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    चुनाव आयोग पर बढ़ता अविश्वास: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के सामने क्यों खड़ा हुआ बड़ा संकट?

    1 hour ago

    Yugcharan News / 01-10-2026

    भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार इस समय देश की चुनावी व्यवस्था से जुड़े एक बड़े विवाद के केंद्र में हैं। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर पहले से चल रही राजनीतिक बहस अब चुनाव आयोग के अंदर दर्ज असहमतियों और निर्णय लेने की प्रक्रिया तक पहुंच गई है।

    भारतीय चुनाव आयोग की तीन सदस्यीय व्यवस्था में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी शामिल हैं। हाल में सामने आई एक जांच रिपोर्ट में दावा किया गया कि संधू और जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। इनमें नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने, फॉर्म में बदलाव और मतदाता डेटा से जुड़े डिजिटल सिस्टम जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं।

    हालांकि, चुनाव आयोग ने आंतरिक मतभेदों की खबरों को पूरी तरह खारिज नहीं किया है, लेकिन उसने यह स्पष्ट किया है कि अलग-अलग विचार किसी संस्थागत निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हो सकते हैं। आयोग का कहना है कि पिछले एक वर्ष में उसके स्तर पर लिए गए अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे।

    SIR बना विवाद का मुख्य केंद्र

    ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में SIR सबसे महत्वपूर्ण और विवादित मुद्दों में से एक बन गया है। यह प्रक्रिया सबसे पहले बिहार में शुरू हुई और बाद में देश के कई राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों तक इसका विस्तार किया गया।

    द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में तैयार की गई ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए हैं। चुनाव आयोग की ओर से इस तरह की प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूचियों को अपडेट करना, डुप्लीकेट नामों तथा अपात्र प्रविष्टियों को हटाना और पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल रखना बताया गया है। दूसरी ओर, विपक्षी दलों और कुछ कार्यकर्ताओं ने आशंका जताई है कि प्रक्रिया के दौरान पात्र मतदाताओं के नाम भी प्रभावित हो सकते हैं।

    यही मुद्दा अब चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली को लेकर उठे सवालों से भी जुड़ गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, दो चुनाव आयुक्तों ने कुछ ऐसे फैसलों पर आपत्ति जताई जिनका संबंध मतदाता पंजीकरण और मतदाता सूची में बदलाव से था।

    दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों से बढ़ी चर्चा

    द इंडियन एक्सप्रेस की जांच के मुताबिक, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने अलग-अलग मौकों पर कुछ प्रक्रियाओं को लेकर अपनी आपत्तियां दर्ज कीं। इनमें नए मतदाताओं के लिए Form 6 में किए गए बदलाव और मतदाता डेटा के केंद्रीकरण से जुड़े सवाल शामिल थे।

    एक रिपोर्ट के अनुसार, SIR से संबंधित कुछ अतिरिक्त घोषणाओं को Form 6 में शामिल किया गया था। इस फॉर्म का इस्तेमाल नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए किया जाता है। रिपोर्ट में कहा गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस तरह के बदलाव के लिए मौजूदा नियमों में संशोधन की आवश्यकता पर सवाल उठाए थे।

    एक अन्य जांच में चुनाव आयोग के डिजिटल सिस्टम ECINet और मतदाता डेटा के केंद्रीकृत नियंत्रण को लेकर भी सवालों का उल्लेख किया गया। रिपोर्ट में दावा किया गया कि कुछ मामलों में राज्य स्तर के अधिकारियों द्वारा की जाने वाली प्रक्रिया पर केंद्रीय डिजिटल सिस्टम का प्रभाव बढ़ गया था।

    इन रिपोर्टों के सामने आने के बाद यह सवाल चर्चा में आया कि तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के भीतर महत्वपूर्ण फैसलों पर किस तरह विचार-विमर्श होता है और असहमति दर्ज होने की स्थिति में अंतिम निर्णय कैसे लिया जाता है।

    चुनाव आयोग ने कहा- मतभेद निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा

    विवाद बढ़ने के बाद चुनाव आयोग ने अपनी स्थिति स्पष्ट की। आयोग ने कहा कि विचारों में अंतर होना किसी भी संस्थागत निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है। आयोग ने यह भी कहा कि SIR सहित पिछले एक वर्ष में लिए गए अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।

    इसके बाद तीनों चुनाव आयुक्तों ने बैठक की और आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली को लेकर कुछ प्रक्रियात्मक बदलावों की घोषणा की। इनमें बैठक के एजेंडे को पहले साझा करना, बैठकों के मिनट्स तैयार करना और अधिकारियों को दिए गए निर्देशों के अनुपालन से जुड़ी प्रक्रिया को स्पष्ट करना शामिल है।

    इस घटनाक्रम के बाद आयोग की ओर से यह संदेश देने की कोशिश की गई कि अलग-अलग अधिकारियों की राय में अंतर को संस्थागत टूट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

    विपक्ष ने उठाए गंभीर सवाल

    दूसरी ओर, विपक्षी दलों ने इस विवाद को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई की मांग तेज कर दी है। कांग्रेस समेत विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और SIR की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।

    सितंबर में कांग्रेस सूत्रों ने कहा था कि विपक्षी दल संसद के दोनों सदनों में मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहे हैं।

    विपक्ष की ओर से यह भी आरोप लगाया गया है कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और स्वतंत्रता से जुड़े सवालों का पर्याप्त समाधान नहीं हुआ है। हालांकि, इन आरोपों को राजनीतिक दलों के दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए। चुनाव आयोग ने अपने फैसलों को कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप बताया है और आंतरिक मतभेदों को सामान्य संस्थागत विचार-विमर्श का हिस्सा कहा है।

    इसी बीच SIR और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच गया है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, अदालत ने मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यप्रणाली और SIR को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दी है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि कुछ महत्वपूर्ण फैसले आयोग के सभी सदस्यों की आवश्यक सहमति के बिना लिए गए। इन आरोपों पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अभी नहीं आया है।

    कौन हैं ज्ञानेश कुमार?

    ज्ञानेश कुमार 1988 बैच के केरल कैडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी रहे हैं। उन्होंने आईआईटी कानपुर से सिविल इंजीनियरिंग में बीटेक किया। अपने प्रशासनिक करियर के दौरान उन्होंने केरल सरकार और केंद्र सरकार में कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया।

    चुनाव आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, उन्होंने केंद्र सरकार में गृह मंत्रालय सहित कई विभागों में जिम्मेदारियां संभालीं। वह जनवरी 2024 में सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हुए और इसके बाद मार्च 2024 में चुनाव आयुक्त नियुक्त किए गए। 19 फरवरी 2025 को उन्होंने भारत के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में कार्यभार संभाला।

    मुख्य चुनाव आयुक्त बनने से पहले कुमार जम्मू-कश्मीर से जुड़े प्रशासनिक मामलों और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण से संबंधित केंद्र सरकार की प्रक्रिया में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा चुके थे। उनके प्रशासनिक करियर में कई संवेदनशील और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण विषय शामिल रहे हैं।

    नियुक्ति प्रक्रिया भी रही चर्चा में

    ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति ऐसे समय हुई जब मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित 2023 का नया कानून पहले से बहस का विषय था।

    इस कानून के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री वाली चयन समिति की व्यवस्था की गई। 2025 में ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति के समय तत्कालीन लोकसभा नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने चयन प्रक्रिया पर आपत्ति दर्ज की थी और संबंधित कानूनी चुनौती पर सुप्रीम कोर्ट के विचार तक नियुक्ति टालने की मांग की थी।

    कानून की संवैधानिक वैधता को लेकर चुनौती भी अदालत में विचाराधीन रही है। यही कारण है कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और उसके सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया पर बहस केवल मौजूदा SIR विवाद तक सीमित नहीं है।

    आगे क्या?

    ज्ञानेश कुमार के सामने अब दो स्तरों पर चुनौती है। पहला, SIR को लेकर जारी राजनीतिक और कानूनी विवाद तथा दूसरा, चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर उठे सवाल।

    आयोग ने कहा है कि अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए और अलग-अलग विचार संस्थागत चर्चा का हिस्सा हैं। वहीं, विपक्षी दलों का कहना है कि दो चुनाव आयुक्तों की लिखित आपत्तियां आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।

    इस बीच चुनाव आयोग ने मतदाता सूची से जुड़े डिजिटल सिस्टम की समीक्षा के लिए भी कदम उठाए हैं। रॉयटर्स के अनुसार, आयोग ने मतदाता सूची के सॉफ्टवेयर की समीक्षा शुरू की है और तकनीकी व्यवस्था की जांच के लिए समिति गठित करने की जानकारी दी है।

    आने वाले दिनों में संसद, सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग से जुड़े घटनाक्रम यह तय करेंगे कि यह विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है। फिलहाल, SIR, मतदाता सूची में बदलाव और चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों ने भारत की चुनावी संस्था की कार्यप्रणाली पर व्यापक सार्वजनिक और राजनीतिक चर्चा को जन्म दिया है।

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