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    डॉलर के मुकाबले रुपये में मजबूती, शुरुआती कारोबार में 12 पैसे की बढ़त; वैश्विक संकेतों और घरेलू चुनौतियों के बीच बाजार सतर्क

    2 hours ago

    भारतीय मुद्रा रुपये ने सोमवार को शुरुआती कारोबार में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले मजबूती दर्ज की और 12 पैसे की बढ़त के साथ 90.66 के स्तर पर पहुंच गई। यह सुधार ऐसे समय में देखने को मिला है, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर में नरमी दिखाई दी और प्रमुख वैश्विक मुद्राओं के मुकाबले ग्रीनबैक कमजोर हुआ। हालांकि, विदेशी पूंजी की लगातार निकासी, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और वैश्विक स्तर पर जारी अनिश्चित परिस्थितियों के कारण निवेशकों की सतर्कता बनी हुई है।

    विदेशी मुद्रा बाजार के जानकारों के अनुसार, रुपये में यह मजबूती मुख्य रूप से डॉलर इंडेक्स में आई गिरावट का नतीजा है। डॉलर इंडेक्स, जो अमेरिकी मुद्रा की ताकत को छह प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मुद्राओं के मुकाबले मापता है, सोमवार को गिरकर 98.99 के स्तर पर आ गया। इससे उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं, विशेष रूप से भारतीय रुपये को कुछ राहत मिली।

    शुरुआती कारोबार में रुपये की चाल

    अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में सोमवार सुबह रुपये की शुरुआत 90.68 के स्तर पर हुई। शुरुआती सौदों के दौरान इसमें और सुधार देखने को मिला और यह 90.66 के स्तर पर पहुंच गया। यह पिछले कारोबारी सत्र के मुकाबले 12 पैसे की बढ़त को दर्शाता है।

    गौरतलब है कि इससे पहले शुक्रवार को रुपया भारी दबाव में रहा था और 44 पैसे की गिरावट के साथ लगभग अपने निचले स्तर 90.78 पर बंद हुआ था। इसके पहले के दो कारोबारी सत्रों में भी रुपये में कुल 17 पैसे की कमजोरी दर्ज की गई थी। इस तरह, हालिया मजबूती को बाजार विशेषज्ञ एक अस्थायी राहत के रूप में देख रहे हैं, न कि किसी स्थायी रुझान के रूप में।

    डॉलर में नरमी से मिला सहारा

    विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी डॉलर में आई बिकवाली ने रुपये को सहारा दिया है। हाल के दिनों में अमेरिका की व्यापार नीति से जुड़े बयानों ने वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ाई है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा यूरोपीय देशों पर संभावित शुल्क लगाने की घोषणा के बाद डॉलर पर दबाव बढ़ा। इन बयानों से निवेशकों के बीच अनिश्चितता का माहौल बना और उन्होंने सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख किया, जिससे डॉलर की मांग कुछ हद तक घटी।

    इसका सीधा असर उभरते बाजारों की मुद्राओं पर पड़ा, जिनमें भारतीय रुपया भी शामिल है। डॉलर में आई कमजोरी के चलते रुपये को कुछ राहत मिली और यह शुरुआती कारोबार में मजबूती के साथ कारोबार करता दिखा।

    कच्चे तेल की कीमतें बनीं चिंता का कारण

    हालांकि, रुपये की मजबूती पर कच्चे तेल की कीमतों का दबाव बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें सोमवार को वायदा कारोबार में 0.17 प्रतिशत की बढ़त के साथ 64.24 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गईं।

    भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेजी से देश के चालू खाते पर दबाव बढ़ता है और रुपये पर नकारात्मक असर पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो रुपये की मजबूती को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

    विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी

    घरेलू मुद्रा बाजार पर विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की गतिविधियों का भी गहरा असर पड़ता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, विदेशी निवेशकों ने शुक्रवार को भारतीय शेयर बाजार से करीब 4,346 करोड़ रुपये की निकासी की।

    विदेशी पूंजी के लगातार बाहर जाने से न केवल शेयर बाजार में दबाव बढ़ता है, बल्कि रुपये पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। जब विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों से धन निकालते हैं, तो उन्हें डॉलर की आवश्यकता होती है, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव आता है।

    शेयर बाजार में गिरावट

    सोमवार को घरेलू शेयर बाजारों में भी कमजोरी देखने को मिली। बीएसई सेंसेक्स 482.80 अंकों या 0.58 प्रतिशत की गिरावट के साथ 83,087.55 के स्तर पर कारोबार करता दिखा। वहीं, एनएसई निफ्टी 129.30 अंकों या 0.50 प्रतिशत की गिरावट के साथ 25,565.05 के स्तर पर आ गया।

    विश्लेषकों के अनुसार, शेयर बाजार में यह गिरावट वैश्विक संकेतों, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण देखने को मिली। शेयर बाजार में कमजोरी का असर अक्सर मुद्रा बाजार पर भी पड़ता है, क्योंकि निवेशकों का भरोसा कमजोर होने पर वे सुरक्षित परिसंपत्तियों की ओर रुख करते हैं।

    वैश्विक परिस्थितियों का असर

    वर्तमान समय में वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक घटनाक्रम का असर सभी प्रमुख मुद्राओं पर पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार नीतियों से जुड़ी अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और केंद्रीय बैंकों की मौद्रिक नीतियां मुद्रा बाजार की दिशा तय कर रही हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक वैश्विक स्तर पर स्थिरता नहीं आती और विदेशी निवेशकों का भरोसा बहाल नहीं होता, तब तक रुपये में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। हालांकि, भारत की मजबूत आर्थिक बुनियाद, बड़े विदेशी मुद्रा भंडार और नियंत्रित मुद्रास्फीति रुपये को लंबी अवधि में सहारा दे सकती है।

    आगे का रुख क्या होगा?

    मुद्रा बाजार के जानकारों का कहना है कि आने वाले दिनों में रुपये की चाल कई कारकों पर निर्भर करेगी। इनमें डॉलर की वैश्विक स्थिति, कच्चे तेल की कीमतें, विदेशी निवेशकों का रुख और घरेलू आर्थिक आंकड़े प्रमुख होंगे।

    यदि डॉलर में कमजोरी का रुझान जारी रहता है और कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता आती है, तो रुपये को और मजबूती मिल सकती है। वहीं, अगर वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ती है या विदेशी पूंजी की निकासी तेज होती है, तो रुपये पर फिर से दबाव बन सकता है।

    निष्कर्ष

     

    कुल मिलाकर, सोमवार को रुपये में दर्ज की गई 12 पैसे की बढ़त ने बाजार को कुछ राहत जरूर दी है, लेकिन चुनौतियां अभी भी बरकरार हैं। विदेशी निवेशकों की सतर्कता, ऊंची कच्चे तेल की कीमतें और वैश्विक घटनाक्रम रुपये की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाते रहेंगे। निवेशकों और कारोबारियों की नजर आने वाले दिनों में वैश्विक संकेतों और घरेलू आर्थिक घटनाओं पर बनी रहेगी, जो भारतीय मुद्रा के भविष्य के रुख को निर्धारित करेंगी।

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