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    पैशन हैज़ नो लिमिट एंड एज इज़ जस्ट ए नंबर: मनीष्का दुबे

    2 months ago

    – स्कूल बैग से लैब नोटबुक तक: जेईसीआरसी ने शुरू किया भारत का रिसर्च रेवोल्यूशन

    –जिज्ञासा से जन्मा नया भारत — "इंडियाज यंग रिसर्चर कॉन्फ्रेंस 2025" ने सेट किए ग्लोबल स्टैंडर्ड


    जयपुर,

    रिसर्च की दुनिया अब तक केवल यूनिवर्सिटी या पीएचडी स्टूडेंट्स तक सीमित मानी जाती थी लेकिन इस पुरानी रिवायत को तोड़ते हुए अब एक नया माइलस्टोन सेट किया गया है। भारतीय शिक्षा के इतिहास में यह पहला मौका है जब स्कूली छात्रों ने आधिकारिक तौर पर रिसर्चर की भूमिका निभाई और एक राष्ट्रीय मंच पर अपने रिसर्च पेपर प्रस्तुत किए। यह ऐतिहासिक और अद्भुत नजारा, 19 व 20 नवम्बर को जेईसीआरसी यूनिवर्सिटी में देखने को मिला जहाँ देश के पहले स्कूली छात्र रिसर्च कांफ्रेंस 'इंडियाज यंग रिसर्चर कॉन्फ्रेंस 2025' का गरिमामयी शुभारंभ हुआ।

    इस आयोजन ने साबित कर दिया कि शौध करने के लिए उम्र नहीं बल्कि जिज्ञासा की जरूरत होती है। नीति आयोग के अटल इनोवेशन मिशन, डिपार्टमेंट ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (डीएसटी) राजस्थान सरकार और एलएंडटी एडूटेक के सहयोग से आयोजित इस महाकुंभ में देश भर के 30 से अधिक स्कूलों ने हिस्सा लिया। मेंटल हेल्थ, इनोवेशन और सस्टेनेबिलिटी जैसे गंभीर विषयों पर मंथन करते इन 250 से ज्यादा नन्हे साइंटिस्ट्स को देखना उपस्थित सभी लोगों के लिए गर्व का क्षण था।

    कांफ्रेंस का मुख्य आकर्षण जोधपुर की 12 वर्षीय यंग इनोवेटर मनिष्का दुबे रहीं। आठवीं कक्षा की छात्रा मनिष्का ने अपने स्टार्टअप के ज़रिए विज़ुअली इंपेयर्ड स्टूडेंट्स के लिए स्मार्ट डिवाइस और बच्चों की सुरक्षा के लिए खास सेफ्टी बैंड तैयार किए हैं। उनकी इस असाधारण प्रतिभा को देखते हुए जेईसीआरसी यूनिवर्सिटी के वाइस चेयरपर्सन अर्पित अग्रवाल ने उन्हें प्रतिष्ठित 'द फ्यूचर ऑफ इंडिया अवार्ड' से सम्मानित किया। मनिष्का ने अपने संबोधन में कहा कि जुनून की कोई सीमा नहीं होती और उम्र सिर्फ एक नंबर है। उन्होंने अपने साथियों को प्रेरित करते हुए बताया कि जब आप कोई काम शुरू करें तो उसे पूरा करके ही दम लें।

    समारोह की मुख्य अतिथी डॉ. जमुना राजेश्वरन (प्रोफेसर एंड हेड, क्लिनिकल न्यूरॉ साइकोलॉजी, कॉग्निटिव न्यूरो साइंस सेंटर, निमहंस, बैंगलोर) ने 12 वर्षीय युवा प्रतिभा (मनिष्का दुबे) को अपना रोल मॉडल बताते हुए कहा कि ज्ञान की कोई उम्र नहीं होती, यह भविष्य की नई परिभाषा है। सस्टेनेबिलिटी को उन्होंने “थीम ऑफ़ एक्शन & रिस्पॉन्सिबिलिटी” बताकर इसे आने वाले दशक का मुख्य ड्राइविंग-फोर्स घोषित किया। उनके अनुसार, भविष्य की हर रिसर्च स्केलेबल, अफ़ोर्डेबल और इनक्लूसिव होनी चाहिए, यही असली इनोवेशन है। मेंटल हेल्थ पर उन्होंने कहा कि आधुनिक दिमाग के केमिकल और स्ट्रक्चरल बदलाव एक नई साइंस हैं, जिन्हें काउंसलिंग से आगे बढ़कर नए टूल्स की जगह बनाती है। कम्युनिटी इंटरवेंशन्स, कल्चरल रिसोर्सेज़ और इंटरजनरेशनल इक्विटी को उन्होंने भविष्य की रिसर्च इकोसिस्टम का कोर बताया। साथ ही युवाओं को संदेश देते हुए कहा, पहले अपना माइंड मजबूत करो, फिर दुनिया की समस्याओं को हल करने निकलो; इंटेग्रिटी ही भविष्य की असली टेक्नोलॉजी है।

    जेईसीआरसी यूनिवर्सिटी के वाइस चेयरपर्सन अर्पित अग्रवाल ने बताया कि यह कॉन्फ्रेंस भारतीय शिक्षा में एक फ्यूचरिस्टिक माइलस्टोन है, जहाँ पहली बार 10वीं–12वीं के छात्र रिसर्चर बने। आज जब भारत केवल 0.64% जीडीपी आर एंड डी पर खर्च कर रहा है, ऐसे में युवा दिमाग ही हमारे सबसे बड़े इनोवेशन ड्राइवर हैं, क्योंकि उनमें न असफलता का डर होता है और न ही सामाजिक बाधाएँ। यह प्लेटफ़ॉर्म छात्रों के लिए ग्लोबल यूनिवर्सिटी अवसरों का एक वाइल्डकार्ड साबित होगा। जेईसीआरसी आने वाले वर्षों में इस रिसर्च कल्चर को नई ऊँचाइयों तक ले जाने के लिए प्रतिबद्ध है। करियर डेवलपमेंट एंड गाइडेंस सेल के माध्यम से हम स्कूलों तक पहुँचकर साइकोमेट्रिक टेस्ट द्वारा छात्रों को फ्यूचर-रेडी बनाएँगे। हम मानते हैं, युवा सिर्फ भविष्य नहीं, बल्कि भारत का एआई-रेडी, इनोवेटिव वर्तमान हैं।

    कॉन्फ्रेंस कोऑर्डिनेटर रोमा चेलानी के अनुसार, यह अनोखा प्रयास पहली बार स्कूल स्तर की रिसर्च को एक संस्थागत पहचान दे रहा है। यह महज़ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत में रिसर्च-ओरिएंटेड शिक्षा की नई शुरुआत और भविष्य की मज़बूत बुनियाद रखने वाला कदम है।

    कांफ्रेंस के समापन पर बेहतरीन रिसर्च पेपर्स और प्रस्तुतियों के लिए छात्रों को एक लाख तक के पुरस्कारों से नवाजा गया। इसके अलावा चयनित रिसर्च पेपर्स को आईएसबीएन नंबर वाले एक विशेष वॉल्यूम में प्रकाशित करने की घोषणा भी की गई जो इन स्कूली छात्रों के अकादमिक जीवन की एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।

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