Search

    Language Settings
    Select Website Language

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policy, and Terms of Service.

    मालवा से वापसी: जब भगवान देवनारायण के स्पर्श से खिल उठा सूखा बाग और राजकुमारी को मिली कष्टों से मुक्ति

    1 day ago

    धार/मालवा। जन-जन के आराध्य और भगवान विष्णु के अवतार श्री देवनारायण की मालवा से गोठां वापसी की यात्रा भक्ति और चमत्कारों की नई गाथा लिख रही है। मालवा में अपने ननिहाल से विदा होकर जब नारायण अपनी माता साडू और ग्वालों के काफिले के साथ निकले, तो राह में आने वाली धार नगरी उनके दिव्य प्रताप की साक्षी बनी।

    चित्र के रूप में छोड़ी अपनी स्मृतियां

    प्रस्थान से पूर्व, भावुक मामा-मामियों के आग्रह पर देवनारायण ने अपनी स्मृति के रूप में एक विशेष मार्ग चुना। उन्होंने भाट के माध्यम से छीपा जाति के चित्रकार से अपना चित्र बनवाया और परिजनों को भेंट किया, ताकि उनके जाने के बाद भी भक्त उनके दर्शन कर सकें।

    सूखे बाग में लौटे प्राण, राजकुमारी पीपलदे का हुआ कायाकल्प

    कथा के अनुसार, जब देवनारायण का काफिला धार नगरी पहुँचा, तो वहां एक लंबे समय से सूखा पड़ा बाग उनके चरण स्पर्श मात्र से हरा-भरा हो गया। इसी बाग में धार की राजकुमारी पीपलदे माता की पूजा करने पहुंची थीं। राजकुमारी पीपलदे जन्म से ही असाध्य कोढ़ और माथे पर सींग जैसी व्याधि से पीड़ित थीं।

    जैसे ही देवनारायण की दिव्य दृष्टि उन पर पड़ी, चमत्कारिक रूप से उनका कोढ़ समाप्त हो गया और माथे का सींग गिर गया। इस कायाकल्प के साथ ही पीपलदे को अपने पूर्व जन्म का आभास हुआ और उन्हें ज्ञात हुआ कि भगवान विष्णु ने ही देवनारायण के रूप में अवतार लिया है, जो उन्हें इस श्राप से मुक्ति दिलाएंगे।

    विवाह की शर्त और गढ़ गाजणा का संकट

    राजकुमारी पीपलदे ने अपने पिता राजा जय सिंह से देवनारायण के साथ विवाह की इच्छा प्रकट की। हालांकि, शुरुआत में राजा सामाजिक भिन्नता के कारण हिचकिचाए, लेकिन राजकुमारी की दृढ़ प्रतिज्ञा के आगे उन्हें झुकना पड़ा। राजा ने एक कठिन शर्त रखते हुए कहा कि यदि देवनारायण गढ़ गाजणा के राक्षस राजा से धार नगरी के छीने हुए किवाड़ (दरवाजे) वापस ले आएंगे, तभी यह विवाह संपन्न होगा।

    साडू माता की घोड़ी और गढ़ गाजणा की ओर प्रस्थान

    उसी दौरान गढ़ गाजणा के राक्षस साडू माता की घोड़ी भी चुरा ले गए थे। अपनी माता के सम्मान और राजा की शर्त को पूरा करने के लिए देवनारायण ने गढ़ गाजणा की ओर कूच करने का निर्णय लिया। भैरूजी को पहरे पर तैनात कर, भगवान देवनारायण अपने प्रसिद्ध नीलागर घोड़े पर सवार होकर धर्म की रक्षा और अपने भक्तों के कल्याण के लिए निकल पड़े हैं।

    इस घटनाक्रम ने सिद्ध कर दिया है कि देवनारायण केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि दीन-दुखियों के रक्षक और साक्षात ईश्वर का स्वरूप हैं।

     

    Click here to Read More
    Previous Article
    उप जिला प्रमुख कोटा को आया हार्ट अटैक, मिलने अस्पताल पहुंचे शिक्षा एवं पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर
    Next Article
    जय जय देव, घर-घर देव: बूंदी में देवनारायण भगवान के 1114वें अवतरण महोत्सव पर उमड़ा जनसैलाब

    Related धर्म और अध्यात्म Updates:

    Are you sure? You want to delete this comment..! Remove Cancel

    Comments (0)

      Leave a comment