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    क्या अमेरिका–ईरान कूटनीति सफल हो पाएगी? बातचीत की सीमित खिड़की के भीतर तनाव कम करने की कोशिश

    3 months ago

    ईरान और अमेरिका के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव के बीच कूटनीति एक बार फिर सक्रिय होती दिख रही है। तेहरान में अब सवाल यह नहीं रह गया है कि बातचीत शुरू हुई है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या यह प्रक्रिया इतनी तेज़ी से आगे बढ़ पाएगी कि हालात किसी बड़े टकराव की ओर जाने से पहले संभाले जा सकें। हालिया संकेत बताते हैं कि दोनों पक्ष फिलहाल सैन्य टकराव से बचने के लिए संवाद को प्राथमिकता दे रहे हैं, हालांकि रास्ता अब भी बेहद संकरा और अनिश्चित है।

    ईरानी अधिकारियों के अनुसार, ईरान और अमेरिका के बीच अगली दौर की बातचीत के लिए ओमान को स्थान के रूप में तय किया गया है। यह बैठक इसी सप्ताह के अंत में होने की संभावना है। हालांकि, फिलहाल इन वार्ताओं में अन्य क्षेत्रीय देशों को शामिल नहीं किया जाएगा। ईरान का मानना है कि शुरुआती चरण में सीमित और केंद्रित बातचीत ही अधिक प्रभावी हो सकती है।

    क्षेत्रीय देशों को बाहर रखने का कारण

    ईरान के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, क्षेत्रीय देशों को फिलहाल बातचीत से बाहर रखने का फैसला किसी को अलग-थलग करने के इरादे से नहीं है। बल्कि आशंका यह है कि ज्यादा पक्षों की मौजूदगी से वार्ता का स्वरूप गंभीर बातचीत के बजाय राजनीतिक प्रदर्शन में बदल सकता है। ईरान चाहता है कि पहले अमेरिका के साथ द्विपक्षीय संवाद एक स्थिर ढांचे में आए, उसके बाद ही क्षेत्रीय साझेदारों को शामिल किया जाए।

    वहीं, क्षेत्रीय मध्यस्थ देशों की सोच कुछ अलग है। उनका मानना है कि फिलहाल वे केवल बातचीत को आसान बनाने वाले पक्ष नहीं हैं, बल्कि भविष्य में किसी भी समझौते के गारंटर की भूमिका निभा सकते हैं। मध्य पूर्व के कई देशों की स्थिरता सीधे तौर पर अमेरिका–ईरान संबंधों से जुड़ी हुई है, इसलिए वे इस प्रक्रिया को केवल दूर से देखने वाले नहीं रह सकते।

    2015 के परमाणु समझौते से अलग हालात

    विश्लेषकों के अनुसार, मौजूदा स्थिति 2015 के परमाणु समझौते से काफी अलग है। उस समय बातचीत मुख्य रूप से परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंधों तक सीमित थी। अब 2026 में हालात अधिक सैन्य प्रकृति के हो चुके हैं। क्षेत्रीय तनाव, समुद्री गतिविधियां और सुरक्षा से जुड़े मुद्दे केंद्र में हैं। ऐसे में आसपास के देश भी सीधे तौर पर प्रभावित हितधारक बन चुके हैं।

    हाल के दिनों में ईरान और कई क्षेत्रीय देशों के बीच कूटनीतिक गतिविधियां तेज हुई हैं। ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रमुख ने हाल ही में रूस का दौरा कर वहां के नेतृत्व से मुलाकात की। इसके अलावा, ईरानी विदेश मंत्री ने तुर्की में भी उच्चस्तरीय परामर्श किए। इन बैठकों के बाद कतर के प्रधानमंत्री ने तेहरान की यात्रा की, जिसे इस प्रक्रिया में एक अहम कदम माना जा रहा है।

    व्यापक समझौते की दिशा में संकेत

    इन सभी कूटनीतिक प्रयासों के बीच ईरान की ओर से यह संकेत भी मिला है कि बातचीत केवल किसी अस्थायी या आंशिक समझौते तक सीमित नहीं रह सकती। सूत्रों के मुताबिक, एक व्यापक और दीर्घकालिक समझौते की रूपरेखा पर काम शुरू हो चुका है। इसका उद्देश्य केवल मौजूदा संकट को टालना नहीं, बल्कि भविष्य में ऐसे हालात दोबारा न बनें, इसके लिए ठोस व्यवस्था करना है।

    हालांकि, वाशिंगटन की ओर से संदेश अब भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में कहा कि ईरान से बातचीत जारी है, लेकिन परिणाम को लेकर उन्होंने अनिश्चितता भी जताई। यह रुख कूटनीति और दबाव, दोनों को साथ लेकर चलने की अमेरिकी रणनीति को दर्शाता है।

    क्या युद्ध का खतरा टल गया है?

    विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल युद्ध का खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन उसमें कुछ कमी जरूर आई है। विश्वास बहाली के उपाय, जैसे कि ईरान के उच्च संवर्धित यूरेनियम भंडार को लेकर संभावित कदम, तनाव कम करने में मदद कर सकते हैं। इसके बावजूद कई अहम मुद्दे अब भी अनसुलझे हैं।

    इनमें सबसे प्रमुख हैं ईरान का बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन से जुड़ा उसका दृष्टिकोण। अमेरिका केवल जोखिम प्रबंधन तक सीमित समझौता नहीं चाहता, जबकि ईरान ऐसी किसी भी डील से बचना चाहता है जो किसी एक प्रशासन के बदलते ही पलट दी जाए।

    आगे का रास्ता

    वर्तमान हालात में दोनों पक्ष यह परख रहे हैं कि क्या स्थायी गारंटी के बदले संरचनात्मक रियायतें दी जा सकती हैं। वार्ता का प्रारूप, स्थान और भागीदारी जैसे मुद्दे फिलहाल द्वितीयक हैं। असली परीक्षा इस बात की होगी कि बातचीत ठोस नतीजों तक पहुंच पाती है या नहीं।

     

    फिलहाल इतना जरूर है कि कूटनीति आगे बढ़ रही है, सैन्य टकराव टल गया है और बातचीत की खिड़की अभी खुली हुई है। यह खिड़की कितने समय तक खुली रहेगी, यह आने वाले दिनों में दोनों पक्षों के फैसलों और समझौतों पर निर्भर करेगा।

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