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    ग्रीनलैंड में कूटनीतिक गतिविधि तेज: कनाडा और फ्रांस ने खोले वाणिज्य दूतावास

    1 month ago

    आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ते भू-राजनीतिक घटनाक्रम के बीच कनाडा और फ्रांस ने ग्रीनलैंड की राजधानी नूक में अपने-अपने वाणिज्य दूतावास खोलने की औपचारिक प्रक्रिया पूरी कर ली है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब हाल के महीनों में संयुक्त राज्य अमेरिका की ओर से खनिज-समृद्ध इस अर्ध-स्वायत्त द्वीप पर प्रभाव बढ़ाने को लेकर चर्चाएं तेज रही हैं। दोनों देशों की इस पहल को न केवल ग्रीनलैंड बल्कि उसके प्रशासनिक संरक्षक डेनमार्क के प्रति समर्थन के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

    कनाडा की विदेश मंत्री अनीता आनंद शुक्रवार को नूक पहुंचीं, जहां उन्होंने कनाडाई वाणिज्य दूतावास का उद्घाटन किया। उनके साथ कनाडा की गवर्नर जनरल और स्वदेशी समुदाय से जुड़ी प्रमुख हस्ती मैरी साइमन भी मौजूद रहीं। कनाडाई अधिकारियों के अनुसार, यह दूतावास जलवायु परिवर्तन, आर्कटिक सुरक्षा, स्थानीय इनुइट समुदायों के अधिकारों और सतत विकास जैसे मुद्दों पर सहयोग को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

    कनाडा ने ग्रीनलैंड में वाणिज्य दूतावास खोलने की घोषणा वर्ष 2024 में ही कर दी थी, यानी हालिया अंतरराष्ट्रीय तनावों से पहले। हालांकि, प्रतिकूल मौसम परिस्थितियों के कारण इसका औपचारिक उद्घाटन नवंबर से टलता रहा। अब इसे सक्रिय किए जाने के साथ ही कनाडा ने स्पष्ट किया है कि वह आर्कटिक क्षेत्र में स्थिरता और सहयोग को प्राथमिकता देता है।

    उद्घाटन से एक दिन पहले अनीता आनंद ने डेनमार्क के विदेश मंत्री लार्स लोके रासमुसेन से मुलाकात की थी। इस बैठक के बाद उन्होंने कहा कि आर्कटिक राष्ट्र होने के नाते कनाडा और डेनमार्क क्षेत्रीय सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं। दोनों देशों ने यह भी दोहराया कि ग्रीनलैंड के विकास से जुड़े निर्णय स्थानीय प्रशासन और वहां के लोगों की सहमति से ही होने चाहिए।

    इसी दिन फ्रांस ने भी ग्रीनलैंड में अपना वाणिज्य दूतावास खोलने की घोषणा को अमल में लाया। फ्रांस के विदेश मंत्रालय ने जानकारी दी कि जीन-नोएल पोइरियर ने नूक में फ्रांस के कौंसल जनरल के रूप में कार्यभार संभाल लिया है। इसके साथ ही फ्रांस, ग्रीनलैंड में वाणिज्य दूतावास स्थापित करने वाला पहला यूरोपीय संघ देश बन गया है।

    फ्रांसीसी विदेश मंत्रालय के अनुसार, नए कौंसल जनरल को ग्रीनलैंड के साथ सांस्कृतिक, वैज्ञानिक और आर्थिक क्षेत्रों में पहले से चल रहे सहयोग को और गहरा करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। साथ ही, स्थानीय प्रशासन के साथ राजनीतिक संवाद और समन्वय को भी मजबूत किया जाएगा। फ्रांस का कहना है कि यह निर्णय राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की जून में हुई ग्रीनलैंड यात्रा के बाद लिया गया था, जिसमें आर्कटिक क्षेत्र में यूरोप की भूमिका पर विस्तार से चर्चा हुई थी।

    ग्रीनलैंड, जो डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्त क्षेत्र है, हाल के वर्षों में अपने विशाल प्राकृतिक संसाधनों और रणनीतिक भौगोलिक स्थिति के कारण वैश्विक शक्तियों के ध्यान का केंद्र बना हुआ है। अमेरिका द्वारा यहां की खनिज संपदा और सामरिक महत्व को लेकर रुचि जताए जाने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चाएं और असहजता बढ़ी थी।

    जनवरी में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने डेनमार्क और कुछ अन्य यूरोपीय देशों पर नए शुल्क लगाने की घोषणा की थी। यह कदम उन देशों की आपत्ति के बाद उठाया गया था, जिन्होंने ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की भूमिका पर सवाल खड़े किए थे। हालांकि, बाद में अमेरिका ने इन शुल्कों की धमकी वापस ले ली। यह दावा किया गया कि नाटो महासचिव की मध्यस्थता से खनिज संसाधनों तक पहुंच को लेकर एक प्रारंभिक ढांचा तैयार किया गया है, लेकिन इस समझौते के विवरण सार्वजनिक नहीं किए गए।

    इन घटनाओं के बीच, अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच तकनीकी स्तर की बातचीत भी शुरू हो चुकी है। इन वार्ताओं का उद्देश्य आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा और सहयोग से जुड़ा एक व्यापक ढांचा तैयार करना है। इससे पहले डेनमार्क और ग्रीनलैंड के विदेश मंत्रियों ने अमेरिका के उपराष्ट्रपति और विदेश मंत्री के साथ बैठक में एक संयुक्त कार्य समूह बनाने पर सहमति जताई थी।

    विश्लेषकों का मानना है कि कनाडा और फ्रांस द्वारा ग्रीनलैंड में कूटनीतिक उपस्थिति बढ़ाना आर्कटिक क्षेत्र में संतुलन बनाए रखने की दिशा में एक अहम संकेत है। यह न केवल स्थानीय प्रशासन के साथ प्रत्यक्ष संवाद को मजबूत करेगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी समुदायों के अधिकार और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर बहुपक्षीय सहयोग को भी बढ़ावा देगा।

    ग्रीनलैंड प्रशासन की ओर से भी संकेत दिए गए हैं कि वह अंतरराष्ट्रीय सहयोग का स्वागत करता है, बशर्ते इससे द्वीप की स्वायत्तता, पर्यावरण और स्थानीय आबादी के हितों की रक्षा हो। आने वाले समय में यह देखा जाएगा कि बढ़ती कूटनीतिक गतिविधियां आर्कटिक क्षेत्र के भविष्य को किस दिशा में ले जाती हैं।

     
     
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