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    अबू धाबी में यूक्रेन–रूस शांति वार्ता का दूसरा दौर शुरू, मतभेद अब भी बरकरार

    1 month ago

    यूक्रेन और रूस के बीच जारी लंबे सैन्य संघर्ष को समाप्त करने के प्रयासों के तहत अमेरिका की मध्यस्थता में शांति वार्ता का दूसरा दौर बुधवार को संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी अबू धाबी में शुरू हुआ। यह त्रिपक्षीय वार्ता ऐसे समय पर हो रही है, जब दोनों देशों के बीच तनाव बना हुआ है और हालिया घटनाक्रमों ने कूटनीतिक प्रक्रिया को और जटिल बना दिया है।

    यूक्रेन के शीर्ष वार्ताकार और राष्ट्रीय सुरक्षा एवं रक्षा परिषद के सचिव रुस्तम उमेरोव ने पुष्टि की कि बातचीत यूक्रेन, अमेरिका और रूस के प्रतिनिधिमंडलों की मौजूदगी में शुरू हुई है। उन्होंने बताया कि मुख्य बैठक के साथ-साथ अलग-अलग कार्य समूहों में भी चर्चा होगी, जिनमें विशिष्ट मुद्दों पर विचार किया जाएगा। इसके बाद साझा सत्र में सभी बिंदुओं को समन्वित करने की योजना है।

    हालिया घटनाओं की छाया में वार्ता

    यह वार्ता ऐसे समय में शुरू हुई है जब यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की ने रूस पर आरोप लगाया है कि उसने अमेरिका समर्थित ऊर्जा संघर्षविराम का लाभ उठाकर हथियारों का भंडारण किया और इसके बाद यूक्रेन पर भारी मिसाइल हमले किए। यूक्रेन का कहना है कि हाल के दिनों में उस पर बैलिस्टिक मिसाइलों से बड़े पैमाने पर हमले हुए, जिससे शांति प्रयासों की गंभीरता पर सवाल खड़े हुए हैं।

    इसके बावजूद, तीनों पक्षों ने बातचीत जारी रखने का फैसला किया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि कूटनीतिक रास्ता अभी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। अमेरिका पिछले एक वर्ष से दोनों देशों पर समझौते के लिए दबाव बना रहा है, ताकि चार साल से जारी इस संघर्ष को किसी समाधान तक पहुंचाया जा सके।

    जमीन और सुरक्षा पर सबसे बड़े मतभेद

    वार्ता के केंद्र में सबसे बड़ा विवाद क्षेत्रीय नियंत्रण को लेकर है। रूस चाहता है कि यूक्रेन उन इलाकों से अपनी सेना वापस बुलाए, जिन पर वह अभी भी नियंत्रण बनाए हुए है, खासकर पूर्वी डोनेत्स्क क्षेत्र के कुछ हिस्सों से। इन इलाकों को यूक्रेन की मजबूत रक्षा पंक्ति माना जाता है और यहां से पीछे हटना कीव के लिए रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील विषय है।

    दूसरी ओर, यूक्रेन ने किसी भी एकतरफा सैन्य वापसी को सिरे से खारिज कर दिया है। कीव का स्पष्ट रुख है कि संघर्ष को मौजूदा अग्रिम मोर्चे पर ही स्थिर किया जाए और भविष्य में किसी राजनीतिक समाधान पर बातचीत की जाए। यूक्रेनी नेतृत्व का मानना है कि जमीन छोड़ना देश की संप्रभुता और सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है।

    एक और अहम मुद्दा ज़ापोरिज़िया परमाणु ऊर्जा संयंत्र का है, जो यूरोप का सबसे बड़ा परमाणु संयंत्र माना जाता है और फिलहाल रूसी नियंत्रण वाले क्षेत्र में स्थित है। इस संयंत्र की सुरक्षा और संचालन को लेकर दोनों पक्षों के बीच सहमति बनना अब भी मुश्किल नजर आ रहा है।

    कब्जे वाले क्षेत्र और सैन्य स्थिति

    वर्तमान स्थिति में रूस यूक्रेन के लगभग 20 प्रतिशत क्षेत्र पर नियंत्रण बनाए हुए है, जिसमें क्रीमिया और पूर्वी डोनबास के कुछ हिस्से शामिल हैं। सैन्य विश्लेषकों के अनुसार, वर्ष 2024 की शुरुआत से अब तक रूसी बलों ने यूक्रेनी क्षेत्र में सीमित लेकिन क्रमिक बढ़त हासिल की है। हालांकि, यह बढ़त क्षेत्रफल के लिहाज से बहुत बड़ी नहीं मानी जा रही, फिर भी इसका राजनीतिक और सैन्य महत्व है।

    यूक्रेन के भीतर जनमत भी किसी समझौते के लिए अनुकूल नहीं दिख रहा है। विभिन्न सर्वेक्षणों से संकेत मिलता है कि बड़ी संख्या में यूक्रेनी नागरिक ऐसे किसी भी समझौते के खिलाफ हैं, जिसमें रूस को स्थायी रूप से जमीन सौंपने की बात हो। राजधानी कीव में कई नागरिकों का कहना है कि मौजूदा वार्ता से किसी बड़े नतीजे की उम्मीद कम है, क्योंकि दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर अड़े हुए हैं।

    पहले दौर के बाद दूसरी कोशिश

    अबू धाबी में यह दूसरा दौर पिछले महीने हुए पहले चरण के बाद हो रहा है, जो दोनों देशों के बीच सार्वजनिक रूप से हुई शुरुआती सीधी बातचीत थी। पहले दौर में किसी ठोस नतीजे की घोषणा नहीं हुई थी, लेकिन इसे संवाद की दिशा में एक अहम कदम माना गया था।

    विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा वार्ता में भी तत्काल युद्धविराम या अंतिम समझौते की संभावना कम है। हालांकि, लगातार बातचीत जारी रहना इस बात का संकेत है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संघर्ष को कूटनीतिक तरीके से सुलझाने की कोशिशें अब भी जारी हैं।

     

    अधिकारियों के अनुसार, महिलाओं और बच्चों सहित आम नागरिकों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दे भी चर्चा में शामिल हैं। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि यह दूसरा दौर दोनों देशों को किसी साझा आधार के करीब ला पाता है या नहीं। फिलहाल, दुनिया की नजरें अबू धाबी में चल रही इस वार्ता पर टिकी हुई हैं, जहां से यूरोप के सबसे बड़े संघर्ष के भविष्य की दिशा तय हो सकती है।

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