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    भोजशाला-कमाल मौला विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को शुक्रवार की नमाज की अंतरिम अनुमति दी

    1 hour ago

    युगचरण न्यूज़ / 14 जुलाई 2026

    मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला-कमाल मौला परिसर से जुड़े लंबे समय से चल रहे विवाद में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश जारी किया। सर्वोच्च न्यायालय ने मुस्लिम पक्ष को अंतिम निर्णय आने तक प्रत्येक शुक्रवार दोपहर 1 बजे से 3 बजे के बीच विवादित परिसर के निकट स्थित एक अलग खुले स्थान पर नमाज अदा करने की अनुमति दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था केवल अंतरिम है और इससे किसी भी पक्ष के कानूनी अधिकार प्रभावित नहीं होंगे।

    मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि दोनों पक्षों के अधिकार सुरक्षित रखते हुए यह अंतरिम व्यवस्था लागू की जा रही है। साथ ही मामले को आगे सुनवाई के लिए मुख्य न्यायाधीश द्वारा नामित उपयुक्त पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने का निर्देश भी दिया गया।

    सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को भी निर्देश दिया कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के 15 मई 2026 के फैसले के आधार पर विवादित परिसर में किसी भी प्रकार का स्थायी परिवर्तन न्यायालय की अनुमति के बिना लागू न किया जाए। अदालत ने संकेत दिया कि यथास्थिति बनाए रखना फिलहाल आवश्यक है।

    यह विवाद उस समय और गहरा गया था जब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 15 मई को अपने फैसले में कहा था कि विवादित स्थल का धार्मिक स्वरूप हिंदू मंदिर का है और इसे देवी सरस्वती को समर्पित भोजशाला माना जाएगा। इसी निर्णय में वर्ष 2003 के उस प्रशासनिक आदेश को भी निरस्त कर दिया गया था, जिसके तहत मुस्लिम समुदाय को परिसर में शुक्रवार की नमाज की अनुमति दी गई थी। हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि मुस्लिम पक्ष चाहे तो मस्जिद निर्माण के लिए राज्य सरकार से वैकल्पिक भूमि मांग सकता है।

    हाईकोर्ट ने अपने फैसले में ऐतिहासिक साहित्य, पुरातात्विक साक्ष्यों और उपलब्ध दस्तावेजों का उल्लेख करते हुए कहा था कि यह स्थल प्राचीन काल में संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र था और यहां देवी सरस्वती का मंदिर स्थित था। इसी निर्णय को चुनौती देते हुए काजी मोइनुद्दीन ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

    मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने अत्यंत विवादित तथ्यों पर बिना पर्याप्त साक्ष्य और गवाहों की विस्तृत जांच किए फैसला सुनाया। उन्होंने कहा कि कई वर्षों से चली आ रही व्यवस्था को अचानक समाप्त करना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। उनका कहना था कि संबंधित मामला पहले से दीवानी अदालत में लंबित है, इसलिए हाईकोर्ट को रिट याचिका पर इस प्रकार का निर्णय नहीं देना चाहिए था।

    वरिष्ठ अधिवक्ता ए.एम. सिंहवी ने भी अदालत में कहा कि भारत का इतिहास अनेक परतों वाला है और यदि प्रत्येक ऐतिहासिक दावे के आधार पर वर्तमान धार्मिक व्यवस्थाओं को बदला जाने लगे तो देश में अनेक नए विवाद खड़े हो सकते हैं। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले में स्पष्ट किया था कि उसका फैसला केवल उसी विवाद तक सीमित रहेगा और उसे अन्य मामलों में मिसाल के रूप में नहीं अपनाया जाना चाहिए।

    सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि यह अत्यंत संवेदनशील मामला है और न्यायालय को प्रत्येक टिप्पणी तथा आदेश बेहद सावधानी के साथ देना होगा। उन्होंने संकेत दिया कि अंतिम सुनवाई से पहले दोनों पक्षों के हितों को ध्यान में रखते हुए संतुलित अंतरिम व्यवस्था आवश्यक है।

    केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से कहा कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद प्रशासनिक स्तर पर कई व्यवस्थाएं लागू हो चुकी हैं और इस समय पूर्व स्थिति बहाल करना व्यावहारिक कठिनाइयां पैदा कर सकता है। उन्होंने अदालत से मौजूदा व्यवस्था में बड़े बदलाव से बचने का आग्रह किया।

    मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने कहा कि पिछले लगभग तीन दशकों से दोनों समुदायों के बीच आपसी सहमति के आधार पर परिसर के उपयोग की व्यवस्था चली आ रही थी। उन्होंने अदालत को बताया कि इस संबंध में पूर्व में सहमति दस्तावेज भी मौजूद है और दीवानी मुकदमा लंबित होने के बावजूद हाईकोर्ट द्वारा रिट याचिका स्वीकार करना कानूनी रूप से उचित नहीं था।

    सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों से पूछा कि क्या विवादित परिसर के निकट कोई सार्वजनिक स्थान उपलब्ध है जहां अंतरिम अवधि में मुस्लिम समुदाय शुक्रवार की नमाज अदा कर सके। इस पर दोनों पक्षों ने ऐसी व्यवस्था पर सहमति जताई। इसके बाद अदालत ने परिसर के निकट खुले स्थान पर प्रत्येक शुक्रवार दोपहर 1 बजे से 3 बजे तक नमाज की अनुमति देने का आदेश पारित किया।

    सुनवाई के दौरान एक अन्य मुद्दा भी उठा, जिसमें हिंदू पक्ष ने विदेश में रखी देवी सरस्वती की प्रतिमा को भारत वापस लाने की मांग का उल्लेख किया। इस पर न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वह ऐसा कोई निर्देश नहीं देगा जिससे यह माना जाए कि केंद्र सरकार पर विदेशों में मौजूद सभी भारतीय प्राचीन प्रतिमाओं और कलाकृतियों को वापस लाने का कानूनी दायित्व तत्काल लागू हो गया है। अदालत ने कहा कि इस प्रकार की टिप्पणी भविष्य में अनावश्यक कानूनी विवाद उत्पन्न कर सकती है।

    सुप्रीम कोर्ट का यह अंतरिम आदेश फिलहाल दोनों पक्षों के अधिकारों को सुरक्षित रखते हुए शांति और संतुलन बनाए रखने की दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है। मामले की अंतिम सुनवाई आगामी दिनों में नामित पीठ के समक्ष होगी, जहां हाईकोर्ट के फैसले की वैधानिकता और विवादित परिसर के धार्मिक स्वरूप सहित सभी कानूनी पहलुओं पर विस्तार से विचार किया जाएगा।

     
     
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