकि उनकी पत्नी गौरी मालवीय के रिकॉर्ड में “सेल्फ नेम मिसमैच” दर्ज किया गया है। पूर्व दिल्ली उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और उनके परिवार के सदस्यों के नाम भी नोटिस सूची में हैं। हालांकि सिसोदिया के मामले में नोटिस जारी किए जाने का कारण संबंधित रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं किया गया है। उनकी पत्नी सीमा सिसोदिया के मामले में “सेल्फ नेम मिसमैच”, जबकि उनके बेटे मीर सिसोदिया के मामले में “पैरेंट नेम मिसमैच” दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी के मामले में भी नोटिस जारी होने की सूची में कारण वाला कॉलम खाली बताया गया है। पूर्व चुनाव अधिकारियों के नाम भी शामिल SIR की प्रक्रिया में कुछ पूर्व चुनाव अधिकारियों के रिकॉर्ड भी जांच के दायरे में आए हैं। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्र और उनकी पत्नी नीलू चंद्र के नाम “पिछली SIR से नो मैपिंग” श्रेणी में रखे गए हैं। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त अरुण गोयल का नाम भी इसी कारण से नोटिस सूची में शामिल किया गया है। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू के मामले में “सेल्फ नेम मिसमैच” की विसंगति दर्ज की गई थी। इसका अर्थ है कि मौजूदा SIR प्रक्रिया में दर्ज नाम और पिछली मतदाता सूची में दर्ज नाम के बीच अंतर पाया गया। हालांकि, दिल्ली के संबंधित निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी ने बाद में बताया कि दस्तावेजों, तथ्यों और अन्य विवरणों के सत्यापन के बाद संधू का नाम अंतिम मतदाता सूची में शामिल किए जाने के लिए मान्य कर दिया गया है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि SIR के दौरान जारी किया गया नोटिस अपने आप में मतदाता का नाम हटाने का अंतिम फैसला नहीं है। सत्यापन और दावे-आपत्तियों की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही अंतिम सूची तैयार की जाएगी। अन्य प्रमुख हस्तियां भी सूची में SIR के दौरान दिल्ली के कई अन्य जाने-माने लोगों के रिकॉर्ड भी जांच के लिए चिह्नित किए गए हैं। इनमें पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और उनकी पत्नी सुदेश धनखड़, पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर, दिल्ली के मंत्री प्रवेश साहिब सिंह, पूर्व दिल्ली भाजपा अध्यक्ष वीरेंद्र कुमार सचदेवा, इतिहासकार रोमिला थापर और नई दिल्ली की सांसद बांसुरी स्वराज के नाम शामिल हैं। जंगपुरा विधानसभा क्षेत्र में समाजशास्त्री और सामाजिक मनोवैज्ञानिक आशीष नंदी, वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह और आनंद ग्रोवर तथा राजनीतिक संचार सलाहकार दिलीप चेरियन के नाम भी सामने आए हैं। पत्रकार शीला भट्ट के रिकॉर्ड में “सेल्फ नेम मिसमैच” दर्ज किया गया है, जबकि वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी का नाम “नो मैपिंग” श्रेणी में रखा गया है। कालकाजी विधानसभा क्षेत्र में अर्थशास्त्री दीपक नैयर के रिकॉर्ड में “पैरेंट नेम मिसमैच” की विसंगति दर्ज की गई है। दिल्ली की ड्राफ्ट मतदाता सूची में बड़े बदलाव दिल्ली में SIR के बाद 31 अगस्त को जारी ड्राफ्ट मतदाता सूची में कुल 97.53 लाख मतदाताओं के नाम दर्ज किए गए। इसके विपरीत, पुनरीक्षण से पहले दिल्ली में लगभग 1.45 करोड़ मतदाता दर्ज थे। ड्राफ्ट चरण में 47.56 लाख नामों को अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत होने जैसी श्रेणियों के तहत बाहर रखा गया। इन आंकड़ों को लेकर दिल्ली में राजनीतिक और कानूनी बहस भी तेज हुई है। कई नागरिकों ने शिकायत की है कि उनके नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं हैं, जबकि उन्होंने SIR के दौरान आवश्यक फॉर्म जमा किए थे। कुछ मामलों में मतदाताओं को गलत तरीके से मृत या स्थानांतरित भी चिह्नित किए जाने की शिकायतें सामने आई हैं। वहीं, लगभग 33.1 लाख मतदाताओं के मामले में “नो मैपिंग” अथवा “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” के आधार पर सत्यापन की जरूरत बताई गई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इनमें करीब 13.79 लाख मतदाता “नो मैपिंग” श्रेणी में और लगभग 19.33 लाख “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” श्रेणी में हैं। अंतिम सूची नवंबर में होगी प्रकाशित दिल्ली में SIR की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है। जिन मतदाताओं को नोटिस जारी किया गया है, उन्हें निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपने रिकॉर्ड और पात्रता से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर दिया जा रहा है। चुनाव अधिकारियों के अनुसार, सत्यापन और मामलों के निपटारे की प्रक्रिया 29 अक्टूबर तक पूरी की जानी है। इसके बाद अंतिम मतदाता सूची 4 नवंबर को प्रकाशित की जानी प्रस्तावित है। अधिकारियों ने यह भी कहा है कि प्रमुख सार्वजनिक हस्तियों और अन्य चर्चित लोगों को हर मामले में व्यक्तिगत रूप से सुनवाई केंद्र पर पहुंचने की आवश्यकता नहीं होगी। निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी ऐसे मामलों की सूची तैयार कर सकते हैं और संबंधित बूथ लेवल अधिकारियों को पंजीकृत पते पर भेजकर दस्तावेजों और रिकॉर्ड का सत्यापन करा सकते हैं। SIR के दौरान सामने आए बिबेक देबरॉय के मामले ने मतदाता सूची के डिजिटल और रिकॉर्ड-आधारित सत्यापन की प्रक्रिया पर विशेष ध्यान खींचा है। हालांकि उनका नाम ड्राफ्ट सूची में दिखाई दिया, चुनाव अधिकारियों के अनुसार उनकी मृत्यु की जानकारी उपलब्ध थी और अंतिम सूची तैयार करते समय उनके रिकॉर्ड को उसी आधार पर अपडेट किया जाएगा। इस पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि वर्तमान ड्राफ्ट सूची अंतिम मतदाता सूची नहीं है और इसमें दर्ज नाम तथा श्रेणियां दावे, आपत्तियों और दस्तावेजी सत्यापन के बाद बदली जा सकती हैं। दिल्ली में SIR की अंतिम प्रक्रिया पूरी होने तक मतदाता रिकॉर्ड से जुड़ी विसंगतियों, नोटिसों और दावों पर चुनाव अधिकारियों द्वारा आगे भी कार्रवाई जारी रहने की संभावना है। अंतिम सूची के प्रकाशन के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि सत्यापन प्रक्रिया के बाद कितने नाम बरकरार रहते हैं, कितने रिकॉर्ड संशोधित होते हैं और किन मामलों में नाम हटाने या जोड़ने की आवश्यकता पड़ती है।

    जर्मनी के दो राज्यों में बदले चुनावी समीकरण, बर्लिन में Die Linke आगे और मेक्लेनबर्ग में AfD शीर्ष पर; Merz ने नतीजे को बताया ‘आपदा’

    Yugcharan News / 21-09-2026 बर्लिन: जर्मनी में रविवार को हुए दो राज्य चुनावों के शुरुआती नतीजों ने देश की राजनीति में नए समीकरणों की ओर इशारा किया है। राजधानी बर्लिन में वामपंथी पार्टी Die Linke सबसे अधिक वोट हासिल करने की स्थिति में दिखाई दी, जबकि उत्तर-पूर्वी राज्य मेक्लेनबर्ग-वेस्टर्न पोमेरानिया में दक्षिणपंथी Alternative for Germany (AfD) सबसे आगे रही। इन परिणामों के बीच चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की सत्तारूढ़ Christian Democratic Union (CDU) को दोनों राज्यों में नुकसान उठाना पड़ा। मेक्लेनबर्ग-वेस्टर्न पोमेरानिया के नतीजे विशेष रूप से CDU के लिए महत्वपूर्ण रहे। ARD के एग्जिट पोल के अनुसार, AfD को करीब 37 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान था, जबकि केंद्र-वाम Social Democratic Party (SPD) लगभग 35.5 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर थी। मर्ज की CDU को केवल 5.5 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान था। यह आंकड़ा पार्टी के लिए राज्य स्तर पर 1949 के बाद सबसे कमजोर प्रदर्शन में से एक बताया जा रहा है। बर्लिन में तस्वीर अलग रही। ARD के एग्जिट पोल में Die Linke को लगभग 24.5 प्रतिशत वोट के साथ सबसे आगे बताया गया, जबकि मर्ज के नेतृत्व वाली CDU करीब 20 प्रतिशत और AfD लगभग 16 प्रतिशत पर रही। हालांकि, सबसे अधिक वोट हासिल करना अपने आप में सरकार बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है और Die Linke को सत्ता के लिए सहयोगी दलों की आवश्यकता होगी। मेक्लेनबर्ग-वेस्टर्न पोमेरानिया में AfD आगे मेक्लेनबर्ग-वेस्टर्न पोमेरानिया में चुनाव का मुख्य मुकाबला AfD और SPD के बीच रहा। राज्य में SPD की लोकप्रिय नेता और मुख्यमंत्री मनुएला श्वेसिग के नेतृत्व वाली पार्टी लगभग 35.5 प्रतिशत वोट के साथ दूसरे स्थान पर रही, जबकि AfD लगभग 37 प्रतिशत के साथ आगे रही। हालांकि, उपलब्ध शुरुआती आंकड़ों के अनुसार AfD के सबसे अधिक वोट पाने के बावजूद उसके लिए सरकार बनाना आसान नहीं होगा। जर्मनी की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने उसके साथ गठबंधन करने से इनकार करने की नीति अपनाई है। इसलिए चुनाव में सबसे अधिक वोट पाने और सरकार बनाने की क्षमता के बीच अंतर बना हुआ है। CDU के लिए इस राज्य का प्रदर्शन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी राज्य विधानसभा में प्रवेश के लिए जरूरी 5 प्रतिशत की सीमा के बेहद करीब रही। शुरुआती एग्जिट पोल में CDU को 5.5 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान लगाया गया था। बाद की रिपोर्टों में भी पार्टी का प्रदर्शन बेहद कमजोर बताया गया। बर्लिन में Die Linke सबसे आगे जर्मनी की राजधानी बर्लिन में Die Linke ने सबसे अधिक वोट हासिल करने की स्थिति बनाई। ARD के एग्जिट पोल के अनुसार पार्टी को करीब 24.5 प्रतिशत वोट मिले, जबकि CDU लगभग 20 प्रतिशत और AfD करीब 16 प्रतिशत पर रही। Die Linke की इस बढ़त का मुख्य राजनीतिक महत्व यह है कि पार्टी को लंबे समय बाद राजधानी में मजबूत स्थिति मिली है। हालांकि, सरकार बनाने के लिए उसे अन्य दलों का समर्थन हासिल करना होगा। इसलिए एग्जिट पोल में सबसे आगे रहने के बावजूद राजधानी की अगली सरकार का स्वरूप गठबंधन वार्ताओं पर निर्भर करेगा। चुनाव अभियान में बर्लिन में आवास की बढ़ती लागत एक प्रमुख मुद्दा रही। Die Linke ने अपने अभियान में आवास और सामाजिक नीतियों पर जोर दिया। पार्टी की शीर्ष उम्मीदवार एलिफ एराल्प ने नतीजों के बाद अपने समर्थकों के बीच इसे पार्टी के लिए बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया। CDU को दोनों राज्यों में झटका दोनों चुनावों में CDU का प्रदर्शन जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। मेक्लेनबर्ग-वेस्टर्न पोमेरानिया में पार्टी लगभग 5.5 प्रतिशत पर रही, जबकि बर्लिन में वह करीब 20 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर रही। मर्ज ने मेक्लेनबर्ग-वेस्टर्न पोमेरानिया में अपनी पार्टी के प्रदर्शन को खुद “आपदा” बताया। हालांकि, उन्होंने पद छोड़ने के संकेतों को खारिज करते हुए कहा कि वह सरकार में बने रहेंगे और अपने आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाएंगे। चांसलर ने अपनी सरकार के आर्थिक एजेंडे को जारी रखने की प्रतिबद्धता दोहराई है। उनके सामने अर्थव्यवस्था, कर व्यवस्था, सामाजिक कल्याण और प्रशासनिक सुधारों से जुड़े मुद्दों को आगे बढ़ाने की चुनौती है। राज्य चुनावों के परिणामों के बाद उनकी पार्टी के भीतर नेतृत्व और सरकार की रणनीति को लेकर चर्चा और तेज हो सकती है। इससे पहले भी AfD ने दर्ज की थी बड़ी बढ़त इन चुनावों से पहले 6 सितंबर को सैक्सोनी-अनहॉल्ट में हुए राज्य चुनाव में भी AfD ने मजबूत प्रदर्शन किया था। वहां पार्टी पूर्ण बहुमत के करीब पहुंच गई थी। इसके बाद जर्मनी की राजनीति में AfD की बढ़ती चुनावी ताकत को लेकर बहस तेज हुई। लगातार अलग-अलग राज्यों में AfD के मजबूत प्रदर्शन ने जर्मनी की पारंपरिक पार्टियों के सामने नई चुनौती रखी है। हालांकि, किसी राज्य में सबसे अधिक वोट प्राप्त करना और सरकार बनाना अलग-अलग राजनीतिक प्रक्रियाएं हैं। मेक्लेनबर्ग-वेस्टर्न पोमेरानिया में भी अन्य प्रमुख दलों की AfD के साथ गठबंधन न करने की स्थिति के कारण सरकार गठन का सवाल अलग रूप ले सकता है। मर्ज के सामने आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने की चुनौती मर्ज सरकार ने सत्ता संभालने के बाद आर्थिक सुधारों को अपनी प्राथमिकताओं में रखा है। लेकिन राज्य चुनावों के परिणाम ऐसे समय आए हैं जब सरकार को आर्थिक दबाव, ऊर्जा कीमतों और सामाजिक कल्याण से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक समर्थन जुटाने की चुनौती है। मर्ज ने स्पष्ट किया है कि वह सुधारों की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में सरकार को दृढ़ता और धैर्य के साथ काम करना होगा। उनके अनुसार, देश को आगे बढ़ाने के लिए प्रस्तावित सुधारों को लागू करना आवश्यक है। मेक्लेनबर्ग-वेस्टर्न पोमेरानिया में ईंधन और ऊर्जा कीमतें भी चुनावी चर्चा का हिस्सा रही थीं। सरकार ने चुनाव से पहले गैस और डीजल पर करों में राहत से जुड़ा पैकेज पेश किया था। इसके बावजूद CDU को राज्य में अपेक्षित समर्थन नहीं मिल सका। जर्मन राजनीति में बढ़ता ध्रुवीकरण दोनों राज्यों के परिणाम जर्मनी के राजनीतिक परिदृश्य में अलग-अलग दिशाओं की पार्टियों के मजबूत होने को भी दर्शाते हैं। बर्लिन में Die Linke सबसे अधिक वोट के साथ आगे रही, जबकि मेक्लेनबर्ग-वेस्टर्न पोमेरानिया में AfD शीर्ष पर रही। दूसरी ओर, मर्ज की CDU को दोनों राज्यों में अपने प्रदर्शन को लेकर चुनौती का सामना करना पड़ा है। इन परिणामों को राष्ट्रीय राजनीति के संदर्भ में भी देखा जा रहा है, लेकिन राज्य चुनाव सीधे तौर पर संघीय सरकार का गठन नहीं करते। इसलिए इनका तत्काल प्रभाव मुख्य रूप से संबंधित राज्यों की सरकारों और गठबंधन समीकरणों पर पड़ेगा। हालांकि, लगातार कमजोर राज्य स्तरीय प्रदर्शन किसी राष्ट्रीय पार्टी की राजनीतिक रणनीति और आंतरिक चर्चा को प्रभावित कर सकता है।   फिलहाल मर्ज ने अपने पद पर बने रहने और सुधार एजेंडे को जारी रखने की बात कही है। दूसरी ओर, AfD के लगातार मजबूत राज्य चुनाव परिणाम और बर्लिन में Die Linke की बढ़त ने जर्मनी की राजनीति में बदलते मतदाता रुझानों को सामने रखा है। अंतिम आधिकारिक परिणामों और गठबंधन वार्ताओं के बाद ही दोनों राज्यों की सरकारों की तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट होगी।

    डोकलाम विवाद के दौरान ICBC ने भारत में 18.5 करोड़ डॉलर के कर्ज और निवेश रोके, आंतरिक दस्तावेजों से खुलासा

    Yugcharan News / 21-09-2026 नई दिल्ली: वर्ष 2017 में भारत और चीन के बीच डोकलाम क्षेत्र में 73 दिनों तक चले सैन्य गतिरोध का असर केवल सीमा पर ही नहीं रहा, बल्कि हजारों किलोमीटर दूर मुंबई में चीन के सबसे बड़े सरकारी बैंकों में से एक की गतिविधियों पर भी पड़ा। इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच के अनुसार, चीन के Industrial and Commercial Bank of China (ICBC) की मुंबई शाखा ने उस दौरान 11 स्वीकृत लेकिन अभी तक वितरित नहीं किए गए कर्ज और बॉन्ड निवेशों की राशि रोक दी थी। इनकी कुल कीमत करीब 18.5 करोड़ डॉलर बताई गई है। यह जानकारी ICBC के एक गोपनीय आंतरिक कार्य-सारांश से सामने आई है। जनवरी 2018 में तैयार किए गए इस 178 पन्नों के दस्तावेज में भारत-चीन सीमा पर जारी तनाव को मुंबई शाखा के सामने मौजूद “आंतरिक और बाहरी चुनौतियों” में शामिल किया गया था। दस्तावेज के अनुसार, सीमा गतिरोध के दौरान बैंक ने अपने ऋण और निवेश जोखिम को कम करने के लिए कई कदम उठाए और स्वीकृत वित्तीय प्रस्तावों के वितरण को रोक दिया। यह खुलासा ‘China Capital’ नाम की एक अंतरराष्ट्रीय जांच का हिस्सा है, जिसे International Consortium of Investigative Journalists (ICIJ) ने कई मीडिया संस्थानों के साथ मिलकर किया है। जांच के लिए ICBC के लंदन कार्यालय से जुड़े लाखों दस्तावेजों की समीक्षा की गई। इनमें आंतरिक रिपोर्ट, गोपनीय दस्तावेज और हजारों कॉरपोरेट ग्राहकों से संबंधित रिकॉर्ड शामिल हैं। डोकलाम तनाव का मुंबई शाखा पर सीधा वित्तीय असर डोकलाम विवाद जून 2017 में उस समय शुरू हुआ था जब चीन ने भारत, भूटान और चीन के त्रि-जंक्शन के पास सड़क निर्माण की कोशिश की थी। भारत ने इस कदम का विरोध किया और भारतीय तथा चीनी सैनिक आमने-सामने आ गए। लगभग 73 दिनों तक चले इस गतिरोध का अंत अगस्त 2017 में दोनों देशों के सैनिकों के पीछे हटने के साथ हुआ। ICBC के आंतरिक दस्तावेज में इस सैन्य तनाव को मुंबई शाखा के प्रदर्शन पर असर डालने वाले प्रमुख कारणों में बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, शाखा ने अपने मुख्यालय द्वारा तय किए गए वार्षिक लाभ लक्ष्य का केवल 57.7 प्रतिशत हासिल किया। दस्तावेज में कहा गया कि सीमा पर तनाव के दौरान बैंक ने ऋण और निवेश से जुड़े जोखिमों को सक्रिय रूप से कम किया। इसी प्रक्रिया में 11 ऐसे कर्ज और बॉन्ड निवेश रोक दिए गए जिन्हें पहले मंजूरी दी जा चुकी थी, लेकिन जिनकी राशि अभी वितरित नहीं हुई थी। इनकी कुल राशि लगभग 185 मिलियन डॉलर थी। आंतरिक रिपोर्ट के अनुसार, इन फैसलों के कारण बैंक की परिचालन आय पर लगभग 6.36 मिलियन डॉलर का प्रभाव पड़ा। इससे यह संकेत मिलता है कि सीमा पर उत्पन्न राजनीतिक और सैन्य तनाव ने भारत में संचालित एक चीनी वित्तीय संस्थान की कारोबारी गतिविधियों को भी प्रभावित किया। पार्टी सदस्यों की भूमिका का भी दस्तावेज में उल्लेख ICBC के आंतरिक दस्तावेज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बैंक की मुंबई शाखा में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों की भूमिका से संबंधित है। रिपोर्ट के अनुसार, सीमा तनाव के दौरान शाखा ने विभिन्न विभागों में मौजूद पार्टी सदस्यों को अपने पदों पर बने रहने और चीन के दूतावास तथा वाणिज्य दूतावास के साथ लगातार संपर्क बनाए रखने के लिए संगठित किया। दस्तावेज में बताया गया कि पार्टी सदस्यों ने संकट के दौरान संचार बनाए रखा और शाखा के सामान्य संचालन को जारी रखने में भूमिका निभाई। शाखा ने चीन में अपने मुख्यालय को भी स्थिति की जानकारी दी और संभावित परिस्थितियों से निपटने के लिए आकस्मिक योजनाएं तैयार कीं। रिपोर्ट के मुताबिक, मुंबई शाखा ने अपने मुख्यालय के संबंधित विभागों को सूचित किया, आकस्मिक योजनाएं तैयार कीं और ऋण तथा निवेश जोखिम को कम करने के उपाय किए। इसका उद्देश्य सीमा तनाव के कारोबारी प्रभाव को सीमित करना था। हालांकि, दस्तावेज में वर्णित ये गतिविधियां ICBC के अपने आंतरिक रिकॉर्ड पर आधारित हैं। इन्हें स्वतंत्र रूप से किसी अन्य संस्था द्वारा किए गए आकलन के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है। तनाव के बीच कर्मचारियों से संवाद पर भी जोर ICBC के दस्तावेज के अनुसार, सीमा विवाद के दौरान बैंक के मुंबई कार्यालय ने स्थानीय कर्मचारियों के बीच चिंता कम करने के लिए भी कई कदम उठाए। रिपोर्ट में बताया गया कि बैंक ने CEO के साथ चाय बैठकों, कर्मचारियों के साथ व्यक्तिगत बातचीत और सामाजिक गतिविधियों का आयोजन किया। इन गतिविधियों का उद्देश्य स्थानीय कर्मचारियों के साथ संवाद बढ़ाना और उस समय पैदा हुई असहजता तथा चिंताओं को कम करना बताया गया। सीमा पर भारत और चीन के सैनिकों के बीच तनाव का असर केवल वित्तीय फैसलों तक सीमित नहीं था, बल्कि बैंक के रोजमर्रा के कामकाज और कर्मचारियों के माहौल पर भी पड़ा। ICBC के दस्तावेज में इस पूरी स्थिति को बैंक की सामान्य परिचालन गतिविधियों को बनाए रखने की चुनौती के रूप में दर्ज किया गया है। 4.8 मिलियन दस्तावेजों की जांच से सामने आई जानकारी ‘China Capital’ जांच के लिए इस्तेमाल किए गए रिकॉर्ड में ICBC के लंदन कार्यालय से जुड़े करीब 48 लाख दस्तावेज शामिल हैं। इन दस्तावेजों की अवधि 2005 से 2024 के बीच की बताई गई है। रिकॉर्ड में आंतरिक रिपोर्ट, व्यापार रहस्य के रूप में चिह्नित दस्तावेज, गोपनीय फाइलें और 4,000 से अधिक कॉरपोरेट ग्राहकों से संबंधित सूचनाएं शामिल हैं। इन दस्तावेजों से ICBC की अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों और चीन की व्यापक आर्थिक तथा राजनीतिक रणनीति के बीच संबंधों पर भी जानकारी सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, ये दस्तावेज पहले Hunters International नामक एक हैकिंग समूह के हाथ लगे थे और बाद में ICIJ तक पहुंचे। इसके बाद ICIJ ने दुनिया के 24 देशों के 75 पत्रकारों और 24 मीडिया साझेदारों के साथ मिलकर रिकॉर्ड की जांच की। इस जांच में द इंडियन एक्सप्रेस भी शामिल था। जांच का उद्देश्य ICBC की वैश्विक गतिविधियों और विभिन्न देशों में उसके वित्तीय संचालन से जुड़े दस्तावेजों की पड़ताल करना था। ICBC चीन के बड़े सरकारी बैंकों में शामिल ICBC चीन का सबसे बड़ा वाणिज्यिक बैंक है और दुनिया के सबसे बड़े बैंकों में भी शामिल है। इसके पास 8 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की परिसंपत्तियां होने की जानकारी दी गई है। यह चीन के चार प्रमुख सरकारी स्वामित्व वाले वित्तीय संस्थानों में से एक है। अन्य प्रमुख संस्थानों में Bank of China, Agricultural Bank of China और China Construction Bank शामिल हैं। ICBC की मुंबई शाखा भारत में बैंक की एकमात्र शाखा बताई गई है। इसी वजह से 2017 के डोकलाम संकट के दौरान इस शाखा की गतिविधियां विशेष महत्व रखती हैं। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद का असर एक चीनी सरकारी बैंक के भारत में कारोबार पर किस तरह पड़ा, इसका विवरण अब सामने आए आंतरिक दस्तावेजों में मिलता है। ICBC ने जांच पर प्रतिक्रिया नहीं दी इंडियन एक्सप्रेस और ICIJ ने जांच में सामने आए निष्कर्षों को लेकर ICBC से सवाल भेजे थे। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, बैंक ने इन प्रश्नों का जवाब नहीं दिया। इस कारण बैंक की ओर से इन दस्तावेजों में दर्ज घटनाओं और आरोपों पर कोई विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इसलिए दस्तावेजों में दिए गए विवरणों को ICBC के आंतरिक रिकॉर्ड के रूप में देखना महत्वपूर्ण है। भारत-चीन संबंधों में आर्थिक और रणनीतिक पहलू डोकलाम विवाद ने भारत और चीन के संबंधों में सीमा सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक संबंधों के जोखिम को भी सामने ला दिया था। दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश संबंध मौजूद रहे हैं, लेकिन सीमा विवाद और रणनीतिक मतभेदों का प्रभाव कारोबारी फैसलों पर पड़ सकता है। ICBC की मुंबई शाखा से जुड़ा यह मामला बताता है कि सीमा पर पैदा हुआ सैन्य तनाव किसी देश में काम कर रहे विदेशी वित्तीय संस्थान के जोखिम आकलन और निवेश संबंधी फैसलों को प्रभावित कर सकता है। 2017 में मुंबई शाखा द्वारा 185 मिलियन डॉलर के 11 स्वीकृत कर्ज और बॉन्ड निवेशों का वितरण रोकना इसी प्रभाव का एक उदाहरण है। आंतरिक रिपोर्ट में दर्ज आंकड़ों के मुताबिक, इन फैसलों का बैंक की परिचालन आय और वार्षिक लक्ष्य पर भी असर पड़ा। साथ ही, पार्टी सदस्यों के माध्यम से चीनी दूतावास और वाणिज्य दूतावास के साथ संपर्क बनाए रखने तथा मुख्यालय को रिपोर्ट करने का उल्लेख यह दर्शाता है कि संकट के दौरान बैंक ने कारोबारी और संस्थागत स्तर पर अलग-अलग उपाय किए। डोकलाम गतिरोध भले ही अगस्त 2017 में सैनिकों के पीछे हटने के साथ समाप्त हो गया था, लेकिन उससे जुड़े आर्थिक प्रभाव और उस समय लिए गए संस्थागत फैसलों का विवरण अब सामने आए इन दस्तावेजों के जरिए सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बना है। ICBC के मुंबई संचालन से जुड़े ये रिकॉर्ड भारत-चीन संबंधों में सीमा तनाव और आर्थिक गतिविधियों के बीच मौजूद जटिल संबंध को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेजी संदर्भ प्रदान करते हैं।

    IIT-B Faculty Member पर जातिगत उत्पीड़न का आरोप, BTech छात्र की आत्महत्या के मामले में केस दर्ज

    Yugcharan News / 20-09-2026 मुंबई: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बॉम्बे (IIT Bombay) के एक फैकल्टी सदस्य के खिलाफ मुंबई पुलिस ने एक 22 वर्षीय बीटेक छात्र की आत्महत्या के मामले में केस दर्ज किया है। पुलिस के अनुसार, फैकल्टी सदस्य पर छात्र के साथ कथित तौर पर जाति आधारित दुर्व्यवहार करने और आत्महत्या के लिए उकसाने से संबंधित आरोप लगाए गए हैं। छात्र अपने हॉस्टल के कमरे में मृत पाया गया था। यह मामला शनिवार को दर्ज किया गया। घटना के सामने आने के बाद संस्थान में छात्र सुरक्षा, मानसिक दबाव और कथित जातिगत उत्पीड़न को लेकर सवाल उठे हैं। पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है और यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि छात्र की मौत से पहले उसके साथ क्या घटनाएं हुई थीं तथा आरोपी फैकल्टी सदस्य की कथित भूमिका क्या थी। हॉस्टल के कमरे में मिला छात्र का शव मृतक छात्र की उम्र 22 वर्ष बताई गई है और वह IIT Bombay में बीटेक के दूसरे वर्ष में पढ़ाई कर रहा था। पुलिस के अनुसार, छात्र अपने हॉस्टल के कमरे में मृत पाया गया। घटना की जानकारी मिलने के बाद संबंधित अधिकारियों को सूचित किया गया और पुलिस ने मामले की जांच शुरू की। छात्र की मौत ने संस्थान के भीतर चिंता पैदा कर दी है। हालांकि, पुलिस जांच के शुरुआती चरण में है और छात्र की आत्महत्या के पीछे की पूरी परिस्थितियों का पता लगाया जाना बाकी है। पुलिस अब उन घटनाक्रमों की जांच कर रही है जो छात्र की मौत से पहले सामने आए थे। मामले में एक फैकल्टी सदस्य के खिलाफ कार्रवाई किए जाने से यह जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है कि क्या छात्र और संबंधित शिक्षक के बीच किसी प्रकार का विवाद या कथित उत्पीड़न हुआ था और उसका छात्र की मानसिक स्थिति तथा अंतिम कदम से कोई संबंध था। जातिगत दुर्व्यवहार का आरोप मुंबई पुलिस ने जिस मामले में केस दर्ज किया है, उसमें फैकल्टी सदस्य पर कथित जातिगत उत्पीड़न का आरोप लगाया गया है। आरोप है कि छात्र के साथ उसकी जाति को लेकर दुर्व्यवहार किया गया था। हालांकि, इन आरोपों की वास्तविक परिस्थितियों और उनकी पुष्टि जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी। किसी भी आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को अदालत में साबित किया जाना बाकी है। पुलिस मामले से जुड़े तथ्यों, उपलब्ध साक्ष्यों और संबंधित लोगों के बयानों की जांच करेगी। जाति के आधार पर किसी छात्र के साथ कथित भेदभाव या उत्पीड़न का आरोप उच्च शिक्षा संस्थानों में संवेदनशील विषय माना जाता है। ऐसे मामलों में संस्थान के भीतर शिकायत निवारण व्यवस्था, छात्र सहायता प्रणाली और प्रशासनिक प्रतिक्रिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। आत्महत्या के लिए उकसाने से जुड़ी जांच पुलिस ने फैकल्टी सदस्य के खिलाफ आत्महत्या के लिए कथित उकसावे से संबंधित मामला भी दर्ज किया है। इसका अर्थ यह है कि जांच एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि आरोपी के कथित व्यवहार और छात्र द्वारा उठाए गए अंतिम कदम के बीच कोई आपराधिक संबंध था या नहीं। आत्महत्या से जुड़े मामलों में पुलिस आमतौर पर घटना से पहले की परिस्थितियों, संबंधित व्यक्तियों के साथ संपर्क, उपलब्ध रिकॉर्ड और अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की जांच करती है। इस मामले में भी जांच का उद्देश्य यह स्पष्ट करना होगा कि छात्र किन परिस्थितियों से गुजर रहा था और क्या किसी व्यक्ति के कथित व्यवहार ने उसे आत्महत्या की ओर धकेलने में भूमिका निभाई। फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर छात्र की मौत और आरोपी फैकल्टी सदस्य के खिलाफ लगाए गए आरोपों के बीच अंतिम कानूनी निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा। पुलिस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया से मामले के तथ्य अधिक स्पष्ट होने की उम्मीद है। IIT Bombay में छात्र सुरक्षा पर उठे सवाल एक प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान में पढ़ने वाले 22 वर्षीय छात्र की मौत ने उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रों की सुरक्षा और कल्याण से जुड़े व्यापक मुद्दों को भी सामने ला दिया है। IIT जैसे संस्थानों में छात्रों को पढ़ाई के साथ-साथ अत्यधिक शैक्षणिक और सामाजिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे वातावरण में शिकायतों को समय पर सुनना और छात्रों को सहायता उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण माना जाता है। इस मामले में जातिगत उत्पीड़न के आरोप सामने आने के कारण संस्थान के भीतर शिकायतों से निपटने की प्रक्रिया भी जांच के दायरे में आ सकती है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में संस्थान की ओर से इस मामले पर विस्तृत प्रतिक्रिया का उल्लेख नहीं है। छात्र की मौत के बाद यह भी महत्वपूर्ण होगा कि पुलिस और संस्थान संबंधित परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच करें तथा यदि किसी प्रकार की शिकायत पहले की गई थी तो उसके रिकॉर्ड और उस पर हुई कार्रवाई की भी समीक्षा की जाए। पुलिस जांच से सामने आएंगे आगे के तथ्य मुंबई पुलिस द्वारा केस दर्ज किए जाने के बाद जांच आगे बढ़ाई जा रही है। पुलिस कथित जातिगत दुर्व्यवहार और आत्महत्या के बीच संभावित संबंध की जांच करेगी। मामले से जुड़े लोगों से पूछताछ और उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा जांच का हिस्सा हो सकती है। इस तरह के मामलों में शुरुआती आरोपों और अंतिम कानूनी निष्कर्ष के बीच अंतर करना जरूरी होता है। किसी व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज होना आरोपों की जांच की शुरुआत को दर्शाता है, न कि आरोपों के न्यायिक रूप से सिद्ध होने को। अदालत में प्रस्तुत होने वाले साक्ष्यों और जांच के निष्कर्ष के आधार पर ही आगे की कानूनी स्थिति तय होगी। छात्र के परिवार के लिए यह घटना बेहद गंभीर और दुखद है। एक युवा छात्र की मौत ने उसके परिवार, सहपाठियों और संस्थान से जुड़े लोगों के बीच चिंता पैदा कर दी है। मामले की जांच अब इस दिशा में भी महत्वपूर्ण होगी कि छात्र किन परिस्थितियों में था और क्या समय रहते किसी तरह की मदद उपलब्ध कराई जा सकती थी। उच्च शिक्षा संस्थानों में संवेदनशील शिकायतों की अहमियत यह घटना एक बार फिर इस बात को रेखांकित करती है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रों की शिकायतों को गंभीरता से लिया जाना कितना जरूरी है। जातिगत भेदभाव, उत्पीड़न या किसी अन्य प्रकार की प्रताड़ना से संबंधित शिकायतों पर समय पर प्रतिक्रिया छात्रों के लिए सुरक्षित शैक्षणिक वातावरण बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। हालांकि, इस मामले में अभी जांच जारी है और घटना से जुड़े सभी तथ्यों का सामने आना बाकी है। पुलिस की जांच यह निर्धारित करने में महत्वपूर्ण होगी कि छात्र की मौत से पहले क्या परिस्थितियां बनी थीं और आरोपी फैकल्टी सदस्य के खिलाफ लगाए गए आरोपों में कितना तथ्यात्मक आधार है। IIT Bombay में बीटेक के दूसरे वर्ष के छात्र की मौत के मामले ने संस्थान के भीतर छात्र कल्याण और सुरक्षा को लेकर गंभीर चर्चा शुरू कर दी है। फिलहाल पुलिस द्वारा दर्ज केस के बाद जांच आगे बढ़ रही है और आने वाले समय में सामने आने वाले साक्ष्यों से मामले की पूरी तस्वीर स्पष्ट होने की उम्मीद है।

    अमेरिका ने नागरिकों से तुरंत ईरान छोड़ने को कहा, उड़ानों और सीमा मार्गों में व्यवधान की चेतावनी

    Yugcharan News / 21-09-2026 नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने ईरान में मौजूद अपने नागरिकों को तत्काल देश छोड़ने की सलाह दी है। अमेरिकी सरकार ने ईरान की यात्रा के खिलाफ अपनी कड़ी चेतावनी दोहराते हुए कहा है कि मौजूदा सुरक्षा स्थिति तेजी से बदल सकती है और इसके कारण उड़ानें रद्द होने, हवाई क्षेत्र बंद होने तथा सीमा मार्गों पर अचानक बदलाव जैसी परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं। ईरान में अमेरिकी वर्चुअल दूतावास की ओर से जारी ताजा सुरक्षा अलर्ट में अमेरिकी नागरिकों से ईरान की यात्रा किसी भी कारण से नहीं करने को कहा गया है। वहीं, जो अमेरिकी नागरिक पहले से ईरान में मौजूद हैं, उन्हें जल्द से जल्द वहां से निकलने की सलाह दी गई है। अमेरिकी प्रशासन का यह अलर्ट ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ा हुआ है और पश्चिम एशिया के विभिन्न हिस्सों में सैन्य गतिविधियों को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं। वॉशिंगटन की ओर से ईरान पर सैन्य और समुद्री दबाव बनाए रखने के बीच ईरानी अधिकारियों ने भी क्षेत्र में अमेरिकी हितों के खिलाफ जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है। अमेरिकी नागरिकों को ईरान की यात्रा से बचने की सलाह अमेरिका ने अपने नागरिकों को ईरान की यात्रा न करने की स्पष्ट सलाह दी है। देश में पहले से मौजूद अमेरिकी नागरिकों को भी उपलब्ध वाणिज्यिक परिवहन साधनों के जरिए जल्द से जल्द बाहर निकलने का आग्रह किया गया है। सुरक्षा अलर्ट में कहा गया है कि क्षेत्र की स्थिति जटिल बनी हुई है और हालात तेजी से बदल सकते हैं। ऐसे में यात्रियों को अचानक उड़ान रद्द होने या हवाई मार्ग बंद होने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। अमेरिकी मिशन ने नागरिकों से हवाई अड्डों, एयरलाइनों और सीमा चौकियों से संबंधित नवीनतम जानकारी पर लगातार नजर रखने को कहा है। ईरान से जमीन के रास्ते किसी दूसरे देश में जाने वाले यात्रियों को यह भी सलाह दी गई है कि वे संबंधित देश की प्रवेश और यात्रा संबंधी आवश्यकताओं की पहले से जांच कर लें। उड़ानों और हवाई क्षेत्र पर असर की आशंका अमेरिकी चेतावनी में सबसे महत्वपूर्ण चिंताओं में से एक हवाई यात्रा में संभावित व्यवधान है। सैन्य तनाव बढ़ने की स्थिति में किसी भी समय हवाई क्षेत्र बंद किया जा सकता है या उड़ानों के संचालन में बदलाव किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में ईरान से बाहर निकलने वाले विदेशी नागरिकों के लिए उपलब्ध विकल्प सीमित हो सकते हैं। यदि कई उड़ान मार्ग एक साथ प्रभावित होते हैं, तो यात्रियों को लंबे समय तक वैकल्पिक परिवहन की प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है। अमेरिकी सरकार ने अपने नागरिकों को इसलिए सलाह दी है कि वे यात्रा योजनाओं को अंतिम रूप देने से पहले एयरलाइनों और संबंधित अधिकारियों से ताजा जानकारी प्राप्त करें। सीमा पार करने वाले लोगों को भी संभावित बदलावों के लिए तैयार रहने को कहा गया है। पश्चिम एशिया के व्यापक तनाव का असर अमेरिका ने अपने सुरक्षा अलर्ट में ईरान समर्थित हूती समूह की गतिविधियों का भी उल्लेख किया है। अमेरिकी सरकार के अनुसार, ईरान समर्थित हूतियों ने सऊदी अरब के खिलाफ सैन्य गतिविधियां की हैं, जिनमें नागरिक हवाई अड्डों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं भी शामिल हैं। अमेरिकी चेतावनी में कहा गया है कि मौजूदा सैन्य संघर्ष तेजी से बढ़ सकता है। इसी कारण अमेरिका अपने नागरिकों से क्षेत्र में अत्यधिक सतर्क रहने का आग्रह कर रहा है। हूतियों की गतिविधियों के कारण पहले भी लाल सागर, अरब प्रायद्वीप और आसपास के क्षेत्रों में सुरक्षा चिंताएं बढ़ी हैं। इन घटनाओं का असर केवल सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि व्यापारिक जहाजों, विमानन मार्गों और क्षेत्रीय परिवहन व्यवस्था पर भी चिंता पैदा हुई है। अमेरिकी ठिकानों और संस्थानों को भी खतरे की चेतावनी अमेरिकी सरकार ने अपने नागरिकों को विदेशों में अमेरिकी हितों से जुड़े स्थानों को लेकर भी सावधान किया है। सुरक्षा अलर्ट में कहा गया है कि अमेरिकी राजनयिक सुविधाओं को अतीत में निशाना बनाया गया है और ईरान या उसके समर्थक समूह विदेशों में अमेरिकी हितों, कारोबार और संस्थानों को निशाना बना सकते हैं। अमेरिकी नागरिकों को ऐसे स्थानों से दूरी बनाए रखने की सलाह दी गई है जो सार्वजनिक रूप से अमेरिका से जुड़े हुए माने जाते हैं। इसके अलावा, नागरिकों को प्रदर्शन, बड़े जमावड़े और उन इलाकों से दूर रहने को कहा गया है जहां पुलिस या सुरक्षा बलों की भारी मौजूदगी हो। अमेरिकी अधिकारियों ने लोगों को कम प्रोफाइल रखने और स्थानीय सुरक्षा परिस्थितियों पर लगातार नजर रखने की सलाह दी है। Smart Traveler Enrollment Program में पंजीकरण की सलाह अमेरिकी मिशन ने ईरान और आसपास के क्षेत्र में मौजूद अपने नागरिकों से Department of State के Smart Traveler Enrollment Program यानी STEP में पंजीकरण कराने का भी आग्रह किया है। STEP के माध्यम से विदेश यात्रा कर रहे अमेरिकी नागरिकों को सुरक्षा और यात्रा संबंधी अपडेट मिल सकते हैं। किसी आपात स्थिति में यह कार्यक्रम अमेरिकी राजनयिक अधिकारियों को अपने नागरिकों से संपर्क करने में भी मदद करता है। अमेरिकी सरकार ने नागरिकों से आधिकारिक सूचनाओं पर नजर रखने और सुरक्षा संबंधी निर्देशों का पालन करने को कहा है। खासकर उन लोगों के लिए यह सलाह महत्वपूर्ण मानी जा रही है जो तनाव वाले इलाकों में मौजूद हैं और देश छोड़ने की योजना बना रहे हैं। हवाई हमले की स्थिति में सावधानी बरतने के निर्देश अमेरिकी सुरक्षा अलर्ट में संभावित हवाई हमले की स्थिति के लिए भी नागरिकों को कुछ सावधानियां बताई गई हैं। अमेरिकियों को निर्देश दिया गया है कि हवाई हमले की स्थिति में खिड़कियों और कांच के दरवाजों से दूर रहें। उन्हें गिरे हुए मलबे से बचने और आधिकारिक संचार माध्यमों से जारी निर्देशों पर ध्यान देने को कहा गया है। ऐसी सलाह इस संभावना को ध्यान में रखकर दी गई है कि सैन्य गतिविधियां बढ़ने पर आम नागरिक क्षेत्रों और बुनियादी ढांचे पर भी असर पड़ सकता है। किसी संघर्ष की स्थिति में हवाई अड्डे, सड़कें और सीमा मार्ग अचानक प्रभावित हो सकते हैं। सऊदी अरब के लिए भी जारी हो चुकी है सुरक्षा चेतावनी ईरान को लेकर जारी ताजा अमेरिकी चेतावनी से पहले सऊदी अरब के संबंध में भी अमेरिकी मिशन ने सुरक्षा संबंधी निर्देश जारी किए थे। रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब में अमेरिकी सरकारी कर्मचारियों को ताइफ और यानबू जैसे स्थानों की यात्रा के लिए विशेष अनुमति लेने को कहा गया था। यह कदम क्षेत्र में बढ़ती सुरक्षा चिंताओं के बीच उठाया गया। सऊदी अधिकारियों ने भी इससे पहले रियाद की ओर बैलिस्टिक मिसाइल दागे जाने के बाद हवाई खतरे को लेकर आपात चेतावनी जारी की थी। सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन के अनुसार, मिसाइल को बीच रास्ते में रोक दिया गया था। इसके अलावा बिश, ताइफ, फरासन और यानबू में नागरिकों और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने के प्रयासों की भी जानकारी सामने आई थी। क्षेत्रीय तनाव पर अमेरिका की बढ़ती चिंता ईरान को लेकर अमेरिकी चेतावनी ऐसे समय में आई है जब पश्चिम एशिया में कई मोर्चों पर तनाव बना हुआ है। अमेरिका और ईरान के बीच पहले से मौजूद राजनीतिक और सैन्य मतभेदों के साथ-साथ क्षेत्र में ईरान समर्थित समूहों की गतिविधियां भी सुरक्षा समीकरण को प्रभावित कर रही हैं। अमेरिकी सरकार की ताजा सलाह से संकेत मिलता है कि वॉशिंगटन अपने नागरिकों के लिए संभावित जोखिम को गंभीरता से ले रहा है। हालांकि, सुरक्षा स्थिति आगे किस दिशा में जाएगी, यह क्षेत्र में होने वाले आगामी घटनाक्रम पर निर्भर करेगा। फिलहाल अमेरिकी नागरिकों से ईरान की यात्रा से पूरी तरह बचने और वहां मौजूद नागरिकों से तत्काल बाहर निकलने की अपील की गई है। साथ ही उन्हें हवाई यात्रा, सीमा चौकियों और स्थानीय सुरक्षा परिस्थितियों में अचानक होने वाले बदलावों के लिए तैयार रहने को कहा गया है।   अमेरिका की यह चेतावनी पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच नागरिकों की सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंता को दर्शाती है। आने वाले दिनों में क्षेत्र में सैन्य और राजनयिक घटनाक्रम इस बात को प्रभावित कर सकते हैं कि यात्रा, हवाई यातायात और सीमा मार्गों की स्थिति किस तरह बदलती है।

    जयपुर महानगर में 21 सितंबर को निकलेगी ‘लोकमंथन यात्रा’ लोक संस्कृति, लोक परंपरा और लोक चेतना के विविध रंगों से सजेगा जयपुर

    जयपुर। लोकमंथन 2026 के अंतर्गत ‘लोकमंथन यात्रा—जयपुर महानगर’ का आयोजन सोमवार, 21 सितंबर 2026 को किया जाएगा। लोकमंथन यात्रा पूरे राजस्थान में चल रही है और जयपुर महानगर में इसका प्रवेश लोक परंपरा, लोक संस्कृति और भारतीय ज्ञान-परंपरा की विविध अभिव्यक्तियों के साथ होगा। यात्रा का शुभारंभ प्रातः 8 बजे श्री गोविंद देव जी मंदिर से होगा। उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी यात्रा को रवाना करेंगी। यात्रा हवा महल, बड़ी चौपड़, अल्बर्ट हॉल होते हुए महारानी कॉलेज पहुँचेगी, जहाँ प्रातः 10 बजे यात्रा का स्वागत एवं विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रारंभ होंगे। यात्रा के दौरान पारंपरिक खेलों के खिलाड़ी एवं अखाड़ों के पहलवान आगे-आगे चलेंगे। मलखम्ब एवं पारंपरिक खेलों का प्रदर्शन भी आकर्षण का केंद्र रहेगा। यात्रा में लोक परंपरा के ध्वज, लोक वाद्य, पारंपरिक वेशभूषा तथा विभिन्न सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से राजस्थान की जीवंत लोक संस्कृति की झलक देखने को मिलेगी। महारानी कॉलेज में लोक संस्कृति का विविध रंग महारानी कॉलेज परिसर में यात्रा का पारंपरिक वेशभूषा एवं भारतीय रीति-रिवाजों के साथ स्वागत किया जाएगा। विद्यालय की बालिकाओं द्वारा तिलक, कच्छी घोड़ी नृत्य, शहनाई वादन तथा ढोल-नगाड़ों के साथ स्वागत किया जाएगा। मुख्य सभागार में वैदिक मंगलाचरण, लोक नृत्य, माँड़ गायन, भवई, चरी एवं कालबेलिया नृत्य, कच्छी घोड़ी और कठपुतली नृत्य, लोकगीत, लोक साहित्य एवं लोक संस्कृति पर व्याख्यान सहित अनेक कार्यक्रम होंगे। ‘लोक में भारत’ तथा ‘लोक साहित्य और संस्कृति’ जैसे विषयों पर संवाद एवं व्याख्यान भी आयोजित होंगे। यात्रा में लोकदेवताओं एवं लोकनायकों की झांकियाँ भी विशेष आकर्षण रहेंगी। बाबा रामदेव जी, वीर तेजाजी तथा संत रविदास जी से जुड़ी सांस्कृतिक एवं प्रदर्शनी झांकियों के माध्यम से लोक आस्था, सामाजिक समरसता और लोक चेतना के विभिन्न पक्षों को सामने रखा जाएगा। परिसर में राजस्थान की लोक परंपराओं और वीर-वीरांगनाओं से संबंधित प्रदर्शनियाँ भी लगाई जाएँगी। तीन मंचों पर होंगे विविध आयोजन महारानी कॉलेज में मुख्य सभागार के साथ सेमिनार हॉल एवं खुले मंच पर भी कार्यक्रम होंगे। सेमिनार हॉल में जयपुर की लोक कला एवं संस्कृति पर प्रश्नोत्तरी, ‘लोक परम्पराएँ’ पर लोक संवाद तथा ‘हम भारत के लोग—हमारी भाषा, हमारी पहचान’ विषय पर गोष्ठी आयोजित होगी। खुले मंच पर संस्कृत संभाषण, जादू, लोक रंग, लोक कथा, लोक कविता, लोक स्मृतियाँ, ‘हम भारत के लोग : संविधान और लोक संस्कृति का समन्वय’ जैसे विषयों पर कार्यक्रम होंगे। इतिहास संकलन समिति द्वारा इतिहास लेखन की लोक परंपरा एवं वंशावली का भी प्रस्तुतीकरण किया जाएगा। परिसर के विभिन्न उद्यानों में लोक कला, लोक विज्ञान, भारतीय संविधान, गुरुकुल एवं भारतीय शिक्षा परंपरा, राजस्थान की वीर-वीरांगनाओं तथा औषधीय पौधों से संबंधित प्रदर्शनियाँ लगाई जाएँगी। साथ ही साहित्य केंद्र और लोक संस्कृति से जुड़े अन्य स्टॉल भी रहेंगे। खेल मैदान में कबड्डी, रस्साकशी, तीरंदाजी सहित पारंपरिक खेलों की गतिविधियाँ आयोजित की जाएँगी। आयोजन समिति ने जयपुर के प्रबुद्ध नागरिकों, लोक संस्कृति एवं परंपरा प्रेमियों, विद्यार्थियों और शहरवासियों से लोकमंथन यात्रा में सहभागी बनने तथा राजस्थान की समृद्ध लोक परंपरा के इस उत्सव का साक्षी बनने का आह्वान किया है।  

    रक्तदान शिविर का आयोजन, 110 यूनिट रक्त संग्रहित

    स्वर्गीय मदनलाल निर्वाण की प्रथम पुण्यतिथि के अवसर पर आज दिनांक 20 सितंबर 2026 को ग्रीन अर्थ ऑर्गेनाइजेशन सोसाइटी के तत्वावधान में राजकीय जयपुरिया चिकित्सालय, जयपुर के सहयोग से काली कमली वाली बगीची, झालाना में रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया। शिविर में बड़ी संख्या में युवाओं एवं क्षेत्रवासियों ने उत्साहपूर्वक भाग लेते हुए रक्तदान किया। इस दौरान कुल 110 यूनिट रक्त संग्रहित किया गया। कार्यक्रम में नवनिर्वाचित पार्षद सुमन रमेश भाटी, राजकुमार निर्वाण एवं उनकी टीम, संस्था के सचिव डॉ. अशोक सहित अनेक समाजसेवी एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। रक्तदान शिविर के माध्यम से जरूरतमंद मरीजों के लिए रक्त उपलब्ध कराने का महत्वपूर्ण प्रयास किया गया। आयोजकों ने सभी रक्तदाताओं एवं सहयोगियों का आभार व्यक्त किया।