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    भारत–अमेरिका व्यापार समझौते पर दुग्ध और कृषि क्षेत्र की स्थिति स्पष्ट, अमूल प्रबंधन ने जताई किसानों की सुरक्षा की बात

    3 months ago

    भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में घोषित अंतरिम व्यापार समझौते को लेकर देशभर में विशेष रूप से कृषि और किसान संगठनों के बीच चर्चाएं तेज हो गई हैं। कई किसान संगठनों ने इस समझौते को लेकर आशंका जताई है कि इससे सस्ते विदेशी कृषि और डेयरी उत्पाद भारतीय बाजार में प्रवेश कर सकते हैं, जिससे घरेलू किसानों पर दबाव बढ़ने की संभावना है। हालांकि, देश के सबसे बड़े दुग्ध सहकारी संघों में से एक अमूल से जुड़े शीर्ष प्रबंधन का कहना है कि यह समझौता किसानों और कृषि क्षेत्र के हितों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है और इससे दीर्घकाल में भारतीय उत्पादकों को नए अवसर मिल सकते हैं।

    अमूल के प्रबंध निदेशक जयन मेहता ने व्यापार समझौते के विभिन्न पहलुओं पर अपनी बात रखते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार वार्ताएं हमेशा दोतरफा होती हैं और इनमें बाजार तक पहुंच एक महत्वपूर्ण तत्व होता है। उनके अनुसार, इस समझौते के तहत भारतीय कृषि और डेयरी उत्पादों को अमेरिकी बाजार में बेहतर पहुंच मिलने की संभावना बनी है, जिससे निर्यात के नए रास्ते खुल सकते हैं।

    व्यापार समझौते में बाजार पहुंच का महत्व

    मेहता ने कहा कि भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए वैश्विक बाजारों तक पहुंच बेहद अहम है। उनका मानना है कि यदि भारत अपने उत्पादों के लिए बड़े और स्थिर बाजार सुनिश्चित करता है, तो इससे किसानों की आय में वृद्धि और मूल्य स्थिरता में मदद मिल सकती है। उन्होंने यह भी बताया कि कुछ उत्पादों पर आयात शुल्क में प्रस्तावित कमी से भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ेगी।

    उनके अनुसार, शुल्क दरों में कमी का उद्देश्य केवल आयात को बढ़ावा देना नहीं है, बल्कि भारतीय निर्यातकों को भी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बेहतर स्थान दिलाना है। उन्होंने कहा कि दुग्ध और कृषि उत्पादों के मामले में सरकार ने संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है, ताकि घरेलू उत्पादकों को नुकसान न हो।

    डेयरी क्षेत्र और पशु आहार की भूमिका

    अमूल के प्रबंध निदेशक ने यह भी स्पष्ट किया कि डेयरी और पशुपालन क्षेत्र की स्थिरता काफी हद तक पशु आहार की उपलब्धता और लागत पर निर्भर करती है। अमूल गुजरात के हजारों गांवों में लाखों दुग्ध उत्पादकों के साथ काम करता है और प्रतिदिन बड़ी मात्रा में दूध का संग्रह करता है। ऐसे में पशु आहार की गुणवत्ता और कीमत दोनों का सीधा असर किसानों की आय पर पड़ता है।

    उन्होंने बताया कि पशु आहार विभिन्न कृषि आधारित कच्चे माल से तैयार किया जाता है, जिनमें मक्का, तेल निकालने के बाद बचा चोकर, तिलहन अवशेष और शीरा जैसे तत्व शामिल होते हैं। भारत में पशु आहार उत्पादन का एक मजबूत आधार मौजूद है और अधिकांश आवश्यक कच्चा माल देश के भीतर ही उपलब्ध है।

    डीडीजीएस आयात को लेकर स्थिति स्पष्ट

    व्यापार समझौते के संदर्भ में डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेन्स विद सॉल्युबल्स (डीडीजीएस) के संभावित आयात को लेकर भी चर्चा हुई है। इस विषय पर अमूल प्रबंधन ने स्पष्ट किया कि डीडीजीएस का उपयोग पशु आहार में सीमित मात्रा में ही किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि पशु आहार में इसका अनुपात सामान्यतः तीन से चार प्रतिशत से अधिक नहीं होता, जिससे इसका व्यापक आयात व्यावहारिक रूप से आवश्यक नहीं है।

    इसके अलावा, भारत में एथेनॉल उत्पादन बढ़ने के साथ देश में ही डीडीजीएस का उत्पादन भी हो रहा है। ऐसे में आयातित डीडीजीएस पर निर्भरता बढ़ने की संभावना कम है। अमूल प्रबंधन का कहना है कि इस समझौते के तहत पशु आहार या डेयरी क्षेत्र के लिए कोई ऐसा प्रावधान नहीं है, जिससे घरेलू किसानों को तत्काल या गंभीर नुकसान पहुंचे।

    किसान संगठनों की आपत्तियां और सरकार की चुनौती

    दूसरी ओर, कुछ प्रमुख किसान संगठनों ने इस व्यापार समझौते के खिलाफ विरोध दर्ज कराने की घोषणा की है। उनका तर्क है कि किसी भी प्रकार की आयात छूट से घरेलू कृषि बाजार में असंतुलन पैदा हो सकता है और छोटे किसानों के लिए प्रतिस्पर्धा कठिन हो सकती है। किसान संगठनों का यह भी कहना है कि भविष्य में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का प्रभाव बढ़ सकता है, जिससे पारंपरिक कृषि ढांचे पर दबाव पड़ेगा।

    सरकार के सामने चुनौती यह है कि वह व्यापारिक हितों और किसानों की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखे। नीति विशेषज्ञों का मानना है कि यदि निर्यात को बढ़ावा देने के साथ-साथ घरेलू उत्पादन और न्यूनतम समर्थन ढांचे को मजबूत किया जाए, तो अंतरराष्ट्रीय समझौते किसानों के लिए अवसर भी बन सकते हैं।

    दीर्घकालिक दृष्टिकोण की जरूरत

    विशेषज्ञों के अनुसार, भारत की कृषि और डेयरी अर्थव्यवस्था तेजी से बदल रही है। उपभोक्ता मांग, शहरीकरण और वैश्विक व्यापार के कारण आने वाले वर्षों में संरचनात्मक बदलाव अपरिहार्य हैं। ऐसे में व्यापार समझौतों का मूल्यांकन केवल तात्कालिक प्रभाव के आधार पर नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीति के तहत किया जाना चाहिए।

    अमूल जैसे सहकारी संगठनों का अनुभव यह संकेत देता है कि यदि किसानों को उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन की पूरी श्रृंखला में जोड़ा जाए, तो वे वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सामना कर सकते हैं। हालांकि, इसके लिए नीति समर्थन, निवेश और पारदर्शी संवाद आवश्यक है।

    आगे की राह

    भारत–अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर बहस अभी जारी है। एक ओर सरकार और उद्योग जगत इसे अवसर के रूप में देख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर किसान संगठनों की चिंताएं भी सामने हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार किस तरह से हितधारकों के साथ संवाद बढ़ाती है और कृषि क्षेत्र के लिए सुरक्षा उपायों को मजबूत करती है।

    फिलहाल, दुग्ध और पशुपालन क्षेत्र से जुड़े बड़े सहकारी संगठनों का मानना है कि मौजूदा प्रावधानों के तहत किसानों के हितों से समझौता नहीं किया गया है। लेकिन इस दावे की वास्तविकता आने वाले महीनों में बाजार की स्थिति और नीति कार्यान्वयन के जरिए स्पष्ट होगी।

     
     
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