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    दिल्ली के 160 साल पुराने टाउन हॉल का बड़ा हिस्सा ढहा, ऐतिहासिक इमारत का अगला हिस्सा, छत और घड़ी क्षतिग्रस्त

    10 minutes ago

    Yugcharan News / 04-11-2026

    नई दिल्ली: पुरानी दिल्ली के चांदनी चौक स्थित 160 साल से अधिक पुराने ऐतिहासिक टाउन हॉल का एक बड़ा हिस्सा ढह गया है। इस घटना में इमारत का अगला हिस्सा (फसाड), पहली मंजिल, छत, मुख्य प्रवेश द्वार के बरामदे की दीवारें और उसके ऊपर लगी ऐतिहासिक घड़ी क्षतिग्रस्त हो गई हैं। यह इमारत दिल्ली नगर निगम (MCD) के स्वामित्व में है और ग्रेड-I संरक्षित विरासत भवनों में शामिल है।

    हैरानी की बात यह है कि जिस नगर निकाय पर दिल्ली की ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण और रखरखाव की जिम्मेदारी है, उसी के स्वामित्व वाली यह महत्वपूर्ण धरोहर लंबे समय से उपेक्षा का सामना कर रही थी। वर्ष 2011-12 में MCD का मुख्यालय यहां से सिविक सेंटर स्थानांतरित होने के बाद परिसर का अधिकांश हिस्सा इस्तेमाल नहीं किया जा रहा था। इमारत के गलियारों की हालत खराब हो चुकी थी, खिड़कियां क्षतिग्रस्त थीं, दीवारों से प्लास्टर उखड़ रहा था और कई रास्ते बंद पड़े थे।

    यह घटना ऐसे समय हुई है, जब दिल्ली सरकार ने टाउन हॉल परिसर को ‘ग्लोबल हेरिटेज सेंटर’ के रूप में विकसित करने की योजना घोषित की है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने अप्रैल में पेश किए गए बजट भाषण में इस परियोजना का उल्लेख किया था। इसका उद्देश्य राजधानी की कला, संस्कृति और खानपान की विरासत को एक ही स्थान पर प्रदर्शित करना है।

    शनिवार को ढही छत और प्रवेश द्वार की भारी बीम

    नगर निगम के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर बताया कि शनिवार को टाउन हॉल के मुख्य प्रवेश बरामदे के पास छत और दो बड़ी बीम ढह गईं। अधिकारी के मुताबिक, सुरक्षा गार्डों और स्थानीय जवानों ने घटना की सूचना दी थी।

    अधिकारी ने बताया कि मलबे का कुछ हिस्सा हटाया जा चुका है, लेकिन पूरे प्रभावित क्षेत्र को साफ करने में कई दिन लग सकते हैं। ढहने के कारण आसपास की दीवारों में दरारें आ गई हैं और इमारत की पहली मंजिल का एक हिस्सा भी क्षतिग्रस्त हुआ है।

    घटना के बाद मुख्य प्रवेश बरामदे के आसपास के क्षेत्र को बैरिकेड लगाकर बंद कर दिया गया है। मौके पर अग्निशमन विभाग के अधिकारी भी मौजूद हैं। सुरक्षा की दृष्टि से प्रभावित हिस्से तक लोगों की आवाजाही सीमित की गई है।

    हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, मंगलवार को परिसर का निरीक्षण करने पर इमारत के कई हिस्सों में खराब स्थिति दिखाई दी। छत की बीमें खुली हुई थीं और दीवारों को नुकसान पहुंचा था। केंद्रीय बैठक कक्ष के आसपास के हिस्से को भी बैरिकेड से घेरा गया था।

    परिसर में अब भी रखी हैं ईवीएम और सुरक्षा कर्मियों का उपयोग

    टाउन हॉल का अधिकांश हिस्सा वर्षों से खाली पड़ा है, लेकिन परिसर का कुछ हिस्सा अब भी सीमित उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। यहां सुरक्षा कर्मियों की तैनाती है और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) को भी परिसर में रखा गया है।

    ऐसे में इमारत के एक बड़े हिस्से के ढहने से परिसर की सुरक्षा और वहां रखी सामग्री को लेकर भी सतर्कता जरूरी हो गई है। फिलहाल प्रशासन की प्राथमिकता मलबा हटाने और प्रभावित हिस्से को सुरक्षित करने की है।

    इमारत की मौजूदा स्थिति इस बात की ओर भी ध्यान खींचती है कि ऐतिहासिक भवनों का संरक्षण केवल योजनाओं और घोषणाओं तक सीमित नहीं रह सकता। नियमित निरीक्षण, संरचनात्मक मजबूती की जांच और समय पर मरम्मत न होने पर ऐसी धरोहरों को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।

    मुगल कालीन सराय की जगह बना था टाउन हॉल

    टाउन हॉल का इतिहास दिल्ली के मुगल और ब्रिटिश शासनकाल से जुड़ा हुआ है। यह परिसर उस स्थान पर बना है, जहां कभी मुगल बादशाह शाहजहां की बेटी बेगम जहांआरा द्वारा बनवाई गई एक सराय मौजूद थी। इस स्थान को बेगम का बाग भी कहा जाता था।

    1857 के विद्रोह के बाद जब अंग्रेजों ने दिल्ली पर नियंत्रण स्थापित किया, तो मुगल सत्ता से जुड़े प्रतीकों को हटाने के प्रयासों के तहत इस सराय को ध्वस्त कर दिया गया। इसके बाद बेगम का बाग का नाम बदलकर कंपनी बाग कर दिया गया।

    इसके बाद यहां एक नई इमारत का निर्माण हुआ, जो 1863 में पूरा हुआ। शुरुआत में इस भवन में दिल्ली इंस्टीट्यूट, जिसे लॉरेंस इंस्टीट्यूट के नाम से भी जाना जाता था, संचालित होता था। बाद में यह परिसर नगर प्रशासन का प्रमुख केंद्र बन गया।

    19वीं सदी के अंतिम वर्षों और 20वीं सदी की शुरुआत में टाउन हॉल ने दिल्ली के नगरपालिका कार्यालय के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहां पहले से मौजूद लॉरेंस इंस्टीट्यूट से जुड़ा यूरोपियन क्लब और पुस्तकालय भी संचालित होते रहे।

    हिंदू और मुस्लिम दानदाताओं ने दिया था निर्माण में योगदान

    इतिहासकार नारायणी गुप्ता ने अपनी पुस्तक ‘दिल्ली बिटवीन टू एम्पायर्स’ में टाउन हॉल के निर्माण से जुड़ी जानकारी दी है। उनके अनुसार, इस भवन का निर्माण प्रांतीय निधि और हिंदू तथा मुस्लिम दानदाताओं के आर्थिक सहयोग से हुआ था।

    निर्माण में लाला महेश दास ने 25 हजार रुपये से अधिक का योगदान दिया था। अन्य योगदानकर्ताओं में लाला सालिग्राम, लाला नाहरवाला, लाला गुरवाला, नवाब ऑफ दुजाना, नवाब जियाउद्दीन और मिर्जा इलाही बख्श के नाम शामिल थे।

    MCD के एक अधिकारी के अनुसार, उस समय दिल्ली पंजाब सरकार के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में आती थी। भवन के निर्माण में पंजाब सरकार के शिक्षा विभाग से भी धन दिया गया था। 1857 के विद्रोह के बाद दिल्ली कॉलेज बंद हो गया था और उससे संबंधित संसाधनों का इस्तेमाल भी इस परियोजना में किया गया।

    वर्ष 1866 में नगरपालिका ने 1,35,457 रुपये में यह भवन खरीद लिया था और योगदान देने वाले लोगों को उनकी राशि लौटा दी थी। हालांकि, पुस्तकालय और यूरोपियन क्लब के लिए कुछ कमरे परिसर में बनाए रखे गए थे।

    145 साल तक नगरपालिका का मुख्यालय रहा टाउन हॉल

    टाउन हॉल लगभग 145 वर्षों तक दिल्ली की नगरपालिका का प्रमुख कार्यालय रहा। वर्ष 2011-12 में MCD ने अपना मुख्यालय मिंटो रोड स्थित नए सिविक सेंटर में स्थानांतरित कर दिया। इसके बाद ऐतिहासिक इमारत का इस्तेमाल धीरे-धीरे कम होता गया और परिसर उपेक्षा का शिकार होने लगा।

    टाउन हॉल का दरबार हॉल, जो मूल बैठक कक्ष था, ऐतिहासिक रूप से कई महत्वपूर्ण आयोजनों का केंद्र रहा। यहां औपचारिक स्वागत समारोह, बड़े आयोजन और महत्वपूर्ण बैठकें आयोजित की जाती थीं।

    परिसर में एक दूसरे बैठक कक्ष का उद्घाटन 10 अगस्त 1947 को तत्कालीन नेता जवाहरलाल नेहरू ने किया था। यह उद्घाटन भारत की आजादी से ठीक पांच दिन पहले हुआ था। इसके अलावा, 1937 से 1939 के बीच परिसर में विस्तार के लिए नए निर्माण किए गए और 1950 में दरबार हॉल का पुनर्निर्माण हुआ।

    इस प्रकार टाउन हॉल केवल एक प्रशासनिक कार्यालय नहीं था, बल्कि दिल्ली के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास का भी महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।

    कई बार बनी पुनर्विकास की योजनाएं, लेकिन नहीं हुआ काम

    MCD के मुख्यालय के स्थानांतरण के बाद टाउन हॉल को दोबारा उपयोग में लाने और उसकी ऐतिहासिक संरचना को संरक्षित करने के लिए कई प्रस्ताव तैयार किए गए, लेकिन कोई भी योजना पूरी तरह आगे नहीं बढ़ सकी।

    वर्ष 2013 में नगर निगम ने परिसर के कुछ हिस्सों को पुस्तकालय, रेस्तरां, सांस्कृतिक केंद्र और बुटीक होटल के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव रखा था। योजना में सार्वजनिक संगीत कार्यक्रमों और सांस्कृतिक आयोजनों के लिए जगह उपलब्ध कराने की बात भी शामिल थी। हालांकि, 2014 में सरकार बदलने के बाद यह प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया।

    वर्ष 2018 में तत्कालीन उत्तरी दिल्ली नगर निगम ने यहां हेरिटेज होटल विकसित करने की योजना बनाई थी, लेकिन इसके लिए कोई बोली प्राप्त नहीं हुई।

    वर्ष 2022 में केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने टाउन हॉल परिसर को 33 वर्षों की लीज पर लेकर वहां संग्रहालय, पुस्तकालय, शोध केंद्र और रेस्तरां विकसित करने में रुचि दिखाई थी। हालांकि, राजस्व के बंटवारे से जुड़े मुद्दों के कारण यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका।

    इसके बाद MCD ने 2023 में एक हेरिटेज सेल का गठन किया, जिसका उद्देश्य भवन के संरक्षण और बहाली के लिए आवश्यक लागत का आकलन तैयार करना था।

    IGNCA और आगा खान ट्रस्ट के साथ भी हुआ काम

    वर्ष 2024 में MCD ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए थे। इसका उद्देश्य नगर निगम के पास मौजूद कलाकृतियों और दुर्लभ दस्तावेजों का संरक्षण और पुनर्स्थापन करना था।

    इसके अलावा, MCD ने आगा खान ट्रस्ट फॉर कल्चर के साथ मिलकर टाउन हॉल की बहाली से संबंधित योजना पर भी काम किया था। इस प्रक्रिया के तहत एक रिपोर्ट तैयार की गई थी।

    हालांकि, इन पहलों के बावजूद इमारत की समग्र स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया। अब परिसर का एक बड़ा हिस्सा ढहने के बाद संरक्षण और पुनर्विकास की योजनाओं को लेकर सवाल और गंभीर हो गए हैं।

    ग्लोबल हेरिटेज सेंटर बनाने की योजना

    टाउन हॉल के लिए सबसे हालिया योजना दिल्ली सरकार और MCD की संयुक्त पहल है। परिसर को ‘ग्लोबल हेरिटेज सेंटर’ के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव दिल्ली पर्यटन विभाग के सहयोग से तैयार किया गया है।

    इस परियोजना को दिल्ली सरकार और MCD के बीच लगभग दो महीने पहले हुए समझौता ज्ञापन के माध्यम से औपचारिक रूप दिया गया था। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने अप्रैल में बजट भाषण के दौरान इस योजना की घोषणा की थी।

    प्रस्ताव के तहत टाउन हॉल को ऐसा केंद्र बनाने की योजना है, जहां दिल्ली की कला, संस्कृति, इतिहास और खानपान से जुड़ी विरासत को प्रदर्शित किया जा सके। इससे ऐतिहासिक परिसर को नया उपयोग मिलने के साथ-साथ शहर की सांस्कृतिक पहचान को भी बढ़ावा देने का लक्ष्य है।

    हालांकि, हालिया ढहने की घटना ने परियोजना के सामने संरक्षण और संरचनात्मक सुरक्षा की चुनौती को और स्पष्ट कर दिया है। किसी भी पुनर्विकास से पहले भवन की मौजूदा स्थिति का विस्तृत आकलन और क्षतिग्रस्त हिस्सों की सुरक्षित बहाली महत्वपूर्ण होगी।

    इतिहासकार ने बताया दिल्ली के विकास का अहम हिस्सा

    दिल्ली के इतिहास पर काम करने वाले लेखक, वृत्तचित्र फिल्म निर्माता और शहर के इतिहासकार सोहेल हाशमी ने कहा कि टाउन हॉल जैसी जगहों ने दिल्ली के विकास और उसके बदलते स्वरूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

    उन्होंने बताया कि वर्ष 2012 में तत्कालीन MCD आयुक्त ने उनसे टाउन हॉल परिसर के बेहतर उपयोग के लिए योजना तैयार करने में मदद मांगी थी। इसके बाद उन्होंने इतिहासकार नारायणी गुप्ता, संरक्षण कार्यकर्ता अनीशा शेखर और खाद्य विशेषज्ञ राहुल वर्मा के साथ मिलकर एक प्रस्ताव तैयार किया था।

    इस प्रस्ताव में टाउन हॉल के कुछ हिस्सों को पुस्तकालय, रेस्तरां, सांस्कृतिक केंद्र और बुटीक होटल के रूप में विकसित करने का सुझाव दिया गया था।

    हाशमी के अनुसार, इस तरह की इमारतें केवल पुरानी वास्तुकला का उदाहरण नहीं होतीं, बल्कि शहर के इतिहास, सामाजिक जीवन और सांस्कृतिक बदलावों की गवाह भी होती हैं।

    संरक्षण व्यवस्था पर उठे सवाल

    चांदनी चौक का टाउन हॉल दिल्ली की उन ऐतिहासिक इमारतों में शामिल है, जिनका संबंध शहर के कई ऐतिहासिक दौरों से रहा है। इसके बावजूद लंबे समय तक खाली पड़े रहने और रखरखाव की कमी के बीच इसका बड़ा हिस्सा ढह जाना विरासत संरक्षण की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

    एक ओर सरकार इस परिसर को अंतरराष्ट्रीय स्तर के विरासत केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना बना रही है, वहीं दूसरी ओर इमारत की मौजूदा संरचनात्मक स्थिति तत्काल संरक्षण की जरूरत को रेखांकित करती है।

    फिलहाल प्रभावित हिस्से को बैरिकेड कर दिया गया है और मलबा हटाने का काम जारी है। अब सबसे महत्वपूर्ण चुनौती यह होगी कि शेष इमारत की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए उसकी ऐतिहासिक पहचान को नुकसान पहुंचाए बिना बहाली का काम आगे बढ़ाया जाए। दिल्ली की इस महत्वपूर्ण धरोहर का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि घोषित पुनर्विकास योजना के साथ उसके संरक्षण और नियमित रखरखाव को कितनी प्राथमिकता दी जाती है।

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