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    बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध नीति का विषय: दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से PIL पर विचार करने को कहा

    5 hours ago

     

    Yugcharan News / 21 August 2026

    दिल्ली हाईकोर्ट ने बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर प्रतिबंध या सीमाएं लगाने के मुद्दे को सरकार की नीतिगत जिम्मेदारी से जुड़ा विषय बताया है। अदालत ने केंद्र सरकार से जनहित याचिका (PIL) में उठाए गए मुद्दों पर विचार करने और उचित निर्णय लेने को कहा है।

    मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति वी. कामेश्वर राव और न्यायमूर्ति मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान अदालत ने संकेत दिया कि बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने या उसकी पहुंच सीमित करने जैसे व्यापक फैसले केवल न्यायिक आदेश के माध्यम से तय करने के बजाय सरकार की नीतिगत प्रक्रिया के तहत विचार किए जाने चाहिए।

    यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब बच्चों और किशोरों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर देश और दुनिया में चिंता बढ़ रही है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बच्चों को जानकारी, शिक्षा, मनोरंजन और संवाद के अवसर प्रदान करते हैं, लेकिन इनके साथ ऑनलाइन सुरक्षा, अनुचित सामग्री, साइबरबुलिंग, निजता और ऑनलाइन शोषण जैसी चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं।

    केंद्र सरकार के विचार के लिए छोड़ा गया मामला

    दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत ने तत्काल सोशल मीडिया प्रतिबंध का आदेश देने के बजाय केंद्र सरकार को इस विषय पर विचार करने की जिम्मेदारी दी है।

    जनहित याचिका में बच्चों की सोशल मीडिया तक पहुंच को लेकर कई चिंताएं उठाई गई हैं। अदालत ने इन मुद्दों पर सरकार द्वारा उचित स्तर पर विचार किए जाने का रास्ता खुला रखा है।

    इस तरह के किसी भी फैसले के लिए सरकार को कई पहलुओं पर विचार करना होगा। इनमें बच्चों की उम्र निर्धारित करना, उम्र की पुष्टि की व्यवस्था, माता-पिता की सहमति, सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी, बच्चों के डेटा की सुरक्षा और नियमों को लागू करने की व्यावहारिक व्यवस्था शामिल हो सकती है।

    बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा बनी प्रमुख चिंता

    बच्चों का सोशल मीडिया इस्तेमाल आज सामान्य डिजिटल जीवन का हिस्सा बन चुका है। मोबाइल फोन और इंटरनेट की आसान उपलब्धता के कारण कम उम्र के बच्चे भी विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रहे हैं।

    हालांकि, विशेषज्ञों और बाल सुरक्षा से जुड़े संगठनों की ओर से लंबे समय से यह चिंता जताई जाती रही है कि कम उम्र के उपयोगकर्ताओं को ऐसा कंटेंट या ऑनलाइन संपर्क मिल सकता है जो उनकी उम्र के लिए उपयुक्त नहीं है।

    साइबरबुलिंग, ऑनलाइन धोखाधड़ी, निजी जानकारी का दुरुपयोग और अनुचित सामग्री तक पहुंच जैसी समस्याएं बच्चों के लिए विशेष जोखिम पैदा कर सकती हैं।

    इसी कारण दुनिया के कई देशों में बच्चों के डिजिटल अधिकारों और ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर नए नियमों पर चर्चा हो रही है। सरकारें और नियामक संस्थाएं यह तय करने की कोशिश कर रही हैं कि बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर किए बिना उन्हें सुरक्षित डिजिटल वातावरण कैसे उपलब्ध कराया जाए।

    पूर्ण प्रतिबंध के बजाय कई विकल्पों पर हो सकता है विचार

    बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना अपने आप में कई व्यावहारिक और कानूनी सवाल खड़े कर सकता है।

    सरकार को यह तय करना होगा कि प्रतिबंध किस उम्र तक लागू किया जाए और क्या सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर समान नियम लागू होंगे। इसके अलावा यह भी महत्वपूर्ण होगा कि किसी उपयोगकर्ता की उम्र की पुष्टि किस तरीके से की जाए।

    उम्र की पुष्टि के लिए यदि बड़ी मात्रा में व्यक्तिगत जानकारी एकत्र की जाती है, तो इससे निजता और डेटा सुरक्षा से जुड़े नए सवाल पैदा हो सकते हैं।

    एक विकल्प माता-पिता की अनुमति को अनिवार्य करना हो सकता है। इसके अलावा सरकार कुछ विशेष फीचर्स पर प्रतिबंध लगाने, बच्चों के खातों के लिए डिफॉल्ट प्राइवेसी सेटिंग मजबूत करने या माता-पिता के नियंत्रण वाले फीचर्स को अनिवार्य करने पर भी विचार कर सकती है।

    सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी

    मामले का एक महत्वपूर्ण पक्ष सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी से भी जुड़ा है।

    कई प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पहले से ही नाबालिग उपयोगकर्ताओं के लिए अलग-अलग सुरक्षा उपाय उपलब्ध कराते हैं। इनमें पैरेंटल कंट्रोल, कंटेंट फिल्टर, रिपोर्टिंग सिस्टम और कुछ प्रकार की गतिविधियों पर सीमाएं शामिल हैं।

    हालांकि, इन उपायों की प्रभावशीलता को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। खास तौर पर यह चुनौती बनी हुई है कि प्लेटफॉर्म किसी उपयोगकर्ता की सही उम्र की पुष्टि कैसे करें और नाबालिगों को उम्र संबंधी प्रतिबंधों को दरकिनार करने से कैसे रोका जाए।

    यदि केंद्र सरकार इस मामले में नए नियम बनाती है, तो सोशल मीडिया कंपनियों पर उम्र की पुष्टि, शिकायतों के त्वरित निपटारे और बच्चों के डेटा की सुरक्षा को लेकर अतिरिक्त जिम्मेदारियां डाली जा सकती हैं।

    बच्चों के अधिकार और डिजिटल पहुंच के बीच संतुलन

    सोशल मीडिया को केवल मनोरंजन का माध्यम मानना अब पर्याप्त नहीं है। बच्चे और किशोर इन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल शिक्षा, रचनात्मक गतिविधियों, समाचार और दोस्तों के साथ संवाद के लिए भी करते हैं।

    ऐसे में किसी भी व्यापक प्रतिबंध के साथ यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि बच्चों की वैध डिजिटल पहुंच और जानकारी प्राप्त करने के अधिकार पर अनावश्यक असर न पड़े।

    यही वजह है कि इस विषय पर नीति बनाना जटिल हो सकता है। सरकार को बच्चों की सुरक्षा के साथ-साथ डिजिटल स्वतंत्रता, निजता और तकनीकी विकास जैसे पहलुओं के बीच संतुलन बनाना होगा।

    दुनिया भर में बढ़ रही है चर्चा

    बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर दुनिया के कई देशों में बहस तेज हुई है। विभिन्न सरकारें नाबालिगों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए उम्र सत्यापन, अभिभावकीय नियंत्रण और प्लेटफॉर्म की जवाबदेही जैसे उपायों पर विचार कर रही हैं।

    भारत में भी इंटरनेट और स्मार्टफोन की बढ़ती पहुंच के कारण यह मुद्दा महत्वपूर्ण होता जा रहा है। बड़ी संख्या में युवा उपयोगकर्ता डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े हैं और ऐसे में बच्चों के लिए सुरक्षित ऑनलाइन वातावरण तैयार करना नीति निर्माताओं के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती बन गया है।

    दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी इसी व्यापक बहस के बीच आई है। अदालत ने फिलहाल यह स्पष्ट किया है कि बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को प्रतिबंधित करने या सीमित करने का व्यापक फैसला नीतिगत स्तर पर सरकार द्वारा लिया जाना चाहिए।

    आगे क्या होगा?

    अब इस मामले में केंद्र सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। सरकार जनहित याचिका में उठाई गई चिंताओं, मौजूदा कानूनों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म द्वारा लागू सुरक्षा उपायों की समीक्षा कर सकती है।

    सरकार आवश्यकता के अनुसार नए नियम, अतिरिक्त सुरक्षा उपाय या मौजूदा व्यवस्था में बदलाव पर विचार कर सकती है। संभावित उपायों में उम्र सत्यापन, मजबूत पैरेंटल कंट्रोल, बच्चों के लिए अतिरिक्त प्राइवेसी सुरक्षा और सोशल मीडिया कंपनियों के लिए नई जिम्मेदारियां शामिल हो सकती हैं।

    हालांकि, दिल्ली हाईकोर्ट ने बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर कोई तत्काल राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध लगाने का आदेश नहीं दिया है। अदालत की टिप्पणी मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित है कि ऐसा व्यापक फैसला नीति और प्रशासन से जुड़ा विषय है, जिस पर केंद्र सरकार को विचार करना चाहिए।

    यह मामला भारत में बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को लेकर चल रही व्यापक चर्चा को एक बार फिर सामने लाता है। आने वाले समय में सरकार द्वारा इस विषय पर उठाए जाने वाले कदम यह तय करने में महत्वपूर्ण होंगे कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और डिजिटल दुनिया तक उनकी पहुंच के बीच किस प्रकार संतुलन बनाया जाता है।

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