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    संवैधानिक नैतिकता राष्ट्रीय एकता की आत्मा द- प्रोफेसर जनक सिंह मीना

    1 month ago

    राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर के डॉ. अम्बेडकर स्टेडी सेंटर द्वारा राष्ट्रीय एकता एवं सामाजिक सद्भाव पर डॉ. भीमराव अंबेडकर का दृष्टिकोण विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस के अवसर पर आयोजित किया गया जिसमें मुख्य वक्ता गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय वडौदरा के प्रो. जनक सिंह मीना, मुख्य अतिथि प्रो. इनाक्षी चतुर्वेदी, विशिष्ट अतिथि डॉ. भजनलाल रोलन रहे । प्रो. जनक सिंह ने अपने उद्बोधन में कहा कि  डॉ. भीमराव अंबेडकर का दृष्टिकोण अत्यंत प्रासंगिक, मार्गदर्शक और भविष्यगामी है । भारत जैसा बहुलतावादी, विविधतापूर्ण, बहुधर्मी, बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश तभी स्थिर और प्रगतिशील रह सकता है जब समानता, न्याय और सामाजिक सामंजस्य इसके मूल मूल्य हों । इसीलिए अंबेडकर ने कहा था कि राजनीतिक लोकतंत्र तभी टिकेगा जब वह सामाजिक लोकतंत्र पर आधारित होगा । प्रो. मीना ने बताया कि  डॉ. अंबेडकर केवल संविधान.निर्माता नहीं थे । वे समाजशास्त्री,  अर्थशास्त्री,  राजनीति शास्त्री, दर्शन शास्त्र, धर्म शास्त्र, भाषा शास्त्र, नीति शास्त्र, इतिहास, कानून एवम विधिशास्त्र, मानवाधिकार चिंतक और राष्ट्र.निर्माता थे। उनकी दृष्टि में भारत की राष्ट्रीय एकता तभी संभव है जब समाज में ऊँच-नीच, भेदभाव, असमानता और सामाजिक अन्याय का अंत हो । प्रो. मीना ने कहा कि राष्ट्रीय एकता का मतलब हैक- हर व्यक्ति के लिए समान अवसर, समान सम्मान, और सुरक्षा व स्वतंत्रता का अनुभव । अंबेडकर का मत था किक-जाति व्यवस्था राष्ट्रीय एकता की सबसे बड़ी शत्रु है,जाति मनुष्य को मनुष्य से अलग करती है,यह समाज को हजारों टुकड़ों में बाँट देती है,जाति के रहते हुए न तो समानता संभव है न सद्भाव । संवैधानिक नैतिकता का पालन हर नागरिक को करना चाहिए । यही संवैधानिक नैतिकता सामाजिक सद्भाव को मजबूत करती है और राष्ट्रीय एकता को अटूट बनाती है ।

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