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    शी जिनपिंग की भारत यात्रा से रिश्तों में जमी बर्फ पिघलने की उम्मीद, लेकिन व्यापारिक संबंधों में भरोसे की कमी बनी बड़ी चुनौती

    1 hour ago

    Yugcharan News / 10-09-2026

    नई दिल्ली/बीजिंग। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा को दोनों एशियाई शक्तियों के बीच पिछले कुछ वर्षों से तनावपूर्ण रहे संबंधों को सामान्य दिशा में ले जाने की एक महत्वपूर्ण कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। सात साल बाद शी जिनपिंग की नई दिल्ली यात्रा की संभावना ऐसे समय में सामने आई है, जब भारत और चीन के बीच कूटनीतिक स्तर पर संवाद में सुधार के संकेत दिखाई दे रहे हैं। हालांकि, दोनों देशों के बीच आर्थिक और कारोबारी रिश्तों की तस्वीर अभी भी उतनी सहज नहीं है। निवेश संबंधी अड़चनें, वीजा में देरी, तकनीकी उपकरणों की आपूर्ति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सवाल दोनों देशों के कारोबारी रिश्तों पर अब भी भारी पड़ रहे हैं।

    शी जिनपिंग के इस सप्ताह नई दिल्ली में होने वाले वार्षिक ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल होने की व्यापक उम्मीद जताई जा रही है। हालांकि, चीन की ओर से उनकी यात्रा की औपचारिक पुष्टि अभी नहीं की गई है। इसी तरह यह भी स्पष्ट नहीं है कि शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच द्विपक्षीय मुलाकात होगी या नहीं। दोनों नेताओं के बीच संभावित बैठक को इसलिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे आने वाले समय में भारत-चीन संबंधों की राजनीतिक और आर्थिक दिशा को लेकर संकेत मिल सकते हैं।

    भारत और चीन के रिश्ते लंबे समय से जटिल रहे हैं। वर्ष 1962 के युद्ध ने दोनों देशों के बीच अविश्वास की गहरी नींव रखी थी। इसके बाद कई दशकों तक सीमा विवाद, रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव बना रहा। वर्ष 2020 में सीमा पर हुई हिंसक झड़प ने रिश्तों को एक बार फिर गंभीर संकट में डाल दिया। उस घटना में 20 भारतीय और चार चीनी सैनिकों की मौत हुई थी। इसके बाद दोनों देशों के बीच राजनीतिक संबंधों के साथ-साथ व्यापार और निवेश के क्षेत्र में भी कई प्रतिबंध और अतिरिक्त जांच देखने को मिली।

    हालांकि, हाल के वर्षों में दोनों देशों ने तनाव कम करने की दिशा में कुछ कदम उठाए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पिछले वर्ष चीन यात्रा और उसके बाद उच्चस्तरीय संपर्कों में वृद्धि ने संबंधों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया को गति दी। भारत और चीन दोनों इस समय अमेरिका के साथ अपने-अपने संबंधों में कई तरह की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में दोनों देशों के लिए एक-दूसरे के साथ संवाद बनाए रखना रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण हो गया है।

    चीन के दक्षिण एशिया मामलों के विशेषज्ञ और फुदान विश्वविद्यालय से जुड़े लिन मिनवांग के अनुसार, बीजिंग निश्चित रूप से भारत के साथ संबंध सुधारना चाहता है, लेकिन चीन यह भी देखना चाहता है कि नई दिल्ली इस दिशा में कितनी दूर तक जाने के लिए तैयार है। उनके आकलन से संकेत मिलता है कि दोनों देशों के संबंधों में अचानक किसी बड़े बदलाव की संभावना कम है और सुधार की प्रक्रिया धीरे-धीरे आगे बढ़ सकती है।

    भारत में ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन से जुड़े हर्ष पंत ने भी दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी को एक बड़ी समस्या बताया है। उनके मुताबिक चीन के पास बड़ी आर्थिक क्षमता है और वह भारत के लिए एक भरोसेमंद आर्थिक साझेदार के रूप में अपनी भूमिका मजबूत कर सकता है। खासकर उस समय जब भारत और चीन दोनों अमेरिकी व्यापार नीतियों से प्रभावित हो रहे हैं, दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

    भारत ने भी चीन से जुड़े निवेश नियमों में कुछ नरमी के संकेत दिए हैं। मार्च में नई दिल्ली ने 2020 के सीमा विवाद के बाद लगाए गए कुछ निवेश प्रतिबंधों में ढील दी। इलेक्ट्रॉनिक्स, पूंजीगत सामान और सौर सेल जैसे क्षेत्रों में चीनी निवेश को लेकर प्रक्रिया को आसान बनाने पर जोर दिया गया। इसके अलावा कुछ उद्योगों में भारतीय और चीनी कंपनियों के संयुक्त उपक्रमों को तेजी से मंजूरी देने पर भी विचार किया जा रहा है।

    इस दिशा में एक उल्लेखनीय कदम भारतीय कंपनी डिक्सन टेक्नोलॉजीज और चीनी स्मार्टफोन निर्माता वीवो के बीच विनिर्माण संयुक्त उपक्रम को मंजूरी देना रहा। यह फैसला इस बात का संकेत माना जा सकता है कि भारत चुनिंदा क्षेत्रों में चीनी कंपनियों के साथ आर्थिक सहयोग को पूरी तरह बंद करने के बजाय नियंत्रित और निगरानी वाली व्यवस्था में आगे बढ़ाना चाहता है।

    फिर भी, इन कदमों का असर अभी तक चीन की बड़ी कंपनियों के भारत में निवेश पर व्यापक रूप से दिखाई नहीं दिया है। वाहन क्षेत्र की प्रमुख कंपनियां बीवाईडी और ग्रेट वॉल मोटर भारत में अपने निवेश को लेकर पहले से अधिक सतर्क रही हैं। भारतीय अधिकारियों से जुड़े सूत्रों के अनुसार, नई दिल्ली की ओर से बढ़ी हुई जांच और नियामकीय सतर्कता के कारण कुछ प्रस्तावित निवेश योजनाएं आगे नहीं बढ़ सकीं। इससे यह स्पष्ट होता है कि दोनों देशों के बीच राजनीतिक स्तर पर संवाद बढ़ने के बावजूद कारोबारी समुदाय अभी भी जोखिमों को लेकर सावधान है।

    भारत की ओर से चीन से जुड़ी कुछ डिजिटल और तकनीकी कंपनियों पर भी सुरक्षा संबंधी चिंताएं बनी हुई हैं। हाल ही में चीन के एंट ग्रुप से जुड़े अलिपे की उस योजना को मंजूरी नहीं दी गई, जिसके तहत उसे भारत की तत्काल भुगतान प्रणाली से जोड़े जाने का प्रस्ताव था। इस मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा और डेटा से जुड़े सवाल महत्वपूर्ण रहे।

    इसी तरह भारतीय अधिकारियों द्वारा चीन की स्मार्टफोन कंपनी श्याओमी के भारत में कारोबार से जुड़े मामलों की जांच को लेकर भी चर्चा चल रही है। भारत के गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय ने कथित अनियमितताओं और विदेशी निवेश कानूनों के संभावित उल्लंघन को लेकर विस्तृत जांच की सिफारिश की है। हालांकि, कंपनी ने कहा है कि वह भारत के सभी लागू कानूनों का पालन करती है और उसे जांच एजेंसी की ओर से कोई आधिकारिक सूचना नहीं मिली है।

    व्यापारिक संबंधों में केवल भारत की चिंताएं ही समस्या नहीं हैं। चीन की ओर से भी संवेदनशील तकनीक और बुनियादी ढांचा क्षेत्रों से जुड़ी कंपनियों को भारत के साथ कुछ प्रकार के कारोबार को लेकर सतर्क रहने के निर्देश दिए जाने की बात सामने आई है। सूत्रों के मुताबिक बंदरगाह उपकरण, सौर ऊर्जा से जुड़े उत्पाद और मोबाइल विनिर्माण में इस्तेमाल होने वाले उपकरण जैसे क्षेत्रों में चीन की कंपनियों पर सावधानी बरतने का दबाव है।

    यह स्थिति भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश के इलेक्ट्रॉनिक्स, सौर ऊर्जा और बुनियादी ढांचा क्षेत्रों में चीन से आने वाले उपकरण और घटक अब भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कारोबारी सूत्रों के मुताबिक इस वर्ष चीन से आने वाले कुछ उपकरण और कंपोनेंट चीनी सीमा शुल्क प्रक्रिया में अटक गए हैं। इनमें भारत के बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट्स में इस्तेमाल होने वाली बड़ी सुरंग निर्माण मशीनें भी शामिल हैं। एक भारतीय सरकारी अधिकारी के अनुसार कुछ ऐसी मशीनें एक वर्ष से अधिक समय तक अटकी रही हैं।

    व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की रुकावटें केवल सामान्य प्रशासनिक समस्याओं तक सीमित नहीं हैं। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के अनुसार, वीजा और उपकरणों की आपूर्ति में आ रही परेशानियां यह संकेत दे सकती हैं कि चीन भारत की व्यापार और तकनीकी निर्भरता को एक रणनीतिक साधन के रूप में इस्तेमाल कर रहा है।

    फिर भी दोनों देशों के बीच संपर्क पूरी तरह कमजोर नहीं हुआ है। पिछले वर्ष भारत और चीन के बीच सीधी उड़ानों को फिर से शुरू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी और चीनी कारोबारी पेशेवरों के लिए वीजा प्रक्रिया में भी कुछ राहत दी गई। हालांकि, हाल के महीनों में चीन में कारोबारी हित रखने वाले कुछ भारतीय व्यापारियों को वीजा हासिल करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है। चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि जिन भारतीय नागरिकों को चीन की यात्रा की वास्तविक आवश्यकता है, उन्हें कानून और नियमों के अनुसार वीजा जारी किया जाता है।

    ऐसे में शी जिनपिंग और नरेंद्र मोदी के बीच संभावित मुलाकात का महत्व केवल कूटनीतिक शिष्टाचार तक सीमित नहीं रहेगा। यदि दोनों नेता व्यापार, निवेश, वीजा, तकनीकी उपकरणों और सीमा से जुड़े मुद्दों पर ठोस बातचीत करते हैं, तो कारोबारी संबंधों में मौजूद कुछ बाधाओं को दूर करने का रास्ता खुल सकता है।

    पूर्व भारतीय वरिष्ठ व्यापार अधिकारी अनूप वाधवान का मानना है कि दोनों देशों के शीर्ष नेताओं की बैठक राजनीतिक और आर्थिक हितों के बीच बेहतर तालमेल बनाने का अवसर प्रदान कर सकती है। हालांकि, उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अंततः व्यापारिक संबंध दोनों देशों के नागरिकों और कंपनियों के वास्तविक आर्थिक हितों पर निर्भर करेंगे।

    भारत और चीन के बीच मौजूदा स्थिति को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा रिश्तों में सकारात्मक माहौल बनाने में मदद कर सकती है, लेकिन केवल एक बैठक से वर्षों से जमा अविश्वास खत्म नहीं होगा। सीमा विवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा, तकनीकी निर्भरता और निवेश की जांच जैसे मुद्दे अभी भी दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित करेंगे।

     

    आने वाले दिनों में सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि क्या दोनों देश राजनीतिक स्तर पर बढ़ते संवाद को वास्तविक आर्थिक सहयोग में बदल पाते हैं। यदि नई दिल्ली और बीजिंग भरोसा बढ़ाने वाले कदम उठाते हैं और कारोबारी बाधाओं को धीरे-धीरे कम करते हैं, तो दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापारिक संबंधों में नई संभावनाएं पैदा हो सकती हैं। लेकिन यदि सुरक्षा चिंताओं और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का प्रभाव जारी रहा, तो कूटनीतिक गर्मजोशी के बावजूद कारोबारी रिश्तों में सावधानी और संदेह बना रह सकता है।

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