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    दिल्ली में ऊंची इमारतों का रास्ता साफ, लेकिन विशेषज्ञों ने दी बुनियादी ढांचे पर चेतावनी

    55 minutes ago

     

    युगचरण न्यूज़ | 14 जुलाई 2026

    राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में शहरी विकास की दिशा में बड़े बदलाव की तैयारी शुरू हो गई है। नई शहरी नियोजन नीतियों के तहत अब राजधानी में अधिक ऊंची आवासीय इमारतों और बड़े पैमाने पर पुनर्विकास (रीडेवलपमेंट) का मार्ग प्रशस्त हो गया है। हालांकि, शहरी नियोजन और वास्तुकला विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसके साथ सड़कों, जलापूर्ति, सीवर, सार्वजनिक परिवहन और अन्य नागरिक सुविधाओं का समानांतर विकास नहीं किया गया, तो दिल्ली की मौजूदा समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं।

    नई नीति के तहत सरकार ने फ्लोर एरिया रेशियो (FAR) की सीमा बढ़ाने के साथ-साथ ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट (TOD) क्षेत्रों का भी विस्तार किया है। इन बदलावों का उद्देश्य सीमित भूमि का बेहतर उपयोग करना, अधिक आवास उपलब्ध कराना और तेजी से बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करना है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली जैसे महानगर में भूमि की कमी के कारण ऊंची इमारतें एक स्वाभाविक आवश्यकता बनती जा रही हैं। लेकिन केवल बहुमंजिला भवन बनाना ही किसी शहर के विकास का संकेत नहीं माना जा सकता। असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि इन इमारतों के साथ स्थानीय बुनियादी ढांचा भी उसी गति से विकसित हो।

    वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार, कई पुनर्विकास परियोजनाओं में मुख्य ध्यान केवल अतिरिक्त निर्माण क्षेत्र, ऊंची इमारतों और आर्थिक लाभ पर केंद्रित रहता है। वहीं सड़कों की चौड़ाई, पार्किंग, सार्वजनिक स्थान, जल निकासी, यातायात व्यवस्था और सामाजिक सुविधाओं जैसे महत्वपूर्ण विषय अक्सर पीछे छूट जाते हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि किसी शहर का विकास केवल पुराने मकानों को गिराकर ऊंचे टावर बनाने से नहीं होता। विकास का वास्तविक पैमाना यह होना चाहिए कि बढ़ती आबादी के बावजूद लोगों की जीवन गुणवत्ता बेहतर हो, यातायात सुगम रहे और नागरिक सुविधाओं पर अतिरिक्त दबाव न पड़े।

    नई TOD नीति को दिल्ली के शहरी विकास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। इसके तहत मेट्रो और क्षेत्रीय रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (RRTS) कॉरिडोर के आसपास लगभग 207 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में उच्च घनत्व वाले मिश्रित उपयोग विकास की अनुमति दी गई है। साथ ही न्यूनतम पात्र भूखंड का आकार घटाकर 2,000 वर्गमीटर कर दिया गया है और FAR को बढ़ाकर 500 तक करने की व्यवस्था की गई है। इससे राजधानी के कई क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर पुनर्विकास की संभावनाएं बढ़ गई हैं।

    शहरी योजनाकारों का कहना है कि आने वाले वर्षों में दिल्ली की जनसंख्या और आवास की मांग लगातार बढ़ेगी। इसलिए अधिक घनत्व वाले विकास को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। हालांकि, हर परियोजना को अलग-अलग देखने के बजाय पूरे इलाके के स्तर पर उसका प्रभाव आंका जाना चाहिए।

    विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी नई परियोजना को मंजूरी देने से पहले यह मूल्यांकन जरूरी है कि उसका प्रभाव सड़कों, मेट्रो, जलापूर्ति, सीवर नेटवर्क, हरित क्षेत्रों और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं पर कितना पड़ेगा। यदि ऐसा नहीं किया गया तो भविष्य में कई इलाकों में यातायात जाम, जल संकट, पार्किंग की कमी और अन्य शहरी समस्याएं और बढ़ सकती हैं।

    उन्होंने यह भी कहा कि शहर के विकास के लिए केवल वास्तुकार ही जिम्मेदार नहीं होते, बल्कि शहरी योजनाकारों, स्थानीय निकायों और विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय भी आवश्यक है। दीर्घकालिक और समग्र योजना के बिना केवल ऊंची इमारतें बनाना भविष्य में नई चुनौतियों को जन्म दे सकता है।

    फिलहाल दिल्ली की नई शहरी नीति को राजधानी के विकास के लिए एक बड़ा अवसर माना जा रहा है। लेकिन विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि यदि बुनियादी ढांचे और नागरिक सुविधाओं का समानांतर विस्तार नहीं हुआ, तो ऊंची इमारतों का यह विकास मॉडल भविष्य में राजधानी पर अतिरिक्त बोझ भी बन सकता है।

     
     
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