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    अजमेर: गुर्जर समाज के शौर्य और दानशीलता का संगम, प्रतिभाओं के सारथियों का हुआ अभिनंदन

    14 hours ago

    मालासेरी डूंगरी के मुख्य पुजारी हेमराज पोसवाल की उपस्थिति ने कार्यक्रम में फूंकी आध्यात्मिक ऊर्जा

    अजमेर। राजस्थान की हृदयस्थली अजमेर में आयोजित जिला स्तरीय गुर्जर प्रतिभा सम्मान समारोह के अंतर्गत भामाशाहों के सम्मान में एक भव्य कार्यक्रम संपन्न हुआ। यह आयोजन केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि समाज के उन स्तंभों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का जरिया बना, जिन्होंने युवाओं के भविष्य को संवारने में अपना निस्वार्थ योगदान दिया है। कार्यक्रम की दिव्यता तब और बढ़ गई जब देवनारायण भगवान की अंतरराष्ट्रीय जन्मस्थली, मालासेरी डूंगरी के मुख्य पुजारी हेमराज पोसवाल ने समारोह में शिरकत की।

    आध्यात्मिक चेतना और सामाजिक उत्थान का मिलन

    समारोह का आरंभ 'जय जय देव, घर घर देव' के गगनभेदी जयघोष के साथ हुआ। देवनारायण भगवान, साढ़ू माता और मालासेरी डूंगरी की पावन शक्ति को नमन करते हुए समाज की एकजुटता पर बल दिया गया। मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित हेमराज पोसवाल का स्वागत पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ किया गया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि शिक्षा और संस्कार ही समाज की असली पूंजी है और जो लोग इस पूंजी को बढ़ाने में मदद करते हैं, वे वंदनीय हैं।

    भामाशाहों का समर्पण: समाज की प्रगति का आधार

    इस विशेष सत्र में उन दानदाताओं और भामाशाहों को मंच पर सम्मानित किया गया, जिनके आर्थिक और नैतिक सहयोग से जिला स्तरीय प्रतिभा सम्मान समारोह का सफल आयोजन संभव हो पाया। वक्ताओं ने रेखांकित किया कि प्रतिभाएं अक्सर संसाधनों के अभाव में दब जाती हैं, लेकिन अजमेर के इन भामाशाहों ने आगे आकर यह सिद्ध कर दिया कि समाज अपने होनहारों के साथ मजबूती से खड़ा है।

    कार्यक्रम के प्रमुख बिंदु:

     * सांस्कृतिक गौरव: मालासेरी डूंगरी के पुजारी की उपस्थिति ने युवाओं को अपनी जड़ों और गौरवशाली इतिहास से जुड़ने की प्रेरणा दी।

     * सम्मान की परंपरा: सहयोगियों को स्मृति चिह्न और साफा भेंट कर उनके त्याग को सराहा गया।

     * नया संकल्प: उपस्थित जनसमूह ने आने वाले समय में शैक्षणिक क्रांति लाने और सामाजिक बुराइयों को जड़ से मिटाने का संकल्प लिया।

    एकजुटता की नई मिसाल

    अजमेर जिले के विभिन्न कोनों से आए समाजबंधुओं ने इस आयोजन को ऐतिहासिक बताया। 'जय जय देव' के नारों के बीच यह संदेश स्पष्ट था कि गुर्जर समाज अब संगठित होकर विकास की नई इबारत लिखने को तैयार है। भामाशाहों के सम्मान के इस दौर ने भविष्य के दानदाताओं को भी प्रेरित किया है, ताकि समाज की कोई भी प्रतिभा धन के अभाव में पीछे न रहे।

     

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