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    अमेरिका से महंगा वेनेजुएलाई कच्चा तेल क्यों खरीद रही है रिलायंस? विशेषज्ञ ने उठाए सवाल

    1 day ago

    देश की सबसे बड़ी रिफाइनिंग और ऊर्जा कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज़ द्वारा वेनेजुएला का कच्चा तेल खरीदे जाने को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (CPR) से जुड़े ब्रह्मा चेलानेय ने सवाल उठाया है कि जब मध्य पूर्वी देशों से अपेक्षाकृत सस्ता कच्चा तेल उपलब्ध है, तो रिलायंस अमेरिका के माध्यम से वेनेजुएला का कच्चा तेल क्यों खरीद रही है, जिसकी लागत अधिक बताई जा रही है।

    विशेषज्ञ के अनुसार, यह खरीद सीधे वेनेजुएला से नहीं, बल्कि अमेरिका से की जा रही है। उनका मानना है कि परिवहन और अन्य खर्चों को जोड़ने के बाद यह कच्चा तेल मध्य पूर्व से आने वाले तेल की तुलना में रिलायंस को थोड़ा महंगा पड़ेगा।

    आर्थिक से ज्यादा रणनीतिक संकेत?

    ब्रह्मा चेलानेय ने सोशल मीडिया पर साझा किए गए अपने विचारों में कहा कि इस सौदे का उद्देश्य केवल व्यावसायिक नहीं हो सकता। उनके अनुसार, यह कदम अमेरिका के प्रशासन को एक रणनीतिक संदेश देने जैसा है। उन्होंने कहा कि जब कुल लागत जोड़ी जाती है, तो यह सौदा आर्थिक लाभ से अधिक राजनीतिक और कूटनीतिक संकेत देता नजर आता है।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का भी मानना है कि वैश्विक तेल बाजार में कीमत के साथ-साथ भू-राजनीतिक समीकरण भी बड़ी भूमिका निभाते हैं। ऐसे में बड़े ऊर्जा समूह कई बार दीर्घकालिक संबंधों और रणनीतिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए फैसले लेते हैं।

    जब्त कच्चे तेल की बिक्री का मामला

    चेलानेय के अनुसार, अमेरिका के दबाव में वेनेजुएला में टैंकरों और भंडारण सुविधाओं में मौजूद करोड़ों बैरल कच्चे तेल को वैश्विक बाजार में उतारा जा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह तेल किसी विशेष छूट के बिना, अंतरराष्ट्रीय बाजार दरों पर बेचा जा रहा है।

    उनका कहना है कि यह कच्चा तेल पूरी तरह से बाजार मूल्य पर बेचा जा रहा है, जिससे इसे खरीदने वाली कंपनियों को कीमत के स्तर पर कोई खास राहत नहीं मिल रही। यही कारण है कि मध्य पूर्वी आपूर्तियों की तुलना में यह सौदा महंगा साबित हो सकता है।

    भुगतान व्यवस्था पर भी उठे सवाल

    विशेषज्ञ ने भुगतान प्रक्रिया को लेकर भी अपनी बात रखी। उनके अनुसार, रिलायंस इस कच्चे तेल के लिए सीधे अमेरिकी सरकारी तंत्र को भुगतान नहीं करेगी। इसके बजाय, बिक्री से प्राप्त राशि को वैश्विक बैंकों में अमेरिका द्वारा नियंत्रित खातों में जमा किए जाने की संभावना है।

    कुछ रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि इस व्यवस्था के तहत धन के उपयोग में प्रशासनिक स्तर पर अधिक लचीलापन हो सकता है। हालांकि, इस पूरे ढांचे को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही हैं और इस पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा जारी है।

    विदेशी खरीदारों के लिए जोखिम

    ब्रह्मा चेलानेय ने यह भी चेतावनी दी कि भले ही कुछ मामलों में अंतरराष्ट्रीय खरीदारों को नियामकीय छूट मिलने की बात कही जा रही हो, लेकिन फिर भी कानूनी और नीतिगत जोखिम पूरी तरह समाप्त नहीं होते। ऊर्जा बाजार से जुड़े जानकारों का कहना है कि ऐसे सौदों में नियमों और वैश्विक परिस्थितियों में बदलाव का असर कंपनियों पर पड़ सकता है।

    इसी कारण बड़ी कंपनियां ऐसे सौदों में अतिरिक्त सावधानी बरतती हैं और सभी संभावित जोखिमों का मूल्यांकन करती हैं।

    रिलायंस की रणनीति पर नजर

    रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लंबे समय से अपने कच्चे तेल स्रोतों में विविधता लाने की नीति अपनाती रही है। कंपनी का उद्देश्य किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम करना और वैश्विक स्तर पर आपूर्ति के विकल्प खुले रखना है। विशेषज्ञ मानते हैं कि वेनेजुएला का कच्चा तेल, उसकी गुणवत्ता और रिफाइनिंग अनुकूलता के कारण भी आकर्षक हो सकता है, भले ही इसकी लागत कुछ अधिक क्यों न हो।

    ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि रिलायंस जैसी कंपनियां अल्पकालिक लागत के साथ-साथ दीर्घकालिक रणनीतिक लाभों को भी ध्यान में रखती हैं।

    बाजार और नीति का संतुलन

    यह मामला एक बार फिर दिखाता है कि वैश्विक ऊर्जा व्यापार केवल मांग और कीमत तक सीमित नहीं है। इसमें अंतरराष्ट्रीय संबंध, नीतिगत संकेत और भविष्य की रणनीतियां भी शामिल होती हैं। रिलायंस का यह कदम इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है।

    निष्कर्ष

     

    अमेरिका के माध्यम से वेनेजुएला का कच्चा तेल खरीदने का रिलायंस का फैसला फिलहाल चर्चा का विषय बना हुआ है। जहां कुछ विशेषज्ञ इसे महंगा और प्रतीकात्मक कदम मान रहे हैं, वहीं अन्य इसे दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक रणनीति का हिस्सा बता रहे हैं। आने वाले समय में यह साफ होगा कि यह निर्णय आर्थिक दृष्टि से कितना प्रभावी साबित होता है।

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