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    लोकसभा में हंगामे के कारण पीएम का धन्यवाद प्रस्ताव पर जवाब टला, विपक्ष ने उठाए प्रक्रिया पर सवाल

    3 months ago

    संसद के बजट सत्र के दौरान बुधवार को लोकसभा में तीखी राजनीतिक टकराव की स्थिति देखने को मिली, जिसके चलते प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर दिया जाने वाला जवाब नहीं हो सका। सदन में हुए हंगामे और विरोध प्रदर्शनों के बीच कार्यवाही को दिन भर के लिए स्थगित करना पड़ा। इस घटनाक्रम ने सदन की कार्यप्रणाली, नियमों के पालन और विपक्ष को बोलने के अवसर को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

    धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान बढ़ा तनाव

    लोकसभा में राष्ट्रपति के संयुक्त अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा अपने अंतिम चरण में थी और प्रधानमंत्री को शाम के समय अपना जवाब देना था। हालांकि, इससे पहले ही सदन का माहौल तनावपूर्ण हो गया। विपक्षी दलों की महिला सांसदों ने कथित तौर पर एक सत्तारूढ़ दल के सांसद द्वारा पूर्व प्रधानमंत्रियों को लेकर की गई टिप्पणियों के विरोध में अपनी सीटों से उठकर सदन के आगे के हिस्से में प्रदर्शन किया। उन्होंने बैनर दिखाते हुए विरोध दर्ज कराया, जिससे कार्यवाही बाधित हो गई।

    उस समय प्रधानमंत्री सदन में उपस्थित नहीं थे, लेकिन पीठासीन अधिकारी ने बढ़ते शोर-शराबे और अव्यवस्था को देखते हुए लोकसभा की कार्यवाही पूरे दिन के लिए स्थगित कर दी। इसके साथ ही प्रधानमंत्री का निर्धारित जवाब भी टल गया।

    आरोपों और पुस्तकों के हवाले से विवाद

    दिन में पहले, धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान एक सत्तारूढ़ दल के सांसद ने कुछ पुस्तकों का उल्लेख करते हुए देश के पहले और पूर्व प्रधानमंत्रियों को लेकर आरोप लगाए। विपक्षी दलों ने इन टिप्पणियों को आपत्तिजनक और असंसदीय बताया। विपक्ष का कहना था कि सदन के नियमों के तहत किसी भी सदस्य को बिना अनुमति पुस्तकों या दस्तावेजों से उद्धरण पढ़ने की अनुमति नहीं है, सिवाय इसके कि वह सदन के कार्य से सीधे जुड़ा हो।

    पीठासीन अधिकारी ने नियमों का हवाला देते हुए संबंधित सांसद से आग्रह किया कि वे पुस्तकों का उल्लेख न करें, लेकिन इसके बावजूद कुछ समय तक बहस जारी रही। इस दौरान विपक्षी सांसद वेल में पहुंच गए और दोनों पक्षों के बीच तीखी नोकझोंक हुई, जिससे सदन की कार्यवाही बार-बार बाधित होती रही।

    विपक्ष का आरोप: दोहरे मापदंड अपनाए गए

    विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि सदन के नियमों को लागू करने में दोहरा रवैया अपनाया गया। कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेताओं का कहना था कि जब विपक्ष के नेता या अन्य सांसद बोलने की कोशिश करते हैं तो उनका माइक्रोफोन जल्दी बंद कर दिया जाता है, जबकि सत्तारूढ़ दल के कुछ सांसदों को लंबी अवधि तक बोलने दिया गया।

    विपक्ष के नेताओं ने इसे लोकतांत्रिक परंपराओं और संसदीय मर्यादाओं के खिलाफ बताया। उनका कहना था कि संसद बहस और संवाद का मंच है, लेकिन यदि विपक्ष की आवाज को दबाया जाएगा तो चर्चा का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।

    नेता प्रतिपक्ष को बोलने का अवसर बना मुख्य मुद्दा

    इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में नेता प्रतिपक्ष को बोलने का अवसर न मिलना भी एक बड़ा कारण रहा। विपक्षी दलों का स्पष्ट रुख रहा कि प्रधानमंत्री का जवाब तभी सार्थक होगा जब चर्चा में विपक्ष के नेता को भी अपनी बात रखने का पूरा अवसर दिया जाए। कांग्रेस नेताओं ने संकेत दिया कि जब तक नेता प्रतिपक्ष को बोलने की अनुमति नहीं दी जाती, तब तक वे प्रधानमंत्री के जवाब के लिए सदन को सुचारु रूप से चलने देने के पक्ष में नहीं हैं।

    विपक्ष ने यह भी याद दिलाया कि अतीत में भी संसदीय इतिहास में ऐसे उदाहरण रहे हैं, जब राजनीतिक गतिरोध के कारण प्रधानमंत्री का धन्यवाद प्रस्ताव पर जवाब टल गया था। विपक्ष का तर्क है कि यह कोई असाधारण स्थिति नहीं है, बल्कि संसदीय परंपराओं के भीतर ही घटित हुआ घटनाक्रम है।

    स्पीकर से की गई मुलाकात और कार्रवाई की मांग

    सदन की कार्यवाही स्थगित होने के बाद विपक्षी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात की और घटनाक्रम पर आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने विवादित टिप्पणियों को सदन की कार्यवाही से हटाने और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई की मांग की। देर शाम तक सदन के आधिकारिक रिकॉर्ड से कुछ आपत्तिजनक टिप्पणियों को हटाए जाने की जानकारी सामने आई।

    विपक्ष का कहना है कि यह कदम स्वागतयोग्य है, लेकिन भविष्य में ऐसे मामलों को रोकने के लिए स्पष्ट और समान नियमों का पालन जरूरी है।

    संयुक्त रणनीति की तैयारी

    दिन के अंत में प्रमुख विपक्षी दलों के नेताओं ने बैठक कर आगे की रणनीति पर चर्चा की। तय किया गया कि अन्य विपक्षी दलों के साथ समन्वय कर एक साझा रुख अपनाया जाएगा, ताकि सदन में विपक्ष की बात प्रभावी ढंग से रखी जा सके। गुरुवार को इस संबंध में व्यापक बैठक कर आगे की कार्ययोजना तय करने पर सहमति बनी।

    संसद की कार्यप्रणाली पर सवाल

    लोकसभा में हुए इस घटनाक्रम ने एक बार फिर संसद की कार्यप्रणाली और संवाद की संस्कृति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतंत्र में असहमति और बहस स्वाभाविक है, लेकिन बार-बार कार्यवाही बाधित होने से विधायी कामकाज प्रभावित होता है। बजट सत्र जैसे महत्वपूर्ण समय में इस तरह की रुकावटें न केवल समय की बर्बादी हैं, बल्कि जनहित से जुड़े मुद्दों पर चर्चा को भी पीछे धकेल देती हैं।

    आगे की राह

     

    अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में यह गतिरोध कैसे सुलझेगा। क्या प्रधानमंत्री धन्यवाद प्रस्ताव पर अपना जवाब दे पाएंगे और क्या विपक्ष को अपनी बात रखने का संतोषजनक अवसर मिलेगा, यह संसद की अगली बैठकों में स्पष्ट होगा। फिलहाल, यह घटनाक्रम संसद में सहयोग, संवाद और नियमों के समान पालन की आवश्यकता को एक बार फिर रेखांकित करता है।

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