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    बोर्ड परीक्षाएं शुरू होते ही निजी स्कूलों की मनमानी चरम पर, फीस के नाम पर विद्यार्थियों के प्रवेश पत्र रोककर दी जा रही है मानसिक प्रताड़ना — संयुक्त अभिभावक संघ

    2 months ago

    जयपुर। राजधानी जयपुर सहित प्रदेश एवं देशभर में बोर्ड परीक्षाओं का दौर शुरू होते ही निजी स्कूलों की मनमानी एक बार फिर खुलकर सामने आ रही है। संयुक्त अभिभावक संघ को लगातार ऐसी शिकायतें प्राप्त हो रही हैं कि कई निजी स्कूल बोर्ड परीक्षाओं के दौरान बकाया अथवा मनमानी फीस के नाम पर विद्यार्थियों पर दबाव बना रहे हैं और उन्हें परीक्षा में बैठने से रोका जा रहा है।

    संघ का आरोप है कि कुछ निजी स्कूलों द्वारा विद्यार्थियों के प्रवेश पत्र (एडमिट कार्ड) अथवा उत्तर पुस्तिकाएं रोकी जा रही हैं, जिससे परीक्षार्थियों को गहरे मानसिक तनाव और भय के माहौल से गुजरना पड़ रहा है। यह न केवल अमानवीय है, बल्कि बच्चों के शिक्षा अधिकारों का खुला उल्लंघन भी है।

     

    संघ ने कहा कि बोर्ड परीक्षाएं विद्यार्थियों के भविष्य से सीधे तौर पर जुड़ी होती हैं। ऐसे संवेदनशील समय में फीस के नाम पर बच्चों को डराना और परीक्षा से वंचित करना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। निजी स्कूल शिक्षा को सेवा के बजाय व्यवसाय बनाकर अभिभावकों की मजबूरी का अनुचित लाभ उठा रहे हैं।

     

    *प्रदेश प्रवक्ता अभिषेक जैन बिट्टू ने कहा —* “बोर्ड परीक्षाओं के दौरान फीस के नाम पर विद्यार्थियों को परीक्षा से रोकना अत्यंत निंदनीय और अस्वीकार्य है। यह सीधा-सीधा बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। कई स्कूल प्रबंधन जानबूझकर डर का माहौल बनाकर अवैध वसूली कर रहे हैं। संयुक्त अभिभावक संघ इसकी कड़ी निंदा करता है और शिक्षा विभाग से मांग करता है कि ऐसे स्कूलों के विरुद्ध तत्काल सख्त कार्रवाई की जाए।”

     

    संघ ने शिक्षा विभाग से मांग की है कि स्पष्ट एवं कड़े निर्देश जारी किए जाएं कि किसी भी परिस्थिति में फीस विवाद के कारण किसी भी विद्यार्थी को परीक्षा देने से न रोका जाए। साथ ही दोषी स्कूलों की मान्यता निलंबित करने, आर्थिक दंड लगाने और अभिभावकों को त्वरित राहत प्रदान करने के ठोस कदम उठाए जाएं।

     

    संयुक्त अभिभावक संघ ने अभिभावकों से अपील की है कि यदि उनके साथ इस प्रकार की कोई भी मनमानी की जा रही है तो वे तुरंत जिला शिक्षा अधिकारी एवं संयुक्त अभिभावक संघ के समक्ष लिखित शिकायत दर्ज कराएं, ताकि बच्चों के अधिकारों की सामूहिक रूप से प्रभावी रक्षा की जा सके।

     

     

     

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