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    सोने-चांदी की कीमतों का अनुमान: क्या तेजी टिकेगी?

    3 months ago

    वैश्विक बाजारों में सोने और चांदी की कीमतों में हाल के दिनों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। पिछले कुछ हफ्तों में रिकॉर्ड स्तर छूने के बाद इन कीमती धातुओं में भारी गिरावट आई, लेकिन अब एक बार फिर इनमें रिकवरी के संकेत दिखाई दे रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह रिकवरी पूरी तरह स्थिर नहीं है और आने वाले दिनों में बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है।

    आनंद राठी शेयर्स एंड स्टॉक ब्रोकर्स के कमोडिटीज़ और करेंसीज़ विभाग के एवीपी मनीष शर्मा के अनुसार, सोने और चांदी की मौजूदा कीमतें कई वैश्विक और घरेलू कारकों से प्रभावित हो रही हैं। निवेशकों को निकट अवधि में सतर्क रहने की आवश्यकता है, जबकि दीर्घकालिक दृष्टिकोण से इन धातुओं की बुनियाद अब भी मजबूत बनी हुई है।

    हालिया गिरावट और रिकवरी की वजह

    इस सप्ताह सोना और चांदी दोनों में रिकवरी देखी गई, क्योंकि रिकॉर्ड रैली के बाद आई तेज गिरावट पर निवेशकों ने “डिप पर खरीदारी” की रणनीति अपनाई। स्पॉट गोल्ड में करीब 10 से 12 प्रतिशत की तेजी देखने को मिली, जब यह $4404 प्रति औंस के निचले स्तर से उबरा। वहीं चांदी में 20 प्रतिशत से अधिक की उछाल आई और यह फिर से $87 प्रति औंस के ऊपर पहुंच गई।

    हालांकि, इससे पहले की गिरावट बेहद तेज थी। बाजार विशेषज्ञों ने चेतावनी दी थी कि खासतौर पर चांदी की कीमतें बहुत तेजी से और बहुत ज्यादा बढ़ गई थीं। इसी वजह से मुनाफावसूली और दबाव दोनों देखने को मिले।

    CME के फैसले और डॉलर की भूमिका

    कीमतों में आई बड़ी गिरावट का एक प्रमुख कारण CME ग्रुप द्वारा सोने और चांदी दोनों पर मार्जिन आवश्यकताओं में बढ़ोतरी थी। इस कदम के बाद लीवरेज पर ट्रेड करने वाले निवेशकों को अपने पोजीशन बंद करने पड़े, जिससे बाजार में तेज बिकवाली शुरू हो गई।

    इसके साथ ही महीने के अंत में डॉलर में मजबूती भी देखने को मिली। अमेरिकी प्रशासन द्वारा केविन वार्श को फेडरल रिजर्व का अगला चेयरमैन नामित किए जाने की खबरों ने बाजार की धारणा को और प्रभावित किया। निवेशक वार्श को महंगाई के खिलाफ सख्त रुख अपनाने वाले नीति निर्माता के रूप में देखते हैं, जिससे ब्याज दरों के सख्त बने रहने की उम्मीद बढ़ गई। इसका सीधा असर सोने जैसी डॉलर-आधारित संपत्तियों पर पड़ा।

    भू-राजनीतिक अनिश्चितता और फेड की भूमिका

    जनवरी महीने में सोने की तेजी के पीछे भू-राजनीतिक तनाव, मुद्रा अवमूल्यन की चिंताएं और फेडरल रिजर्व की स्वतंत्रता को लेकर आशंकाएं भी प्रमुख कारण थीं। जब ये चिंताएं कुछ हद तक कम हुईं और डॉलर मजबूत हुआ, तो सोने-चांदी पर दबाव बढ़ गया।

    हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि फेड चेयर को लेकर अटकलें अभी खत्म नहीं हुई हैं। केविन वार्श की नियुक्ति की औपचारिक पुष्टि बाकी है, और उनकी मौद्रिक नीति को लेकर अनिश्चितता बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगी।

    साप्ताहिक आउटलुक: क्या कहता है बाजार?

    मनीष शर्मा के अनुसार, मौजूदा समय में बाजार बेहद संवेदनशील है। ऊंचे स्तरों पर पोजीशन एडजस्टमेंट के कारण बिकवाली का दबाव बन सकता है, लेकिन लंबे समय के लिए फंडामेंटल्स अब भी सकारात्मक हैं।

    • स्पॉट गोल्ड (CMP $4915/औंस): मौजूदा सप्ताह में अस्थिरता के साथ $5020 से $5090 प्रति औंस तक जाने की संभावना।

    • स्पॉट सिल्वर: कीमतें उतार-चढ़ाव के साथ $90 से $91 प्रति औंस तक पहुंच सकती हैं।

    चीन की मांग से मिल रहा है सहारा

    चीन के बाजारों में सोने और चांदी की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार (LBMA) की तुलना में प्रीमियम पर ट्रेड कर रही हैं, जो मजबूत मांग और सीमित आपूर्ति का संकेत देती हैं। इस साल की शुरुआत से ही चीन में चांदी की उपलब्धता कम रही है।

    सोने की बात करें तो हाल के हफ्तों में चीन में गोल्ड ETF में निवेश अमेरिका की तुलना में ज्यादा रहा है, जबकि अमेरिकी ETF होल्डिंग्स चीन से 7–8 गुना बड़ी हैं। इसके अलावा, स्प्रिंग फेस्टिवल से पहले ज्वेलरी की थोक मांग में भी तेजी आई है, जिसे कीमतों में आई गिरावट ने और बढ़ावा दिया।

    हालांकि, 17 फरवरी से चीन में लूनर न्यू ईयर की छुट्टियों के चलते एक्सचेंज वॉल्यूम कुछ समय के लिए कम रह सकता है।

    डॉलर, अमेरिकी डेटा और रुपये का असर

    डॉलर में हालिया मजबूती निकट अवधि में सोने की कीमतों को “रोलर कोस्टर” पर रख सकती है। निवेशकों की नजर अमेरिका की मासिक जॉब्स रिपोर्ट पर भी है, हालांकि सरकारी शटडाउन की स्थिति में इसके जारी होने में देरी हो सकती है।

    भारत में, भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के बाद रुपये में आई मजबूती ने घरेलू सोने की कीमतों में तेजी को सीमित किया है। मजबूत रुपया आयातित सोने को सस्ता बनाता है, जिससे कीमतों पर दबाव आता है।

    दीर्घकालिक दृष्टिकोण: सोने की चमक बरकरार?

    विशेषज्ञों का मानना है कि लंबी अवधि में सोने और चांदी की संभावनाएं अब भी मजबूत हैं। अगर सोने की कीमतें $4650–$4500 प्रति औंस के स्तर तक गिरती हैं, तो वहां से नई निवेश मांग देखने को मिल सकती है।

    ब्याज दरों के भविष्य को लेकर अनिश्चितता, केंद्रीय बैंकों की निरंतर खरीद, ETF में निवेश और अमेरिकी परिसंपत्तियों से विविधीकरण की प्रवृत्ति 2026 में भी जारी रह सकती है। इन सभी कारकों के चलते साल की दूसरी छमाही में सोना $6000 प्रति औंस के स्तर का परीक्षण कर सकता है।

    निष्कर्ष

    संक्षेप में कहा जाए तो, सोने और चांदी की कीमतों में मौजूदा रिकवरी राहत देने वाली जरूर है, लेकिन यह पूरी तरह स्थिर नहीं है। निकट अवधि में अस्थिरता बनी रह सकती है, जबकि दीर्घकाल में कीमती धातुओं का दृष्टिकोण सकारात्मक बना हुआ है। निवेशकों को जल्दबाजी से बचते हुए संतुलित रणनीति अपनानी चाहिए और गिरावट के स्तरों को अवसर के रूप में देखना चाहिए।

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