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    संस्कृत बने आम बोलचाल की भाषा भारतीय ज्ञान परंपरा के संवाहक बनें डिग्रीधारी: राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े

    1 hour ago

    राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के अष्टम दीक्षांत समारोह में 9,422 विद्यार्थियों को मिली उपाधियां, 37 शोधार्थियों को मिली विद्यावारिधि पीएच.डी. दो विभूतियों को मानद् डी लिट उपाधि से किया सम्मानित

    जयपुर। राजस्थान के राज्यपाल एवं जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलाधिपति हरिभाऊ किसनराव बागड़े ने कहा कि संस्कृत केवल शास्त्रों और विश्वविद्यालयों की भाषा नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति, ज्ञान परंपरा और जीवन मूल्यों की आधारशिला है। संस्कृत को जनभाषा बनाने के लिए इसका अधिकाधिक प्रयोग आवश्यक है। प्रत्येक संस्कृत प्रेमी अपने घर और परिवार से संस्कृत संवाद की शुरुआत करे तो यह भाषा पुनः जन-जन के जीवन में प्रतिष्ठित हो सकती है।

    राज्यपाल सोमवार को केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर परिसर के बहुउद्देशीय सभागार में आयोजित जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के अष्टम दीक्षांत समारोह को संबोधित कर रहे थे। समारोह में कुल 9,422 विद्यार्थियों को विभिन्न उपाधियां तथा 37 शोधार्थियों को विद्यावारिधि (पीएच.डी.) की उपाधि प्रदान की गई। सुप्रसिद्ध संत एवं समाजसेवी ब्रह्मर्षि श्री गुरुवानन्द स्वामी तथा प्रख्यात संस्कृतविद् प्रो. रमेशकुमार पाण्डेय को मानद् विद्यावाचस्पति (डी.लिट्.) की उपाधि से सम्मानित किया गया।

    राज्यपाल ने कहा कि विश्वविद्यालयों का उद्देश्य केवल पाठ्यपुस्तकीय ज्ञान और उपाधियां प्रदान करना नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसी शिक्षा देना चाहिए जो विद्यार्थियों में विवेक, संस्कार और सही-गलत की पहचान करने की क्षमता विकसित करे। भारतीय गुरुकुल परंपरा में शिक्षा का लक्ष्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास था। आज भी ज्ञान तभी सार्थक है, जब उसके साथ चरित्र, नैतिकता और समाज के प्रति उत्तरदायित्व जुड़ा हो।

    उन्होंने संस्कृत की मौखिक और श्रुति परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत में ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्मृति और वाणी के माध्यम से संरक्षित एवं हस्तांतरित होता रहा है। राज्यपाल ने नालंदा के ज्ञान भंडार के विनाश का उल्लेख करते हुए कहा कि पुस्तकालयों को नष्ट किया जा सकता है, लेकिन मनुष्य के मन-मस्तिष्क में सुरक्षित ज्ञान को समाप्त नहीं किया जा सकता। भारतीय ज्ञान परंपरा इसी जीवंत स्मृति और निरंतर साधना के कारण आज भी अक्षुण्ण है।

    राज्यपाल ने भारतीय संत परंपरा को सामाजिक समरसता का आधार बताते हुए जगद्गुरु रामानन्दाचार्य के संदेश “जात-पात पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई” का स्मरण किया। उन्होंने विश्वविद्यालय के प्रणेता ब्रह्मपीठाधीश्वर पद्मश्री नारायणदास महाराज को दूरदर्शी संत बताते हुए कहा कि संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना उनकी भविष्यदृष्टि और ज्ञान के प्रति प्रतिबद्धता का परिणाम है।

    उन्होंने कहा कि उपाधि प्राप्त करने वाले विद्यार्थी केवल डिग्रीधारी बनकर न रहें, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा के संवाहक बनें और अपने ज्ञान का उपयोग राष्ट्र एवं समाज के कल्याण के लिए करें।

    विकसित भारत के संकल्प में संस्कृत विश्वविद्यालयों की बड़ी भूमिका प्रो. वरखेडी

    दीक्षांत समारोह के मुख्य अतिथि केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेडी ने कहा कि विकसित भारत के राष्ट्रीय संकल्प को साकार करने में संस्कृत विश्वविद्यालयों और भारतीय ज्ञान परंपरा की महत्वपूर्ण भूमिका है। राजस्थान की गौरवशाली सांस्कृतिक, शैक्षणिक और ज्ञान परंपरा इस दिशा में सशक्त आधार प्रदान करती है।

    उन्होंने कहा कि दीक्षांत समारोह केवल उपाधियां प्रदान करने का अवसर नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों का स्मरण कराने का महत्वपूर्ण अवसर है। संस्कृत विश्वविद्यालयों का दायित्व केवल शिक्षा प्रदान करना नहीं, बल्कि शास्त्रों, विद्वानों और भारत की ज्ञान परंपरा की रक्षा करते हुए उसकी निरंतरता बनाए रखना भी है।

    प्रो. वरखेडी ने शास्त्र रक्षा की तुलना गंगा के अविरल प्रवाह से करते हुए कहा कि जिस प्रकार गंगा का प्रवाह निरंतर जीवन देता है, उसी प्रकार संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रवाह भी अविच्छिन्न रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि उपाधिधारक केवल डिग्रीधारी नहीं, बल्कि एक महान सभ्यता और ज्ञान परंपरा के प्रतिनिधि हैं।

    उन्होंने संस्कृत विश्वविद्यालयों से आधुनिक ज्ञान-विज्ञान, तकनीकी संस्थानों और अन्य विश्वविद्यालयों के साथ समन्वय बढ़ाने का आह्वान किया। संस्कृत विद्या की सुगंध समाज के प्रत्येक क्षेत्र तक पहुंचनी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को समकालीन शिक्षा, तकनीक और रोजगार से जोड़ना समय की आवश्यकता है।

    इस अवसर पर राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय की कुलगुरु प्रो. मदनमोहन झा ने विश्वविद्यालय का प्रगति प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा, कौशल विकास, तकनीक और रोजगारोन्मुखी कार्यक्रमों से जोड़ने की दिशा में निरंतर कार्य कर रहा है।

    समारोह में राज्यपाल ने विश्वविद्यालय की पहल पर स्थापित राजस्थान मंत्र प्रतिष्ठान की वेबसाइट का लोकार्पण भी किया। उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को 12 स्वर्ण पदक एवं एक कुलाधिपति स्वर्ण पदक सहित कुल 13 पदक प्रदान किए गए। बी.पी. मौर्य स्मृति पुरस्कार और सागरमल जूनीवाल स्मृति पुरस्कार भी प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को प्रदान किए गए।

    समारोह में कुलसचिव डॉ. गुंजन सोनी, परीक्षा नियंत्रक डॉ. शंभू कुमार झा, अनुसंधान केंद्र निदेशक प्रो. राजधर मिश्र सहित विश्वविद्यालय के अधिकारी, शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी एवं बड़ी संख्या में गणमान्यजन उपस्थित रहे।

     

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