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    दिल्ली कोर्ट ने स्वातंत्र्य भारद्वाज को तीन सप्ताह की अंतरिम जमानत दी, केस पर सोशल मीडिया में बयान देने पर लगाई रोक

    3 hours ago

     

    Yugcharan News / 16-09-2026

    नई दिल्ली। दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान एक नाबालिग CJP कार्यकर्ता के पिता पर कथित हमले से जुड़े मामले में स्वातंत्र्य भारद्वाज को तीन सप्ताह की अंतरिम जमानत दी है। हालांकि, अदालत ने जमानत देते समय उन पर कई कड़ी शर्तें लगाई हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि अंतरिम जमानत की अवधि के दौरान वह इस मामले, अपने बचाव, शिकायतकर्ता या उसके परिवार से संबंधित कोई बयान, वीडियो, पॉडकास्ट, इंटरव्यू, रील या पोस्ट किसी सार्वजनिक मंच पर प्रकाशित या साझा नहीं कर सकेंगे।

    अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सौरभ प्रताप सिंह ललर ने अंतरिम जमानत का आदेश देते हुए दिल्ली पुलिस की जांच में कई कमियों और अधूरे पहलुओं को भी रेखांकित किया। अदालत ने जांच अधिकारी को इन बिंदुओं पर स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने और जांच को आगे बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि मामले की जांच में डिजिटल सामग्री, CCTV फुटेज, पुलिस रिकॉर्डिंग, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की पर्याप्त जांच किए जाने की जरूरत है।

    जंतर-मंतर प्रदर्शन से जुड़ा है मामला

    यह मामला 23 जून को जंतर-मंतर पर हुए एक प्रदर्शन से संबंधित है। अभियोजन के अनुसार, शिकायतकर्ता अपनी बेटी और एक मित्र के साथ प्रदर्शन में शामिल होने के लिए वहां पहुंचे थे। आरोप है कि वीडियो रिकॉर्ड करने को लेकर विवाद हुआ, जिसके बाद स्वातंत्र्य भारद्वाज और उनके साथियों ने शिकायतकर्ता को घेरकर कथित तौर पर मारपीट की।

    पुलिस के अनुसार, शिकायतकर्ता के सिर पर दो चोटें आई थीं। आरोप है कि उनके साथ मुक्कों और कड़े जैसी किसी कठोर वस्तु से हमला किया गया। हालांकि, ये सभी आरोप अभी न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं और मामले के अंतिम गुण-दोष पर अदालत ने कोई निष्कर्ष नहीं दिया है।

    शुरुआत में इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 115(2) और 126(2) के तहत मामला दर्ज किया गया था। ये धाराएं उस समय जमानती अपराधों से संबंधित थीं और भारद्वाज को तत्काल गिरफ्तार नहीं किया गया था। पुलिस के नोटिस के बाद उन्होंने जांच में शामिल होकर पूछताछ में सहयोग किया था।

    बाद में SC/ST Act की धाराएं जोड़ी गईं

    मामले में बाद में नया मोड़ तब आया जब 4 सितंबर को शिकायतकर्ता ने एक पूरक बयान दिया। इसमें उन्होंने स्वयं को अनुसूचित जाति से संबंधित बताते हुए आरोप लगाया कि घटना के दौरान उनके और उनकी नाबालिग बेटी के खिलाफ जातिसूचक और अपमानजनक टिप्पणियां की गई थीं।

    इसके बाद FIR में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रावधानों के साथ BNS की धारा 351(3) भी जोड़ी गई। इसके बाद भारद्वाज को गिरफ्तार किया गया और उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।

    अदालत ने जमानत पर विचार करते हुए इस बात पर भी ध्यान दिया कि जातिगत टिप्पणी का आरोप मूल FIR में दर्ज नहीं था और यह आरोप घटना के लगभग दस सप्ताह बाद सामने आया। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी आरोप का देर से सामने आना अपने आप में उसे झूठा साबित नहीं करता। अदालत ने कहा कि अंतिम सत्यता का फैसला इस स्तर पर नहीं किया जा सकता, लेकिन जमानत पर विचार करते समय इस परिस्थिति के प्रभाव को देखा जा सकता है।

    सोशल मीडिया गतिविधि भी बनी जमानत की सुनवाई का हिस्सा

    दिल्ली पुलिस ने जमानत का विरोध करते हुए भारद्वाज की सोशल मीडिया गतिविधियों और एक पॉडकास्ट का हवाला दिया। पुलिस के अनुसार, पॉडकास्ट में घटना के संबंध में भारद्वाज की ओर से कथित तौर पर ऐसी बातें कही गई थीं जिन्हें जांच के दौरान महत्वपूर्ण माना गया।

    अदालत ने कहा कि डिजिटल युग में किसी पीड़ित या गवाह को प्रभावित करने के लिए आरोपी का उनके पास शारीरिक रूप से पहुंचना जरूरी नहीं है। सार्वजनिक मंचों पर दिए गए बयान बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच सकते हैं और उनका प्रभाव लंबे समय तक बना रह सकता है।

    इसी आधार पर अदालत ने अंतरिम जमानत के दौरान सोशल मीडिया पर मामले से संबंधित किसी भी तरह की सार्वजनिक टिप्पणी पर रोक लगा दी। कोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि यह प्रतिबंध केवल मामले और उससे जुड़े लोगों के संबंध में है तथा इसे कानूनसम्मत अभिव्यक्ति पर सामान्य रोक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

    आपत्तिजनक संदेशों को लेकर अदालत की अहम टिप्पणी

    सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता और उसकी नाबालिग बेटी को अलग-अलग नंबरों से कथित रूप से भेजे गए आपत्तिजनक और अश्लील संदेशों का भी उल्लेख हुआ। हालांकि, अदालत ने कहा कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर इन संदेशों को सीधे स्वातंत्र्य भारद्वाज से जोड़ना संभव नहीं था।

    इसके बावजूद कोर्ट ने माना कि किसी लंबित मामले को लेकर सार्वजनिक टिप्पणियां या ऑनलाइन गतिविधियां पीड़ित और उसके परिवार के खिलाफ माहौल को प्रभावित कर सकती हैं। इसी संदर्भ में अदालत ने सार्वजनिक मंचों पर मामले की चर्चा से जुड़ी पाबंदी को जमानत की शर्तों का हिस्सा बनाया।

    अदालत ने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन यह पूर्ण अधिकार नहीं है। कोर्ट के अनुसार, किसी लंबित मामले को सार्वजनिक मंच पर इस तरह प्रस्तुत नहीं किया जा सकता जिससे पीड़ित पर दबाव पड़े या मामले की सुनवाई सार्वजनिक स्तर पर प्रभावित करने की कोशिश हो।

    दिल्ली पुलिस की जांच पर अदालत ने उठाए सवाल

    अंतरिम जमानत देते समय अदालत ने जांच की प्रक्रिया में कई महत्वपूर्ण कमियों की ओर भी ध्यान दिलाया। कोर्ट ने कहा कि पुलिस ने जिस पॉडकास्ट को अपनी दलीलों में महत्वपूर्ण बताया, उसके संबंध में कई बुनियादी जांच कदमों की जानकारी रिकॉर्ड पर स्पष्ट नहीं थी।

    अदालत ने सवाल उठाया कि क्या पॉडकास्ट चैनल चलाने वाले व्यक्ति से पूछताछ की गई, क्या मूल वीडियो फुटेज हासिल किया गया और क्या इलेक्ट्रॉनिक सामग्री को फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया।

    इसके अलावा जंतर-मंतर प्रदर्शन स्थल के CCTV फुटेज को लेकर भी अदालत ने पुलिस की रिपोर्ट में पर्याप्त जानकारी नहीं पाई। प्रदर्शन के दौरान तैनात पुलिसकर्मियों द्वारा बनाई गई रिकॉर्डिंग, भारद्वाज के कॉल डिटेल रिकॉर्ड और टावर लोकेशन जैसे डिजिटल साक्ष्यों का भी उल्लेख किया गया।

    कोर्ट ने जांच अधिकारी को CCTV फुटेज, पुलिस रिकॉर्डिंग, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और टावर लोकेशन संबंधी डेटा एकत्र करने का निर्देश दिया। साथ ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से संबंधित अकाउंट और अपलोड विवरण हासिल करने, पॉडकास्ट चैनल के संचालक से पूछताछ करने तथा इलेक्ट्रॉनिक सामग्री की फोरेंसिक जांच कराने को कहा गया। जांच में यह भी निर्धारित करने का निर्देश दिया गया कि संबंधित डिजिटल सामग्री वास्तविक है, उसमें छेड़छाड़ हुई है या वह कृत्रिम तरीके से तैयार की गई है।

    हिरासत में पूछताछ पूरी होने का भी रखा गया ध्यान

    अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि जिन अपराधों का आरोप लगाया गया है, उनमें अधिकतम सजा सात वर्ष तक हो सकती है और भारद्वाज से हिरासत में पूछताछ पूरी हो चुकी है।

    कोर्ट ने कहा कि मामले में शिकायतकर्ता और गवाहों को प्रभावित किए जाने की आशंका को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि, अदालत ने माना कि इस जोखिम को कड़ी और सीमित शर्तों के जरिए नियंत्रित किया जा सकता है।

    इसी संतुलन के आधार पर अदालत ने उन्हें तीन सप्ताह की अंतरिम जमानत प्रदान की। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत का आदेश मामले के अंतिम गुण-दोष पर कोई राय नहीं है।

    जमानत के साथ कई शर्तें लागू

    अंतरिम जमानत के दौरान स्वातंत्र्य भारद्वाज को शिकायतकर्ता, उसकी नाबालिग बेटी, परिवार के सदस्यों या अभियोजन पक्ष के गवाहों से संपर्क करने से रोका गया है।

    उन्हें सबूतों के साथ छेड़छाड़ नहीं करने, जांच अधिकारी के बुलाने पर जांच में शामिल होने और जांच में सहयोग करने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने उन्हें बिना पूर्व अनुमति देश से बाहर जाने पर भी रोक लगाई है।

    सबसे अहम शर्त सोशल मीडिया से जुड़ी है। उन्हें मामले, अपने बचाव, शिकायतकर्ता या उसके परिवार से संबंधित कोई सार्वजनिक बयान, वीडियो, पॉडकास्ट, इंटरव्यू, रील या पोस्ट करने अथवा साझा करने की अनुमति नहीं होगी। अंतरिम जमानत की अवधि समाप्त होने के बाद उन्हें अदालत के निर्देश के अनुसार आत्मसमर्पण करना होगा।

    नियमित जमानत पर 6 अक्टूबर को होगी सुनवाई

    अदालत ने भारद्वाज की नियमित जमानत याचिका पर अगली सुनवाई के लिए 6 अक्टूबर की तारीख तय की है। उस समय नियमित जमानत देने, अंतरिम जमानत समाप्त करने या उसे आगे बढ़ाने के मुद्दे पर सुनवाई होगी।

    इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट पहले ही उनकी गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई कर चुका है। वहीं, पटियाला हाउस कोर्ट ने 15 सितंबर को तीन सप्ताह की अंतरिम जमानत का आदेश दिया। इससे पहले 14 सितंबर को अदालत ने मामले में जमानत पर आदेश सुरक्षित रखा था।

    फिलहाल स्वातंत्र्य भारद्वाज अंतरिम जमानत पर बाहर रहेंगे, लेकिन उनके ऊपर सोशल मीडिया गतिविधियों, शिकायतकर्ता और गवाहों से संपर्क तथा जांच में सहयोग को लेकर स्पष्ट प्रतिबंध लागू हैं। दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस को अदालत द्वारा चिन्हित जांच संबंधी कमियों पर आगे कार्रवाई करते हुए स्थिति रिपोर्ट दाखिल करनी है। मामले की अगली महत्वपूर्ण सुनवाई 6 अक्टूबर को होगी, जब नियमित जमानत और अंतरिम राहत की आगेची दिशा पर अदालत विचार करेगी।

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