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    सुप्रीम कोर्ट ने CJP हिंसा की जांच कर रही समिति के पुनर्गठन से किया इनकार, 14 वर्षीय प्रदर्शनकारी को सुरक्षा देने का निर्देश

    3 hours ago

    Yugcharan News / 16-09-2026

    नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर पर जुलाई में हुए CJP छात्र प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा की जांच के लिए गठित हाई-पावर्ड इंक्वायरी कमेटी (HPEC) के पुनर्गठन की मांग को खारिज कर दिया है। अदालत ने कहा कि समिति के कामकाज पर इस स्तर पर आपत्ति जताना जल्दबाजी होगी, क्योंकि जांच अभी शुरुआती चरण में है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि समिति का उद्देश्य किसी एक पक्ष के हितों का समर्थन करना नहीं, बल्कि निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ तथ्यों को सामने लाने में सुप्रीम कोर्ट की सहायता करना है।

    भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं, ने समिति के पुनर्गठन की मांग पर सुनवाई की। कुछ पक्षों की ओर से समिति की संरचना को लेकर आपत्तियां उठाई गई थीं और इसके पुनर्गठन का अनुरोध किया गया था। हालांकि, पीठ ने इन आपत्तियों को फिलहाल समय से पहले उठाया गया मुद्दा माना।

    अदालत ने अपने आदेश में कहा कि HPEC के खिलाफ इस तरह की आशंकाएं और आरोप उस समय लगाए जा रहे हैं जब समिति ने अपनी जांच अभी शुरू ही की है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि समिति को निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से काम करने का अवसर दिया जाना चाहिए।

    अदालत ने कहा कि समिति का गठन उच्चतम स्तर की निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए किया गया है। इसका उद्देश्य किसी एक पक्ष या दूसरे पक्ष के दावों को आगे बढ़ाना नहीं है। अदालत की यह टिप्पणी उस समय आई है जब जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई, प्रदर्शनकारियों के साथ कथित व्यवहार और सुरक्षा बलों के खिलाफ हुई हिंसा को लेकर अलग-अलग आरोप सामने आए हैं।

    पांच सदस्यीय समिति कर रही है जांच

    सुप्रीम कोर्ट ने 18 अगस्त को पांच सदस्यीय हाई-पावर्ड इंक्वायरी कमेटी का गठन किया था। समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर. सुभाष रेड्डी कर रहे हैं। समिति को जंतर-मंतर और अन्य स्थानों पर हुए घटनाक्रम से जुड़े विभिन्न आरोपों की जांच करने की जिम्मेदारी दी गई है।

    जांच के दायरे में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस द्वारा कथित तौर पर अत्यधिक बल प्रयोग और दूसरी ओर सुरक्षा कर्मियों के खिलाफ हुई हिंसा के आरोप शामिल हैं। समिति को अपनी रिपोर्ट सीधे सुप्रीम कोर्ट को सौंपनी है और पूरी प्रक्रिया अदालत की निगरानी में चलेगी।

    सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देशों में जांच की प्राथमिकताओं को भी स्पष्ट किया गया है। अदालत ने कहा है कि समिति शुरुआत में कुछ विशेष और गंभीर आरोपों की जांच पर ध्यान केंद्रित करे। इनमें प्रदर्शनकारियों पर कथित रूप से पेलेट गन के इस्तेमाल, लक्षित हिंसा, महिला प्रदर्शनकारियों के उत्पीड़न तथा दोनों पक्षों की ओर से अत्यधिक हिंसा और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप शामिल हैं।

    इससे स्पष्ट है कि अदालत जांच को केवल पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि प्रदर्शन के दौरान हुई पूरी हिंसक घटनाओं और उनसे जुड़े सभी महत्वपूर्ण पहलुओं को सामने लाने की प्रक्रिया पर जोर दे रही है।

    संवेदनशील गवाहों की पहचान गोपनीय रखने का निर्देश

    सुप्रीम कोर्ट ने जांच प्रक्रिया में गवाहों की सुरक्षा और गोपनीयता को भी महत्वपूर्ण माना है। अदालत ने निर्देश दिया कि संवेदनशील या कमजोर स्थिति वाले गवाहों की पहचान को गोपनीय रखा जाए। उनके बयान और साक्ष्यों के संबंध में भी अत्यधिक गोपनीयता बरतने को कहा गया है।

    अदालत ने यह संभावना भी जताई कि गवाहों को अपने दस्तावेज और अन्य साक्ष्य सुरक्षित तथा गोपनीय तरीके से जमा कराने के लिए एक अलग ऑनलाइन पोर्टल बनाया जा सकता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि महत्वपूर्ण जानकारी साझा करने वाले लोगों को अपनी पहचान सार्वजनिक होने या संभावित दबाव का सामना करने की आशंका कम हो।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि नोडल काउंसिल की भूमिका केवल सुप्रीम कोर्ट की सहायता तक सीमित रहेगी। उसे HPEC, अदालत और मामले में शामिल पक्षों के बीच सीधे संवाद के माध्यम के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

    दो वरिष्ठ वकीलों को बनाया गया अमीकस क्यूरी

    सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. मोनिका गुसैन और एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड सी. सोलोमन को अमीकस क्यूरी नियुक्त किया है। दोनों अधिवक्ता मामले में अदालत की सहायता करेंगे और पक्षों के बीच स्वतंत्र मध्यस्थ भूमिका निभाएंगे।

    अदालत ने HPEC को एक सदस्य-सचिव नियुक्त करने और अपनी पहली रिपोर्ट जल्द से जल्द प्रस्तुत करने का भी निर्देश दिया है। इससे जांच प्रक्रिया को औपचारिक रूप देने और अदालत के समक्ष शुरुआती निष्कर्ष रखने की दिशा में आगे बढ़ने की उम्मीद है।

    सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि मामले से जुड़े व्यापक संवैधानिक प्रश्नों पर अभी अंतिम फैसला नहीं किया जाएगा। ऐसे संवैधानिक मुद्दों पर अदालत उचित चरण में विचार करेगी। इसका अर्थ है कि मौजूदा स्तर पर प्राथमिकता तथ्यों, घटनाओं और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच को दी जा रही है।

    14 वर्षीय प्रदर्शनकारी की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता

    सुनवाई के दौरान एक 14 वर्षीय प्रदर्शनकारी से संबंधित सुरक्षा का मुद्दा भी सामने आया। अदालत को बताया गया कि बच्ची और उसके परिवार को कथित तौर पर कई धमकियां मिली हैं। इन धमकियों के कारण उसकी तथा उसके परिवार की सुरक्षा को लेकर गंभीर और लगातार चिंता बनी हुई है।

    अदालत ने इन दावों को गंभीरता से लेते हुए दिल्ली पुलिस को आवश्यक कदम उठाने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस से कहा कि वह बच्ची और उसके परिवार के लिए खतरे का आकलन करे और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जरूरी संरक्षण उपलब्ध कराए।

    अदालत ने कथित तौर पर धमकी देने या परेशान करने वाले लोगों के खिलाफ भी जल्द जांच करने का निर्देश दिया। अदालत के निर्देश में कहा गया कि पुलिस को ऐसे कथित असामाजिक तत्वों के खिलाफ जांच में तेजी लानी चाहिए, जो बच्ची या उसके परिवार को धमकाने अथवा परेशान करने के आरोपों का सामना कर रहे हैं।

    दिल्ली पुलिस को इस मामले में अपनी कार्रवाई की स्थिति से संबंधित रिपोर्ट भी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दाखिल करनी होगी। अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 9 अक्टूबर की तारीख तय की है।

    हिंसा की जांच के साथ सुरक्षा भी अदालत की प्राथमिकता

    इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश से यह स्पष्ट है कि अदालत एक ओर जंतर-मंतर की घटनाओं की निष्पक्ष जांच चाहती है, वहीं दूसरी ओर मामले से जुड़े संवेदनशील गवाहों और नाबालिगों की सुरक्षा को भी महत्व दे रही है।

    अदालत द्वारा HPEC के पुनर्गठन से इनकार करने का तत्काल प्रभाव यह है कि मौजूदा समिति ही अपनी जांच जारी रखेगी। समिति को दोनों पक्षों से जुड़े आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करना होगा तथा अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंपनी होगी।

    जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़े विवाद में प्रदर्शनकारियों की ओर से पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए गए हैं, जबकि सुरक्षा बलों के खिलाफ हिंसा और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप भी जांच के दायरे में हैं। ऐसे में HPEC की रिपोर्ट आगे की न्यायिक प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।

    फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी पक्ष के आरोप को अंतिम रूप से स्वीकार या खारिज नहीं किया है। अदालत ने जांच पूरी होने से पहले समिति पर सवाल उठाने को जल्दबाजी बताया है और उसे स्वतंत्र रूप से काम करने का अवसर दिया है।

    आने वाले समय में HPEC द्वारा जुटाए जाने वाले साक्ष्य, गवाहों के बयान और घटनाओं से संबंधित अन्य सामग्री के आधार पर जांच आगे बढ़ेगी। अदालत ने स्पष्ट किया है कि व्यापक संवैधानिक सवालों पर बाद के चरण में विचार किया जाएगा। वहीं, 14 वर्षीय प्रदर्शनकारी और उसके परिवार की सुरक्षा को लेकर दिल्ली पुलिस को दिए गए निर्देश यह दर्शाते हैं कि अदालत मामले की न्यायिक जांच के साथ-साथ उससे जुड़े लोगों की सुरक्षा को भी गंभीरता से देख रही है।

     

    9 अक्टूबर को होने वाली अगली सुनवाई में दिल्ली पुलिस की स्थिति रिपोर्ट और HPEC की जांच की प्रगति पर अदालत के समक्ष आगे की स्थिति स्पष्ट होने की संभावना है।

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