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    कलकत्ता हाईकोर्ट में हुई अव्यवस्था पर सुप्रीम कोर्ट नाराज़, ममता बनर्जी बनाम ईडी विवाद में नोटिस जारी करने के संकेत

    3 days ago

    पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और प्रवर्तन निदेशालय (ED) के बीच चल रहे टकराव से जुड़े मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट में हुई कथित अव्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी चिंता व्यक्त की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि वह हाईकोर्ट परिसर में जो कुछ हुआ, उससे “बेहद विचलित” है और यह एक गंभीर मुद्दा है, जिस पर न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक है।

    सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी उस समय आई जब कलकत्ता हाईकोर्ट में राजनीतिक रणनीति से जुड़ी एक कंसल्टेंसी फर्म से संबंधित जांच के दौरान सुनवाई बाधित हुई थी। इस घटना ने न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा और स्वतंत्रता को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

    क्या है पूरा मामला

    प्रवर्तन निदेशालय ने आरोप लगाया है कि पश्चिम बंगाल सरकार के कुछ वरिष्ठ अधिकारी और सत्तारूढ़ दल से जुड़े लोग उसकी जांच प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर रहे हैं। यह जांच एक राजनीतिक सलाहकार संस्था के कार्यालयों में की गई छापेमारी से जुड़ी है, जो राज्य की सत्ताधारी पार्टी के साथ काम करती है।

    ईडी का कहना है कि जांच के दौरान बाधाएं उत्पन्न की गईं और कथित रूप से सबूतों से छेड़छाड़ की कोशिश भी हुई। एजेंसी ने यह भी दावा किया कि कुछ घटनाएं जांच को प्रभावित करने के उद्देश्य से की गईं।

    सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

    मामले की सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट की कार्यवाही में अव्यवस्था पैदा होना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक है। न्यायालय ने संकेत दिए कि वह इस पूरे प्रकरण में संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर सकता है, ताकि घटनाओं की सच्चाई सामने लाई जा सके।

    पीठ ने सवाल उठाया कि क्या अदालत परिसर को किसी तरह के विरोध या दबाव का मंच बनाया जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक संस्थानों की गरिमा बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है।

    ईडी की दलीलें

    प्रवर्तन निदेशालय की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान बड़ी संख्या में वकील एकत्रित हो गए, जिनका इस मामले से सीधा संबंध नहीं था। इससे सुनवाई का माहौल प्रभावित हुआ और न्यायाधीश को कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी।

    ईडी ने आरोप लगाया कि यह स्थिति अचानक नहीं बनी, बल्कि इसके पीछे सुनियोजित प्रयास हो सकते हैं। एजेंसी ने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए खतरनाक संकेत बताया।

    हाईकोर्ट का रुख

    घटना के बाद कलकत्ता हाईकोर्ट ने एहतियातन कदम उठाते हुए आगे की सुनवाई में केवल संबंधित पक्षों के वकीलों को ही अदालत में प्रवेश की अनुमति दी। इसके अलावा, हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच एजेंसी द्वारा छापेमारी के दौरान कोई दस्तावेज जब्त नहीं किए गए थे, जिसके बाद एक याचिका को खारिज कर दिया गया।

    हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि अदालत का वातावरण सुनवाई के लिए अनुकूल होना चाहिए और किसी भी प्रकार की अव्यवस्था न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर करती है।

    राजनीतिक प्रतिक्रियाएं

    इस पूरे मामले ने राजनीतिक हलकों में भी हलचल पैदा कर दी है। सत्तारूढ़ दल ने आरोपों को राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया है, जबकि विपक्ष ने न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप के आरोपों को गंभीर करार दिया है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल कानूनी नहीं, बल्कि राजनीतिक और संस्थागत संतुलन से भी जुड़ा हुआ है। ऐसे मामलों में अदालतों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

    लोकतंत्र और न्यायपालिका पर सवाल

    विशेषज्ञों के अनुसार, अदालत परिसर में किसी भी तरह की अव्यवस्था लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि अदालतों में सुनवाई शांतिपूर्ण और व्यवस्थित तरीके से हो।

    सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को इसी संदर्भ में एक कड़ा संदेश माना जा रहा है कि न्यायिक संस्थानों पर किसी भी तरह का दबाव स्वीकार्य नहीं है।

    आगे क्या?

     

    अब सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट के अगले कदम पर टिकी हैं। यदि अदालत औपचारिक नोटिस जारी करती है, तो यह मामला और भी व्यापक कानूनी जांच की ओर बढ़ सकता है। इससे न केवल संबंधित पक्षों, बल्कि भविष्य में ऐसे मामलों के लिए भी एक मिसाल कायम हो सकती है।

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