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    अरावली पहाड़ियों पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: नवंबर का आदेश फिलहाल स्थगित, नई समिति से होगा दोबारा अध्ययन

    4 days ago

    अरावली पहाड़ियों की परिभाषा और संरक्षण से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने नवंबर 2025 के आदेश को फिलहाल के लिए स्थगित (एबेयन्स) कर दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि इस संवेदनशील पर्यावरणीय मुद्दे पर नई विशेषज्ञ समिति गठित कर दोबारा सर्वे और अध्ययन किया जाएगा। इस मामले की अगली सुनवाई 21 जनवरी 2026 को निर्धारित की गई है।

    मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि अरावली क्षेत्र को केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाले भू-आकृतियों तक सीमित करने से अनियंत्रित खनन का रास्ता खुल सकता है, जिसे लेकर अदालत गंभीर रूप से चिंतित है। इसी कारण कोर्ट ने अपने पूर्व आदेश पर पुनर्विचार का संकेत दिया है।

    क्या है पूरा विवाद

    अरावली पर्वतमाला देश की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक मानी जाती है, जो दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात तक फैली हुई है। यह क्षेत्र न केवल जैव विविधता के लिए अहम है, बल्कि उत्तर भारत के जलस्तर, वायु गुणवत्ता और जलवायु संतुलन में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है।

    नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए अरावली पहाड़ियों की एक एकरूप परिभाषा को मंजूरी दी थी। इसके तहत 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली भूमि को “अरावली हिल” और 500 मीटर की दूरी में स्थित दो या अधिक ऐसी पहाड़ियों को “अरावली रेंज” माना गया था। साथ ही, विशेषज्ञ रिपोर्ट आने तक इन क्षेत्रों में नए खनन पट्टों पर रोक लगा दी गई थी।

    हालांकि, इस परिभाषा को लेकर पर्यावरणविदों और कुछ राजनीतिक दलों ने आपत्ति जताई थी।

    सुप्रीम कोर्ट की चिंता

    सुप्रीम कोर्ट ने अब कहा है कि यदि अरावली को केवल ऊंचाई के आधार पर परिभाषित किया गया, तो कई ऐसे क्षेत्र जो पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील हैं, वे “गैर-अरावली” श्रेणी में आ सकते हैं। इससे वहां खनन और निर्माण गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है, जो पर्यावरण के लिए घातक होगा।

    मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अब यह जरूरी हो गया है कि ‘नॉन-अरावली’ घोषित किए जाने वाले क्षेत्रों की विस्तृत पहचान की जाए, ताकि किसी भी तरह की गलत व्याख्या या दुरुपयोग न हो।

    नई समिति और अगली सुनवाई

    अदालत ने संकेत दिया कि एक नई विशेषज्ञ समिति गठित की जाएगी, जो अरावली क्षेत्र का वैज्ञानिक और पर्यावरणीय दृष्टिकोण से अध्ययन करेगी। इस समिति की रिपोर्ट के आधार पर ही आगे कोई अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

    इस बीच, केंद्र सरकार की ओर से अदालत को भरोसा दिलाया गया कि वह सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पूरी तरह पालन करेगी। चारों संबंधित राज्यों को भी फिलहाल कोई नई कार्रवाई न करने के संकेत दिए गए हैं।

    पर्यावरणविदों और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं

    पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली जैसी प्राचीन पर्वतमाला को केवल तकनीकी या ऊंचाई आधारित मानकों से परिभाषित करना प्रकृति के साथ अन्याय होगा। उनका तर्क है कि अरावली का महत्व केवल उसकी ऊंचाई में नहीं, बल्कि उसकी पारिस्थितिकी, जल संरक्षण क्षमता और जलवायु संतुलन में है।

    वहीं, विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि अरावली की नई परिभाषा से खनन और रियल एस्टेट परियोजनाओं को बढ़ावा मिलेगा, जिससे पहले से ही क्षतिग्रस्त पारिस्थितिकी को और नुकसान पहुंचेगा। कुछ नेताओं ने इसे “प्राकृतिक धरोहर पर हमला” बताया है।

    क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला

    अरावली पहाड़ियां दिल्ली-एनसीआर सहित उत्तर भारत के बड़े हिस्से को रेगिस्तानीकरण से बचाने में अहम भूमिका निभाती हैं। ये पहाड़ियां मानसूनी जल को रोकने, भूजल recharge करने और वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने में सहायक मानी जाती हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार, यदि अरावली क्षेत्र में अनियंत्रित खनन या निर्माण हुआ, तो इसका असर सीधे तौर पर जल संकट, प्रदूषण और तापमान वृद्धि के रूप में सामने आ सकता है।

    आगे क्या

     

    अब 21 जनवरी की सुनवाई पर सबकी नजरें टिकी हैं। नई समिति के गठन और उसके अध्ययन के बाद सुप्रीम कोर्ट इस मामले में अंतिम दिशा-िर्देश जारी कर सकता है। यह फैसला न केवल पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से अहम होगा, बल्कि भविष्य में देश की अन्य संवेदनशील भौगोलिक संरचनाओं के संरक्षण के लिए भी एक नज़ीर बन सकता है।

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