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    दीपावली आज: दोपहर 3:30 से शुरू होगा लक्ष्मी पूजन का शुभ मुहूर्त

    2 months ago

    जानिए पूजा विधि, देवी के पूजन योग्य स्वरूप और दीपोत्सव से जुड़ी 5 पौराणिक कथाएं

    जयपुर। आज कार्तिक अमावस्या का पावन पर्व दीपावली मनाया जा रहा है। इस बार अमावस्या तिथि दोपहर 3:30 बजे से प्रारंभ होगी और अगले दिन सुबह 5:25 बजे तक रहेगी। इसी अवधि में लक्ष्मी पूजन के आठ शुभ मुहूर्त प्राप्त होंगे। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, आज का दिन माता लक्ष्मी, गणेश और कुबेर की आराधना के लिए अत्यंत मंगलकारी है।


    पूजन का शुभ समय और विधि

    लक्ष्मी पूजन का पहला मुहूर्त दोपहर 3:30 बजे से आरंभ होगा। पूजा के लिए घर के उत्तर-पूर्व दिशा में स्वच्छ और पवित्र स्थान चुनें। देवी लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र को लाल या गुलाबी कपड़े पर स्थापित करें।
    मां लक्ष्मी के साथ गणेश और कुबेर की प्रतिमाओं का पूजन भी आवश्यक माना गया है। धूप, दीप, पुष्प, मिठाई और पंचमेवा से आराधना करें। पूजा के समय शंख, घंटी और दीपक की लौ से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।


    देवी लक्ष्मी के पूजन योग्य स्वरूप

    पूजा के लिए कमल पर विराजमान, दोनों हाथों से आशीर्वाद और धन वर्षा करती हुई लक्ष्मी की मूर्ति या तस्वीर सबसे शुभ मानी जाती है।
    धार्मिक मान्यता है कि खड़ी मुद्रा या उल्लू पर सवार रूप की पूजा नहीं करनी चाहिए। ऐसा करने से धन का स्थायित्व नहीं रहता और परिवार में अस्थिरता आती है। इसलिए घर में स्थायी सुख-समृद्धि के लिए बैठी हुई लक्ष्मी का पूजन श्रेष्ठ माना गया है।


    दीपावली की पांच पौराणिक कथाएं: हर कथा में है एक संदेश

    1. समुद्र मंथन से प्रकट हुई लक्ष्मी

    देवता और दैत्य जब अमृत पाने के लिए समुद्र मंथन कर रहे थे, तब चौदह रत्नों के साथ देवी लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ। मान्यता है कि वे पहले भी अस्तित्व में थीं, लेकिन नाराज होकर समुद्र में चली गईं। कार्तिक अमावस्या के दिन उनके पुनः प्रकट होने की खुशी में दीपोत्सव मनाया गया।


    2. मां काली का असुर वध

    पश्चिम बंगाल में दीपावली के दिन काली पूजा की जाती है। माना जाता है कि देवी काली ने इसी रात रक्तबीज जैसे राक्षसों का संहार किया था। इस विजय की स्मृति में वहां दीप जलाए जाते हैं। इसलिए बंगाल में दीपावली शक्ति की आराधना का पर्व है।


    3. राजा बलि की धरती पर वापसी

    दक्षिण भारत, विशेषकर केरल में, दीपावली राजा बलि की स्मृति में मनाई जाती है। जब भगवान विष्णु वामन रूप में आए और बलि से तीन पग भूमि मांगी, तो उन्होंने विनम्रता से अपना सिर अर्पित कर दिया। विष्णु ने उन्हें वर्ष में एक दिन अपनी प्रजा से मिलने का वरदान दिया। उस दिन उनके स्वागत में दीप जलाए जाते हैं।


    4. राम का अयोध्या लौटना

    राम, सीता और लक्ष्मण जब 14 वर्ष का वनवास समाप्त कर अयोध्या लौटे, तो नगर दीपों से जगमगा उठा। उस अमावस्या की रात अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक बन गई। तभी से हर वर्ष इस दिन दीपावली का पर्व मनाया जाता है।


    5. युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ

    महाभारत काल में पांडवों को खांडवप्रस्थ का जंगल मिला, जिसे उन्होंने इंद्रप्रस्थ के रूप में विकसित किया। राज्य स्थापना के उपलक्ष्य में युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ का आयोजन किया। उस दिन राज्यभर में दीप प्रज्ज्वलित किए गए और दीपोत्सव की परंपरा आरंभ हुई।


    दीपावली: केवल प्रकाश नहीं, आत्मा का उत्सव

    दीपावली का पर्व केवल घरों को रोशन करने का अवसर नहीं, बल्कि आत्मा में बसे अंधकार को भी मिटाने का संदेश देता है। यह दिन समृद्धि, सद्भाव और प्रकाश की विजय का प्रतीक है।
    ज्योतिष मतानुसार, आज का दिन धन, ज्ञान और शुभता के लिए विशेष ऊर्जा से भरा हुआ है — इसलिए श्रद्धा और संयम के साथ पूजन करने पर हर घर में लक्ष्मी का स्थायी निवास होता है।

     

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