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    कारस देव का इतिहास

    1 month ago

    पिता राजू चंदीला और बड़ी बहिन एलादे

    प्राचीन काल की बात है ,उस समय गढ़ राजौर पर राजू चंदीला गुर्जर नामक बहादुर योद्धा राज किया करता था ,उस राज्य प्रजा बहुत सुखी थी, उनकी पत्नी सोडा बहुत ही धार्मिक विचारों बाली अत्यंत सुन्दर महिला थी ,उनके गर्भ से पहली संतान पुत्री हुई, ज्योतिषियों ने उस कन्या का नामकरण एलादे नाम से किया, और राजा को उसके भविष्य के बारे में बताया कि हे राजन ,यह लड़की बड़ी होकर आपके कुल का नाम रोशन करेगी ,समय बीतता गया एला दे बड़ी हुई और पास के पहाड़ के मंदिर में देवी की तपस्या करने लगी ,जिससे उसमे अध्यात्मिक बल बढ़ने लगा एक दिन दिल्ली के बादशाह अल्लाउद्दीन खिलजी का मदमस्त हाथी सांकल तोड़कर भाग छूटा ,हाथी के पीछे पीछे सैनिक और हाथी को सँभालने बाले दौड़ते हुए चल रहे थे , हाथी के पीछे पीछे सांकल जमीन पर रगड़ती जा रही थी ,लेकिन किसी भी सैनिक की हिम्मत नहीं थी कि उस हाथी की सांकल पकड़ कर रोके। वह हाथी खेत खलिहान जानवर इंसान सभी को रौंदता हुआ आगे बढ़ रहा था ,जब यह दृश्य एला ने देखा तो उसने देवी में श्रद्धा रखते हुए उनके नाम का सुमिरन कर पैर का अंगूठा सांकल पर रख दिया ,और हाथी को रोक दिया। यह दृश्य देखकर सैनिको को बहुत आश्चर्य हुआ ,उन्होंने एला दे से उसका परिचय पूछा ,एला दे ने जबाब दिया ,तुम्हारा हाथी तुम्हारी पकड़ में आ गया ,अपना हाथी वापस ले जाओ ,मेरे पिता राजू चंदीला को अगर पता लग गया कि तुम लोगों ने हाथी से जानमाल का इतना नुक्सान पहुँचाया है ,तो तुम्हारी उम्र जेल में ही बीतेगी सैनिकों ने लौट कर सारा समाचार बादशाह को सुनाया ,और बताया कि हमने शूरवीर तो बहुत देखे है ,लेकिन शूरवीरों से भी बहुत शक्तिशाली और अत्यंत सुन्दरी ,राजा राजू चंदीला की पुत्री एला दे जैसी वीरांगना कभी नहीं देखी ,बादशाह के पुत्र ने ऐसी वीरांगना से शादी की प्रबल इच्छा जताई , तो बादशाह ने अपने पुत्र से शादी करने के लिए एला दे से शादी का प्रस्ताव भिजवाया ,अन्यथा युद्ध की धमकी दी ,राजू चंदीला ने युद्ध को चुना ,भयंकर युद्ध हुआ ,,राजू चंदीला की थोड़ी सी सेना बादशाह के सामने धराशाई होने लगी अगले दिन हार निश्चित मानकर ,राजू चंदीला रात्रि में सुरंगो में होते हुए बचते बचाते ,अपनी पुत्री और पत्नी को लेकर ,भरतपुर की ओर रवाना हो गये ,जहाँ उन्होंने बैर तहसील के निठार गाँव में बसेरा किया ,दूसरे दिन बल्लभगढ़ होते बूढी जहाज पहुंचे ,जहाज पहुंचकर राजू चंदीला ने ,मान्या लुहार के यहाँ नौकरी कर लीमान्या लुहार काफी बलशाली और बात बाला योद्धा था ,उसको जब राजू चंदीला ने मामला समझाया तो मान्या लुहार बादशाह के खिलाफ राजू चंदीला को दोस्त की तरह समर्थन देने को तैयार हो गया।

    *कारस देव का जन्म*

    मान्या लुहार के साथ रहते हुए एक बर्ष पश्चात ,भादो वदी 4 को रात्रि 12 बजे कारस देव का जन्म हुआ। 

    कारस देव बहुत ही तेजी से शरीर के आकार में बढ़ रहे थे ,जब वो पांच बर्ष के हो गए ,तब वो जंगल में अकेले खेल रहे थे ,वहाँ उन्होंने देखा कि एक साधु समाधी लगाये हुए थे ,वह साधू स्वयं शंकर भगवान् थे संस्कारी परिवार से संस्कार युक्त बालक कारस देव श्रद्धा से उनके पास बैठे रहे ,जब साधू की समाधी खुली तो साधू से उन्होंने प्रणाम किया ,और पूछा बाबा में आपकी क्या सेवा करूँ ,साधु के वेशधारी शंकर भगवान् ने बालक को कमंडल देकर कहा कि हे बालक जा और इस कमंडल में बिन ब्याई बकरी का दूध ले आ ,बालक श्रद्धा पूर्वक कमंडल लेकर एक बकरी चराने बाले ग्वाला के पास पहुंचा ,और बिन ब्याई बकरी का थोडा दूध कमंडल में देने को कहा , ग्वाला ने कहा हे बालक बिन ब्याई बकरी कभी दूध नहीं देती ,जो अभी ब्याई (ब्याना =बच्चा को जन्म देना )ही नहीं है ,वो दूध कैसे देगी ,जा वो रही बिन ब्याई बकरी ,अगर तुझे दूध दे दे तो तू निकाल ले ,ग्वाल ने बिन ब्याई बकरी को इशारे से बताया, बालक ने कमंडल लेकर जैसे ही उस बिन ब्याई बकरी के नीचे रखा उसके थनो (स्तन )से अपने आप दूध की धार बहने लगी ,बालक कारस देव समझ गए ये कोई चमत्कारी साधू है ,शायद स्वयं त्रिलोकी शंकर भगवान् ही हों। ऐसी मान्यता है कि उस दिन के महादेव के वरदान के फलस्वरूप 100 में से एकाध बिन ब्याई बकरी भी दूध देती है ,जिसे ईन्दल या अलहद बकरी भी कहा जाता है। जब कारस देव दूध लेकर लौटे तो साधू ने कहा हे संस्कारी आज्ञाकारी और श्रद्धावान बालक तेरा तेरा गुरु कौन है ? बालक ने बताया अभी तक मेरा कोई गुरु नहीं बना ,साधू ने पुनः कहा अरे बालक जिसका कोई गुरु नहीं हो उसकी सेवा में ग्रहण नहीं कर सकता ,इसलिए पहले अपना गुरु बनाओ ,तब बालक कारस देव ने चतुराई पूर्वक कहा कि ,हे त्रिलोकीनाथ आप से अच्छा गुरु कौन हो सकता है ,दूध पीने से पहले मुझे शिष्य बना लो और दूध भी पी लो।

    *शिवजी गुरु*

    साधू वेश शिवजी ने कारस देव को शिष्य बनाकर दूध पिया। शिवजी वहीँ रह कर तपस्या करने लगे और बालक कारस देव उनकी सेवा करते रहे,और उनको अध्यात्मिक शक्तियों से परिपूर्ण करते रहे, जब साधु वेश शिवजी का वहाँ तपस्या का समय पूरा हुआ तो ,साधु वेश शिवजी के जाने से पहले उनसे प्रार्थना की ,हे त्रिलोकीनाथ भविष्य में आपके तपस्या स्थान की पहचान बनाने के लिए आप इस सूखे और निर्जन स्थान पर,हिमालय जैसी गंगा न सही प्यास बुझाने बाली गंगा तो बहा दो , शिवजी तथास्तु कह अंतर्ध्यान हो गए।कारिश देव गुरु के स्थान पर शिवलिग स्थापित कर उसकी पूजा करने लगे बूढी जहाज गांव को गुर्जर श्रद्धालु पूजनीय स्थान मानते हैं ,बड़ी श्रद्धा के साथ पवित्र कुंड में स्नान करते है ,गुरु की तपस्या के स्थान पर पूजा बाला शिवलिग मौजूद है ,और पूजा बाले स्थान से ही शीतल गंगा निकलती है ,जिसे शीते कुंड कहा जाता है,जिसका महत्व पुष्कर सरोवर की तरह है। और आज भी मौजूद है ,श्रद्धालु बहुत दूर दूर से आकर इस कुंड में नहाते है ,विश्वाश है कि इसमें स्नान से समस्त पाप कट जाते है ,तथा असाध्य चर्म जहाँ तक कि कोढ़ भी ठीक हो जाता है कारस देव जब जवान हुए तो अध्यात्मिक शक्तियों से युक्त महान शक्तिशाली योद्धा भी बन गए ,बताया जाता है ,कि उन्होंने अपने छोटे भाई सूरपाल के साथ , मेवाड़ तक राज्य किया। और चमत्कारों से जन जन के लोकप्रिय बन गए ,हर इंसान और पशुधन को बीमारियों से मुक्त करते रहे ,भैसे पर सवार उनका स्वरुप दुश्मनों को यमराज का अवतार लगता था , सूरपाल को आज की मूर्तियों में घोड़े पर सवार और कारस देव को भैसे पर सवार माना जाता है, उनके जीवनकाल में उन्होंने चमत्कारों की झड़ी लगा दी, जीवन के अंतिम दिनों में कारस देव पुनः तपस्या हेतु हिमालय चले गए ,उनकी अनुपस्थिति में दुर्भाग्यबश उनके छोटे भाई सूरपाल को सांप ने डस लिया ,जब एला दे ने अपने छोटे भाई सूरपाल के लिए बिलाप किया ,और बेहोश हो गई ,जब बेहोश होकर पत्थर पर गिरी तो उनके सिर से खून बह निकला ,जब होस आया तो एला दे के हाथ खून से रंग गए ,एला दे ने जब खून से रंगे हाथ पत्थर कि शिलाओं पर पटके तो उनका रंग लाल हो गया ,आज भी जहाज गाँव के मंदिर के पास हाथ के छापों बाली खून से लाल शिलाएं मौजूद है ,जब एला दे का विलाप सुना तो कारिश देव हिमालय से वापस लौटे ,और अपनी अध्यात्मिक शक्ति से साँपों को आकर्षित करने लगे जिस इलाके में कारस देव के छोटे भाई सूरपाल को साँप ने काटा था उस इलाके के समस्त साँप घबरा कर इकट्ठे होने लगे ,और सभी साँप छोटे भाई सूरपाल को स्वयं द्वारा ना डसे जाने की दुहाई देने लगे ,अंत में डसने बाला सांप भी आ गया ,और भय से डसे गए भाई को जहर वापस खींचकर पुनर्जीवित करने को तैयार हो गया ,लेकिन शर्त रखी कि जहाँ भी जहर को डाला जायेगा वो स्थान निर्जन हो जायेगा ,या फिर कमसे कम दो व्यक्तियों जान ले लेगा कारस देव ने शर्त मान ली और छोटे भाई सूरपाल जीवित हो उठे अब आई बारी जहर को निस्तारण की तो कारस देव ने अपने दो दोस्तों को बताया कि उन्हें आज जहर का प्रसाद लेना होगा ,लेकिन जहर पीकर भी ऐसा पुनर्जन्म पाएंगे जो कि देवता के रूप में अमर हो जायेंगे ,उन पर अगले जन्म में सांप के जहर का कोई असर नहीं होगा ,तथा उनमें किसी भी सांप के काटे इंसान या जानवर को पुनर्जीवित करने की क्षमता होगी ,दोनों दोस्तों ने खुसी खुसी जहर पी लिया ,और उनके प्राण पखेरू उड़ गए ,पुनर्जन्म के पश्चात ,दोनों दोस्तों ने दो गुर्जर गाँवो में चंदीला गोत्र में ही जन्म लिया ,जिन दो जगहों पर लोकदेवताओं का पुनर्जन्म हुआ उनमे से पहला है , रेती जो कि मध्यप्रदेश मुरैना में स्थित है जहाँ पर हीरा भूमियां नाम के लोकदेवता ने जन्म लिया ,दूसरा स्थान है विरजा जो कि राजस्थान के धौलपुर जिला में स्थित है। हमारे समाज में ,आज भी पूर्वी राजस्थान और पश्चिमी मध्यप्रदेश के इलाके में ,इन दोनों लोकदेवताओं की अत्यधिक मान्यता है , कहा जाता है ,किसी भी प्रकार के सांप का काटा हुआ जानवर या मनुष्य अगर इन लोकदेवताओं के मंदिर तक ले आया जाये तो उसकी मृत्यु नहीं होती ,आज भी किसी के भी सांप द्वारा डसे जाने पर सीधा मंदिर स्थान पर लाया जाता है अन्य कथाओं में कारस देव द्वारा अपने अध्यात्मिक चमत्कार के रूप में बहिन के बच्चे की शादी में भात भरना ,बादशाह की बेटी से व्याह करना ,और हर दुखी और जरूरतमंद की सहायता करना है ,जिसको उनकी गोठ (गाथा ) के रूप में गोठिया (पुजारी भक्त )गाते है कारस देव गुर्जरों के पशुधन की हर प्रकार की बीमारी से बचाव करने बाले ,बाँझ गाय, भैस को गर्भवती बनाने का आशीर्वाद देने बाले ,और गाय भैस को इच्छित बछड़ा और पाड़ी (कटली ,कटड़ी ) प्रदान करने बाले देवता है , कारस देव की गाथा बुन्देलखण्ड अंचल की गुर्जर एवं अहीर जातियों के मध्य विख्यात है। यह गाथा गोटों के (गीत की एक शैली विशेष) रूप में गायी जाती है। गाथा के नायक, पशुपालक जाति के वीर कारसदेव के चबूतरे स्थापित होते है। इन पर ईटों के दो छोटे घर बने होते हैं। जन का मानना है कि एक में कारसदेव और दूसरे में भाई सूरजपाल प्रतिष्ठित है। बांस पर सफेद झंडी की ध्वजा फहरायी जाती है। प्रत्येक माह की कृष्ण चतुर्थी एवं शुक्ल चतुर्थी को गुर्जर अहीर इकट्ठा हो धुल्ला पदधारी व्यक्ति के साथ इकट्ठे होते है जिस पर कारसदेव की सवारी आती है। प्रस्तुत गाथा में कारसदेव के जन्म से लेकर मृत्यु तक की कथा गायी जाती है। इसमें उनके द्वारा किये गए अद्भुत एवं अलौकिक साहसी कार्यो का वर्णन होता हैं।

    कारस-देव की पूजा पशु-रक्षा के साथ-साथ झाड़-फूंक के लिए भी की जाती है। मैकासुर की तरह ही इनका भी पूजा का स्थान ऊँचे से टीले पर बना होता है। कारस-देव को एतिहासिक व्यक्तित्व मन गया है। ये हैहय वंशी राजाओं की परम्परा के स्वीकारे गए हैं। इनकी पूजा के समय भी प्रसाद को वहीं पर समाप्त करने का विधान है, प्रसाद को घर नहीं ले जाया जाता है। इनके प्रसाद में सफ़ेद ध्वजा, नारियल आदि चढाने का चलन है। इनकी पूजा के समय इनके नाम का दरवार लगता है, जिसमें लोग अपनी समस्या को सामने रखते हैं। एक व्यक्ति जिसे मन जाता है कि उस पर कारस-देव का प्रभाव आ जाता है वह भक्तों की समस्याओं को सुनता है तथा झाड़-फूंक के साथ उनका निदान भी करता है। इन दोनों लोक-देवताओं के बारे में एक बात खास है कि होली के अवसर पर गुर्जर व अहीर जाति के लोग इन दोनों लोक-देवताओं के समक्ष नृत्य करते हैं।

     

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