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    सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद मतदाता जागरूकता यात्रा पर रोक: राज्य निर्वाचन आयोग का रवैया लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों पर हमला

    45 minutes ago

    राजस्थान इलेक्शन वॉच ने आयोग के फैसले को चुनौती देने और दोबारा सुप्रीम कोर्ट जाने का किया ऐलान

    जयपुर, राजस्थान निर्वाचन आयोग द्वारा सुप्रीम कोर्ट के 2 नवंबर 2026 के आदेश के बावजूद मतदाता जागरूकता यात्रा की अनुमति देने से इनकार करना बेहद गंभीर और अलोकतांत्रिक कदम है। राजस्थान इलेक्शन वॉच ने आयोग के इस रवैये की कड़ी निंदा करते हुए इसे नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों पर हमला बताया है। संगठन ने स्पष्ट किया है कि मतदाताओं को जागरूक करने के लोकतांत्रिक प्रयासों को प्रशासनिक बहानों की आड़ में दबाने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इसके खिलाफ पुनः सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाएगा।

    दो दशकों से मतदाता जागरूकता का अभियान

    राजस्थान इलेक्शन वॉच, मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) और सहयोगी संस्थाएं पिछले दो दशकों से लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान मतदाता जागरूकता यात्राओं का आयोजन करती रही हैं। इन यात्राओं का उद्देश्य नागरिकों को उनके लोकतांत्रिक अधिकारों, कर्तव्यों और आदर्श आचार संहिता के प्रति जागरूक करना तथा स्वतंत्र, निष्पक्ष और जवाबदेह चुनाव की प्रक्रिया को मजबूत करना है।

    यह अभियान किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि मतदाताओं को जागरूक और लोकतंत्र को मजबूत करने के उद्देश्य से चलाया जाता है। इसके बावजूद आयोग द्वारा बार-बार अनुमति देने से इनकार करना उसकी निष्पक्षता और नागरिक सहभागिता के प्रति प्रतिबद्धता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

    दो बार आवेदन खारिज, लेकिन ठोस आधार नहीं

    निकाय चुनावों की घोषणा के बाद 7 सितंबर 2026 को अजमेर, ब्यावर, भीलवाड़ा, बीकानेर, डूंगरपुर, जयपुर, राजसमंद, सलूंबर, सिरोही, टोंक और उदयपुर सहित 11 जिलों में मतदाता जागरूकता यात्रा आयोजित करने के लिए अनुमति मांगी गई। राज्य निर्वाचन आयोग ने 10 सितंबर को आवेदन खारिज कर दिया।

    इसके बाद पंचायती राज चुनावों के मद्देनजर 6 अक्टूबर को पुनः आवेदन प्रस्तुत किया गया, जिसे आयोग ने 9 अक्टूबर को फिर अस्वीकार कर दिया। इस तरह आयोग ने नागरिकों के शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक अभियान को आगे बढ़ाने का अवसर देने के बजाय लगातार बाधाएं खड़ी कीं।

    सुप्रीम कोर्ट ने आयोग का प्रतिबंधात्मक आदेश किया निरस्त

    आयोग के इस रवैये के खिलाफ अरुणा रॉय, निखिल डे और अन्य साथियों ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की। यह मामला सिविल रिट याचिका संख्या 249/2024 में आई.ए. संख्या 333171/2026 के रूप में प्रस्तुत किया गया।

    29 अक्टूबर को मामले की सुनवाई 2 नवंबर के लिए निर्धारित हुई। 2 नवंबर 2026 को सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग के प्रतिबंधात्मक आदेश को निरस्त (Set Aside) करते हुए आयोग को दो दिनों के भीतर अभ्यावेदन पर पुनर्विचार कर उचित आदेश पारित करने का निर्देश दिया।

    यह आदेश नागरिकों की लोकतांत्रिक भागीदारी और मतदाता जागरूकता के महत्व को रेखांकित करने वाला था। लेकिन आयोग ने इस निर्देश की भावना के अनुरूप समाधान निकालने के बजाय एक बार फिर अनुमति देने से इनकार कर दिया।

    4 नवंबर को फिर इनकार: प्रशासनिक बहानों की आड़ में नागरिक अधिकारों पर रोक

    सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद याचिकाकर्ताओं ने 3 नवंबर को ब्यावर, जयपुर, सलूंबर और टोंक जिलों में मतदाता जागरूकता यात्रा के लिए पुनः आवेदन प्रस्तुत किया। राज्य निर्वाचन आयोग के मुख्य निर्वाचन अधिकारी एवं सचिव श्री राजेश वर्मा ने 4 नवंबर को विस्तृत आदेश जारी कर आवेदन फिर अस्वीकार कर दिया।

    आयोग ने अपने निर्णय के समर्थन में पुलिस बल की व्यस्तता, चुनावी संवेदनशीलता, यात्रा के विस्तृत रूट और कार्यक्रम की कथित कमी तथा अपनी ओर से संचालित SVEEP गतिविधियों का हवाला दिया है।

    लेकिन सवाल यह है कि क्या प्रशासनिक सुविधा के नाम पर नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों को ही रोक दिया जाए?

    यदि रूट और समय-सारणी में कोई कमी थी, तो आयोग उसे स्पष्ट कर आवश्यक विवरण मांग सकता था। यदि कानून-व्यवस्था को लेकर कोई वास्तविक आशंका थी, तो उचित शर्तें और सुरक्षा संबंधी दिशा-निर्देश निर्धारित किए जा सकते थे। केवल आशंकाओं और प्रशासनिक व्यस्तताओं का हवाला देकर पूरे अभियान को प्रतिबंधित कर देना किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।

    आयोग का यह तर्क भी उचित नहीं है कि वह स्वयं SVEEP के तहत जागरूकता कार्यक्रम चला रहा है, इसलिए नागरिक संगठनों की स्वतंत्र पहल की आवश्यकता नहीं है। निर्वाचन आयोग की गतिविधियां नागरिकों की स्वतंत्र भागीदारी का विकल्प नहीं हो सकतीं। लोकतंत्र में सरकारी संस्थाओं और नागरिक समाज की भूमिका एक-दूसरे की पूरक होती है, प्रतिस्पर्धी नहीं।

    संविधान और सुप्रीम कोर्ट के आदेश की भावना का सम्मान जरूरी

    राजस्थान इलेक्शन वॉच का मानना है कि मतदाता जागरूकता के शांतिपूर्ण प्रयास अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक सहभागिता से जुड़े संवैधानिक अधिकारों के दायरे में आते हैं। संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा की स्वतंत्रता प्रदान करता है। इन अधिकारों पर कोई भी प्रतिबंध कानूनसम्मत, आवश्यक और उचित आधार पर ही लगाया जा सकता है।

    आयोग का बार-बार अनुमति देने से इनकार करना इस सवाल को और गंभीर बनाता है कि क्या नागरिकों को चुनाव के समय स्वतंत्र रूप से मतदाता जागरूकता का अभियान चलाने का अधिकार है, या यह अधिकार केवल सरकारी संस्थाओं तक सीमित माना जा रहा है?

    अरुणा रॉय, निखिल डे और शंकर सिंह ने कहा:

    “यह फैसला संविधान, लोकतंत्र और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की बड़ी जीत होना चाहिए था। लेकिन प्रशासनिक बहानों की आड़ में आयोग नागरिकों के अधिकारों को कुचलने पर आमादा है। मतदाताओं को जागरूक करना किसी सरकार या आयोग की कृपा नहीं, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए नागरिकों की जिम्मेदारी और अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी इस तरह का रवैया बेहद चिंताजनक है। हम इस अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करते रहेंगे।”

    संघर्ष जारी रहेगा, सुप्रीम कोर्ट फिर जाएंगे

    राजस्थान इलेक्शन वॉच ने स्पष्ट किया है कि आयोग के इस निर्णय को अंतिम नहीं माना जाएगा। संगठन फिर सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाएगा और मांग करेगा कि नागरिक संगठनों को चुनावों के दौरान मतदाता जागरूकता यात्राएं आयोजित करने के लिए एक स्पष्ट, पारदर्शी, समयबद्ध और गैर-मनमानी प्रक्रिया निर्धारित की जाए।

    संगठन यह भी मांग करेगा कि शांतिपूर्ण नागरिक अभियानों को रोकने के बजाय निर्वाचन आयोग आवश्यक समन्वय, उचित शर्तों और पारदर्शी दिशा-निर्देशों के माध्यम से उनका संचालन सुनिश्चित करे।

    लोकतंत्र केवल मतदान कराने से मजबूत नहीं होता; वह तब मजबूत होता है, जब नागरिकों को सवाल पूछने, संवाद करने और मतदाताओं को जागरूक करने की स्वतंत्रता मिलती है। मतदाता जागरूकता यात्रा पर रोक लोकतंत्र को मजबूत करने का नहीं, बल्कि नागरिक भागीदारी को सीमित करने का प्रयास है। राजस्थान इलेक्शन वॉच इस अधिकार की रक्षा के लिए अपना संघर्ष जारी रखेगा।

     

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