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    उच्च शिक्षा की डिजिटल स्वप्न और पैशन का कड़वा यथार्थ प्रोफेसर अशोक कुमार

    1 month ago

    उच्च शिक्षा की डिजिटल स्वप्न और पैशन का कड़वा यथार्थ 

     

    प्रोफेसर अशोक कुमार 

    पूर्व कुलपति गोरखपुर, कानपुर विश्वविद्यालय एवं विभागाध्यक्ष राजस्थान विश्वविद्यालय 

     

     

    उच्च शिक्षा का डिजिटल स्वप्न और पेंशन का कड़वा यथार्थ

    राजस्थान का बजट 2026-27 एक ऐसे चौराहे पर खड़ा दिखाई देता है, जहाँ भविष्य की तकनीक और अतीत की देनदारियों के बीच एक गहरा असंतुलन है। वित्त मंत्री द्वारा पेश इस बजट ने जहाँ एक ओर 'डिजिटल राजस्थान' और 'स्किल इंडिया' की तर्ज पर उच्च शिक्षा को आधुनिक कलेवर देने की कोशिश की है, वहीं दूसरी ओर विश्वविद्यालयों के कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा और पेंशन जैसे बुनियादी संकटों को ठंडे बस्ते में डाल दिया है।

    तकनीक की चमक और रोजगार का वादा

    बजट में युवाओं के लिए की गई घोषणाएं निश्चित रूप से स्वागत योग्य हैं। राजस्थान स्टेट टेस्टिंग एजेंसी का गठन भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता लाने की दिशा में एक बड़ा और जरूरी कदम है, जो बार-बार होने वाले पेपर लीक के कलंक को धोने में सहायक हो सकता है। साथ ही, 14 नए मानव संसाधन संस्थानों की स्थापना और विदेशी भाषाओं के प्रशिक्षण का प्रस्ताव यह दर्शाता है कि सरकार शिक्षा को वैश्विक बाजार की जरूरतों के अनुरूप ढालना चाहती है। ₹10 लाख तक के ब्याज मुक्त ऋण की घोषणा युवाओं को 'जॉब सीकर' के बजाय 'जॉब प्रोवाइडर' बनाने की एक गंभीर कोशिश नज़र आती है।

    पेंशन का अनसुलझा सवाल: एक बड़ी विफलता

    किन्तु, उच्च शिक्षा का यह उज्ज्वल भविष्य उन विश्वविद्यालयों की नींव पर टिका है, जो आज आर्थिक बदहाली के कगार पर हैं। बजट का सबसे निराशाजनक पहलू विश्वविद्यालयों के सेवानिवृत्त और वर्तमान कर्मचारियों की पेंशन को लेकर सरकार की 'चुप्पी' है। पुरानी पेंशन योजना को लेकर वैधानिक स्पष्टता का न होना और इसके लिए किसी समर्पित 'कॉर्पस फंड' की घोषणा न करना, हजारों परिवारों को अनिश्चितता के अंधेरे में छोड़ने जैसा है।

    राज्य के पुराने विश्वविद्यालयों पर पेंशन का बोझ इतना अधिक है कि वे अपनी आय का बड़ा हिस्सा इसी में खर्च कर रहे हैं। ऐसे में बजट द्वारा उन्हें "आय के स्वयं के स्रोत विकसित करने" की सलाह देना, वास्तव में अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने जैसा है। इसका सीधा परिणाम छात्र शुल्कों में वृद्धि और शिक्षा के महंगे होने के रूप में सामने आएगा, जो 'समावेशी शिक्षा' के लक्ष्य के विपरीत है।

    अधूरा सुधार और अपेक्षाएं

    सातवें वेतन आयोग के अवशेष और समय पर पेंशन भुगतान के स्थाई समाधान (जैसे ट्रेजरी से जुड़ाव) की मांग को अनसुना करना यह संकेत देता है कि सरकार उच्च शिक्षा के 'सॉफ्टवेयर' (डिजिटल कोर्स और ए आई ) पर तो ध्यान दे रही है, लेकिन इसके 'हार्डवेयर' (शिक्षक और कर्मचारी) की सुध लेना भूल गई है। उच्च शिक्षा में शोध के लिए किसी विशेष अनुदान की अनुपस्थिति भी यह बताती है कि हमारी प्राथमिकता केवल डिग्रियां बांटने तक सीमित है, मौलिक ज्ञान सृजन पर नहीं।

    निष्कर्ष

    कुल मिलाकर, यह बजट उच्च शिक्षा के लिए 'ऊपर से चमकदार और भीतर से खोखला' नजर आता है। नई संस्थाएं और विदेशी भाषाएं तब तक फलदायी नहीं होंगी, जब तक कि विश्वविद्यालयों का मूल ढांचा वित्तीय संकट से जूझता रहेगा। सरकार को यह समझना होगा कि एक सुरक्षित और संतुष्ट शिक्षक ही एक सुरक्षित भविष्य का निर्माण कर सकता है। जब तक पेंशन और स्थाई वित्तीय सहायता जैसे मुद्दों का हल नहीं निकलता, तब तक उच्च शिक्षा के आधुनिकीकरण के दावे महज कागजी ही रहेंगे।

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