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    दिल्ली हाईकोर्ट ने नीरज बवानिया की अंतरिम जमानत याचिका खारिज की, पत्नी और बच्चों से मिलने के लिए 6 घंटे की कस्टडी पैरोल मंजूर

    3 hours ago

    Yugcharan News / 16-09-2026

    नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को नीरज बवानिया उर्फ नीरज सेहरावत को अंतरिम जमानत देने से इनकार कर दिया, लेकिन उसे अपनी पत्नी और नवजात बच्चों से मिलने के लिए छह घंटे की कस्टडी पैरोल की अनुमति दी। अदालत ने सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और जेल में बंद आरोपी से जुड़े जोखिमों को देखते हुए अंतरिम जमानत के अनुरोध को स्वीकार नहीं किया। वहीं, मानवीय आधार पर परिवार से मुलाकात की अनुमति देते हुए अदालत ने उसे पुलिस हिरासत में ले जाकर पत्नी और बच्चों से मिलने की व्यवस्था करने का निर्देश दिया।

    न्यायमूर्ति मनोज जैन की अदालत ने नीरज बवानिया की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। अदालत के निर्देश के अनुसार, उसे पुलिस सुरक्षा में सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे के बीच उसके घर और अस्पताल ले जाया जाएगा, ताकि वह अपनी पत्नी और नवजात बच्चों से मिल सके। कस्टडी पैरोल के दौरान वह न्यायिक हिरासत से बाहर होगा, लेकिन पुलिस की निगरानी में रहेगा।

    मामला नीरज बवानिया के परिवार में हाल ही में हुए प्रसव और उसके बाद पैदा हुए बच्चों की गंभीर चिकित्सकीय स्थिति से जुड़ा है। इससे पहले भी दिल्ली हाईकोर्ट उसे छह घंटे की कस्टडी पैरोल दे चुका है। अदालत के समक्ष यह बताया गया था कि उसकी पत्नी ने 14 अगस्त को आपातकालीन सर्जरी के बाद तीन बच्चों को जन्म दिया था। बच्चों का जन्म लगभग 27 सप्ताह की गर्भावस्था में हुआ था। तीन नवजातों में से एक की जन्म के कुछ ही समय बाद मृत्यु हो गई, जबकि अन्य दो को अस्पताल के नवजात गहन चिकित्सा कक्ष (NICU) में भर्ती कराया गया था।

    अंतरिम जमानत की मांग क्यों की गई थी

    नीरज बवानिया की ओर से अदालत में अंतरिम जमानत की मांग मुख्य रूप से उसके नवजात बच्चों की चिकित्सकीय स्थिति और पत्नी को पारिवारिक सहयोग की जरूरत के आधार पर की गई थी। उसके वकीलों ने अदालत को बताया था कि उसकी पत्नी की स्थिति गंभीर थी और आपातकालीन सर्जरी के बाद उसने समय से पहले तीन बच्चों को जन्म दिया।

    अदालत के सामने रखी गई जानकारी के मुताबिक, जन्म के बाद एक बच्चे की मृत्यु हो गई, जबकि दो अन्य बच्चों को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती रखा गया। इनमें से एक बच्चे को वेंटिलेटर और दूसरे को CPAP सपोर्ट दिए जाने की जानकारी अदालत को दी गई थी। पत्नी को बाद में अस्पताल से छुट्टी मिल गई थी।

    इन परिस्थितियों को देखते हुए नीरज बवानिया ने अंतरिम जमानत की मांग की थी ताकि वह अपने परिवार के साथ रह सके और पत्नी तथा नवजात बच्चों की देखभाल में सहयोग कर सके।

    हालांकि, अभियोजन पक्ष ने अंतरिम जमानत का विरोध किया। राज्य की ओर से अदालत में नीरज बवानिया की सुरक्षा, उसके जेल रिकॉर्ड और कथित गैंग प्रतिद्वंद्विता से जुड़े जोखिमों का हवाला दिया गया। अभियोजन पक्ष का तर्क था कि उसे सामान्य रूप से जेल से बाहर करने पर सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़ी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

    अदालत ने कस्टडी पैरोल को चुना विकल्प

    अदालत ने अंतरिम जमानत देने के बजाय सीमित अवधि की कस्टडी पैरोल का रास्ता अपनाया। इसका अर्थ है कि नीरज बवानिया को परिवार से मिलने का अवसर दिया जाएगा, लेकिन वह पूरी तरह स्वतंत्र नहीं रहेगा। उसे पुलिस सुरक्षा में निर्धारित स्थानों तक ले जाया जाएगा और तय समय समाप्त होने के बाद वापस हिरासत में भेज दिया जाएगा।

    इस व्यवस्था का उद्देश्य परिवार से मुलाकात की उसकी जरूरत और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के बीच संतुलन बनाना है। ताजा आदेश के अनुसार, उसे छह घंटे के लिए पत्नी और बच्चों से मिलने की अनुमति दी गई है।

    इससे पहले 25 अगस्त को भी दिल्ली हाईकोर्ट ने उसे छह घंटे की कस्टडी पैरोल दी थी। उस समय उसे अस्पताल में भर्ती अपने दो बच्चों से मिलने की अनुमति मिली थी। 26 अगस्त को सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक यह पैरोल दी गई थी।

    पहले भी मांगी गई थी अंतरिम राहत

    नीरज बवानिया की अंतरिम जमानत याचिका पर पिछले कुछ सप्ताह से दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही है। 2 सितंबर के आदेश में अदालत ने मामले की स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने को कहा था। इसके बाद 7 सितंबर को मामले को आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया। 9 सितंबर को अदालत ने जेल अधिकारियों से आरोपी की नवीनतम नामावली रिपोर्ट मंगाने का निर्देश दिया और बच्चे की गंभीर चिकित्सकीय स्थिति से संबंधित जानकारी को राज्य से सत्यापित कराने को कहा।

    14 सितंबर को भी अदालत ने दिल्ली पुलिस को नवजात बच्चे से संबंधित मेडिकल दस्तावेजों की पुष्टि करने का निर्देश दिया था। न्यायमूर्ति मनोज जैन ने पुलिस से नीरज बवानिया की नामावली रिपोर्ट और बच्चे से जुड़े मेडिकल रिकॉर्ड की जांच करने को कहा था। इसके बाद मामले को 16 सितंबर की सुनवाई के लिए रखा गया था।

    इस पूरी प्रक्रिया में अदालत ने परिवार की ओर से पेश किए गए चिकित्सा दस्तावेजों की पुष्टि कराने पर जोर दिया। इससे यह सुनिश्चित करने की कोशिश की गई कि अंतरिम राहत की मांग से जुड़े चिकित्सकीय आधारों की स्वतंत्र रूप से जांच हो सके।

    सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को लेकर चिंता

    अंतरिम जमानत का विरोध करते हुए अभियोजन पक्ष ने नीरज बवानिया को उच्च जोखिम वाला कैदी बताया और कथित गैंग प्रतिद्वंद्विता का हवाला दिया। इससे पहले ट्रायल कोर्ट ने भी अंतरिम जमानत देने से इनकार किया था। वहां सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़ी आशंकाओं को महत्वपूर्ण माना गया था।

    अदालत के समक्ष यह तर्क भी रखा गया कि नीरज बवानिया को अंतरिम जमानत पर रिहा करने की स्थिति में उसकी सुरक्षा के साथ-साथ पुलिस और प्रशासन के सामने कानून-व्यवस्था से जुड़ी अतिरिक्त चुनौती उत्पन्न हो सकती है।

    इसी कारण हाईकोर्ट ने परिवार से मिलने की अनुमति देते हुए भी पूर्ण अंतरिम जमानत का विकल्प नहीं चुना। कस्टडी पैरोल में पुलिस निगरानी बनी रहती है और निर्धारित अवधि पूरी होने के बाद आरोपी को वापस हिरासत में भेजा जाता है।

    मामले में अदालत की प्रक्रिया जारी

    नीरज बवानिया की जमानत से संबंधित कार्यवाही में दिल्ली हाईकोर्ट ने पहले भी पुलिस से विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी। अदालत ने पुलिस और जेल प्रशासन से संबंधित रिकॉर्ड उपलब्ध कराने के साथ-साथ परिवार की ओर से पेश किए गए चिकित्सा दस्तावेजों की भी पुष्टि कराई।

    7 सितंबर और 9 सितंबर के आदेशों से भी स्पष्ट है कि अदालत मामले की सुनवाई के दौरान लगातार अतिरिक्त दस्तावेज और सत्यापन रिपोर्ट मांग रही थी। 9 सितंबर को अदालत ने विशेष रूप से उस रिपोर्ट को सत्यापित करने का निर्देश दिया था जिसमें एक नवजात बच्चे की गंभीर स्थिति का उल्लेख था।

    ऐसे मामलों में अदालत के सामने एक तरफ आरोपी के परिवार से जुड़े मानवीय और चिकित्सकीय हालात होते हैं, जबकि दूसरी तरफ हिरासत में रखे गए व्यक्ति की सुरक्षा, मुकदमे की प्रक्रिया और सार्वजनिक व्यवस्था से संबंधित मुद्दे होते हैं। मौजूदा मामले में अदालत ने परिवार से मुलाकात के लिए सीमित अवधि की कस्टडी पैरोल को अंतरिम जमानत के बजाय राहत के रूप में इस्तेमाल किया है।

    छह घंटे की मुलाकात का महत्व

    छह घंटे की कस्टडी पैरोल के दौरान नीरज बवानिया को अपनी पत्नी और बच्चों से मिलने का अवसर मिलेगा। यह मुलाकात पुलिस सुरक्षा में होगी। अदालत का यह आदेश परिवार की मौजूदा परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सीमित राहत प्रदान करता है, जबकि उसे पूरी तरह जेल से बाहर करने से जुड़ी सुरक्षा संबंधी चिंताओं को भी बनाए रखता है।

    इससे पहले भी अदालत ने इसी तरह की सीमित अवधि की अनुमति देकर उसे अस्पताल में भर्ती बच्चों से मिलने का अवसर दिया था। उस समय नवजातों की स्थिति गंभीर बताई गई थी और एक बच्चे को वेंटिलेटर तथा दूसरे को CPAP सपोर्ट दिए जाने की जानकारी सामने आई थी।

    अंतरिम जमानत पर अदालत का फैसला

    ताजा आदेश का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि दिल्ली हाईकोर्ट ने अंतरिम जमानत की मांग को स्वीकार नहीं किया है। यानी नीरज बवानिया को इस आधार पर नियमित रूप से जेल से बाहर रहने की अनुमति नहीं मिली है। इसके बजाय अदालत ने छह घंटे की कस्टडी पैरोल की अनुमति दी है, जिससे वह अपनी पत्नी और बच्चों से मिल सकेगा।

    अदालत के इस फैसले के बाद नीरज बवानिया न्यायिक हिरासत में ही रहेगा। परिवार से मिलने के लिए उसे पुलिस सुरक्षा में निर्धारित अवधि के लिए बाहर ले जाया जाएगा और इसके बाद उसे वापस हिरासत में लौटना होगा।

    मामले की आगे की न्यायिक प्रक्रिया जारी रहेगी। अदालत ने इससे पहले पुलिस से विस्तृत रिपोर्ट और संबंधित दस्तावेजों की पुष्टि करने को कहा था। अब ताजा आदेश के बाद अंतरिम जमानत के सवाल पर अदालत का रुख स्पष्ट है कि फिलहाल सीमित कस्टडी पैरोल के जरिए पारिवारिक मुलाकात की अनुमति दी जाएगी, जबकि पूर्ण अंतरिम रिहाई का अनुरोध स्वीकार नहीं किया गया है।

    इस मामले में आगे की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने पुलिस रिपोर्ट, जेल रिकॉर्ड और अन्य संबंधित दस्तावेजों का महत्व बना रहेगा। फिलहाल छह घंटे की कस्टडी पैरोल नीरज बवानिया को परिवार से मिलने के लिए दी गई सीमित राहत है, जबकि उसकी हिरासत और उससे जुड़ी न्यायिक कार्यवाही जारी रहेगी।

     

     

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