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    सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान CJP ने 5 सितंबर का प्रस्तावित मार्च वापस लेने की घोषणा की, केंद्र की कार्रवाई के बाद लिया फैसला

    3 hours ago

    Yugcharan News / 01-09-2026

    सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को छात्र प्रदर्शनों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया। कॉकroach जनता पार्टी (CJP) की ओर से उसके सह-संयोजक और प्रवक्ता सौरव दास ने अदालत को बताया कि संगठन ने 5 सितंबर को दिल्ली में प्रस्तावित विरोध मार्च को वापस लेने का फैसला किया है। यह निर्णय केंद्र सरकार और संबंधित राज्यों की ओर से छात्र प्रदर्शनों के दौरान दर्ज प्राथमिकी को वापस लेने की दिशा में शुरू की गई कानूनी प्रक्रिया के बाद लिया गया।

    मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने की। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि दिल्ली पुलिस के साथ-साथ बिहार, असम, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र की ओर से भी छात्र प्रदर्शनों से संबंधित प्राथमिकी को समाप्त करने के लिए आवेदन दायर किए गए हैं।

    सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को यह भी बताया कि इन कदमों का उद्देश्य 25 जुलाई को केंद्र सरकार और CJP के प्रतिनिधियों के बीच हुई बातचीत के दौरान दिए गए आश्वासन को लागू करना है। सरकार की ओर से यह भरोसा भी दिलाया गया कि 20 जुलाई से 25 जुलाई के बीच हुए प्रदर्शन से संबंधित घटनाओं को लेकर भविष्य में नई प्राथमिकी दर्ज नहीं की जाएगी।

    केंद्र की कार्रवाई के बाद बदला विरोध प्रदर्शन का फैसला

    सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से अदालत को बताया गया कि सरकार ने प्रदर्शनकारियों से किए गए अपने पूर्व आश्वासन को पूरा करने के लिए आवश्यक कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी है। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत के दौरान जिस प्रतिबद्धता की बात कही गई थी, उसे लागू करने के लिए संबंधित आवेदन अदालतों में पेश किए गए हैं।

    केंद्र की ओर से इस स्थिति को देखते हुए उम्मीद जताई गई कि CJP भी 5 सितंबर को प्रस्तावित मार्च को वापस लेने का निर्णय करेगी। इसके बाद अदालत में मौजूद सौरव दास ने स्वयं पीठ के समक्ष संगठन का पक्ष रखा और मार्च वापस लेने की घोषणा की।

    दास ने कहा कि सरकार की ओर से दिए गए सकारात्मक आश्वासन और सुप्रीम कोर्ट की ओर से उन्हें मिली न्यायिक मान्यता को देखते हुए संगठन ने 5 सितंबर को प्रस्तावित मार्च को वापस लेना उचित समझा है। उन्होंने कहा कि संगठन अब अदालत के आदेश के अनुपालन की उम्मीद करता है।

    उन्होंने इस पूरे मामले में अदालत और दोनों पक्षों के वकीलों के प्रयासों के लिए आभार भी व्यक्त किया। दास ने विशेष रूप से अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर और सॉलिसिटर जनरल की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके प्रयासों से समाधान की दिशा में आगे बढ़ने का रास्ता तैयार हुआ।

    मुख्य न्यायाधीश ने दोनों पक्षों के रुख का स्वागत किया

    CJP की ओर से मार्च वापस लेने की घोषणा के बाद मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने दोनों पक्षों के बीच बने सकारात्मक माहौल का स्वागत किया। उन्होंने सुनवाई के दौरान कहा कि यदि दोनों पक्ष सद्भावना के साथ आगे बढ़ें तो सभी मुद्दों का समाधान धीरे-धीरे किया जा सकता है।

    मुख्य न्यायाधीश ने यह भी टिप्पणी की कि दुनिया में ऐसी कोई समस्या नहीं है जिसका समाधान खुले मन से बातचीत करने के बाद न निकाला जा सके। अदालत की यह टिप्पणी मामले में संवाद और आपसी सहमति के महत्व को रेखांकित करती है।

    सॉलिसिटर जनरल ने भी अदालत को बताया कि इस प्रक्रिया में दोनों पक्षों ने रचनात्मक रवैया अपनाया और एक-दूसरे को विरोधी पक्ष के रूप में देखने के बजाय समाधान निकालने की दिशा में काम किया।

    सुनवाई के दौरान सामने आए घटनाक्रम से संकेत मिला कि जुलाई में हुए छात्र प्रदर्शनों को लेकर सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच उत्पन्न विवाद अब न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से समाधान की ओर बढ़ रहा है।

    24 अगस्त को घोषित हुआ था 5 सितंबर का मार्च

    CJP ने 24 अगस्त को दिल्ली में 5 सितंबर को विरोध मार्च निकालने की घोषणा की थी। संगठन का आरोप था कि केंद्र सरकार ने 25 जुलाई को बातचीत के दौरान दिए गए आश्वासनों को पूरी तरह लागू नहीं किया। संगठन विशेष रूप से छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी वापस लेने की प्रक्रिया में कथित देरी को लेकर नाराज था।

    प्रस्तावित मार्च को लेकर संगठन की ओर से कहा गया था कि इसका उद्देश्य सरकार पर अपने पूर्व आश्वासनों को लागू करने के लिए दबाव बनाना है। प्रदर्शन को दिल्ली के इंडिया गेट से शुरू करके नई दिल्ली स्थित पुलिस मुख्यालय तक ले जाने की योजना बताई गई थी।

    संगठन के अनुसार, प्रदर्शन में उन परिवारों की भागीदारी भी प्रस्तावित थी जिनके बच्चे कथित तौर पर परीक्षा संबंधी विवादों के बीच आत्महत्या कर चुके थे। इसके अलावा जुलाई में हुए प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई से प्रभावित होने का दावा करने वाले लोग भी मार्च में शामिल होने वाले थे।

    हालांकि, केंद्र की ओर से प्राथमिकी वापस लेने की दिशा में उठाए गए कदम और सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के बाद संगठन ने अपना प्रस्तावित कार्यक्रम वापस लेने का फैसला किया।

    छात्र प्रदर्शनों से जुड़े मामलों पर अदालत का हस्तक्षेप

    पूरा विवाद छात्र प्रदर्शनों और परीक्षा में कथित अनियमितताओं से जुड़े मुद्दों के बाद सामने आया था। जुलाई में विभिन्न स्थानों पर छात्रों और अन्य प्रदर्शनकारियों की ओर से विरोध प्रदर्शन किए गए थे। इन प्रदर्शनों के दौरान कई मामले दर्ज किए जाने की बात सामने आई थी।

    CJP ने आरोप लगाया था कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी वापस लेने को लेकर सरकार की ओर से पर्याप्त कार्रवाई नहीं की जा रही थी। संगठन ने यह भी दावा किया था कि 25 जुलाई को हुई बातचीत में कुछ आश्वासन दिए गए थे, लेकिन बाद में उन्हें लिखित रूप में स्पष्ट रूप से सामने नहीं लाया गया।

    इसी मुद्दे को लेकर संगठन ने दोबारा आंदोलन का आह्वान किया था। 5 सितंबर के प्रस्तावित मार्च की घोषणा भी इसी पृष्ठभूमि में की गई थी।

    मंगलवार की सुनवाई में हालांकि स्थिति अलग नजर आई। सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि संबंधित प्राथमिकी को समाप्त करने के लिए आवश्यक आवेदन दाखिल किए जा चुके हैं। इसके बाद CJP ने भी अपना विरोध मार्च वापस लेने की घोषणा कर दी।

    सुप्रीम कोर्ट ने प्राथमिकी को लेकर दिया अहम आदेश

    सुनवाई के दौरान अदालत ने छात्र प्रदर्शनों से संबंधित प्राथमिकी के मुद्दे पर भी महत्वपूर्ण कदम उठाया। अदालत ने छात्र प्रदर्शनों से जुड़ी सभी संबंधित प्राथमिकी को समाप्त करने का आदेश दिया। इसके साथ ही भविष्य में इन प्रदर्शनों से संबंधित घटनाओं को लेकर नई प्राथमिकी दर्ज किए जाने पर भी रोक लगाने की बात सामने आई।

    इस आदेश का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि विवाद केवल एक राज्य या एक शहर तक सीमित नहीं था। मामले में दिल्ली के अलावा बिहार, असम, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में दर्ज मामलों का भी उल्लेख किया गया।

    सरकार की ओर से विभिन्न राज्यों के स्तर पर उठाए गए कानूनी कदमों और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी ने मामले को व्यापक न्यायिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ाया।

    अदालत के आदेश के बाद CJP की ओर से 5 सितंबर का मार्च वापस लेने की घोषणा को विवाद को शांत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    बातचीत से समाधान की उम्मीद

    सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई से यह संदेश भी सामने आया कि सरकार और प्रदर्शनकारी संगठन के बीच बातचीत के माध्यम से विवाद को सुलझाने की संभावना बनी हुई है। मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी ने भी इस बात पर जोर दिया कि सद्भावना और खुले मन से बातचीत के जरिए जटिल मामलों का समाधान निकाला जा सकता है।

    फिलहाल, CJP ने अदालत के समक्ष 5 सितंबर के प्रस्तावित मार्च को वापस लेने की घोषणा कर दी है। दूसरी ओर, केंद्र और संबंधित राज्यों की ओर से प्राथमिकी समाप्त करने की प्रक्रिया को लेकर अदालत के समक्ष उठाए गए कदम मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई का आधार बनेंगे।

    छात्र प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब ध्यान इस बात पर रहेगा कि संबंधित अदालतों में दाखिल किए गए आवेदन किस तरह आगे बढ़ते हैं और सरकार की ओर से दिए गए आश्वासनों को किस प्रकार लागू किया जाता है।

     

    इस पूरे घटनाक्रम में अदालत की भूमिका एक ऐसे मंच के रूप में सामने आई है जहां सरकार और प्रदर्शनकारी पक्ष के बीच विवाद को कानूनी प्रक्रिया तथा संवाद के माध्यम से सुलझाने का प्रयास किया गया। 5 सितंबर का प्रस्तावित मार्च वापस लिए जाने के साथ फिलहाल टकराव की स्थिति कम होने की संभावना है, हालांकि आगे की प्रक्रिया संबंधित कानूनी आदेशों और उनके अनुपालन पर निर्भर करेगी।

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