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    अभिषेक मनु सिंघवी: टाटा संस के खिलाफ ट्रस्ट्स की कानूनी लड़ाई में कौन हैं वरिष्ठ अधिवक्ता

    4 hours ago

    Yugcharan News / 21-09-2026

    टाटा समूह के भीतर चेयरमैन पद और भविष्य की रणनीति को लेकर चल रहा विवाद अब कानूनी मोर्चे पर भी महत्वपूर्ण रूप ले चुका है। टाटा ट्रस्ट्स ने वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी को अपनी ओर से पैरवी के लिए नियुक्त किया है। ट्रस्ट्स की ओर से यह कदम टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति और कंपनी की प्रस्तावित लिस्टिंग से जुड़े मुद्दों पर उठाया गया है।

    इस मामले में सिंघवी की भूमिका इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि वह इससे पहले टाटा संस और साइरस मिस्त्री के बीच हुए लंबे कानूनी विवाद में टाटा पक्ष की ओर से पेश हो चुके हैं। उस समय उन्होंने टाटा संस के बोर्ड और उसके फैसलों का प्रतिनिधित्व किया था। अब वही वरिष्ठ वकील टाटा ट्रस्ट्स की ओर से टाटा संस के मौजूदा नेतृत्व से जुड़े सवालों पर कानूनी पक्ष रख रहे हैं।

    टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस में लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। ट्रस्ट्स ने 17 सितंबर को टाटा संस के बोर्ड द्वारा चंद्रशेखरन को पांच वर्ष के एक और कार्यकाल के लिए चेयरमैन नियुक्त किए जाने की वैधता पर सवाल उठाया है। इसके साथ ही प्रस्तावित सार्वजनिक लिस्टिंग को लेकर भी मतभेद सामने आए हैं।

    टाटा विवाद में सिंघवी की नई भूमिका

    टाटा ट्रस्ट्स की ओर से सिंघवी की नियुक्ति ऐसे समय हुई है जब समूह के भीतर कंपनी के प्रशासन, चेयरमैन के कार्यकाल और टाटा संस की भविष्य की संरचना को लेकर चर्चा तेज है।

    सिंघवी ने इस विवाद में अपनी भूमिका को लेकर ‘दुख और खेद’ की भावना व्यक्त की है। इसकी वजह उनके दिवंगत रतन टाटा के साथ पुराने संबंध भी बताए गए हैं। हालांकि, कानूनी रूप से उनका वर्तमान दायित्व टाटा ट्रस्ट्स का पक्ष रखना है और विवाद से जुड़े मुद्दों पर ट्रस्ट्स की ओर से तर्क प्रस्तुत करना है।

    यह स्थिति उनके पुराने टाटा मामले से अलग है। साइरस मिस्त्री को टाटा संस के चेयरमैन पद से हटाए जाने के बाद शुरू हुए विवाद में सिंघवी टाटा पक्ष की कानूनी टीम का हिस्सा थे। मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने टाटा संस के बोर्ड द्वारा मिस्त्री को हटाने के फैसले को बरकरार रखा था और मामले में टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका तथा कंपनी के Articles of Association से जुड़े अधिकारों पर भी विचार किया था।

    कौन हैं अभिषेक मनु सिंघवी?

    अभिषेक मनु सिंघवी सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता होने के साथ-साथ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद हैं। वह तेलंगाना का प्रतिनिधित्व करते हैं। संसद और कांग्रेस संगठन में भी उन्होंने कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाई हैं।

    सिंघवी 1997 में महज 37 वर्ष की उम्र में भारत के सबसे युवा अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बने थे। उन्होंने 1997 से 1998 तक इस पद पर काम किया।

    उनके पिता लक्ष्मी मल सिंघवी भी देश के जाने-माने विधिवेत्ता, राजनयिक और सांसद थे। वह ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त रह चुके थे और राज्यसभा के सदस्य भी रहे थे।

    अभिषेक मनु सिंघवी ने दिल्ली के सेंट कोलंबा स्कूल और सेंट स्टीफंस कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने अर्थशास्त्र में बीए ऑनर्स किया। इसके बाद उन्होंने कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज से उच्च शिक्षा हासिल की, जहां उन्होंने एमए और पीएचडी की डिग्री प्राप्त की। उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय में पब्लिक इंटरनेशनल लॉ के समर प्रोग्राम में भी हिस्सा लिया।

    साइरस मिस्त्री विवाद में टाटा पक्ष के वकील

    सिंघवी के करियर से जुड़े प्रमुख मामलों में टाटा संस और साइरस मिस्त्री का विवाद विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। मिस्त्री को टाटा संस के चेयरमैन पद से हटाए जाने के बाद कंपनी और मिस्त्री पक्ष के बीच लंबी कानूनी लड़ाई चली।

    मामला राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण से लेकर उच्च न्यायालय और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। सिंघवी टाटा पक्ष की ओर से कानूनी टीम में शामिल थे। 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने टाटा संस के बोर्ड के निर्णय को बरकरार रखा।

    अब टाटा ट्रस्ट्स की ओर से सिंघवी की नियुक्ति के कारण उनके पुराने कानूनी अनुभव का संदर्भ फिर सामने आया है। हालांकि वर्तमान विवाद के मुद्दे अलग हैं और इसमें टाटा ट्रस्ट्स की ओर से उठाए जा रहे सवालों पर कानूनी बहस होनी है।

    नेशनल हेराल्ड मामले में भी पैरवी

    सिंघवी कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं की ओर से भी अदालतों में पेश होते रहे हैं। नेशनल हेराल्ड से जुड़े मामलों में उन्होंने कांग्रेस नेता सोनिया गांधी सहित अन्य नेताओं का प्रतिनिधित्व किया है।

    यह मामला Associated Journals Limited और Young Indian से जुड़े कानूनी और वित्तीय मुद्दों से संबंधित है। विभिन्न जांच एजेंसियों की कार्रवाई और उससे जुड़े कानूनी विवादों में सिंघवी कांग्रेस नेताओं के प्रमुख कानूनी प्रतिनिधियों में शामिल रहे हैं।

    डी.के. बसु मामला और हिरासत में अधिकार

    सिंघवी का नाम सुप्रीम कोर्ट के चर्चित डी.के. बसु मामले से भी जुड़ा रहा है। यह मामला हिरासत में हिंसा, अवैध हिरासत और मानवाधिकारों की सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों से संबंधित है।

    बाद की कार्यवाही में सुप्रीम कोर्ट ने सिंघवी को एमिकस क्यूरी यानी अदालत के सहयोगी के रूप में नियुक्त किया था। उन्होंने हिरासत में लोगों के अधिकारों की सुरक्षा और अदालत के पहले से तय दिशा-निर्देशों को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए अतिरिक्त उपायों की जरूरत पर अपनी दलीलें रखीं।

    डी.के. बसु मामले में सुप्रीम कोर्ट का मूल फैसला हिरासत में यातना और अवैध गिरफ्तारी से जुड़े सुरक्षा उपायों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

    राष्ट्रीय ध्वज से जुड़ा ऐतिहासिक मामला

    सिंघवी उन वकीलों में भी रहे हैं जिन्होंने नागरिक अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण संवैधानिक मामलों में पैरवी की है। Union of India बनाम नवीन जिंदल मामले में उन्होंने नवीन जिंदल की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दलीलें रखी थीं।

    इस मामले में अदालत ने राष्ट्रीय ध्वज फहराने के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के एक पहलू के रूप में माना था, हालांकि यह अधिकार उचित प्रतिबंधों के अधीन है।

    जलीकट्टू मामले में भूमिका

    2017 में जलीकट्टू से जुड़े कानूनी विवाद में भी सिंघवी ने Animal Welfare Board of India की ओर से पैरवी की थी। मामला पशु क्रूरता, जलीकट्टू की वैधता और इस प्रथा को अनुमति या विनियमित करने के लिए बनाए गए कानूनों से जुड़े सवालों पर केंद्रित था।

    यह मामला पशु कल्याण और परंपरागत प्रथाओं के बीच कानूनी संतुलन से जुड़े व्यापक संवैधानिक और विधिक प्रश्नों के कारण महत्वपूर्ण रहा।

    टेलीकॉम क्षेत्र के बड़े मामलों में भी प्रतिनिधित्व

    सिंघवी ने अपने लंबे कानूनी करियर में देश की कई बड़ी दूरसंचार कंपनियों का प्रतिनिधित्व किया है। इनमें भारती एयरटेल, वोडाफोन और आइडिया जैसी कंपनियां शामिल रही हैं।

    इन मामलों में स्पेक्ट्रम शुल्क, राजस्व हिस्सेदारी, 3G इंट्रा-सर्किल रोमिंग व्यवस्था, लाइसेंस नवीनीकरण और 2G स्पेक्ट्रम विवाद से जुड़े कानूनी प्रश्न शामिल रहे हैं। टेलीकॉम क्षेत्र में हुए नियामकीय और कानूनी बदलावों के दौरान इन मामलों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    दिल्ली आबकारी नीति मामले में भी पैरवी

    सिंघवी दिल्ली आबकारी नीति मामले में आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की ओर से भी सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए हैं। उन्होंने पूर्व दिल्ली मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की ओर से गिरफ्तारी और जमानत से जुड़े मामलों में दलीलें रखीं।

    इन मामलों में केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाई, गिरफ्तारी की वैधता और जमानत के कानूनी मानकों से जुड़े प्रश्न सुप्रीम कोर्ट के सामने आए।

    राहुल गांधी के मानहानि मामले में प्रतिनिधित्व

    कांग्रेस नेता राहुल गांधी से जुड़े ‘मोदी सरनेम’ मानहानि मामले में भी सिंघवी उनके कानूनी प्रतिनिधियों में शामिल रहे। 2023 में राहुल गांधी को आपराधिक मानहानि मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद उनकी लोकसभा सदस्यता चली गई थी।

    इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उनकी दोषसिद्धि पर रोक लगा दी, जिसके बाद उनकी संसदीय सदस्यता बहाल होने का रास्ता साफ हुआ।

    PMLA से जुड़े मामलों में दलीलें

    सिंघवी ने Prevention of Money Laundering Act यानी PMLA से संबंधित कई महत्वपूर्ण मामलों में भी कानूनी दलीलें रखी हैं। विशेष रूप से कानून की कड़ी जमानत शर्तों और प्रवर्तन एजेंसियों की शक्तियों से जुड़े सवालों पर उन्होंने अदालतों में बहस की है।

    विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ जैसे महत्वपूर्ण मामलों में PMLA की धाराओं और जमानत से जुड़ी ‘ट्विन कंडीशंस’ पर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष व्यापक कानूनी बहस हुई थी।

    अब टाटा समूह में नया कानूनी अध्याय

    टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच मौजूदा विवाद में सिंघवी की नियुक्ति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह टाटा समूह के पिछले बड़े कॉरपोरेट विवाद में दूसरी तरफ से कानूनी प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।

    वर्तमान मामले में मुख्य प्रश्न टाटा संस के चेयरमैन के रूप में एन. चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति, बोर्ड के 17 सितंबर के प्रस्ताव और कंपनी की प्रस्तावित लिस्टिंग से जुड़े हैं। टाटा ट्रस्ट्स की ओर से इन मुद्दों की वैधता और प्रक्रिया को लेकर आपत्तियां उठाई गई हैं।

    आगे की कानूनी कार्यवाही में दोनों पक्षों के तर्क, कंपनी के Articles of Association, ट्रस्ट्स के अधिकार और टाटा संस के कॉरपोरेट प्रशासन से जुड़े प्रावधान महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। ऐसे में अभिषेक मनु सिंघवी का अनुभव इस विवाद के कानूनी पक्ष में प्रमुखता से सामने आया है।

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