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    CJP प्रदर्शन मामला: दिल्ली हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी बदलने से किया इनकार, कहा- बिना सुनवाई किसी को दोषी नहीं ठहरा सकते

    2 hours ago

    Yugcharan News / 28 July 2026

    नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने CJP (Cockroach Janta Party) के जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान एक महिला को थप्पड़ मारने के आरोपों को लेकर विवादों में आए अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त (Additional DCP) संदीप लांबा की निगरानी में चल रही पुलिस जांच को किसी अन्य अधिकारी को सौंपने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी अधिकारी के खिलाफ लगाए गए आरोपों के आधार पर बिना निष्पक्ष सुनवाई और कानूनी प्रक्रिया पूरी हुए उसे दोषी नहीं माना जा सकता।

    न्यायमूर्ति गिरिश कठपालिया की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि यदि संबंधित अधिकारी ने वास्तव में कोई गलत कार्य किया है तो कानून के अनुसार उसके खिलाफ कार्रवाई होगी, लेकिन केवल आरोपों या वायरल वीडियो के आधार पर यह मान लेना कि वह निष्पक्ष जांच नहीं कर सकता, न्याय के सिद्धांतों के विपरीत होगा।

    अदालत ने कहा- संस्थाओं की विश्वसनीयता को कमजोर न करें

    सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति गिरिश कठपालिया ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायिक और प्रशासनिक संस्थाओं की विश्वसनीयता बनाए रखना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि कोई अधिकारी दोषी पाया जाता है तो उसे कानून के तहत परिणाम भुगतने होंगे, लेकिन इससे पहले उसके खिलाफ पूर्वाग्रह नहीं बनाया जा सकता।

    अदालत ने कहा कि किसी अधिकारी से उसकी पूरी जिम्मेदारी केवल इसलिए नहीं छीनी जा सकती क्योंकि उसके खिलाफ कुछ आरोप लगाए गए हैं। न्यायालय ने यह भी कहा कि निष्पक्षता का सिद्धांत सभी व्यक्तियों पर समान रूप से लागू होता है।

    याचिकाकर्ता ने जताई थी पक्षपात की आशंका

    याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में कहा गया कि हाल ही में सामने आए वीडियो, जिनमें संदीप लांबा पर एक महिला को थप्पड़ मारने का आरोप लगाया गया है, उनकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े करते हैं। याचिका में कहा गया कि ऐसी परिस्थितियों में अदालत के निर्देश पर चल रही जांच किसी अन्य पुलिस अधिकारी की निगरानी में कराई जानी चाहिए ताकि जांच प्रक्रिया पर कोई संदेह न रहे।

    याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि न्याय केवल निष्पक्ष होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि वह निष्पक्ष दिखाई भी देना चाहिए।

    हाईकोर्ट ने दलील से नहीं जताई सहमति

    अदालत ने इस तर्क से सहमति नहीं जताई। न्यायमूर्ति कठपालिया ने कहा कि यदि केवल आरोपों के आधार पर किसी अधिकारी को जांच से हटा दिया जाए तो यह उसके खिलाफ बिना सुनवाई के दोष तय करने जैसा होगा।

    अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई अधिकारी किसी अन्य मामले में आरोपों का सामना कर रहा है, तो इसका यह अर्थ नहीं निकाला जा सकता कि वह हर मामले में निष्पक्ष तरीके से कार्य नहीं करेगा। न्यायालय ने कहा कि ऐसा मान लेना न्यायिक प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों के विपरीत होगा।

    "क्या पूरी दिल्ली पुलिस को कटघरे में खड़ा कर दें?"

    सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि संबंधित अधिकारी के खिलाफ लगे आरोपों से निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तब अदालत ने टिप्पणी की कि क्या इसका अर्थ यह है कि पूरी दिल्ली पुलिस को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाए और वह कोई भी जांच या एफआईआर दर्ज न करे?

    अदालत ने कहा कि किसी एक अधिकारी पर लगे आरोपों के आधार पर पूरे संस्थागत ढांचे पर सवाल उठाना उचित नहीं माना जा सकता।

    सरकार ने अदालत को दी जांच पूरी होने की जानकारी

    सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से उपस्थित अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि संबंधित पुलिस जांच पहले ही पूरी हो चुकी है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता का बयान दर्ज कर लिया गया है और जांच रिपोर्ट सक्षम प्राधिकारी को आगे की कार्रवाई के लिए भेज दी गई है।

    इस जानकारी को रिकॉर्ड पर लेते हुए अदालत ने कहा कि चूंकि जांच पूरी हो चुकी है, इसलिए याचिका अब व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी (Infructuous) हो गई है। इसी आधार पर अदालत ने याचिका खारिज कर दी।

    आदेश के बाद भी याचिका पर हुआ आग्रह

    अदालत द्वारा आदेश सुनाए जाने के बाद भी याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने आग्रह किया कि हालिया घटनाओं के कारण पक्षपात की आशंका बनी हुई है और मामले पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।

    हालांकि अदालत ने इस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया और दोहराया कि केवल किसी वायरल वीडियो या आरोप के आधार पर किसी अधिकारी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यदि भविष्य में कानूनी प्रक्रिया के बाद कोई दोष सिद्ध होता है तो उसके अनुसार कार्रवाई की जाएगी।

    किस मामले से जुड़ी है यह याचिका?

    यह मामला वर्ष 2025 की एक घटना से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि उन्हें मार्च 2025 में जाफराबाद पुलिस स्टेशन में अवैध रूप से हिरासत में रखा गया था। इस शिकायत पर दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस जांच के आदेश दिए थे।

    बाद में याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि जांच उनके बयान दर्ज किए बिना ही पूरी की जा रही थी। इसके बाद अदालत ने निर्देश दिया कि जांच पूरी करने से पहले उनका बयान दर्ज किया जाए। इसी दौरान उन्होंने नई याचिका दायर कर जांच की निगरानी संदीप लांबा से हटाने की मांग की।

    CJP प्रदर्शन के बाद कई कानूनी विवाद

    हाल के दिनों में CJP के नेतृत्व में हुए प्रदर्शनों के बाद पुलिस कार्रवाई, हिरासत, बल प्रयोग, एफआईआर और जांच प्रक्रियाओं को लेकर विभिन्न अदालतों में कई याचिकाएं दायर की गई हैं। इन मामलों में पुलिस की भूमिका और प्रदर्शनकारियों के अधिकारों से जुड़े कई प्रश्न न्यायालयों के समक्ष विचाराधीन हैं।

    इसी क्रम में यह मामला भी सामने आया, जिसमें अदालत ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि किसी भी अधिकारी के खिलाफ आरोपों की जांच कानून के अनुसार होगी, लेकिन बिना निष्पक्ष सुनवाई के किसी व्यक्ति को दोषी मानना न्यायिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है।

    निष्कर्ष

     

    दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले ने एक बार फिर न्यायिक प्रक्रिया के उस मूल सिद्धांत को दोहराया है कि प्रत्येक व्यक्ति को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार है। अदालत ने कहा कि किसी अधिकारी के खिलाफ आरोप लगना और उसका दोष सिद्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं। जब तक विधिक प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक केवल आरोपों के आधार पर उसकी जिम्मेदारियां हटाना उचित नहीं होगा। वहीं, सरकार की ओर से जांच पूरी होने की जानकारी दिए जाने के बाद अदालत ने याचिका को निरर्थक मानते हुए खारिज कर दिया।

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