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    भारत किसी भी देश से तेल खरीदने के लिए स्वतंत्र है: रूस ने ट्रंप के दावे पर दी प्रतिक्रिया

    1 month ago

    रूस ने स्पष्ट रूप से कहा है कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार किसी भी देश से कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद खरीदने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। यह प्रतिक्रिया अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान के बाद आई है, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि भारत रूसी तेल की खरीद कम कर अमेरिका और संभवतः वेनेजुएला से अधिक तेल खरीदेगा।

    क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने बुधवार को इस विषय पर टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत का तेल आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाना कोई नई बात नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत लंबे समय से रूस के अलावा अन्य देशों से भी तेल और पेट्रोलियम उत्पाद खरीदता रहा है। ऐसे में इसमें कोई असामान्य या अप्रत्याशित बदलाव नहीं देखा जाना चाहिए।

    भारत की ऊर्जा नीति पर रूस का रुख

    पेसकोव ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार के विशेषज्ञ इस तथ्य से भली-भांति परिचित हैं कि रूस भारत का एकमात्र तेल आपूर्तिकर्ता नहीं है। भारत हमेशा से अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न देशों से आयात करता रहा है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि रूस को भारत की ओर से ऐसा कोई औपचारिक संकेत नहीं मिला है, जिससे यह लगे कि भारतीय रिफाइनरियां रूसी तेल की खरीद पूरी तरह बंद करने जा रही हैं।

    रूस के विदेश मंत्रालय ने भी इस विषय पर अपनी स्थिति स्पष्ट की। मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया ज़ाखारोवा ने कहा कि भारत और रूस के बीच हाइड्रोकार्बन व्यापार दोनों देशों के लिए लाभकारी रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह सहयोग अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में स्थिरता बनाए रखने में भी सहायक है और रूस इस क्षेत्र में भारत के साथ सहयोग जारी रखने के लिए तैयार है।

    ट्रंप के बयान और वास्तविकता के बीच अंतर

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में यह संकेत दिया था कि भारत रूसी तेल की जगह अमेरिका से तेल खरीदने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। हालांकि, इस बयान को लेकर कई विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं। रूसी मीडिया और ऊर्जा विश्लेषकों का कहना है कि भारत की तेल जरूरतें इतनी बड़ी हैं कि केवल अमेरिकी आपूर्ति से उन्हें पूरा करना संभव नहीं है।

    ऊर्जा विशेषज्ञ इगोर युश्कोव के अनुसार, अमेरिका जो शेल ऑयल निर्यात करता है, वह अपेक्षाकृत हल्के ग्रेड का होता है, जबकि रूस भारत को अपेक्षाकृत भारी और अधिक सल्फर युक्त ‘यूराल्स’ ग्रेड का तेल सप्लाई करता है। भारतीय रिफाइनरियों की तकनीकी संरचना को देखते हुए केवल एक स्रोत से दूसरे स्रोत पर सीधा बदलाव करना व्यावहारिक और आर्थिक रूप से आसान नहीं है।

    आयात की मात्रा और व्यावहारिक सीमाएं

    रूस आमतौर पर भारत को प्रतिदिन 15 से 20 लाख बैरल कच्चा तेल निर्यात करता रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका इतनी बड़ी मात्रा में तेल की आपूर्ति करने की स्थिति में नहीं है। इसके अलावा, अमेरिकी तेल को अन्य ग्रेड के साथ मिश्रित करने पर अतिरिक्त लागत आती है, जिससे भारत के लिए सीधा विकल्प चुनना मुश्किल हो जाता है।

    युश्कोव ने यह भी याद दिलाया कि वर्ष 2022 में जब रूस ने यूरोपीय और अमेरिकी बाजारों से हटकर एशियाई बाजारों, विशेषकर भारत, की ओर रुख किया था, तब वैश्विक तेल उत्पादन में कटौती हुई थी। इसके परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें तेज़ी से बढ़ीं और कई देशों में ईंधन महंगा हुआ।

    भारत की तेल निर्भरता और रणनीति

    भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 88 प्रतिशत आयात करता है। वर्ष 2021 तक भारत के कुल तेल आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी बेहद कम थी। हालांकि, यूक्रेन संकट के बाद पश्चिमी देशों द्वारा रूस से दूरी बनाने के चलते भारत ने रियायती दरों पर रूसी तेल की खरीद बढ़ाई और वह रूसी कच्चे तेल का एक प्रमुख खरीदार बनकर उभरा।

    हालिया आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2026 के शुरुआती हफ्तों में भारत द्वारा रूसी तेल का आयात कुछ हद तक घटा है, लेकिन यह अभी भी भारत की ऊर्जा जरूरतों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह उतार-चढ़ाव बाजार की परिस्थितियों, कीमतों और लॉजिस्टिक कारणों से जुड़ा हो सकता है, न कि किसी एकतरफा राजनीतिक फैसले से।

    संतुलन बनाए रखने की कोशिश

    कुल मिलाकर, रूस का रुख यह संकेत देता है कि वह भारत की ऊर्जा नीति को व्यावहारिक और बहुपक्षीय दृष्टिकोण से देखता है। भारत भी अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए विभिन्न देशों के साथ संतुलन बनाए रखते हुए आगे बढ़ रहा है। मौजूदा परिस्थितियों में यह स्पष्ट है कि भारत किसी एक आपूर्तिकर्ता पर निर्भर रहने के बजाय विकल्प खुले रखना चाहता है, ताकि घरेलू जरूरतों और वैश्विक बाजार की अनिश्चितताओं के बीच संतुलन कायम रखा जा सके।

     
     
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