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    पौराणिक गाथा: जब धार नगरी के जमाई बने भगवान देवनारायण, जानें पीपलदे संग विवाह की अनूठी कथा

    1 hour ago

    गढ़ गाजणा से धार नगरी तक चमत्कार और अटूट श्रद्धा का अद्भुत संगम

     

    भगवान देवनारायण की लीलाएं अपरंपार हैं। नाग कन्या और दैत्य कन्या से विवाह के पश्चात उनके जीवन में एक नया अध्याय तब जुड़ा, जब उन्होंने धार नगरी के गौरव को पुनर्स्थापित किया। लोक मान्यताओं के अनुसार, देवनारायण ने अपनी अलौकिक शक्तियों से गढ़ गाजणा के किवाड़ उखाड़कर गज दन्त और नीम दन्त नामक राक्षसों के सिर पर लदवाकर धार नगरी भिजवा दिए थे।

    चमत्कार देख नतमस्तक हुए राजा जय सिंह

    जब धार नगरी की प्रजा ने सुबह आँखें खोलीं, तो वे आश्चर्यचकित रह गए। नगरी के विशाल द्वार, जो शत्रुओं द्वारा हटा दिए गए थे, वे अपनी जगह पर वापस लगे हुए थे। जब यह समाचार राजा जय सिंह तक पहुँचा, तो वे तुरंत द्वार पर आए। इस चमत्कार को देखकर उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया कि देवनारायण कोई साधारण मानव नहीं, बल्कि स्वयं विष्णु के अवतारी पुरुष हैं। इसी अटूट विश्वास के चलते उन्होंने अपनी पुत्री राजकुमारी पीपलदे का हाथ देवनारायण के हाथ में सौंपने का निर्णय लिया।

    सोने का नारियल और माता साडू की स्वीकृति

    राजा जय सिंह ने चार विद्वान पंडितों के हाथों सोने का 'लग्न-नारियल' भेजकर विवाह का प्रस्ताव रखा। ये पंडित छोछू भाट के माध्यम से माता साडू के दरबार में पहुँचे। उस समय देवनारायण निद्रा में थे। माता साडू ने उन्हें जगाकर धार नगरी की राजकुमारी पीपलदे के रिश्ते की जानकारी दी।

    मर्यादा और परंपरा का निर्वाह करते हुए देवनारायण ने माता से कहा, "माता, बिना कन्या को देखे विवाह का निर्णय लेना उचित नहीं, पहले छोछू भाट को कन्या की शोभा देखने भेजें।" जब छोछू भाट ने धार जाकर पीपलदे के सौंदर्य और गुणों को देखा, तो उन्होंने लौटकर माता साडू को आश्वस्त किया कि राजकुमारी पीपलदे साक्षात लक्ष्मी का स्वरूप हैं और नारायण के लिए सर्वथा उपयुक्त हैं।

    अधूरे फेरों का रहस्य: धार से मंगरोप तक का सफर

    विवाह की तैयारियाँ धूमधाम से शुरू हुईं। धार नगरी में शहनाइयाँ गूँजने लगीं और नगाड़ों की थाप पर मंगल गीत गाए गए। देवनारायण और पीपलदे के हाथों में विवाह का रक्षा-सूत्र (डोरा) बाँधा गया।

    इस विवाह की सबसे विशेष बात इसके 'फेरे' रहे। लोक कथाओं के अनुसार, देवनारायण ने पीपलदे के साथ धार नगरी में केवल तीन फेरे ही लिए थे। शेष आधे फेरे उन्होंने बाद में मंगरोप नामक स्थान पर आकर पूरे किए। यह घटना आज भी राजस्थानी लोक संस्कृति और भजनों में बड़े चाव से सुनाई जाती है।

    प्रमुख बिंदु: एक नजर में

     * चमत्कार: राक्षसों द्वारा धार नगरी के किवाड़ वापस स्थापित करना।

     * प्रस्ताव: राजा जय सिंह द्वारा सोने के नारियल के साथ पंडितों को भेजना।

     * गवाह: छोछू भाट द्वारा राजकुमारी की सुंदरता की पुष्टि करना।

     * विशेषता: विवाह के फेरों का दो अलग-अलग स्थानों (धार और मंगरोप) पर संपन्न होना।

     

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