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    जहाँ युवा सोचते हैं ग्लोबल और बोलते हैं समाधान की भाषा- जेईसीआरसी डिप्लोमैसी समिट 8.0

    3 months ago

    -डेटर’ से ‘क्रेडिटर’ नेशन तक: वी श्रीनिवास ने जेईसीआरसी डिप्लोमेसी समिट में भारत की नई आर्थिक पहचान को किया प्रकाशित

     

    -शब्दों का खेल नहीं, स्पेशलाइज़्ड स्किल है डिप्लोमेसी: जेईसीआरसी डिप्लोमैसी समिट 8.0

     

     

    जयपुर,

     

    जहाँ डिप्लोमेसी केवल पढ़ाई नहीं, बल्कि एक सोच, एक कौशल और एक जीवन-दृष्टि है—वहाँ जेईसीआरसी यूनिवर्सिटी आज देश के भविष्य के डिप्लोमैट्स और ग्लोबल लीडर्स को आकार दे रही है। इसी विज़न को साकार करते हुए, जेईसीआरसी एम.यू.एन. सोसाइटी ने अपने सिग्नेचर प्लेटफ़ॉर्म ‘जेईसीआरसी डिप्लोमेसी समिट (जेडीएस) 8.0’ का 

     आग़ाज़ किया, जिसने युवाओं को केवल चर्चा नहीं, बल्कि ग्लोबल डिसीज़न-मेंकिंग की वास्तविक ट्रेनिंग दी।

    “कालाय तस्मै नमः – जियोपॉलिटिक्स इन द एज ऑफ़ शिफ़्टिंग सिविलाइज़ेशन्स” की थीम के साथ आयोजित यह समिट उस मंच के रूप में उभरा, जहाँ देशभर के 600 से अधिक युवा डेलीगेट्स नहीं, बल्कि उभरते डिप्लोमैट्स बनकर विश्व की जटिल चुनौतियों पर समाधान गढ़ते नज़र आए।

     

    यूनाइटेड नेशंस के साथ हुआ ऐतिहासिक एमओयू और कट्स इंटरनेशनल जैसे ग्लोबल इंस्टीट्यूशंस की नॉलेज पार्टनरशिप ने यह स्पष्ट कर दिया कि जेईसीआरसी अब केवल एक यूनिवर्सिटी नहीं, बल्कि इंटरनेशनल डिप्लोमैटिक इकोसिस्टम का सक्रिय हिस्सा है—जो इसे राजस्थान का ही नहीं, बल्कि भारत के सबसे प्रभावशाली डिप्लोमैसी प्लेटफॉर्म्स में शामिल करता है।

     

    इनॉग्रल सेरेमनी में मुख्य अतिथि, राजस्थान सरकार के चीफ़ सेक्रेटरी वी. श्रीनिवास ने युवाओं को यह संदेश दिया कि डिप्लोमेसी की असली ताकत स्किल्स, स्ट्रेटेजिक थिंकिंग और कंटीन्यूअस लर्निंग में छिपी है। इंजीनियरिंग से सिविल सर्विस तक की अपनी यात्रा साझा करते हुए उन्होंने बताया कि कैसे कूटनीतिक समझ और निर्णय लेने की क्षमता किसी भी लीडरशिप क्वॉलिटी की रीढ़ होती है। जे-स्टोर और हार्वर्ड बिज़नेस रिव्यू जैसे नॉलेज प्लेटफॉर्म्स का उल्लेख करते हुए उन्होंने युवाओं को डिग्री से आगे सोचने और ग्लोबल माइंडसेट अपनाने का आह्वान किया, जिससे भारत आज ‘डेटर’ से ‘क्रेडिटर नेशन’ की ओर बढ़ रहा है।

     

    समारोह के गैस्ट ऑफ़ ऑनर, विदेश मंत्रालय के फॉर्मर सेक्रेटरी (ईआर) दम्मू रवि ने स्पष्ट किया कि डिप्लोमेसी कोई क्लासरूम सब्जेक्ट नहीं, बल्कि स्पेशलाइज़्ड नॉलेज, एक्सपर्ट स्किल्स और रियल-वर्ल्ड अंडरस्टैंडिंग का संगम है। उनके अनुसार आज की दुनिया में सिविलाइज़ेशंस टकरा नहीं रही, बल्कि एक-दूसरे के साथ को-क्रिएट कर रही हैं—और यही भविष्य की डिप्लोमेसी की असली पहचान है। आत्मनिर्भर भारत की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि यह ग्लोबल इंटरलिंकेजेज़ से कटने का नहीं, बल्कि उन्हें अपनी रणनीतिक ताकत बनाने का नाम है।

     

    जेईसीआरसी यूनिवर्सिटी के चेयरपर्सन ओ.पी. अग्रवाल ने समिट को ‘माइंड्स इन मोशन’ का जीवंत उदाहरण बताते हुए कहा कि आने वाला कल उन्हीं का होगा जो न केवल अपनी बात रख सकें, बल्कि दूसरे नज़रियों को समझने की डिप्लोमैटिक मेच्योरिटी भी रखते हों। उन्होंने छात्रों को ‘क्रिएटर्स ऑफ़ द प्रेज़ेंट’ और ‘डिप्लोमैट्स ऑफ़ द फ़्यूचर’ के रूप में संबोधित करते हुए कहा कि चाहे करियर कोई भी हो, डिप्लोमेसी हर लीडर की सबसे बड़ी सॉफ्ट पावर है।

     

    वाइस चांसलर प्रो. विक्टर गंभीर ने डिप्लोमेसी और एजुकेशन के ऐतिहासिक रिश्ते को रेखांकित करते हुए बताया कि जेईसीआरसी का उद्देश्य केवल शिक्षित ग्रेजुएट्स नहीं, बल्कि ग्लोबल प्रॉब्लम-सॉल्वर्स और स्ट्रेटेजिक थिंकर्स तैयार करना है, जो ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के भारतीय विज़न को वैश्विक मंच पर लीड कर सकें।

     

    जेडीएस 8.0 की 10 विशेष कमेटीज़—यूएनएससी से लेकर लोकसभा और एंटरप्रेन्योरशिप समिट तक—एक डिप्लोमैटिक सिमुलेशन नहीं, बल्कि लीडरशिप रिहर्सल बनकर उभरीं, जहाँ युवाओं ने रेड सी क्राइसिस से लेकर सोशल मीडिया रेगुलेशन जैसे मुद्दों पर नीति-निर्माताओं की तरह डिबेट की।

     

    ₹3 लाख से अधिक के प्राइज़ पूल के साथ, सेक्रेटरी जनरल आदित्य सोलंकी और डिप्टी सेक्रेटरी जनरल अर्नभ दास के नेतृत्व में यह समिट उस सोच को मजबूत करता है कि 'जेईसीआरसी वह जगह है जहाँ डिप्लोमैट्स तैयार होते हैं, जहाँ नेतृत्व सिखाया नहीं जाता—जिया जाता है।'

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