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    12वें लोक उत्सव के दूसरे दिन संगीत, संवाद और उत्तर-दक्षिण संगम का ऐतिहासिक उत्सव

    3 months ago

    तिलोनिया/अजमेर. 12वें लोक उत्सव के दूसरे दिन संस्कृति, संविधान और सामूहिकता का एक सशक्त और ऐतिहासिक उदाहरण प्रस्तुत किया गया। तिलोनिया स्थित बेयरफुट कॉलेज में कार्यक्रम की शुरुआत भारतीय संविधान की प्रस्तावना के सामूहिक वाचन से हुई। इस गंभीर और प्रेरक क्षण ने पूरे दिन के आयोजन को न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों से जोड़ दिया।

    सभा को संबोधित करते हुए अरुणा रॉय ने खमायती संगीत और उससे जुड़े समुदायों की परंपराओं पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि संगीत केवल कला नहीं, बल्कि जीवन का अभिन्न हिस्सा है, यह श्रम, भक्ति, उत्सव और संघर्ष की अभिव्यक्ति है। उन्होंने जोर देकर कहा, “संगीत का कोई धर्म नहीं होता। भारत हम सबका है, हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई और संगीत हमें एक सूत्र में बांधता है।”

    उन्होंने प्रसिद्ध लोककला मर्मज्ञ कोमल कोठारी के योगदान को स्मरण करते हुए बताया कि किस प्रकार उन्होंने राजस्थान की लोक परंपराओं को संरक्षित करने और उन्हें सम्मान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    लोक वाद्य और मरुस्थल की गूंज- 12वें लोक उत्सव के दूसरे दिन 12वें लोक उत्सव के दूसरे दिन सरंगी और कमायचा जैसे पारंपरिक वाद्यों का परिचय कराया गया। सरंगी की मानवीय स्वर जैसी गूंज और कमायचा की गहरी लय ने श्रोताओं को लोक संगीत की आत्मा से परिचित कराया। लंगा गायकों ने प्रेम, आस्था और रोज़मर्रा के जीवन से जुड़े गीत प्रस्तुत किए, जो पीढ़ियों की स्मृतियों को जीवंत करते हैं।

    कुलदीप कोठारी ने बाजरे के सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह केवल एक अनाज नहीं, बल्कि जीवन, आस्था और साझा अस्तित्व का प्रतीक है। लंगा गायकों ने बाजरा और जीरा पर आधारित विशेष गीत प्रस्तुत कर साधारण जीवन को सांस्कृतिक उत्सव में बदल दिया।

     

    महिला स्वर की सामूहिक शक्ति भी 12वें लोक उत्सव के दूसरे दिन का महत्वपूर्ण आकर्षण रही। मेधा साही के ‘स्ट्रेंजर्स क्वायर’ ने लगभग सौ स्वरों के साथ “भेणा चेत सके तो चेत” गीत प्रस्तुत किया। शंकर सिंह ने महिला मेला के इतिहास को साझा करते हुए कहा कि महिलाएँ गीतों की सर्जक और संवाहक हैं; उनके अनुभव और भावनाएँ ही लोक परंपराओं को जीवंत बनाए रखती हैं।

     

     *12वें लोक उत्सव के दूसरे दिन, सोफिया कॉलेज, अजमेर में उत्तर-दक्षिण संगीत संगम* 

    12वें लोक उत्सव के दूसरे दिन अजमेर के सोफिया कॉलेज में एक विशेष कार्यशाला आयोजित की गई, जिसने उत्तर और दक्षिण भारत की संगीत परंपराओं को पहली बार एक साझा मंच पर लाकर एक ऐतिहासिक पहल की।

    कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. ज्योति चंदेल के द्वारा कलाकारों एवं अन्य अतिथियों के स्वागत से हुई। अरुणा रॉय ने 12वें लोक उत्सव की अवधारणा और उद्देश्य को साझा किया, जबकि कलाकारों का परिचय शेफाली मार्टिन द्वारा कराया गया।

    दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत की प्रतिष्ठित गायिका संगीता शिवकुमार ने अपनी प्रस्तुति से कर्नाटक संगीत की गहराई और सूक्ष्मता को सामने रखा। उनके साथ मृदंगम वादक अश्विनी श्रीनिवासन, वायलिन वादक हरिता नारायण और घाटम वादक सुमना चंद्रशेखर ने संगत की।

    राजस्थान की लोक परंपरा का प्रतिनिधित्व दरिया बाई, हनीफा बाई, मांड़ गायिका मांगी बाई, कमायचा वादक घेवर खान मांगणियार तथा ढोलक वादक कुतला खान मांगणियार ने किया।

    जब कर्नाटक संगीत की जटिल राग संरचना और राजस्थान के लोक संगीत की सहजता एक साथ मंच पर गूंजी, तो 12वें लोक उत्सव के दूसरे दिन यह संगम भारत की विविधता में एकता का जीवंत प्रतीक बन गया।

     *12वें लोक उत्सव के दूसरे दिन यह स्पष्ट हुआ कि लोक परंपराएँ केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान की जीवंत शक्ति हैं। संगीत, संवाद और साझी स्मृतियों के माध्यम से यह उत्सव एक ऐसे भारत की कल्पना को साकार करता है, जहाँ विविधता ही एकता की सबसे मजबूत नींव है।* 

    इस वर्ष के लोक उत्सव की एक विशेष पहचान यह रही कि राजस्थान और दक्षिण भारत से बड़ी संख्या में महिला कलाकारों ने सक्रिय भागीदारी की। यह केवल प्रस्तुति का विस्तार नहीं, बल्कि एक नई सांस्कृतिक परंपरा की शुरुआत है, जहाँ स्त्री स्वर केंद्र में हैं और लोक एवं शास्त्रीय परंपराओं के बीच सशक्त संवाद स्थापित हो रहा है।

     *कल (28 फरवरी) होंगे ये प्रमुख कार्यक्रम* 

    लोक उत्सव के तीसरे दिन, 28 फरवरी को प्रातः 7 बजे अमानत, अम्मा का बगीचा में सुप्रभातम् के साथ कार्यक्रम की शुरुआत होगी। इस अवसर पर तुंगीनाथ एवं कालबेलिया महिला कलाकारों द्वारा फाग और होली के पारंपरिक गीत प्रस्तुत किए जाएंगे।

    प्रातः 9:30 बजे से एम्फीथिएटर में बीन, मुरली, सुरनाई, शहनाई, मुरला और नरह जैसे वात्य वाद्यों की प्रस्तुतियाँ होंगी। साथ ही सुरमंडल और सुरिंदा का वादन सिंधी सारंगी और कामायचा की संगत में किया जाएगा। चंग, डेरू और चकरी जैसे पारंपरिक नृत्य भी प्रस्तुत किए जाएंगे।

    दोपहर 3 बजे दलाई लामा हॉल में “परफॉर्मिंग समुदायों के अधिकार” विषय पर कार्यशाला आयोजित होगी, जिसमें निखिल डे, पारस बंजारा और शंकर सिंह विचार रखेंगे। विशेष अतिथि सोहेल हाशमी रहेंगे।

    सायं 6 बजे एम्फीथिएटर में “विरासत” प्रस्तुति के तहत लंगा और मांगणियार समुदाय की तीन पीढ़ियाँ पारंपरिक शैली में गायन करेंगी। इसके बाद “डायलॉग ऑफ द ड्रम्स” जुगलबंदी के साथ कार्यक्रम का समापन होगा।

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