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    अधिकारों को कागज़ों में सीमित नहीं रहने दिया जाएगा- निखिल डे

    1 month ago

    स्वास्थ्य का अधिकार कानून देश-दुनिया को दिशा दिखा सकता है-डॉ. नरेन्द्र गुप्ता

     

     12–13 घंटे काम, शिकायत पर आईडी ब्लॉक, हमें हर हाल में न्याय चाहिए-सिंपल कुमावत, महिला गिग वर्कर

     

     नियमों के अभाव में ठप पड़े जनहित के कानून, सामाजिक न्याय पर गहराता संकट

     

     *स्वास्थ्य का अधिकार लागू नहीं, सामाजिक सुरक्षा पेंशन में 50 रुपये की बढ़ोतरी और रोजगार में खानापूर्ति, गरीबों के अधिकारों के साथ खिलवाड़ बंद करना होगा* 

     

     *सामाजिक सुरक्षा पेंशन में 15% की बढ़ोतरी नहीं कर सकते तो मुख्यमंत्री, मंत्री, अफसर और कर्मचारियों की बढ़ने वाली तनख्वाह और पेंशन पर रोक लगाई जाए* 

     

    जयपुर, 

    राजस्थान में जन आंदोलनों की मांग पर राज्य विधानसभा द्वारा सामाजिक न्याय और अधिकार आधारित तीन ऐतिहासिक कानून पारित किए गए थे:

    1. राजस्थान न्यूनतम आय गारंटी अधिनियम 2023

    2. राजस्थान स्वास्थ्य का अधिकार अधिनियम 2023

    3. राजस्थान प्लेटफॉर्म आधारित गिग वर्कर्स कल्याण एवं पंजीकरण अधिनियम 2023

    ये कानून राज्य में सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं की गारंटी और असंगठित व गिग श्रमिकों के संरक्षण की दिशा में ऐतिहासिक और दूरदर्शी पहल थे। किंतु अत्यंत चिंता और गंभीर आपत्ति का विषय है कि वर्तमान राज्य सरकार द्वारा इन कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु आवश्यक नियम (Rules) अब तक अधिसूचित नहीं किए गए हैं। नियमों के अभाव में ये कानून व्यवहार में लागू ही नहीं हो पा रहे हैं और इनका उद्देश्य अधूरा रह गया है।

    11 फरवरी को राज्य विधानसभा में प्रस्तुत बजट में भी सामाजिक क्षेत्र की स्पष्ट और गंभीर अनदेखी दिखाई दी है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा और रोजगार जैसे मूलभूत अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर ठोस एवं पर्याप्त प्रावधानों का अभाव चिंताजनक है। यह स्थिति दर्शाती है कि सरकार जनहितकारी कानूनों और सामाजिक सरोकारों को प्राथमिकता देने में विफल रही है।

    विशेष रूप से स्वास्थ्य का अधिकार कानून देश का पहला ऐसा कानून है जिसने प्रत्येक नागरिक को वैधानिक रूप से स्वास्थ्य सेवाओं का अधिकार प्रदान किया। परंतु विडंबना यह है कि इसके नियम बनाकर लागू नहीं किया जा रहा है। न तो स्वास्थ्य संस्थानों की आधारभूत संरचना को सुदृढ़ किया गया है, न ही मानव संसाधन, दवाओं और आपात सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की गई है। बिना नियम और प्रशासनिक ढांचे के यह ऐतिहासिक कानून केवल कागज़ों में सीमित रह गया है। यहाँ तक कि राज्य के स्वास्थ्य मंत्री विधानसभा में यह तक कहते हैं कि इस कानून की जरूरत ही नहीं है, जो यह दर्शाता है कि राज्य सरकार की राज्य के नागरिकों के स्वास्थ्य के प्रति प्रतिबद्धता पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।

    जन स्वास्थ्य अभियान से जुड़े डॉ. नरेन्द्र गुप्ता ने कहा, “स्वास्थ्य का अधिकार कानून अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कानून है। यह केवल राजस्थान ही नहीं, बल्कि देश और पूरी दुनिया को दिशा दिखा सकता है। यदि इसे गंभीरता से लागू किया जाए तो जनस्वास्थ्य का पूरा ढांचा मजबूत होगा और वंचित एवं गरीब नागरिकों को वास्तविक स्वास्थ्य सुविधाएँ मिल सकेंगी। लेकिन सरकार की उदासीनता अत्यंत चिंताजनक है।”

    इसी प्रकार, न्यूनतम आय गारंटी अधिनियम के तहत सामाजिक सुरक्षा पेंशन में प्रतिवर्ष 15% वृद्धि का प्रावधान था। यदि यह प्रावधान लागू होता तो पेंशन राशि 1322 रुपये प्रतिमाह होती और वित्तीय वर्ष 2026–27 में 1520 रुपये तक पहुँचती। किंतु न तो पिछले वर्ष 15% वृद्धि की गई और न ही इस वर्ष—केवल 50 रुपये की नाममात्र बढ़ोतरी की गई है। यह पेंशनधारकों के साथ अन्याय और संवेदनहीनता का स्पष्ट उदाहरण है। यदि सरकार 15% वृद्धि देने में असमर्थ है, तो मुख्यमंत्री, मंत्रियों, अफसरों और कर्मचारियों की वेतन व पेंशन वृद्धि पर भी समान रूप से रोक लगाई जानी चाहिए। इसी कानून के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में 25 दिन का अतिरिक्त रोजगार और शहरी क्षेत्रों में 125 दिन का रोजगार उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया था। किंतु जमीनी स्तर पर, विशेषकर शहरी क्षेत्रों में, रोजगार उपलब्ध कराने के नाम पर केवल खानापूर्ति की जा रही है। बेरोजगार युवाओं और जरूरतमंद परिवारों को अपेक्षित अवसर और सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध नहीं हो पा रहा है।

    VB-GRAMG अधिनियम, 2025 की धारा 30 स्पष्ट रूप से कहती है:

    “इस अधिनियम या इसके अंतर्गत बनाई गई किसी भी योजना के प्रावधान, वर्तमान में प्रभावी किसी अन्य कानून या ऐसे किसी कानून के आधार पर प्रभावी किसी साधन/दस्तावेज़ में निहित किसी भी असंगत प्रावधान के बावजूद प्रभावी रहेंगे। परंतु यह कि जहाँ कोई राज्य अधिनियम विद्यमान है या बनाया जाता है, जो ग्रामीण परिवारों को अकुशल शारीरिक कार्य के लिए रोजगार गारंटी प्रदान करता हो और जो इस अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप हो, तथा जिसके अंतर्गत परिवारों को दी जाने वाली गारंटी इस अधिनियम में प्रदत्त गारंटी से कम न हो और रोजगार की शर्तें इस अधिनियम में निर्धारित शर्तों से निम्नतर न हों, वहाँ राज्य सरकार को अपने स्वयं के अधिनियम को लागू करने का विकल्प होगा। यह भी प्रावधानित है कि ऐसे मामलों में वित्तीय सहायता संबंधित राज्य सरकार को उस प्रकार से प्रदान की जाएगी जैसा कि केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित किया जाएगा, परंतु यह सहायता उस राशि से अधिक नहीं होगी, जितनी राज्य इस अधिनियम के अंतर्गत बनाई गई योजना के लागू होने की स्थिति में प्राप्त करने का अधिकारी होता।” यह प्रावधान स्पष्ट करता है कि यदि राज्य सरकार चाहे तो अपने कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू कर सकती है। इसके बावजूद राज्य में पारित कानूनों को लागू न करना सरकार की प्राथमिकताओं और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।

    प्लेटफॉर्म आधारित गिग वर्कर्स कल्याण एवं पंजीकरण अधिनियम 2023 के तहत हर वर्ष बजटीय प्रावधान किया जाता है, लेकिन उसका समुचित उपयोग नहीं किया जाता। वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए 350 करोड़ रुपये का प्रावधान गिग एवं ई-कॉमर्स श्रमिकों के लिए किया गया, किंतु व्यय नगण्य रहा है।

    महिला गिग वर्कर सिंपल कुमावत ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा, “हम अपने काम के सचमुच मालिक नहीं हैं। कंपनियाँ हमसे 12–13 घंटे तक काम करवाती हैं। यदि हम किसी प्रकार की शिकायत करते हैं या अपने अधिकारों की बात करते हैं, तो हमारी आईडी ब्लॉक कर दी जाती है। हमारे पास कोई सुरक्षा, कोई सुनवाई और कोई न्याय का तंत्र नहीं है। हमें हर हाल में न्याय चाहिए।” उनका यह बयान गिग श्रमिकों की असुरक्षित और शोषणपूर्ण कार्य परिस्थितियों को उजागर करता है।

    11 फरवरी 2026 को प्रस्तुत बजट में भी अधिकार आधारित इन कानूनों के क्रियान्वयन के लिए न तो पर्याप्त बजटीय प्रावधान स्पष्ट किए गए हैं और न ही कोई ठोस, समयबद्ध कार्ययोजना सामने रखी गई है। इन कानूनों को लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे ने कहा कि जब विधानसभा कानून पारित करती है और सरकार उन्हें नियमों के अभाव में लागू नहीं करती, तो यह लोकतंत्र के साथ अन्याय है। सामाजिक सुरक्षा पेंशन में 50 रुपये की वृद्धि गरीबों के साथ संवेदनहीनता दर्शाती है। अधिकार आधारित कानूनों को निष्प्रभावी करना जनता के संघर्षों का अपमान है। “अधिकारों को कागज़ों में सीमित नहीं रहने दिया जाएगा।”

    अभियान की ओर से पूर्व में भी राज्य के मुख्यमंत्री से इस संबंध में बातचीत हेतु समय मांगा और राज्य के मुख्य सचिव से लेकर संबंधित विभागों, मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों को ज्ञापन एवं संवाद के माध्यम से अवगत कराया कि नियमों के अभाव में कानून लागू नहीं हो पा रहे हैं। इसके बावजूद अनदेखी जारी है। यह स्थिति अब अस्वीकार्य है और इसे और अधिक बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हम राज्य सरकार से मांग करते हैं कि:

    • तीनों कानूनों के नियम तत्काल अधिसूचित किए जाएँ।

    • सामाजिक सुरक्षा पेंशन में 15% वार्षिक वृद्धि के प्रावधान का पालन किया जाए।

    • ग्रामीण और शहरी रोजगार गारंटी को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।

    • स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने हेतु ठोस बजटीय एवं प्रशासनिक कदम उठाए जाएँ।

    राज्य विधानसभा द्वारा पारित जनहितकारी कानूनों को लागू करना सरकार की संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी है। यदि सरकार स्वयं विधानसभा से पारित कानूनों को प्रभावी रूप से लागू नहीं कर पा रही है, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया और जनता के जनादेश दोनों के साथ अन्याय है। ऐसी स्थिति में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि जब पारित कानूनों को ही लागू नहीं किया जा रहा है, तो सत्ता में बने रहने का नैतिक औचित्य क्या रह जाता है।

    सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों ने सरकार से मांग की है कि इन तीनों कानूनों के नियम तत्काल बनाए जाएँ, बजट में सामाजिक क्षेत्र को प्राथमिकता दी जाए तथा जनहित के प्रावधानों को बिना विलंब लागू किया जाए। अन्यथा व्यापक जनआंदोलन के लिए बाध्य होना पड़ेगा।

     

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