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    भगवान श्री देवनारायण के पुत्र-पुत्री बिला-बिली का जन्म

    1 month ago

    भगवान देवनारायण माता साडू से आकर कहते हैं अब हम लौटकर बैकुंठ में वापस जायेगें। हमारा दिया वचन पूरा हुआ। आपकी झोलियां खेलें हैं। अब आप मुझे हंसी-खुशी विदा करो।

    पीपलदे की आंखों मे आंसु देखकर देवनारायण कहते हैं क्या हुआ, आप क्यों रोती है ?

    पीपलदेजी कहती है कि भगवान मेरे दिन कैसे कटेंगे ? भगवान कहते हैं कि पीपलदे मैंने आपको जो बीला दिया था वो कहां हैं ? पीपलदेजी कमरे का ताला खोलकर बीले को लेकर आती है। छोटा सा बीला था जब रखा था, अब ये बीला बड़ा हो गया है, जैसे मां के गर्भ में बच्चा बड़ा होता है, उसी तरह बीले में बच्चा पल रहा था। भगवान देवनारायण भैरुजी को कहते है कि इस बीले के दो फाड़ करो। एक भाग में बीली बाई थी और दूजा फाड़ मे बीला था। ये दोनों पीपलदेजी को देते हैं और कहते हैं ये दोनों तुम्हारे बेटा-बेटी है, इनको पालो ये तुम्हारी सेवा करेगें।

    देवनारायण मेदूजी, मदनसिहंजी, भांगीजी, को तो अपने साथ बैकुंठ ले जाते हैंं। और भूणाजी को अमर कर देते हैं। और भगवान वहां से पहले नाग पहाड़ पर आते हैं और फिर अन्तध्र्यान हो जाते हैं। पीपलदेजी से कह जाते हैं कि मैंने ३ ब्याह शादियां करी। तीनों को लोग मेरे साथ पूजेगें। तीनों को एक जगह रखेगें। इस प्रकार जो देवनारायण का पाट लगता हैं वो तो राक्षस कन्या है और जो जोत दीप जुड़ते है वो राजा बासक की नाग कन्या और जो ईंटें है वो पीपलदेजी का स्वरुप और उनको पूजा में नीम की पत्तियां चढ़ती हैं।

    वीला-बीली जब बड़े होते हैं तब नापाजी उन्हें अपने मां-बाप की देवलियों की सेवा में लेकर जाते हैं। बीली तो सेवा करने के लिए तैयार हो जाती है मगर बीला सेवा करने से मना कर देता है। उसी दिन से बीला के शरीर में कोढ़ हो जाता है

    गांव वाले भी बिला-बिली को गांव से निकाल देते हैं। यहां तक कि उन दोनों को भीख मांगकर अपना गुजारा करना पड़ता है। बिली, बिला को भगवान देवनारायण की सेवा करने के लिए बहुत समझाती है।

    आखिर में बिला मान जाता है और देवनारायण भगवान की सेवा करने के लिए तैयार हो जाता है। तब भगवान उनको साक्षात दर्शन देते हैं और उनका सारा कोढ खत्म कर उनकी देह को कंचन जैसा कर देते हैं।

    और कहते हैं कि बीला अगर तू अहंकार नहीं करता तो मेरे बराबर मेरे आसन पर बैठता। अब तूने अहंकार किया था तो तेरा स्थान हमेशा मंदिर के पिछवाड़े ही होगा। तबसे देवनारायण के देवरों के पीछे बीले का स्थान होता है।

     

     

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