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    भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत डीडीजीएस आयात पर सीमित शुल्क रियायत, केवल 5 लाख टन को मंजूरी

    2 hours ago

    Yugcharan / 08/02/2026

    भारत सरकार ने भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते के पहले चरण के अंतर्गत अमेरिका से सूखे डिस्टिलर्स ग्रेन्स विद सॉल्यूबल्स (डीडीजीएस) के सीमित आयात को मंजूरी दी है। इस निर्णय के तहत केवल 5 लाख टन डीडीजीएस पर शुल्क रियायत दी जाएगी, जो देश में कुल पशु आहार खपत का लगभग एक प्रतिशत है। सरकार का कहना है कि यह कदम घरेलू पशु आहार आपूर्ति को सहारा देने, बढ़ती मांग को संतुलित करने और खाद्यान्न सुरक्षा बनाए रखने के उद्देश्य से उठाया गया है।

    सरकारी अधिकारियों के अनुसार, देश में पशु आहार की कुल वार्षिक खपत करीब 500 लाख टन है। इसके मुकाबले अमेरिका से आयात की अनुमति दी गई मात्रा बेहद सीमित है। अधिकारियों का कहना है कि इस आयात से घरेलू बाजार पर किसी प्रकार का नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा और न ही मानव उपभोग के लिए इस्तेमाल होने वाले खाद्यान्नों की उपलब्धता प्रभावित होगी।

    डीडीजीएस मुख्य रूप से एथनॉल उत्पादन के बाद बचा हुआ उप-उत्पाद होता है, जिसका उपयोग पशु आहार में प्रोटीन स्रोत के रूप में किया जाता है। भारत में पोल्ट्री, डेयरी, मत्स्य पालन और पशुपालन क्षेत्रों में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि सीमित मात्रा में डीडीजीएस आयात से पशु आहार की लागत में उतार-चढ़ाव को कम करने में मदद मिलेगी, जिससे इन क्षेत्रों में उत्पादन लागत नियंत्रित रह सकेगी।

    सरकारी स्तर पर यह भी स्पष्ट किया गया है कि इस कदम का उद्देश्य मक्का और सोयाबीन जैसे प्रमुख फीड अनाजों पर दबाव कम करना है। वर्तमान में पशु आहार के लिए मक्का, गेहूं और सोयाबीन मील का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है। अनुमान के अनुसार, मक्का की खपत लगभग 200 लाख टन, गेहूं की 65 लाख टन और सोयाबीन मील की करीब 62 लाख टन है। ये तीनों मिलकर कुल पशु आहार खपत का लगभग दो-तिहाई हिस्सा बनाते हैं।

    देश में बढ़ती जनसंख्या, आय में वृद्धि और शहरीकरण के कारण दूध, मांस, अंडे और मत्स्य उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है। इसके साथ ही पशु आहार की जरूरत भी बढ़ रही है। हालांकि, सीमित कृषि भूमि, उत्पादन क्षमता में अंतर और जलवायु संबंधी चुनौतियों के चलते घरेलू स्तर पर पशु आहार की आपूर्ति पर दबाव बना हुआ है। ऐसे में सरकार का मानना है कि नियंत्रित आयात एक व्यावहारिक समाधान हो सकता है।

    आधिकारिक आकलन के अनुसार, यदि मौजूदा रुझान जारी रहे तो 2030 के शुरुआती वर्षों तक पशु आहार की मांग घरेलू आपूर्ति से अधिक हो सकती है। सभी यथार्थवादी विकास परिदृश्यों में कुछ मात्रा में आयात की आवश्यकता सामने आ रही है। इससे पहले भी देश को घरेलू कीमतों में दबाव के चलते 2021 में सोयाबीन मील का आयात करना पड़ा था।

    वर्तमान स्थिति में भारत विभिन्न देशों से पशु आहार और उससे जुड़े कच्चे माल का आयात करता है। आंकड़ों के मुताबिक, देश हर साल 6 लाख टन से अधिक पशु आहार, लगभग 6 लाख टन सोयाबीन और करीब 9 लाख टन मक्का आयात करता है। इन आयातों के प्रमुख स्रोतों में एशिया और अफ्रीका के कई देश शामिल हैं। ऐसे में अमेरिका से सीमित मात्रा में डीडीजीएस आयात को आपूर्ति स्रोतों के विविधीकरण के रूप में भी देखा जा रहा है।

    नीति निर्माताओं का कहना है कि यह निर्णय खाद्य महंगाई को नियंत्रित रखने में भी सहायक हो सकता है। पशु आहार की लागत में वृद्धि का सीधा असर दूध, अंडे और मांस जैसे उत्पादों की कीमतों पर पड़ता है। यदि आहार लागत स्थिर रहती है, तो उपभोक्ताओं को भी राहत मिल सकती है।

    सरकार ने यह भी रेखांकित किया है कि डीडीजीएस आयात से घरेलू मक्का और सोयाबीन बाजारों पर दबाव कम होगा, जिससे इन फसलों की उपलब्धता मानव उपभोग और अन्य प्राथमिक जरूरतों के लिए बनी रहेगी। इसके अलावा, यह कदम राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा और कृषि निर्यात लक्ष्यों के अनुरूप बताया जा रहा है।

    व्यापार विशेषज्ञों के अनुसार, केवल एक प्रतिशत आयात कोटा तय करना एक संतुलित और कम जोखिम वाला फैसला है। इससे न तो घरेलू किसानों के हितों को नुकसान होगा और न ही बाजार में अस्थिरता आएगी। साथ ही, यह भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में विश्वास निर्माण की दिशा में एक सीमित लेकिन व्यावहारिक कदम माना जा रहा है।

    कुल मिलाकर, डीडीजीएस पर दी गई यह सीमित शुल्क रियायत सरकार की उस रणनीति को दर्शाती है, जिसमें घरेलू जरूरतों, किसानों के हितों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार संतुलन के बीच संतुलन साधने का प्रयास किया गया है। आने वाले समय में पशु आहार की मांग और आपूर्ति की स्थिति को देखते हुए इस नीति की समीक्षा की जा सकती है, लेकिन फिलहाल इसे एक सावधानीपूर्वक और नियंत्रित पहल के रूप में देखा जा रहा है।

     
     
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