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    संपत्ति धोखाधड़ी मामले में पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट को चुनौती, गायक लकी अली पहुंचे कर्नाटक हाईकोर्ट

    4 minutes ago

    Yugcharan News / 04-11-2026

    प्रसिद्ध गायक लकी अली ने अपने परिवार की संपत्तियों से जुड़े कथित जालसाजी और धोखाधड़ी के मामले में पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार किए जाने के फैसले को कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दी है। उनका आरोप है कि इस मामले की जांच में उनके दिवंगत पिता के हस्ताक्षरों की कथित जालसाजी और संपत्ति हस्तांतरण से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं की पर्याप्त जांच नहीं की गई। उन्होंने यह भी कहा है कि मजिस्ट्रेट ने पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार करने से पहले उन्हें उस पर आपत्ति दर्ज कराने या विरोध याचिका दाखिल करने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया।

    इस याचिका पर सुनवाई करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति रमनाथ हेगड़े ने नोटिस जारी किया है। लकी अली ने अदालत से 18 फरवरी 2026 को बेंगलुरु के प्रथम अतिरिक्त मुख्य महानगर दंडाधिकारी (आई एसीएमएम) द्वारा पारित आदेश को रद्द करने की मांग की है। इसी आदेश के तहत येलहंका न्यू टाउन पुलिस की ओर से दाखिल क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार की गई थी।

    लकी अली का कहना है कि पुलिस की जांच और उसके बाद की न्यायिक कार्यवाही के दौरान उन्हें अपना पक्ष रखने का उचित अवसर नहीं मिला। अब वह हाईकोर्ट से निर्देश चाहते हैं कि संबंधित मजिस्ट्रेट उन्हें क्लोजर रिपोर्ट के खिलाफ आपत्ति और विरोध याचिका दाखिल करने की अनुमति दें।

    क्या है लकी अली का संपत्ति विवाद मामला?

    यह मामला लकी अली के परिवार की अचल संपत्तियों के कथित अवैध हस्तांतरण से जुड़ा है। गायक ने आरोप लगाया है कि कुछ लोगों ने कथित साजिश के तहत उनके दिवंगत पिता महमूद अली और उनकी सौतेली मां ताहेरा महमूद अली के हस्ताक्षरों की जालसाजी की।

    याचिका के अनुसार, कथित तौर पर जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (जीपीए) और स्पेशल पावर ऑफ अटॉर्नी (एसपीए) से जुड़े दस्तावेजों पर फर्जी हस्ताक्षर किए गए। इन दस्तावेजों पर 9 नवंबर 1989 की तारीख दर्ज बताई गई है। लकी अली का आरोप है कि इन दस्तावेजों का इस्तेमाल परिवार की अचल संपत्तियों को हस्तांतरित करने के लिए किया गया।

    मामले में जिन संपत्तियों का उल्लेख है, वे बेंगलुरु उत्तर तालुक के येलहंका होबली क्षेत्र के तीन गांवों में स्थित कृषि भूमि हैं। इनमें गोविंदपुरा, वासुदेवपुरा और केनचेन्नाहल्ली गांव शामिल हैं।

    लकी अली का दावा है कि इन जमीनों के हस्तांतरण से जुड़े दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर गंभीर सवाल हैं। उनका आरोप है कि संबंधित दस्तावेजों में उनके पिता और सौतेली मां के हस्ताक्षरों की वास्तविकता की पर्याप्त जांच नहीं की गई।

    यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि हस्ताक्षरों की जालसाजी और संपत्ति के अवैध हस्तांतरण से जुड़े आरोप अभी आरोप हैं। अदालत में इनकी सत्यता का अंतिम निर्धारण होना बाकी है।

    पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट को क्यों दी गई चुनौती?

    लकी अली की याचिका का मुख्य आधार यह है कि जांच एजेंसियों ने मामले के महत्वपूर्ण पहलुओं की पर्याप्त पड़ताल नहीं की। उनके अनुसार, अपराध जांच विभाग (सीआईडी) की आर्थिक अपराध शाखा ने जांच के दौरान दस्तावेजों पर मौजूद हस्ताक्षरों की प्रामाणिकता और पावर ऑफ अटॉर्नी के पंजीकरण से जुड़े सवालों को पूरी तरह नहीं परखा।

    गायक का कहना है कि जांच में यह स्पष्ट रूप से जांचा जाना चाहिए था कि जीपीए और एसपीए दस्तावेजों पर दर्ज हस्ताक्षर वास्तविक थे या कथित रूप से जाली बनाए गए थे। इसके अलावा, दस्तावेजों के पंजीकरण की प्रक्रिया और संपत्तियों के हस्तांतरण में उनकी भूमिका की भी पर्याप्त जांच जरूरी थी।

    उनका आरोप है कि जांच में इन बिंदुओं पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया और अंततः पुलिस ने मामले को बंद करने की रिपोर्ट दाखिल कर दी। लकी अली का कहना है कि इस रिपोर्ट को स्वीकार करने से पहले उन्हें अपनी आपत्तियां रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए था।

    12 मार्च 2024 को मजिस्ट्रेट ने दिए थे आगे की जांच के निर्देश

    इस मामले में पहले भी क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की जा चुकी थी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 12 मार्च 2024 को मजिस्ट्रेट ने पुलिस को मामले की आगे जांच करने और लकी अली की आपत्तियों पर विचार करने के बाद रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था।

    इस आदेश का उद्देश्य पहले दाखिल क्लोजर रिपोर्ट पर उठाई गई आपत्तियों को ध्यान में रखते हुए मामले की दोबारा जांच कराना था। इसके बाद पुलिस ने आगे की जांच की, लेकिन अंततः फरवरी 2026 में क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार किए जाने की प्रक्रिया पूरी हुई।

    लकी अली का कहना है कि आगे की जांच के बाद भी पुलिस ने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की, लेकिन उन्हें इस रिपोर्ट को चुनौती देने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला। इसी प्रक्रिया को लेकर उन्होंने अब हाईकोर्ट का रुख किया है।

    उनकी याचिका में यह सवाल भी उठाया गया है कि जब पहले मजिस्ट्रेट ने उनकी आपत्तियों पर विचार करने और आगे जांच कराने का निर्देश दिया था, तब बाद की कार्यवाही में उन्हें रिपोर्ट के खिलाफ अपना पक्ष रखने का अवसर क्यों नहीं मिला।

    क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार होने के बाद क्या होता है?

    आपराधिक मामलों में पुलिस जांच पूरी करने के बाद अदालत में अपनी रिपोर्ट दाखिल करती है। यदि जांच एजेंसी को पर्याप्त सबूत नहीं मिलते या वह अपराध के संबंध में अभियोजन आगे बढ़ाने योग्य आधार नहीं पाती, तो वह क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर सकती है।

    हालांकि, पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट दाखिल होना और उसका अदालत द्वारा स्वीकार किया जाना अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। रिपोर्ट पर विचार करने का अधिकार संबंधित मजिस्ट्रेट के पास होता है। शिकायतकर्ता या संबंधित पक्ष को रिपोर्ट के खिलाफ अपनी आपत्तियां रखने का अवसर मिल सकता है। ऐसी आपत्तियों को सामान्यतः विरोध याचिका या प्रोटेस्ट पिटीशन के रूप में दाखिल किया जाता है।

    इस मामले में लकी अली की प्रमुख शिकायत भी इसी प्रक्रिया से जुड़ी है। उनका कहना है कि मजिस्ट्रेट द्वारा क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार किए जाने से पहले उन्हें पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया। इसलिए वह चाहते हैं कि अदालत उन्हें रिपोर्ट पर आपत्ति दर्ज कराने की अनुमति दे और मामले में उनकी शिकायतों पर सुनवाई हो।

    हाईकोर्ट में उनकी याचिका का उद्देश्य फिलहाल क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार किए जाने की प्रक्रिया को चुनौती देना और अपनी आपत्तियां रखने का अवसर प्राप्त करना है। इसे संपत्ति विवाद में आरोपों के सही या गलत होने पर अंतिम न्यायिक फैसला नहीं माना जाना चाहिए।

    प्रमाणित प्रतियों और अदालती कार्यवाही में अनियमितताओं का भी आरोप

    लकी अली ने अपनी याचिका में केवल जांच की गुणवत्ता पर ही सवाल नहीं उठाए हैं, बल्कि क्लोजर रिपोर्ट से संबंधित प्रमाणित प्रतियों और मजिस्ट्रेट के समक्ष हुई कार्यवाही को लेकर भी कथित अनियमितताओं का उल्लेख किया है।

    उनका कहना है कि क्लोजर रिपोर्ट की प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध कराने और न्यायिक कार्यवाही के संचालन में भी ऐसी समस्याएं सामने आईं, जिनकी जांच आवश्यक है।

    किसी न्यायिक आदेश को चुनौती देते समय संबंधित दस्तावेजों की उपलब्धता और पक्षकारों को सुनवाई का अवसर मिलना महत्वपूर्ण होता है। लकी अली का तर्क है कि इन प्रक्रियात्मक पहलुओं में कथित खामियों के कारण वह समय पर और प्रभावी तरीके से अपनी आपत्तियां प्रस्तुत नहीं कर सके।

    हालांकि, इन कथित अनियमितताओं पर हाईकोर्ट का अंतिम रुख अभी सामने नहीं आया है। अदालत की ओर से नोटिस जारी किया जाना इस बात का संकेत है कि याचिका पर आगे सुनवाई होगी, लेकिन इससे याचिकाकर्ता के आरोपों की पुष्टि नहीं होती।

    लकी अली का आधिकारिक नाम मकसूद एम अली

    गायक लकी अली का आधिकारिक नाम मकसूद एम अली है। वह भारतीय संगीत जगत में अपनी अलग आवाज और लोकप्रिय गीतों के लिए जाने जाते हैं। इस मामले में उन्होंने अपने परिवार की संपत्तियों से जुड़े कथित दस्तावेजी फर्जीवाड़े और हस्तांतरण के आरोपों को लेकर कानूनी कार्रवाई की है।

    यह विवाद मुख्य रूप से बेंगलुरु उत्तर के येलहंका क्षेत्र में स्थित कृषि भूमि और वर्ष 1989 के बताए जा रहे पावर ऑफ अटॉर्नी दस्तावेजों से संबंधित है। मामले में उनके दिवंगत पिता और सौतेली मां के हस्ताक्षरों की प्रामाणिकता एक महत्वपूर्ण मुद्दा है।

    अब हाईकोर्ट की सुनवाई पर टिकी नजरें

    कर्नाटक हाईकोर्ट में याचिका पहुंचने और न्यायमूर्ति रमनाथ हेगड़े द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद मामले में आगे की न्यायिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। अदालत को लकी अली की उन शिकायतों पर विचार करना होगा, जिनमें उन्होंने क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार किए जाने से पहले पर्याप्त अवसर नहीं मिलने और जांच में महत्वपूर्ण पहलुओं की अनदेखी का आरोप लगाया है।

    लकी अली चाहते हैं कि हाईकोर्ट मजिस्ट्रेट को निर्देश दे कि उन्हें पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट के खिलाफ विरोध याचिका दाखिल करने और अपनी आपत्तियां रखने का अवसर दिया जाए। इसके साथ ही उन्होंने 18 फरवरी 2026 के उस आदेश को रद्द करने की मांग की है, जिसके जरिए क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार की गई थी।

    फिलहाल इस मामले में हाईकोर्ट की ओर से नोटिस जारी किया गया है। संपत्तियों के कथित अवैध हस्तांतरण, दस्तावेजों पर हस्ताक्षरों की जालसाजी और जांच में खामियों से जुड़े आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष आना बाकी है। आने वाली सुनवाई में यह स्पष्ट हो सकेगा कि अदालत क्लोजर रिपोर्ट के खिलाफ लकी अली की आपत्तियों पर आगे क्या निर्देश देती है।

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